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Monday, September 2, 2019

कल्पना...!

   छत पर सूखते कपड़ों से रह-रह कर टपक रहे पानी के छीटों से परेशान चींटी कभी दायें ओर मुड़ती-कभी बायें ओर। एकाध बार ठहर भी गई लेकिन छींटे थे कि फिर से आगे जाने के लिये मजबूर कर रहे थे। वहीं करीब ही उस काई लगी छत पर पिछले दो-तीन दिनों से पड़ा सूखा पत्ता अब सड़ने लगा था। उसके काले पड़ चुके किनारों पर चींटी पहुंचने ही वाली थी कि फिर से एक बूंद टपकी और चींटी ठिठक सी गई। उधर पत्ता भी परेशान था कि ये पानी टपकना खत्म क्यों नहीं हो रहा। उसकी वजह से छत पर नमी बनी रहती है और उसका सड़ना तेजी से होता है जबकि अभी पत्ता चाह रहा था कि कुछ और समय मिल जाय तो छत पर रहते हुए कुछ और नज़ारे देख सकूं।
      उधर चींटी थोड़ा सा पीछे सरकते हुए बगल से चल पड़ी। पत्ते से दूरी बनाते हुए काई छू ही रही थी कि धप्-धप् करते सीढ़ियां चढ़ते किसी के आने की आहट हुई। चींटी ठिठक गई। एक बारह-तेरह साल की लड़की हाथ में एक छड़ी लेकर छत की रेलिंग से सटे कच्चे पपीतो को तोड़ने आगे बढ़ गई। चींटी काई से अलग हट सूखी जमीन की ओर चल पड़ी। लड़की ने रेलिंग का सहारा ले उचक कर पपीतों को छड़ी से गिराना चाहा। रेलिंग के दूसरी ओर नीचे कोई खड़ा था जो गिरते कच्चे पपीतों को शायद जमा करने आया था। लड़की ने एक दो बार जोर से छड़ी खेंच कर पपीते के डंठलों पर चोट की लेकिन पपीते फिर भी न टूटे। रेलिंग के निचले हिस्से पर पैर रख अब लड़की ने पपीते के डंठलों में छड़ी से एक-दो बार कोंचा। खट की आवाज के साथ एक पपीता नीचे जा गिरा। टूटने की जगह पर दूध की बूंदें चुह-चुहाकर गिरने लगीं। एक बार फिर बचे हुए दूसरे पपीते को लड़की ने छड़ी से कोंचा और फिर वही बात। उसी तरह से खट की आवाज हुई और दूध की बूंदें। अब लड़की रेलिंग से नीचे उतर आई। काई से बचते-बचाते वापस सीढ़ियों की ओर बढ़ चली।
   चींटी अब उस रेलिंग की ओर बढ़ चली जहां लड़की ने अभी पपीते तोड़े थे। गीले कपड़ों से पानी अभी भी रह-रह कर टपक रहा था। बचते-बचाते रेलिंग के करीब पहुंचते ही किसी लिसलिसी चीज में पैर फंस से गये। ओह...ये ...। यह वही छड़ी थी जिससे पपीते तोड़ने के बाद उसे यूं ही छत पर फेंक दिया गया था। उसमें दूध लग चुका था और अब चींटी उसी में फंस चुकी थी।
    उधर पत्ता यह सब देख रहा था। उसे चींटी पर गुस्सा आ रहा था कि संभल कर नहीं गई। उधर चींटी मन ही मन सोच रही थी कि पत्ते की ओर जाती तो शायद खतरा न होता। क्या पता कुछ खाने लायक मिल जाता। तभी गीले कपड़ों से एक बूंद टपकी ओर छींटे पड़ गये। लेकिन छींटे इतने भी न थे कि चिपचिपे दूध से उसे छुड़ा सकें। एक तो छड़ी का दूध लगा सिरा टपकती बूंदों से थोड़ा हट कर था और दूसरे बूंदें भी अब धीरे-धीरे ही गिर रही थीं। उनमें पहले जैसी तेजी न थी। चिपचिपे दूध में से बाहर निकलने की चींटी की तमाम कोशिशें बेकार हो रही थीं। इस बीच एक हवा का झोंका आया और सड़ रहा पत्ता थोड़ा सा सरक कर काई से छू गया। उधर काई भी चींटी की हरकतों पर नज़र रख रही थी। अचानक पत्ते के छू जाने से उसका ध्यान बंटा। दोनों ने एक दूसरे को समझा और फिर से चींटी की ओर देखने लगे।
   कपड़ों से टपकती बूंदों में यह कानाफूसी शुरू हो चुकी थी कि नीचे एक चींटी पपीते के दूध में फंस चुकी है। शर्ट की आस्तीन पर नई बन रही बूंद ने सूख रहे दुपट्टे की बड़ी हो चुकी बूंद को मन ही मन हिदायत सी दी कि थोड़ा चींटी के करीब गिरना। हो सकता है इसी में वह दूध से अलग हो जाय। दिक्कत ये कि वे सभी एक ही कतार में गिर सकती थीं। कपड़े और हादसे वाली जगह के बीच अभी भी फासला था। कुछ और बूंदें एक-एक कर गिरीं लेकिन निष्फल! चींटी अभी भी वहीं फंसी थी। तभी बगल में सूख रहे बनियान से एक बूंद छड़ी पर गिरी। ढलान पाकर वह छड़ी के दूध लगे सिरे की ओर बढ़ी लेकिन पहुंच नहीं पाई। पहले ही ढुलक गई।
     उधर छड़ी भी मन ही मन खुद को कोस रही थी कि थोड़ा और सीधी होती तो बूंद आखिरी छोर तक पहुंच जाती। हो सकता है उसी से चींटी निकल जाती। इसी उहापोह के बीच एक गिलहरी छत पर उतर आई। इन सब मामलों से अनजान वह जामुन की सूखी गुठली की ओर बढ़ गई। कपड़ों से टपकती बूंदों ने मन ही मन मनाया कि गिलहरी छड़ी की ओर बढ़ जाये। थोड़ा हिलाये-डुलाये तो हो सकता है चींटी निकल जाय लेकिन गिलहरी तो अपने में ही मगन थी। इस बीच सीढ़ियों पर फिर से धप्-धप् की आवाज़ सुनाई दी। अबकी घर की कोई महिला थी। आते साथ उसने छड़ी को उठाया और उससे कपड़ों को रस्सी पर ठीक से फैलाना शुरू किया। गुस्से में थी। लड़की को कहा भी था कि पपीते तोड़ने के लिये छत पर जाना तो कपड़ों को उलट-पलट कर थोड़ा सा फैला भी दे लेकिन नहीं। यह सारा काम तो उसके जिम्मे है।
   अब चींटी गीली साड़ी पर सहमी सी ठिठकी थी। दूध कब का पैरों से छूट चुका था। काई ने एक जम्हाई सी ली और पत्ते ने राहत की सांस। गिलहरी कहीं नज़र नहीं आ रही थी। नज़र आ रहा था तो छत से सटा पपीता और उसकी मुस्कराती दुधिया बूंदें।
  चींटी अब धीरे-धीरे रस्सी के किनारों की ओर बढ़ चली थी। तभी महिला ने सिकुड़े बनियान को रस्सी से उतार कर जोर से फटकारा। एक फुहार सी हुई। असंख्य बूंदें हवा में छिटकीं !

अगले ही पल चींटी रस्सी पर थी… किनारे से बस थोड़ी दूर !
- Satish Pancham

1 comment:

अजय कुमार झा said...

ऐसी अद्भुत कल्पना सिर्फ सफ़ेद घर के सतीश पंचम ही कर सकते हैं | क्या कहूँ अद्भुत वो तो खैर आपको भी पता है की सचमुच ही नायाब लेखन है आपका | साधुवाद और शुक्रिया इसे साझा करने के लिए | बेहतरीन बेहतरीन और उससे भी बेहतरीन | कमाल की पोस्ट है ये

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