सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, May 26, 2016

हॉर्नबिल परसाद....मधुमक्खी......कोल्हू का घोड़ा !

हॉर्नबिल प्रसाद तार पर बैठे हुए
    कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ा जा रहा था कि अचानक एक पक्षी सामने से पंख फड़फड़ाते निकला और कुछ दूर जाकर तार पर बैठ गया। ध्यान से देखा तो यह हॉर्नबिल पक्षी था। अमूमन पूर्वांचल में ये पक्षी नहीं दिखता। तुरंत मोबाइल से उसकी तस्वीर खेंचा। एक ही क्लिक ले पाया कि हॉर्नबिल परसाद जैसे प्रकट हुए थे वैसे ही फुर्र से गायब भी हो गये। सामने एक विशाल पीपल का पेड़ था। वहीं किसी कोटर में महाशय का घर था। साईकिल से पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा तो उनका पता ही नहीं। पीपल के पत्ते मजे से खड़खड़ा रहे थे। सामने एक डाल पर नज़र पड़ी तो वहाँ मधुमक्खियों का विशालकाय छत्ता था। लगातार मधुमक्खियों के आने-जाने से, उनकी हलचल से छत्ता हल्के-हल्के फूल-पिचक रहा था। यूँ लग रहा था जैसे उसमें जान हो, कुछ-कुछ हार्ट-बीट की तरह !  इस तरह का विशालकाय़ छत्ता मध्य प्रदेश के भीमबेटका में देखा था। वहाँ भी छत्ता इसी तरह मधुमक्खियों की हलचल के कारण हार्ट-बीट शैली में फूल-पिचक रहा था। बहुत संभव है पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट कम होती तो मधुमक्खियों की भनभनाहट भी सुनाई देती। सारंगा मधुमक्खियों के बारे में सुना है कि वे बहुत खतरनाक होती हैं और उनके छत्ते से भन्नाहट की आवाजें भी तेज सुनाई देती हैं।




   आगे जाने पर पत्थर का कोल्हू दिखा जिस पर विभिन्न आकार-प्रकार के जानवर उकेरे गये थे। गिलहरी, तोता, घोड़ा, चाँद, युद्ध का दृश्य, बैल। पहले इन कोल्हूओं में तेल या गन्ने की पेराई होती थी। अब ये सिर्फ खेती-बाड़ी के औजारों को तेज़ करने के काम आते हैं। किसी की दरांती नहीं चल रही या हंसुआ-चाकू भोथरा हो गया तो पहुंच गया कटोरी में पानी लेकर। वहीं भिगो कर औजारों को कोल्हू के पत्थर से रगड़ेगा और धार आने के बाद कटोरी का पानी फेंक चल देगा। बच्चे जरूर उस पर बैठते हैं। खेलते कूदते हैं। इन कोल्हूओं के बारे में पहले भी सफ़ेद घर पर जिक्र कर चुका हूँ। गाजीपुर के लेखक विवेकी राय जी ने भी अपनी किताब में इन कोल्हुओं का जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि -  इन कोल्हुओं को लोग हाथोंहाथ उठाकर एक गाँव से दूसरे गाँव करते डगरा लाते थे। कहीं पहाड से आती थीं यह बनकर 
  
    
आगे विवेकी राय जी लिखते हैं कि - “जिन लोगों को पथरीया की जरूरत होती थी वे पहाड पर जाकर उसे गढवाते थे। और ऐसा भाईचारा था लोगों के बीच कि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग ढकेल कर पहुँचा देते थे। जिस गाँव में पथरीया पहुँच जाती थी उस गाँव के लोगों की जिम्मेदारी हो जाती थी कि ढकेल कर अगले गाँव में पहुँचा दें। किसी का कोल्हू गाँव में रह जाना पूरे गाँव के लिये लज्जा की बात मानी जाती थी 

   इन पथरियों पर पहचान के लिये सूरज, चाँद, हिरन  आदि की आकृतियां बनी होती थीं। अब हर समय तो कोई इतने लंबे समय तक इन कोल्हूओं के साथ नहीं चल सकता था। सो एक गाँव से दूसरे गाँव, दूसरे से तीसरे……निशान के आधार पर कोल्हू सरका दिया जाता था। जिसका कोल्हू गाँव में पहुँचता था, वह इन निशानों को देख कर उसे ले लेता था। 
      
         वैसे, बदलते समय के साथ, लोगों में आये दुराव के साथ एक मुहावरा भी बना है – ‘सीवान का कोल्हू होना’ -  माने ऐसा काम जिसमें सब लोग पूरी तरह सहयोग नहीं करते। किसी सामूहिक काम में जब कोई आधे मन से बल लगाता दिखता है तो कहा जाता है कि क्या सीवान ( गाँव) का कोल्हू टारने ( हटाने) आए हो"।

   मजे की बात ये कि सीवान शब्द सुनते ही वहाँ के एक जेलियर अपराधी शहाबुद्दीन का नाम जेहन में कौंधता है। वह भी एक तरह का कोल्हू ही है जिसे सभी राजनीतिक दल आधे-अधूरे मन से टारने का नाटक कर रहे हैं यही वजह है कि वह टर नहीं रहा है वरना क्या मजाल कि ऐसा खूंखार व्यक्ति अब तक स्वछंद रहे।  

कटा हुआ कोल्हू....बिल्कुल सादा...न डिजाइन न कुछ
   आगे कुछ और कोल्हू मिले। एक ऐसा भी कोल्हू मिला जिस पर कोई निशान न था। बिल्कुल प्लेन। अजीब बात ये कि उसकी गोलाई का एक हिस्सा कटा हुआ था। थोड़ा बहुत आसपास के लोगों से पूछा तो उन्हें इसके बारे में जानकारी ही न थी। अब तक मैंने जितने कोल्हू देखे थे सब पर कुछ न कुछ डिजाइन बना था। यह इस प्रकार का अकेला कोल्हू था। ऐसे मामलों में जब कुछ जानकारी न मिले तो अनुमान से काम चलाना पड़ता है। कोल्हू को छूकर सहलाते हुए इसके टूटे किनारे को देख समझ रहा था कि एक बात मन में आई। क्या पता कोल्हू गोलाई में तो सही सलामत कट गया हो लेकिन गढ़ते समय हो सकता है किनारे से कट गया हो। संभवत:  इसी खराबी के चलते इस पर आगे काम न किया गया हो और तमाम कोल्हूओं के साथ कम दाम में या मुफ्त में ही घेलुआ के तौर पर दे दिया गया हो। लेकिन जिसने भी इसे मुफ्त में लिया होगा उसे लाने में अच्छी खासी परेशानी हुई होगी। गोलाकार कोल्हू को लुढ़काते हुए तो लाया जा सकता है लेकिन इस तरह के कटे कोल्हू को भारी-भरकम बैलों वाली गाड़ी से या गोलाकार लट्ठों पर ठेलते हुए ही लाया जा सकता है। 

 

   वहाँ से हटकर आगे बढ़ा तो एक और विचित्र नज़ारे से सामना हुआ। सामने जमीन पर गड़े कोल्हू से घोड़ा बंधा था। कोल्हू के ऊपरी हिस्से में ईंट-गारा जोड़कर नांद बना दी गई थी। घोड़ा उसी नांद में अपना थूथन धंसाये खबर-खुबर खा रहा था। मजेदार दृश्य था। कोल्हू का बैल सुना था आज कोल्हू का घोड़ा भी देख लिया। वैसे घोड़ा शानदार था। उसके स्वभाव से परिचित नहीं था वरना उसके पुट्ठों पर हाथों से खरहरा करता। आस-पास उसका मालिक भी नज़र नहीं आ रहा था कि कुछ सहायता मिलती। 

   
 खैर, वहाँ से आगे बढ़ा तो सौ साल से भी पुराना वह नील गोदाम दिख गया जिसके बारे में बताया गया था कि उसके उपर ईंट जोड़कर घर बना लिया गया है। साईकिल दूर खड़ी करके वहाँ पहुंचा। मकान को देखने पर स्पष्ट हो जाता था कि निचले हिस्से की ईंटे अलग हैं और ऊपर की अलग। खेत में काम कर रहे एक किसान से पूछा तो उसने बताया कि अभी लोग हैं नहीं कहीं गये हुए हैं। मैंने आसपास घूम कर नज़ारा लिया। नील गोदाम से सटा कुआँ सही सलामत दिखा। अपने सौ साल से भी ज्यादा पुरातन रूप में अनोखा लग रहा था। उसके भीतरी हिस्से में नीम और पीपल की बहुतायत दिखी। झुक कर देखना चाहा तो किसान ने मना कर दिया। चेतावनी मिली कि कुएं की ऊपरी सतह पर उगे नीम और पीपल की दरारों में कभी कभी सांप या बिच्छु रहते हैं, थोड़ा सा ‘फरकेहोकर फोटू हिंचिये। किसी तरह दो-चार फोटू खेंचकर जब मुड़ने लगा तो कुएँ की भीतरी संरचना में एक परत पर ध्यान गया। समूची दीवारें तो 'इंग्लिश बांड' शैली में ईंट जोड़कर बनी थी लेकिन ज्यों ही एक निश्चित उंचाई आ जाती वहीं ईंटों की एक परत तिरछी हो जाती। यह परतें थोड़ी-थोड़ी देर बाद लगातार नीचे दिखतीं चली गई थीं। कुएं की भीतरी डिजाइन पसंद आई। इसे इंग्लिश बांड शैली का उत्कृष्ट नमूना कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी। देखा जाय तो इस तरह के इंग्लिश बांड शैली में ईंटों की जुड़ाई हड़प्पा मोहनजोदड़ो काल में भी था लेकिन उसका नामकरण इंग्लिश बांड ही ज्यादा प्रसिद्ध है। 

     कुछ क्षण वहाँ ठहर कर निकलने को था कि अबकी फिर से वह हॉर्नबिल पक्षी पंख फड़फड़ाता नज़र आया। इससे पहले कि कैमरा लेकर उसे कैप्चर करूं....हार्नबिल प्रसाद ये जा....वो जा और गुम....!




  - सतीश पंचम

 जारी......




सौ साल से ज्यादा पुराने कुएं में ईंटों की जुड़ाई में कुछ दूरी के बाद ईंटों की तिरछी परत नज़र आती है






कुआँ और नील गोदाम


Sunday, May 22, 2016

नील गोदाम....कटा हाथी.....छूही....पीपल !

      इस बार गाँव जाने के बाद आदतन सुबह-सुबह साईकिल उठा कर चल दिया गाँव घूमने। घर से कहा गया कि कुछ खा-पीकर निकलो लेकिन जानता था कि देर हुई तो मई की चिलचिलाती धूप मुश्किल खड़ी कर देगी इसलिये चाय-नमकीन भकोस कर जल्दी-जल्दी निकल पड़ा। रास्ते में मदार, नीम, पीपल, बबूल, गूलर, महुआ, आम, मेहंदी, शमी निहारता खेतों के बीच दिख रही पगडण्डी पर साईकिल उतार चल पड़ा। वहीं गेहूँ की कटाई होने के बाद सूखे खाली पड़े खेतों के बीच मुसखोल दिखे। मुसखोल, यानि चूहों द्वारा खेतों में बनाये गये भुरभुरे बिल जिनमें गेहूँ के दाने और तमाम अनाज आदि चूहों द्वारा जमा किये जाते हैं। एक के बाद एक खेतों को पार करते फिर से सड़क पर आ गया। रास्ते में कई लोग मिले जिनसे राम-रहारी होते गई। उन लोगों से रूक कर ढेर सारा बतियाने की इच्छा भी थी लेकिन संक्षिप्त हाल-चाल से ही काम चलाना पड़ा क्योंकि आगे धूप ने रास्ता मुश्किल करना था और मैं चाहता था कि ठंडे-ठंडे माहौल में जितना ज्यादा इलाका कवर हो सके इस दौरान कवर कर लूं।
   
     भैंसों की नांद, गायों का हंकरना, गिलहरी की चिट-चिट के बीच साईकिल कच्चे रास्ते पर चल पड़ी। सामने का इलाका कुछ बदला-बदला सा लगा। ध्यान से देखने पर जी धक् से कर गया। अंग्रेजों के जमाने का नील गोदाम गायब था। वही नील गोदाम जिसने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उल्लेखनीय है कि बिहार के चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर  लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते 
थे। तब चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी से संपर्क साधा और उन्हें अपने साथ चंपारण ले गये ताकि वे देख सकें कि निलहे किसानों पर अंग्रेज किस तरह अत्याचार कर रहे हैं। नतीजतन चंपारण सत्याग्रह हुआ और तीन कठिया प्रणाली पर रोक लग गई। बाद में रासायनिक रंगों के उत्पादन ने नील उत्पादन पर असर डाला और धीरे-धीरे नील गोदाम बंद होते गये। दरअसल जिसे नील गोदाम कहा जाता है वह एक तरह से नील वाली फसल के मथने का हौज है जिसमें नील को पहले सड़ाया जाता है और फिर उसे मथा जाता है। मथने के बाद जो कुछ निकलता उसे सुखाया जाता और पावडर बनाकर पैक किया जाता था।
   
     पिछली बार जब इसगोदाम के पास से गुजरा था तब उसकी कई तस्वीरें लिया था। 


 

















     कुएँ, जिनके भारी-भरकम छूही से गड़ारी लगी रहती थी और जिससे पानी खेंचा जाता था ताकि नील सड़ाया जा सके। हौज की दीवारें, उनके निकास द्वार। ऐसी तमाम तस्वीरों को कैमरे में कैद किया था लेकिन अब वहाँ सिर्फ कुआं था। हौज गायब था। वहीं खेतों में काम कर रहे एक व्यक्ति से पूछा तो उसने बताया कि गोदाम को जेसीबी लगाकर तोड़ दिया गया। कुआँ बचा है। सुनते ही मन खट्टा हो गया। इतनी मोटी-मोटी दीवारें थीं हौज की, बिना प्लास्टर के भी सौ साल से ज्यादा यह संरचना खड़ी रही और अचानक जेसीबी लगाकर उसे तुड़वा दिया गया। युवक ने बताया कि जल्दी टूट नहीं रहा था। जेसीबी को कई बार पोज़ीशन बदलना पड़ा, कभी बायें से तो कभी दायें से, आगे-पीछे करते हुए पहले छोटा हौज तोड़ा गया और फिर उसके बगल वाला और फिर अंतिम वाला टूटा। बड़ी जबर दीवारें थीं। कुछ ज्यादा पूछ-पछोर करने पर उसने बताया कि मलवा वहाँ रखा गया है चाहो तो देख सकते हो। इसके आगे कुछ पूछने की इच्छा ही न रही। फिर भी चलते-चलते पूछ ही लिया कि ये तो सरकारी जमीन पर बना होगा ? जवाब मिला कि नहीं, गोदाम निजी जमीन पर बना था। जिन लोगों की जमीन थी उन्होंने इसे तुड़वाकर जमीन खाली कराया ताकि जगह का इस्तेमाल हो सके। कुछ क्षण रूक कर उसने बताया कि जो पुराने लोग थे वे उसे बचा कर आखिर कितने दिन रखते। उन्हें मयालगती थी इसे तोड़ते हुए। आजा-पुरखों की चीज ठहरी। इसलिये अब तक बची रही। परिवार बढ़ा तो जगह की कमी हुई और नतीजा सामने है। पूछा कि आसपास कुछ और गोदाम थे, उनकी हालत कैसी है ? जवाब मिला कि है, लेकिन टूट-फूट गया है। एक पर तो सीधे घर बना दिया है, दूसरा एकदम खत्म हो चुका था सो उस पर इमामबाड़ा बन गया है। एकाध दूसरे गाँव में है लेकिन उसके बारे में नहीं पता कि अब उनकी कैसी हालत है। है भी या नहीं पता नहीं।  
नील का सूखा पावडर पैकेट

   
    टूटे गोदाम की कुछ तस्वीरें खेंच कर युवक को नमस्कार कहते हुए आगे उस ओर बढ़ चला जहाँ नील गोदाम का मलवा पड़ा था। साईकिल खेत में ही खड़ी करके करीब पहुँचा। ऐसा लगता था जैसे किसी हाथी को कई टुकड़ों में काटा गया हो। मोटी-मोटी दीवारें, ईंटों का ढेर, चूने-गारे का जोड़....। देखकर स्तब्ध था। मलवे के साथ एक पीपल भी उखड़ा चला आया था। तस्वीरें खेंच रहा था तो दूर से एक बच्चा मुझे देख रहा था। शायद वह समझना चाहता हो कि इस मलवे में आखिर ऐसा क्या है जिसकी मैं तस्वीर ले रहा हूँ। कुछ देर ठहर कर भारी मन से लौटा। साईकिल को कुछ देर खेत में पैदल साथ-साथ खेंचते गया। आगे पगडण्डी आने पर ध्यान आया कि इस पर बैठना भी है।

जारी....

-  सतीश पंचम

पुरानी तस्वीर जिसमें नील गोदाम के हौज दिख रहे हैं

नई तस्वीर: नील गोदाम जो अब टूट चुका है....सिर्फ कुआं बचा है 



पुरानी तस्वीर जिसमें कुआँ और उसके पीछे गोदाम की दीवार दिख रही है

नई तस्वीर जिसमें सिर्फ कुआँ और उसकी छूही दिख रही है....पीछे गोदाम गायब है

 
   नील गोदाम का मलवा : 

कटे हाथी ......
 




जारी.....









Saturday, May 7, 2016

आफ़तकाल !


  अंदर ही अंदर लोग यह मानने लगे हैं कि डिग्री में कुछ तो झोल-झपाटा है वरना इतनी हाय-तौबा न मचती। सब कुछ सच्चा होता तो साहब खुद ही सारा कुछ सामने रख देते। यह विश्वास कुछ कुछ उतना ही खरा है जितना लोग केजरीवाल के बारे में मानते हैं कि वे कितना भी नेक बनें, कितनी भी ईमानदारी शो-ऑफ़ करें, कुछ न कुछ तो उनकी भी कमियाँ हैं जो सबसे गाली खाते रहते हैं। कभी मुँह छुपाकर विज्ञापन दिखाते हैं तो कभी फुल पेज में पूरा बखान ही बखान।

    ऐसा ही कुछ अंदरूनी विश्वास गाँधी परिवार के प्रति या हर उस राजनीतिक घराने के प्रति है जिसकी कमाई दनादन बढती चली गई है। लोग अंदर ही अंदर मानते हैं कि बिना झोल-झपाटे के ये तीव्रतर प्रगति संभव ही नहीं है। फिर दामाद जी का भी कुछ लुक-शुक वैसा ही है जिसे देख लगता है मानों कहीं के कोई बाउन्सर हो। वैसे भी आम जन में निराशा के चलते एक किस्म की हीन ग्रंथि काम करती है। ऐसे लोगों को देख वह ग्रंथि और सुदृढ़ हो जाती है।

    रही बात साहब की तो वह डिग्री मामले में जब तक अदालती चक्कर से बचे रहे तभी तक ठीक वरना वहाँ पहुंचते ही मामला सुहाना हो जायगा। खोद-खोद के पूछ-पछोर होगी सो अलग। जितेन्दर तोमर का हाल तो जान ही रहे हैं। विरोधी खार खाये बैठे हैं सो अलग। अब तक के विकास-फिकास का काम तो सब दिख ही रहा है। कुल जमा पूंजी में साक्षी, प्राची, सुब्बू, योगी, ईरानी, बीफ, उत्तराखण्ड, रोहित, जेएनयू, कन्हैया-वन्हैया ही छाये रहे। जो बचा था वह डिग्री पूरी कर रही है। फिर इन दिनों चीफ़ जस्टिस जी भी कुछ भावुक लग रहे हैं। भावनाओं में बहकर डिग्री की सघन जाँच होने लगी तो मुश्किल हो जायगी। जल्दीबाजी में पुराने जमाने के कागज़ का लुक देने के लिये चाय के गिलास की गीली पेंदी, मोमबत्ती की जलती लौ से किनारों को कत्थई करने वाला काम भी नहीं होता। मिस्टेक हो जाती है।

    बाय द वे सुनने में आया कि बिल क्लिंटन ने जब मोनिका के साथ अपने संबंधों का खुलासा किया था तो अमरीकी समाज ने उनके द्वारा सब सच-सच बताने की हिम्मत को सराहा था। उन्हें इस्तीफ़ा देने से रोकने में उस साफ़गोई का बहुत बड़ा हाथ था। इधर जब भारत आये थे तो महाराष्ट्र के नेता कृपाशंकर सिंह ने एअरपोर्ट पर बड़ी देर तक हाथ मिलाते हुए उनसे पूछा था कि आप चाहते तो उसे रास्ते से हटा सकते थे लेकिन आप ने वह नहीं किया इसलिये लोगों को आश्चर्य है। बिल क्लिंटन मुस्करा कर रह गये। थैंक्यू कह आगे बढ़ गये।

    वह तो थी दूसरे देश की बात लेकिन अपने यहाँ अभी वह उदारता नहीं आई है। यहाँ फर्जी डिग्री को लेकर सच्चाई स्वीकारने का चलन सिर्फ़ फ़िल्मों में है मसलन मुन्नाभाई MBBS या शाहरूख़ की फिल्म 'कभी हाँ, कभी ना' जैसी फिल्मों में ! जब तक यह स्वीकार समाज में न आये, तब तक इन्तज़ार किया जाय ! क्या पता सत्य का राजनीतिक ज्वार आये और किनारे पर पड़े सीप, घोंघे, हार-फूल, लकड़ी-डंठल, काँग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा को भिगोता वापस लौट जाय !

ऑफ़्टरऑल इट्स 'आफ़तकाल' !

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.