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Wednesday, September 7, 2016

'ऑकुपाई चारपाई'.......गंवई मानस !

मेरे गाँव में प्रधान के चुनाव के वक्त एक चुनाव चिन्ह चारपाई भी थी 
  काँग्रेस पार्टी वाला वह खाट मर्मज्ञ जो कोई भी रहा हो लेकिन चुनावी सभाओं के लिये दिया गया उसका खाट पंचायतवाला आईडिया कमाल का रहा । इसलिये भी कि अमूमन लोग किसी मसले पर खाट शब्द सुनते ही उसका शब्द-युग्म या उससे जुड़ा नकारात्मक मुहावरा बोलना शुरू कर देते हैं मसलन - खाट खड़ी कर देना, खटिया खड़ी बिस्तरा गुल, खाट के ठाठ टाईप। लेकिन खाट पंचायत के दौरान काँग्रेसी सभाओं में जो कुछ भी हुआ उसकी शायद कम ही लोगों को उम्मीद हो । कम ही इसलिये कहना चाहिये क्योंकि जो लोग गाँव-देहात से जुड़े हैं वे जानते हैं कि शादी-ब्याह के दौरान खाट को लेकर कितनी बमचक मचती है। पहले जब बारात आती थी तो लोग समूचे गाँव में निकलते थे कि हर घर से एक-एक खाट ले लो। बाद में बारात लौटने के बाद लौटा दिया जाता था। हर कोई देता भी था क्योंकि आज नहीं तो कल उनके यहाँ भी शादी ब्याह के मौके पर बारातियों के लिये खाट की जरूरत पड़ेगी और आज ना कहने का मतलब है कि अपने टाईम मुश्किल झेलना। इस दौरान वह घर सबसे पहले खाट दे देता था जिसके यहाँ हाल-फिलहाल बारात आने वाली हो। सिर्फ खाट ही नहीं, तकिया, दरी, गद्दा, कण्डाल सभी कुछ सामूहिक रूप से इस्तेमाल होता था।
   
    इसमें कई लोग चालाकी कर जाते थे। जब जानते कि लगन का टाईम है तो अच्छी वाली खाट भीतर वाले घर में छुपा देते या उस पर गुदड़ी डाल देते। कुछ तो रात-दिन सूखी दाल को ही फैला कर सुखवाते। नहीं कुछ तो बूढ़े-बुजुर्गों को लिटा देते कि सोये रहो, जब बटोरने वाले आयेंगे तो कह दिया जायगा कि अभी खाली नहीं है, देख रहे हैं वे खटिया पर ही हग-मूत रहे हैं, कैसे दे दें ? जानने वाले भी समझ ही जाते क्योंकि यही तो वह सब भी किये हैं। खैर, आगे समय बदला और ग्राम्य सामूहिकता की हूंट-टूंट के बीच बाजारवाद की पहुंच ने एक धक्का दे दिया। अब लोग टेंट हाऊस से खटिया बिस्तरा लाने लगे। यह सोच बनने लगी कि जैसे बाकी खरचे वैसे एक यह भी सही। कौन जाय लोगों से घर-घर मांगने कि खटिया दे दो, बिस्तरा दे दो। इस सिकुड़ती सामूहिकता के बीच नौजवान भी लोगों से मांगने में शर्माने लगे क्योंकि यही वह तबका था जिसके जिम्मे इन सब चीजों के जुटाने की जिम्मेदारी होती थी। नौकरी करने वाले परिजनों के जरिये बाहर से रूपया-पैसा आने लगा तो लोग भी हाथ खोलने लगे। नये-नये टेंट हाऊस खुलने लगे। रोजगार का एक नया जरिया बना। भले ही सामूहिकता की कीमत पर यह बदलाव हुआ लेकिन हुआ।

   
    इसके बाद वह दौर आया कि बारातों में द्वार पूजा के समय ही लोग टेंट हाऊस से आये फोल्डिंग खाट को अपने लिये छांट लेते और पास ही के खेत में कहीं अंधेरे में जाकर फेंक आते ताकि खाना खाने के बाद लौटकर ठाठ से खाट पर सो सकें । इधर द्वार-पूजा का कार्यक्रम चलता, नचनिया नाचते हुए पसीने-पसीने हो जाता । ऐसे में कुछ की नज़र कन्या पक्ष की ओर खड़ी सुंदर बालाओं पर तो कुछ की नज़र ट्रैक्टर से उतरते खाट पर । कुछ ऐसे भी होते हैं जो नाचते नाचते जमीन में गड़े खूंटे पर नज़र रखते हैं और इसके पीछे गंवईं कारण भी है। होता यह है कि बारात आने के रास्ते में जो कुछ गाय-बैल, बकरी, भैंस बंधे होते हैं उन्हें हटाकर कहीं पेड़ से तो कहीं घर के पिछवाड़े बांध दिया जाता है लेकिन खूंटा वहीं गड़ा रहने दिया जाता है। नतीजतन लोग नाचते हुए कितना ललनाओं की ओर देखें, कितना भी मानें कि पीली वाली देख रही है तब भी उनकी नज़र जमीन में गड़े खूंटे को देख रही होती है कि कहीं अंगूठे में ठेस न लग जाय वरना लत्ता बांधकर घूमना पड़ेगा।

    इस बीच कुछ बारातें शालीन किस्म की होती हैं। उसके बाराती थोड़ा धैर्यवान किसिम के होते हैं। गोधूलि बेला में जब ट्रैक्टर से फोल्डिंग खाट उतरती है तो वे उन खाटों को यूं देख कर निकल जाते हैं मानों उनकी कोई वैल्यू ही नहीं। यहाँ तक कि द्वार पूजा के समय भी ये पूरे मनो योग से कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं, पूरे धीर-गंभीर होकर मिठाई वाला दोना थामते हैं, पानी पिलाने वाले को इज्जत से बुलाते हैं कि भाई तनिक इनको भी दिजिये। यह अलग बात है कि इस इनको भी में मुझे भी दिजिये वाला भाव शामिल होता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो ट्यूब लाईट से दूर कोने वाली जगह तलाशते हैं ताकि मन भर लड्डू पेड़ों का ध्वंस किया जा सके। जो मिठाई पसंद न आये उसे कल्ले से जमीन पर गिरा दें और सिर्फ गुलाब-जामुन और छेना, बर्फ़ी पर आईंस्टाईन के E=MC स्क्वेयर वाली थ्योरी अप्लाय की जा सके। उजाले में यह थ्योरी फेल होने के चांसेस रहते हैं क्योंकि कोई परिचित इस तरह उन्हें भकोसते देख मुस्करा सकता है। यहाँ ट्यूबलाईट से दूर अंधेरे में इज्जत बनी रहती है।
ठंड का मौसम हो तो  पार्टियाँ अलाव के जरिये भी लोगों को जुटा लें 
  
    फिर थोड़ी देर बाद दूसरी ओर शादी-विवाह चलने लगता है तो दूसरी ओर खाने की पंगत शुरू हो जाती है। लोग ललकार ललकार कर बांटने वालों को प्रोत्साहित करते हैं कि अरे यहाँ दाल दिजिये, यहाँ गुलाब जामुन रखिये। यहाँ खटमिट्ठी आम की फांकी रखिये। यहाँ कटहल का रसेदार दिजिये। सभी काम में लगे होते हैं तो कुछ का काम यही रहता है कि देखो कोई नौजवान बांटते-बांटते रसगुल्ले वाली बाल्टी लेकर अंधेरे में अपने घर की ओर न चल दे। तो कुछ का काम रहता है कि भले ही कुछ काम न करें लेकिन ऐसा हाव-भाव बनाये रहें जैसे वही सब कंट्रोल कर रहे हैं। ऐसे लोगों को गंवईं बोली में कहा जाता है कि – पिसान पोत कर भण्डारी बननामतलब भण्डार घर की सामग्री की देखभाल करने वाला कोई और है लेकिन अपने शरीर पर पिसान यानि गेहूँ का आटा पोत कर भण्डार गृह का मालिक बना कोई और घूम रहा है। देखा जाय तो इस तरह के आटा पोत भण्डारी हर जगह हैं। राजनीति से लेकर ठेलानीति तक। पता चला राकेट भेजने की तैयारी किसी और ने करी लेकिन छोड़ते समय सरकार बदल गई और भण्डारी जी पहुंच गये कि जो किया हमने ही किया।
  
    खैर, खान-पान के दौरान ऐसा भी समय आता है कि कुछ बाराती पहली पंगत में बैठ कर खाना खाने के लिये टूट पड़ते हैं। इस पहली पंगत वाला लॉजिक ये कि जल्दी से खाना फिनिश करें और सबसे पहले ट्रैक्टर से उतरे खाट पर रात भर के लिये कब्जा जमा लें वरना कहीं शामियाने में सबके बीच बैठ कर नाच देखना पड़ेगा, नींद लगेगी सो अलग। इस तरह खाट मिल जायेगी तो सोओ चाहे जागो अपनी मर्जी। फिर कुछ ऐसे भी रहते हैं कि द्वार पूजा के समय ही भकोस कर खा लेते हैं ताकि खाना कम खाना पड़े और सबसे पहले खाट पर कब्जा जमाया जाय। कुछ तो ऐसे भी होते हैं कि अपने घर भले ही बोरा बिछा कर सोते हों लेकिन बारात में उन्हें खाट चाहिये ही चाहिये। खाट न मिला तो समझो इज्जत में कमी कर दी। वैसे खाट के लिये इस आतुरता की वजह यह भी है कि खाने के बाद तुरंत तो कुछ ज्यादा नींद नहीं लगती, चकर-पकर में, हंगामें नाच-गाने के बीच कुछ देर चल जाता है लेकिन जैसे जैसे रात के दो-तीन बजते हैं तो नींद अपना पूरा जोर मारती है। सुबह चार-बजते बजते तो अच्छे-अच्छे नचदेखुआ भी नींद में धराशायी होने लगते हैं। ऐसे में खाट बड़ी काम आती है सिर्फ खुद के लिये ही नहीं बाकी जीव-जंतुओं के लिये भी। पता चला इधर आप अकेले खाट पर सो रहे हैं और सुबह नींद खुले तो पैताने के पास कोई गाँव का कुत्ता भी गोल-मटोल होकर सोया है। दोनों ओर से शांति-पूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल।     
   
    फिर धीरे-धीरे वह माहौल भी खत्म होने लगा और लोग अपने बाईक से या किसी गाड़ी से बारातों में जाने लगे। जो नज़दीकी परिजन होते वे तो शादी ब्याह के लिये रूक जाते और जो सिर्फ प्योर बाराती रहते वे खाना खाने के बाद अपनी-अपनी गाड़ी उठा चल देते। बारात का मजा भी लिया और रात ही में घर भी पहुंच लिये। ऐसे वक्त पर जो अपने घनिष्ठ को रोकना चाहता है तो एकाध मजाकिया फब्ती भी कस ही देता है, मसलन क्या घर पर जाकर पत्नी की रखवाली करने जा रहे हो ? क्या करोगे जाकर ? ठहर जाओ, बारात में आये हो तो बाराती बन कर रहो । लेकिन लोग-बाग रहते हैं कि इस मजाक को मुस्की मारते निकल लेते हैं। घर पर जा कर अपने वाले खाट पर सोयेंगे कि टेंट हाऊस वाले नॉयलॉन के फोल्डिंग खाट पर सोयेंगे !
  
    इस लिहाज से देखा जाय तो काँग्रेस की सभा के बाद खाट लूट ले जाने को हैरान होकर सिर्फ़ शहर वाले देख रहे हैं। वह भी वे और आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं जो ऑफ़िस की मीटिंग या सेमिनार के दौरान मिले पेन को अपनी जेब में खोंस कर चल देते हैं। बिना एक लाईन लिखे पैड को अपने बैग में ठूंस कर चल देते हैं। ऐसे लोगों को तब आश्चर्य नहीं होता जब वे गोलगप्पे वाले से अंत में एक सूखा देने की गुज़ारिश करते हैं याकि धनिया-मिर्ची लेते हुए कड़ी पत्ता डालने की जिद करते हैं। तब भी नहीं जब थैली पास में होने के बावजूद सामान खरीदते समय प्लास्टिक की पन्नी के लिये दुकानदार से बकझक करते हैं। ऐसे ही लोग शायद इस खाट लूट पर ज्यादा हैरान हैं। 

        उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि यह खाट, यह चारपाई एक तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसके चारों पाये लोकतंत्र के उन चार स्तंभों की तरह है जिस पर लोकतंत्र टिका हुआ है। एक भी पाया कमजोर हुआ तो मुश्किल खड़ी हो जायगी। देखा जाय तो वे गाँव वाले ही थे जिन्होंने सही अर्थों में चारपाई वाले लोकतंत्र का सम्मान किया। दुनिया भले जैस्मिन रिवोल्यूशन के जरिये ऑकुपाई तहरीर स्क्वेयर करे, ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट करे...लेकिन हमने अपनी मौलिकता बनाये रखी और बिना किसी उकसावे के अपने लिये ऑकुपाई चारपाई’ जैसा अनूठापन गढ़ लिया। यह ऑकुपाई चारपाई रिवोल्यूशन अपने आप में अनूठा इसलिये भी है कि अब तक लोग अकेले सभा में आते थे, कुर्सी पर बैठते थे और भाषण सुन कर चले जाते थे। लेकिन उस खाट मर्मज्ञके चलते अब लोग जान गये कि चुनावी सभाओं में खाट भी पाई जा सकती है। ऑकुपाई की जा सकती है। ऐसे में लोग अब सपरिवार चुनावी सभा में आयेंगे। एक साथ परिवार के लोग एक या दो खाट पर कब्जा जमा कर बैठ जायेंगे। अकेले होने पर आखिर कब तक किसी को कहेंगे कि भाई तू उठ जा, या कम बैठ ।  पूरा परिवार एक साथ होने पर गारंटी रहेगी कि एक या दो खाट पर एक साथ बैठ कब्जा कर लिया जाय। फिर कितना तो विलक्षण माहौल होगा जब घर से लोग टिफिन लेकर पहुंचेंगे । एक ही खाट पर बैठ कर खायेंगे, भोजन-भाजन करेंगे। पानी की व्यवस्था तो कार्यकर्ता लोग कर ही देंगे। इस बहाने चुनावी सभा में भीड़ भी बढ़ेगी। दूसरे दल भी इस खाट समस्या पर सोचेंगे और कुछ करेंगे वरना हो सकता है कि चुनावी सभा से लाई खाट पर बंदा सोते हुए आराम पाये और उसी पार्टी को वोट कर दे जिसके यहाँ से खाट लाई गई। कुछ तो ऐसे भी होंगे जो खुद ही घर पहुंचा दें अपने चुनाव निशान के साथ। पता चला कमल के चुनाव चिन्ह वाला खाट अलाने के यहाँ तो पंजे के निशान वाला ढेकाने के यहाँ। कोई हाथी लेकर पहुंचेगा तो कोई साईकिल लेकर। रस्सी में भी रंगत नज़र आ ही जाएगी।
   
    फिर ये वो देश है कि जहाँ पार्टियों के बैनर तक फाड़ कर लोग अपने लिये हवादार चड्ढी सिलवा लेते हैं, ये तो खाट है जिसे सिर पर रख लोग आधी धूप और आधी छाँव में चलते परम आनंद की प्राप्ति कर सकते हैं । मन किया तो काँग्रेसी खाट पर भाजपाई बैनर भी बिछा सकते हैं और वहीं लेटे-लेटे मन की बात भी सुन सकते हैं। 

- सतीश पंचम


Saturday, September 3, 2016

बत्तख, तोते, हरी घास, विशालकाय तिरंगा...... हैदराबाद यात्रा - 2

    हैदराबाद के खूबसूरत संजीवैय्या पार्क में घूमते हुए एक जगह घास के खूबसूरत टीले नज़र आये। देखने से लगता था जैसे कश्मीर की वादी हो। कहीं सरपट ढलान तो कहीं तिरछी चढ़ाई। नर्म घास पर जूते उतार कर चलने का मन हुआ कि एकाएक बत्तखों का कुनबा खदबदाते हुए सामने से गुज़रा। यह एक पानी का छोटा सा खूबसूरत कुंड था। कुछ कमल खिले थे। ऊपर तोतों का कुनबा टांय-टांय करता उड़ा चला जा रहा था। पास ही एक गिलहरी चिट्-चिट् करती इत-उत फुदक रही थी। कुछ देर वहां ठहर कर आगे बढ़ा। जब यहां आ रहा था तब बहुत दूर से एक विशालकाय तिरंगा झंडा लहराता दिख रहा था। जिज्ञासावश उस ओर बढ़ता चला गया। 

    जैसे-जैसे करीब पहुंचा दिलचस्पी बढ़ती गई। अब झंडे के फड़फड़ाने की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी थी। यूं कपड़ों के फड़फड़ाने की आवाज़ हम सबने कब सुनी है ? बहुत हुआ तो प्लास्टिक की बरसाती शीट या किसी बैनर का फड़फड़ाना ही सुना होगा वह भी बहुत हल्के से लेकिन यहाँ मामला कुछ अलग था। यह तिरंगा झंडा इतना विशाल था, इतना फैलाव लिये था कि देखते ही बनता था। इसके फड़कने की आवाज में अलग ही रोमांच महसूस हो रहा था। काफी देर तक उस तिरंगे झंडे को हैरान हो देखता रहा। विशालकाय पोल के ऊपरी सिरे पर अशोक के चार सिंह वाला राजचिन्ह सुशोभित था। ध्यान से देखने पर पोल के पास एक सूचना पट्टी दिखी जिस पर झंडे की उंचाई 291 Feet दर्शायी गई थी। तेलंगाना राज्य बनने के दो साल पूरे होने के अवसर पर हाल ही में इस विशालकाय तिरंगे झंडे का निर्माण किया गया था। कपड़े की लंबाई 108x72 Feet थी, वजन लगभग 66 किलो। इतने विशाल आकार के झण्डे को फहरते देख समझा जा सकता है कि उसकी आवाज़ में रोमांच आखिर क्यों कर था।

   पोल को ध्यान से देखा तो वह बड़े-बड़े नट-बोल्ट के जरिये एक प्लेटफॉर्म से जुड़ा था। उन नट-बोल्टों के पास ही एक तार और प्लेट देखने से पता चला कि यहाँ से पोल में अर्थिंग दी गई है ताकि आकाशी बिजली से बचाव हो सके। कुछ नवयुवक उस सीमेंट के प्लेटफॉर्म पर बैठे थे। पोल को छूकर देखा। थोड़ा सा ठनठना कर भी देखा, अच्छा लग रहा था। कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश की लेकिन झंडा इतना विशालकाय कि कैमरे में अंट ही नहीं रहा था। नतीजतन कुछ दूर हटकर फोटो खेंचनी पड़ी। इसी दौरान झंडे के कपड़े पर ध्यान गया तो पता चला इसे चौड़ी पट्टियों वाले कई स्तरों से जोड़ कर बनाया गया है। कई थान लगे होंगे इसे बनाने में। जब उन पट्टियों की चौड़ाई ध्यान से देखा तो लगा कि हो न हो यह कपड़ा किसी एअरजेट या रशियन सुल्ज़र मशीन पर बना होगा क्योंकि इतने चौड़े पन्हे के कपड़े उन्हीं मशीनों पर बनते हैं। हथकरघे पर नहीं या फिर किसी चौड़ी कालीन की बुनाई वाला तरीका होगा लेकिन बाद में नेट पर सर्च किया तो पता चला यह निटेड पोलीस्टर है। निटींग मशीन पर बना है।

   थोड़ी देर ठहर कर देखने के बाद सफ़ेद पट्टियों के बीच चकती सी दिखी। अबकी थोड़ी हैरानी हुई कि आखिर क्या बात है जो सीधे-सीधे पट्टियों को जोड़ने के बावजूद बीच में चकती लगानी पड़ी। क्या वहां से कपड़ा कम पड़ गया था या उसे सिलने के लिये तकनीकी मुहाना छोड़ा गया था ताकि विशालकाय झंडे के भीतर पहुंचकर सिरो को जोड़ा जाय। बहरहाल मामला समझ न आया लेकिन इतना जरूर पता चला कि जब झंडा नया होगा तो इस तरह की चकती नज़र न आई होगी लेकिन इतने दिनों तक फहरते रहने के कारण उस पर धूल-मिट्टी, धुआँ-कोहरे का असर पड़ने से तमाम जोड़ दिखाई देने लगे, यहाँ तक कि सफ़ेद कपड़ों के बीच लगी सफ़ेद चकती भी। कैमरे में उसे कैद करने की बहुत कोशिश की लेकिन न हो सका। रिसोल्यूशन कम पड़ रहा था फिर मेरी दिलचस्पी इसकी आवाज़ और फहरने में थी।

   काफ़ी देर तक झंडे के आसपास घूमने के बाद लौटने लगा। कुछ दूर जाने के बाद झंडे को फिर से देखा। अच्छा लग रहा था लेकिन जेहन में एक बात बार-बार आ रही थी कि हमारे नेता इस तरह से झण्डों के प्रदर्शन से लोगों का ध्यान खेंचने में कामयाब तो हो जाते हैं जिसके चलते थोड़ी देर के लिये लोगों का मन बहलाव हो जाता है। मैं खुद घास के खूबसूरत इलाके से टहलते-टहलते यहाँ खिंचा चला आया। तालाब, बतख, तोते, गिलहरी, गुलाब, गेंदा सभी कुछ के बीच विशालकाय झण्डा अलग ही आकर्षण का केन्द्र रहा।
  
   वैसे एक बात जरूर जेहन में आती है कि इतना बड़ा, खूबसूरत और आकर्षक झण्डा इसलिये बन पाया क्योंकि बड़े-बड़े आकार की ढेर सारी चौड़ी पट्टियों को एक के बाद एक मजबूत डोर से जोड़ा गया। विशाल आकार के पोल को कई टुकड़ों में लाकर जोड़ने के बाद प्लेटफॉर्म पर ढेर सारे नट-बोल्ट लगाकर कसे गये, बैलेंस करने के लिये दो मोटे-मोटे तारों के सिरे ताने गये ताकि स्थिरता बनी रहे और झण्डा शान से लहराता रहे। ठीक यही स्थिति हमारे देश की भी है। यह भी खूबसूरत और आकर्षक तभी लग सकेगा जब इसके तमाम सिरों को एक दूजे से जोड़ा जाय, इसके नट-बोल्ट ठीक से कसे रहें, बैलेंस बना रहे। यह नहीं कि कार्यपालिका अपनी ओर के तार को ज्यादा तानने की कोशिश करे और विधायिका अपनी ओर, न्यायपालिका अपनी ओर। सभी का संतुलन जरूरी है वरना तो पत्रकारिता वाला तार पहले ही छटक गया है। रात-दिन एलियन, जादू, पाताल, निर्मल-राधे गाता ही रहता है। विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका सभी में जंग लग ही चुकी है। आपसी तना-तनी में तारों के टूटने का खतरा बना ही रहता है। रही-सही कोर-कसर पूरी करने कॉर्पोरेट वाले तो जुटे ही हैं।
   
    उम्मीद करता हूँ देश अब तक जैसे लहरते-फहरते बढ़ता रहा है वैसे ही आगे भी बढ़ता रहेगा। पीछे ले जाने के लिये तमाम उद्दम लगे होने के बावज़ूद लोग कभी-कभी समझदारी दिखा देते हैं। अपनी गलतियों को चुनाव के हिसाब से सुधार भी लेते हैं। पहले जो चुनाव सही लग रहा होता था वही बाद में गलत भी लगने लगता है। पहले जिन्हें काँग्रेस में रहनुमा नज़र आते थे वे भाजपा में ढूँढने लगे। कुछ क्षेत्रिय दल भी छुटभैया टाईप रहनुमा हो लिये। यह सब चलता ही रहेगा। कोई 31 परसेंट को कोस रहा होगा तो कोई 69 परसेंट की गलती बता रहा होगा। अंदर ही अंदर जानते सभी हैं कि गलतियाँ हो रही हैं सुधार भी होंगे ही। दिक्कत यही कि सुधार की रफ्तार थोड़ी धीमी है। नकारात्मक ज्यादा नज़र आता है, सकारात्मक कम। लाश तक ले जाने के लिये सुविधा नहीं मिल पा रही और नंग-धड़ंग बाबा-साबा सांविधानिक प्रवचन बांटते फिरते हैं। ज्ञान-विज्ञान की छोड़ कर जाहिलों जैसी बातें करते हैं। कहीं कुछ तो कहीं कुछ। हर ओर जैसे दौं सी लगी है। इसके बावज़ूद कहीं कुछ अच्छा होता है, नज़र आता है तो मन खुश हो जाता है। दिक्कत ये कि खुश करने लायक बातें याद करने पर भी बहुत कम याद आती हैं। जेहन में नकारात्मकता इतनी होने लगे तो चिंता होनी स्वाभाविक है।
  
   बहरहाल शान से फहरते इस विशालकाय झंडे के कुछ और चित्रों को देखें.....! 


 जारी....

- सतीश पंचम









फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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