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Sunday, December 1, 2019

'गारगोटी' की अद्भुत दुनिया !

सूई सी नुकीली संरचना

   “I try to sprinkle a little gems and jewels in the music that people could use in their own life.”

     Nipsey Hussle

     कभी हस्सल ने संगीत में रत्न और जवाहरात छिड़कते हुए उसे लोगों के लिये पेश करने की बात कही थी ताकि लोगों के जेहन में उसके प्रति लगाव हो, वे उसे अपना सकें। ऐसी ही कुछ बानगी नासिक स्थित 'गारगोटी मिनरल म्यूजियम' में देखने मिली जिसमें घूमते हुए सचमुच के रत्नों और बेशकीमती पत्थरों का माधुर्य मन में घुलता चला जाता है। वहां आने वाले लोग रंग-बिरंगे पत्थरों के लुभावने सौंदर्य और विशिष्ट संरचनाओं को देख मन ही मन प्रफुल्लित और एक किस्म की कशिश सी महसूस करते हैं। कहीं जामुनी रंग के बिल्लौरी पत्थर नज़र आते हैं तो कहीं पीला पुख़राज। कहीं नीलम तो कहीं रूबी। मानों रंग-बिरंगे चमकीले पत्थरों का एक तरह से दरबार सजा हो।


चट्टानों में फंसी हवा


नासिक स्थित इस गारगोटी म्यूजियम के बारे में करीब सोलह-सत्रह साल पहले सुना था। एक-दो बार उस ओर से गुजरा भी था लेकिन जा नहीं सका। इस बार शिर्डी जाने पर प्लान में ‘गारगोटी म्यूजियम’ भी शामिल कर लिया कि इस बार जाना ही है। गूगल पर सर्च किया तो पता चला शिर्डी से करीब साठ किलोमीटर दूर है। सब कुछ सेट करके अगले दिन सुबह साढ़े आठ बजे होटल से निकले। खुशनुमा मौसम में चलते हुए रास्ते में जगह-जगह अमरूद, अनार और बेर की दुकानें सजी नजर आ रही थीं। ताजे और आकर्षक बड़े अमरूदों को देख मन हरा हो जाय ऐसी तो बानगी रही। गाड़ी में ड्राईवर ने गाने चला रखे थे। बढ़िया शानदार सड़क पर कभी बीड़ी जलईले चल रहा था तो कभी ‘गिलहरी के जूठे मटर’ खाने की जुगत भिड़ाई जा रही थी। तभी मनमर्जियाँ फिल्म का मेरा फेवरेट गाना चला – ‘सतलुज में इक समंदर नाचे...अप्रैल मई विच दिसंबर नाचे...’। इस गाने को मैं कई बार सुन चुका हूं। हर बार अच्छा लगता है। तब और जब गाने में कहा जाता है - पोरस दे विच...सिकंदर...नाचे ! बढ़िया संगीत, शानदार लिरिक्स।

गाड़ी लगातार आगे बढ़ी जा रही थी। ड्राईवर से बातचीत में पता चला कि गारगोटी म्यूजियम यदि मुंबई या कहीं बड़े शहर के बीचोबीच होता तो बहुत सारे लोग देखते लेकिन ये इतनी दूर और गाँव एरिया में पड़ता है कि बहुत कम लोग ही वहां पहुंच पाते हैं। मुझे उस लेखक की बात याद आ गई जिसका मकान गली के सबसे आखरी छोर पर था। किसी ने उससे पूछा कि इतने आख़िर में क्यों घर बनवाया तो उसने कहा – “ताकि मुझ तक वही लोग पहुंच सकें जिन्हें सचमुच मुझसे मिलने की चाहत हो। जिसे पहुंचना होगा वह मुझ तक किसी भी तरह पहुंच जायेगा ।” अपने आप में दार्शनिक अंदाज़ में कही यह बात काफी हद तक सच भी है। हम लोग रोज अपने मोबाइल फोन पर लगातार फिजूल के मैसेज आते देखते हैं। कभी मार्केटिंग तो कभी फलाना-ढिमकाना। शायद हंस या पाख़ी पत्रिका में कहीं पढ़ा था कि लेखक केदारनाथ सिंह BSNL का सिम कार्ड इसलिये इस्तेमाल करते थे क्योंकि उसका नेटवर्क बहुत खराब था। फोन अक्सर नहीं लगता था। कई बार ट्राय करने के बाद ही बात हो पाती थी और इसलिये केदारनाथ सिंह फिजूल के फोन करने वालों से बचे रहते थे।

खैर, अपन गारगोटी पहुंचे तो अभी सुबह के साढ़े नौ बजे थे। टिकट लेकर भीतर गये तो सामने ही भारत माता की सुंदर मूर्ति। आसपास मौहाल ही एकदम अलग सा लग रहा था। कहीं क्रिस्टल तो कहीं पत्थर तो कहीं कुछ। वहां मौजूद गाईड ने एक-एक कर हमें वहां मौजूद रत्नों, रंग-बिरंगे पत्थरों के बारे में बताना शुरू किया। उन्हें देख विश्वास नहीं होता था कि ये प्रकृति ने स्वंय बनाये हैं। ऐसे सुंदर रंग, ऐसी शानदार संरचना कि दिल खुश हो जाय। जेहन में कवि नीरज की लिखी उस गीत की पंक्तियां तैर रही थीं जिनमें वो – बादल-बिजली-चंदन-पानी की बात कर रहे थे। शायद उसी मिश्रण से ऐसी प्यारी और सुंदर संरचनाएं बनी होंगी। उन्हें बार-बार छूने का मन कर रहा था। गाईड ने बताया कि ये इतने बारीक और महीन हैं कि छूने पर रूई की तरह महसूस होंगे लेकिन जब उंगलियों से खून निकलने लगता है तब पता चलता है कि कहीं चुभ गया है।

महीन चट्टानी रेशे, मानों कोई चूजा बैठा हो

ऐसा ही फलसफा शायद जीवन में भी कभी-कभार देखने में आता है। इंसानी रिश्तों में कभी कोई किरचें ऐसे ही चुभ जाती है जिसका पता हमें बाद में चलता है।

अगले शोकेस की ओर बढ़े तो पता चला सामने जो जामुनी रंग की चमकदार क्रिस्टल्स संरचना रखी है वह ब्राजील के खदानों से आई है। इसे ऐसे ही साबूत रूप में पानी से धोने के बाद वैसे का वैसा लाकर रख दिया गया है। इसे लाने में कितनी मशक्कत की गई होगी उसे इस बात से समझा जा सकता है कि जब कभी उसे हटाया या सरकाया जाता है साफ सफाई के लिये तो उससे कुछ न कुछ किरचें झड़ जाती है। इसलिये जितना हो सके ऐसे नाजुक मिजाज पत्थरों को साफ-सफाई के दौरान सरकाने-हटाने से बचा जाता है। ठीक उस तुनकि मिजाज बच्चे की तरह जो जब तक हो अपने से ही खेलने में तल्लीन रहता है लेकिन अगर कोई हाथ भी लगा दे तो आसमान सर पर उठा ले। ऐसा ही कुछ यहां भी है।

एक दूसरे शोकेस की तरफ देखा तो वहां हरे रंग के क्रिस्टल्स दिखे जिन्हें देख लगता था कि सफ़ेद रंग के आईस्क्रीम पर हरे रंग की टॉपिंग्स की गई हो। एक दूसरे क्रिस्टल को देखा जिसमें हवा का बुलबुला फंसा था। मैं कल्पना कर रहा हूं कि जब धरती के गर्भ में यह सब सृजन हो रहा होगा तो वह दौर कितना रोमांचक और आल्हादकारी होगा। अब भी धरती के भीतर यह सृजन कहीं न कहीं चल ही रहा है। एक क्रिस्टल तो ऐसा लगा मानों केमिस्ट्री लैब में पानी भरे टेस्ट ट्यूब आड़े-तिरछे करके रख दिये गये हों। गाईड ने बताया कि हजारों-लाखों साल में बने ये क्रिस्टल अमूमन तब मिलते हैं जब कहीं ज्वालामुखी की नली सूख जाय और बाद में वहां सड़क या किसी इमारत का निर्माण कार्य करने के लिये ब्लास्टिंग करी जाय। उस समय धरती के भीतर से निकले इन रत्नों को देखने पर ये धूल-धुसरित नज़र आते हैं। पानी से धोते साथ इनका असली रंग नजर आता है। ऐसे ही ढेर सारे कंकड़-पत्थर यहां रखे गये हैं जिनमें ज्यादातर भारत के दक्खिनी प्लैटो से लाये गये हैं। शायद यही वजह है कि इस म्यूजियम का नाम ‘गारगोटी’ रखा गया जिसका मराठी भावार्थ है – कंकड़-पत्थर !


वहीं पर सफ़ेद किरचों वाले एक पत्थर के बारे में बताया गया कि जो लोग नहीं जानते वे इसे पीसकर रंगोली के तौर पर इस्तेमाल कर लेते हैं। विडम्बना देखिये कि जिस रंग- रंगोली को धरती ने खुद ब खुद तैयार किया उसी को बिगाड़ कर इंसान अपने हिसाब से रंगोली बनाने लगता है। प्रकृतिदत्त संरचनाओं को अपने हिसाब से बनाने-बिगाड़ने की प्रवृत्ति संभवत: मनुष्य में जन्मना है।

      हरे रंग के बच्चे को गले लगाती पन्ना

आगे बढ़े तो एक जगह शोकेस में मटमैली सी ऐसी आकृति दिखी जिसे देख कर लगता था कोई स्त्री बच्चे को गले लगा रही हो और बच्चा भी अपनी माँ के पास सुरक्षित महसूस कर रहा हो। नीचे उस पत्थर का नाम पढ़ा तो लिखा था – Emerald, जिसे हम पन्ना के नाम से जानते हैं। कैसा अद्भुत संयोग है कि इतिहास में एक ‘पन्ना धाय’ भी थीं जिन्होंने राणा सांगा के पुत्र को बचाने के लिये अपने बच्चे को आगे कर दिया था। पूरा इतिहास आँखों के सामने घूम गया। इस पन्ना में भी एक स्त्री थी जो बच्चे को गले लगा रही थी। शायद बिछड़ने से पहले का दृश्य था। प्रकृति ने रच दिया।



आगे बढ़े तो पता चला कई और देशों से भी रंग-बिरंगे रत्न लाये गये हैं। कोई अफ़गानिस्तान से तो कोई पाकिस्तान से। अमेरिका, श्रीलंका, फ्रांस हर ओर के बेशकीमती रत्न, रंग-बिरंगे पत्थर। यूं तो घर बनते समय बालू या रेत के बीच से निकले सुडौल गोलाकार छोटे-छोटे पत्थरों को अमूमन हम सभी बचपने में खेलते रहे हैं। उस समय हमारी सारी दुनिया उन पत्थरों के इर्द-गिर्द रहती थी। आस-पास क्या हो रहा है, गर्मी है कि सर्दी है, भूख-प्यास सब भूल जाते थे। फिर यहां तो तमाम तरह के सुडौल, रंगीन पत्थर थे। तप्त ज्वालामुखी के पेट से निकले कुछ तो ऐसे लाल आकर्षक कि जिन्हें बार-बार छूने का मन करे, कुछ तो यूं मानो फ्रूट-कैंडी रखे हों।



आगे दूसरी मंजिल पर कई तरह के खनिजों से सामना हुआ। उन्हें देखने से पता चला कि तांबा, सोना, हीरा, लोहा आदि अपने मूल स्वरूप में धरती के भीतर किस तरह के आकार में होते हैं। जमीन के भीतर जब खोदा जाता है तो वो आख़िर किस अवस्था में मिलते हैं। वहीं पास ही डायनासोर के अवशेष भी मिले जिनमें एक अंडा भी रखा था। किसी शॉटपुट के गोले की तरह का आकार। बगल वाले शोकेस में मैमथ के दांतों के अवशेष दिखे। आज भी कहीं-कहीं ध्रुवीय प्रदेशों में भीमकाय मैमथ के अवशेष मिलने की खबरें सुनाई पड़ती हैं। एक जगह उल्का पिंड के अवशेष दिखे। उन्हें देखकर मन में कई बार यह खयाल आता है जानें कितने साल पुराना इसका निर्माण हुआ होगा। न जाने किस-किस रास्ते होकर और कितने ताप-शीत झेलते हुए यह धरती पर पहुंचा और आज यहां है। नासिक के इस प्राइवेट म्यूजियम में। बता दूं कि इस म्यूजियम का निर्माण श्री कृष्ण चंद्र पाण्डेय ने रंग-बिरंगे पत्थरों का संग्रह करने के अपने शौक के चलते करवाया है। लंबे समय से वे इन पत्थरों का संग्रह करते चले गये। आज यह इतना बड़ा और आकर्षक हो गया है कि नासिक के प्रमुख स्थानों में गिना जाने लगा है। नासिक से करीब तीस किलो मीटर और शिर्डी से करीब साठ किलोमीटर दूर।

धीरे-धीरे अब तमाम शो-केस कवर कर चुके थे लेकिन मन नहीं भरा था। एक बार फिर से चक्कर लगाकर वापस लौटने को हुए तो सामने ही नर्मदा नदी से निकला एक अंडाकार पत्थर दिखा। उसे देखने के बाद लगा कि – अरे इन सब के बीच ये कैसे छूट गया ? नर्मदा से निकले उस पत्थर को देख याद आई अमृतलाल वेगड़ की जिन्होंने करीब तीस साल में नर्मदा की पैदल चलते हुए खण्ड-खण्ड परिक्रमा की थी। जबलपुर से निकलते हुए गुजरात और फिर पार होकर वापस गुजरात से जबलपुर। अपनी इस तीस साल लंबी यात्रा का सुंदर विवरण उन्होंने ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ में लिखा है। नौकरी करते हुए कभी दीपावली की छुट्टी में तो गभी गर्मी में वे पैदल निकल पड़ते थे और जहां से पिछली यात्रा छोड़ी थी वहां से फिर शुरू करते थे। इसे एक तरह की साधना ही कहूंगा कि जिसमें ऐसे लोग लंबे समय तक जुड़े रहते हैं। ये अलग ही मिट्टी के बने होते हैं। अपनी किताब में वेगड़ जी ने अपने साथ चल रहे एक युवक अनिल का जिक्र किया है जिसमें वे लिखते हैं कि – “धूप में सारा दिन चलते रहे। शाम को गोरा पहुँचे। भोर होते ही चल दिया। नर्मदा के कँकरीले पाट में से जा रहे हैं। अनिल कंकड़ बीनता चलता है। मैं सोचता हूँ, अभी तो यात्रा की शुरूवात है, वैसे ही बोझ से लदे हैं, यह अतिरिक्त बोझ वह कब तक ढो सकेगा। पर युवा ह्रदय को कोई कैसे समझाए !”
नर्मदा से निकला पत्थर
   मुझे लगा कि शायद के सी पाण्डेय जी को भी उनकी युवावस्था के दौरान किसी ने कहा होगा कि इन कंकड़ पत्थरों को बीन कर आखिर में क्या हासिल होगा लेकिन आज देखिये ! यह वही कंकड़ पत्थर हैं जिन्हें देखने हम इतनी दूर से आ पहुंचे। के सी पाण्डेय जी से मिलने की इच्छा हुई लेकिन पता चला वे अभी अमेरिका में हैं। मिलने की साध अधूरी रही। शायद आगे कभी संयोग हो और उनसे मिल सकूं।

अंत में वेगड़ जी की किताब के उस अंश से अपनी बात समाप्त करता हूँ जिसमें उन्होंने नर्मदा के तमाम कंकड़-पत्थर और चट्टानों को देख कर लिखा है कि – वैसे तो नर्मदा रेत या मिट्टी में से बहती है, लेकिन बीच-बीच में वह चट्टानों में आ जाती है। ...नर्मदा इन चट्टानों पर से कई छोटे-छोटे प्रपातों के रूप में नीचे गिरती है। यहाँ वह कूदने का, गिरने का, दौड़ने का और चट्टानों से टकराने का अभ्यास करती है। यह तो मानों नर्मदा की व्यायामशाला है !
नर्मदा ने अपनी राह में जगह-जगह ऐसी व्यायामशालाएँ स्थापित की हैं। शायद इसीलिए वह आरम्भ से लेकर अन्त तक अपने आपको तेजस्वी और उल्लसित रख सकी है”

   नर्मदा जी की ऐसी ही व्यायामशाला से निकले उस पत्थर को मन ही मन छूकर अपनी वापसी शुरू हुई ।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ फ्रांस, अमेरिका, ब्राजील के पत्थरों के पास जलगाँव का बिल्लौर रखा है।
समय – वही, जब पुणे की चट्टान अफ़गानिस्तान वाली चट्टान से कहे – “चाय पियोगे ? एकदम मस्त पुणेरी चाय”

और तभी अफ़गानी चट्टान कहे – “इसे भी पिलाना, ये मुलतान से है”


1 comment:

राजेंद्र गुप्ता Rajendra Gupta said...

आपकी जादुई लेखनी से अद्भुत विवरण! इन बहुमूल्य सुंदर रत्नों का एक गारगोटी दिल्ली में भी है। लगभग अनाम। बहुत कम लोग देखने जाते हैं। कनाट प्लेस में बाबा खड़कसिंह मार्ग पर राजीव गांधी हैंड़ीक्राफ्ट भवन में राज्यों के एम्पोरिया के ऊपर, तीसरे ताल पर। gargotidotcom/delhi/

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