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Sunday, August 28, 2016

Hockey Pockey, Plain Talk, Double Talk, मधुलेखा, कांची....in हैदराबाद !

   अमूमन किसी जगह एक बार घूमने जाने के बाद हम चाहते हैं कि कुछ नई सी जगह देखी जाय लेकिन फूल-पत्तों, पेड़-पौधों, घास-फूस का मामला इससे थोड़ा अलग है। इनका आनंद तभी मिलता है जब उन्हीं को फिर से दुबारा देखा जाय किसी और मौसम में, किसी और टाईम-जोन में। इसलिये करीब डेढ़ साल बाद दुबारा हैदराबाद जाने का मौका मिला तो समय निकाल कर फिर से हैदराबाद के उसी संजीवैया पार्क जा पहुंचा जहाँ पिछली बार आया था। तब सर्दियों का खुशनुमा मौसम था। पार्क बन ही रहा था। रोज़ गार्डन में गुलाब तो खूब खिले थे लेकिन जाने की मनाही थी। उद्घाटन वगैरह का चक्कर ठहरा। खैर, इस बार जाने पर पेड़-पौधे तो खूब दिखे लेकिन फूलों की कमी दिखी। अगस्त का महीना ठहरा। हरियाली भरपूर लेकिन रंगत में कमीं थी। इस कमी को पूरा करने के लिये रोज़ गार्डन के गुलाब जरूर कोशिश कर रहे थे लेकिन बात वहां भी नहीं जम रही थी। अधिकतर क्यारियों में गुलाब की सेपलिंग्स लगी थीं। कहीं गुलाब खिले थे तो कहीं उनके ठूंठ गड़े थे। शायद कुछ दिनों में उनमें पत्तियों की झालर भी सजने लगे।
   
    गनीमत यह थी कि हर गुलाब की प्रजाति के साथ उसके नाम की तख़्ती लगी थी। कुछ के नाम आकर्षक थे तो कुछ के नाम एकदम से अनसुने। एक गुलाब की प्रजाति दिखी – प्लेन टॉक तो दूसरे गुलाब का नाम था डबल टॉक। एक प्रजाति थी – Passionate Kisses. एक गुलाब की प्रजाति दिखी जिसका नाम था – My Valentine. ऐसे ही कुछ नाम और थे – Hokey Pokey, Funny Girl, Glory of Jaipur, Pride of Midnapore, Ganges Mist, मधुलेखा, कांची, श्वेता, गायत्री….। तो कुछ गुलाब की प्रजातियाँ ऐसी थीं जो climber थीं। लता की तरह फैलते हुए पूरे इलाके को गुलाबों से ढंक देती थीं। ऐसी ही एक प्रजाति थी Amadeds. हांलाकि उसमें फूल नहीं लगे थे लेकिन कल्पना की जा सकती है कि जब उसमें चटक लाल रंग के फूल खिलते होंगे तो क्या नज़ारा रहता होगा।
   
    वहीं पास ही क्यारी में बारदान बिछे थे। छोटे-छोटे गोलाकार आकार में कटे हिस्सों को देख अंदाजा लगाया कि यहाँ गुलाब की कलम लगाने के लिये जगह छोड़ी गई है। थोड़ा सा ध्यान दिया तो बारदान का रंग और उस पर खिंची रेखाओं को देख यूं लगा मानों वह हमारे पीएम साहब का करोड़ी सूट वाला कपड़ा हो जिस पर कि नामावली बुनी गई थी। लेकिन नहीं, यह साधारण बारदान ही था जिसे क्यारी में बिछा कर सतह पर कुछ इस तरह इंतजाम किया गया था ताकि पानी देने पर ज्यादा देर तक पौधों के आस-पास नमी और ऊमस बनी रहे। खैर, राजनीतिक बातों का असर इतना कि हम प्रकृति को देखने के लायक भी न रहे। उसमें भी कुछ न कुछ नकारात्मक पुट ढूंढ ही लेते हैं। यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
  
   खैर, आगे और भी कई खूबसूरत नज़ारे दिखे। माहौल खुशनुमा लग रहा था। सामने ही एक उंचे टीले के पास जापानी ढंग से लकड़ी की छवाई वाला खूबसूरत गेट बनाया गया था। सुबह के ठंडे मौसम में ओंस की बूंदे लकड़ी का किनारा थामें चूने के लिये बेताब नज़र आ रही थीं लेकिन ठिठकी थीं। शायद अभी न जाओ छोड़ कर....दिल अभी भरा नहींसरीख़ा मामला लग रहा था। जब लबा-लब भर जायेंगी तो बूंदें खुद ही छोड़ कर चल देंगी।

   
   एक जगह छोटा सा मझोले आकार का पेड़ दिखा। खूबसूरत पेड़। पता नहीं चला कि आखिर वह किस प्रजाति का पेड़ है लेकिन सुंदर लग रहा था। उसके करीब ही खूबसूरत गुलाब घड़ी नज़र आई। न जाने वह कौन आर्किटेक्ट था जिसने अपनी प्यारी सी कल्पना के जरिये कांटों वाले गुलाब और घड़ी के कांटों के बीच मेटॉफ़र सा बुन दिया।

जारी....

- सतीश पंचम







हुसैन सागर झील में मछलियों की टोह लेता मछुआरा


फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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