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Saturday, September 3, 2016

बत्तख, तोते, हरी घास, विशालकाय तिरंगा...... हैदराबाद यात्रा - 2

    हैदराबाद के खूबसूरत संजीवैय्या पार्क में घूमते हुए एक जगह घास के खूबसूरत टीले नज़र आये। देखने से लगता था जैसे कश्मीर की वादी हो। कहीं सरपट ढलान तो कहीं तिरछी चढ़ाई। नर्म घास पर जूते उतार कर चलने का मन हुआ कि एकाएक बत्तखों का कुनबा खदबदाते हुए सामने से गुज़रा। यह एक पानी का छोटा सा खूबसूरत कुंड था। कुछ कमल खिले थे। ऊपर तोतों का कुनबा टांय-टांय करता उड़ा चला जा रहा था। पास ही एक गिलहरी चिट्-चिट् करती इत-उत फुदक रही थी। कुछ देर वहां ठहर कर आगे बढ़ा। जब यहां आ रहा था तब बहुत दूर से एक विशालकाय तिरंगा झंडा लहराता दिख रहा था। जिज्ञासावश उस ओर बढ़ता चला गया। 

    जैसे-जैसे करीब पहुंचा दिलचस्पी बढ़ती गई। अब झंडे के फड़फड़ाने की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी थी। यूं कपड़ों के फड़फड़ाने की आवाज़ हम सबने कब सुनी है ? बहुत हुआ तो प्लास्टिक की बरसाती शीट या किसी बैनर का फड़फड़ाना ही सुना होगा वह भी बहुत हल्के से लेकिन यहाँ मामला कुछ अलग था। यह तिरंगा झंडा इतना विशाल था, इतना फैलाव लिये था कि देखते ही बनता था। इसके फड़कने की आवाज में अलग ही रोमांच महसूस हो रहा था। काफी देर तक उस तिरंगे झंडे को हैरान हो देखता रहा। विशालकाय पोल के ऊपरी सिरे पर अशोक के चार सिंह वाला राजचिन्ह सुशोभित था। ध्यान से देखने पर पोल के पास एक सूचना पट्टी दिखी जिस पर झंडे की उंचाई 291 Feet दर्शायी गई थी। तेलंगाना राज्य बनने के दो साल पूरे होने के अवसर पर हाल ही में इस विशालकाय तिरंगे झंडे का निर्माण किया गया था। कपड़े की लंबाई 108x72 Feet थी, वजन लगभग 66 किलो। इतने विशाल आकार के झण्डे को फहरते देख समझा जा सकता है कि उसकी आवाज़ में रोमांच आखिर क्यों कर था।

   पोल को ध्यान से देखा तो वह बड़े-बड़े नट-बोल्ट के जरिये एक प्लेटफॉर्म से जुड़ा था। उन नट-बोल्टों के पास ही एक तार और प्लेट देखने से पता चला कि यहाँ से पोल में अर्थिंग दी गई है ताकि आकाशी बिजली से बचाव हो सके। कुछ नवयुवक उस सीमेंट के प्लेटफॉर्म पर बैठे थे। पोल को छूकर देखा। थोड़ा सा ठनठना कर भी देखा, अच्छा लग रहा था। कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश की लेकिन झंडा इतना विशालकाय कि कैमरे में अंट ही नहीं रहा था। नतीजतन कुछ दूर हटकर फोटो खेंचनी पड़ी। इसी दौरान झंडे के कपड़े पर ध्यान गया तो पता चला इसे चौड़ी पट्टियों वाले कई स्तरों से जोड़ कर बनाया गया है। कई थान लगे होंगे इसे बनाने में। जब उन पट्टियों की चौड़ाई ध्यान से देखा तो लगा कि हो न हो यह कपड़ा किसी एअरजेट या रशियन सुल्ज़र मशीन पर बना होगा क्योंकि इतने चौड़े पन्हे के कपड़े उन्हीं मशीनों पर बनते हैं। हथकरघे पर नहीं या फिर किसी चौड़ी कालीन की बुनाई वाला तरीका होगा लेकिन बाद में नेट पर सर्च किया तो पता चला यह निटेड पोलीस्टर है। निटींग मशीन पर बना है।

   थोड़ी देर ठहर कर देखने के बाद सफ़ेद पट्टियों के बीच चकती सी दिखी। अबकी थोड़ी हैरानी हुई कि आखिर क्या बात है जो सीधे-सीधे पट्टियों को जोड़ने के बावजूद बीच में चकती लगानी पड़ी। क्या वहां से कपड़ा कम पड़ गया था या उसे सिलने के लिये तकनीकी मुहाना छोड़ा गया था ताकि विशालकाय झंडे के भीतर पहुंचकर सिरो को जोड़ा जाय। बहरहाल मामला समझ न आया लेकिन इतना जरूर पता चला कि जब झंडा नया होगा तो इस तरह की चकती नज़र न आई होगी लेकिन इतने दिनों तक फहरते रहने के कारण उस पर धूल-मिट्टी, धुआँ-कोहरे का असर पड़ने से तमाम जोड़ दिखाई देने लगे, यहाँ तक कि सफ़ेद कपड़ों के बीच लगी सफ़ेद चकती भी। कैमरे में उसे कैद करने की बहुत कोशिश की लेकिन न हो सका। रिसोल्यूशन कम पड़ रहा था फिर मेरी दिलचस्पी इसकी आवाज़ और फहरने में थी।

   काफ़ी देर तक झंडे के आसपास घूमने के बाद लौटने लगा। कुछ दूर जाने के बाद झंडे को फिर से देखा। अच्छा लग रहा था लेकिन जेहन में एक बात बार-बार आ रही थी कि हमारे नेता इस तरह से झण्डों के प्रदर्शन से लोगों का ध्यान खेंचने में कामयाब तो हो जाते हैं जिसके चलते थोड़ी देर के लिये लोगों का मन बहलाव हो जाता है। मैं खुद घास के खूबसूरत इलाके से टहलते-टहलते यहाँ खिंचा चला आया। तालाब, बतख, तोते, गिलहरी, गुलाब, गेंदा सभी कुछ के बीच विशालकाय झण्डा अलग ही आकर्षण का केन्द्र रहा।
  
   वैसे एक बात जरूर जेहन में आती है कि इतना बड़ा, खूबसूरत और आकर्षक झण्डा इसलिये बन पाया क्योंकि बड़े-बड़े आकार की ढेर सारी चौड़ी पट्टियों को एक के बाद एक मजबूत डोर से जोड़ा गया। विशाल आकार के पोल को कई टुकड़ों में लाकर जोड़ने के बाद प्लेटफॉर्म पर ढेर सारे नट-बोल्ट लगाकर कसे गये, बैलेंस करने के लिये दो मोटे-मोटे तारों के सिरे ताने गये ताकि स्थिरता बनी रहे और झण्डा शान से लहराता रहे। ठीक यही स्थिति हमारे देश की भी है। यह भी खूबसूरत और आकर्षक तभी लग सकेगा जब इसके तमाम सिरों को एक दूजे से जोड़ा जाय, इसके नट-बोल्ट ठीक से कसे रहें, बैलेंस बना रहे। यह नहीं कि कार्यपालिका अपनी ओर के तार को ज्यादा तानने की कोशिश करे और विधायिका अपनी ओर, न्यायपालिका अपनी ओर। सभी का संतुलन जरूरी है वरना तो पत्रकारिता वाला तार पहले ही छटक गया है। रात-दिन एलियन, जादू, पाताल, निर्मल-राधे गाता ही रहता है। विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका सभी में जंग लग ही चुकी है। आपसी तना-तनी में तारों के टूटने का खतरा बना ही रहता है। रही-सही कोर-कसर पूरी करने कॉर्पोरेट वाले तो जुटे ही हैं।
   
    उम्मीद करता हूँ देश अब तक जैसे लहरते-फहरते बढ़ता रहा है वैसे ही आगे भी बढ़ता रहेगा। पीछे ले जाने के लिये तमाम उद्दम लगे होने के बावज़ूद लोग कभी-कभी समझदारी दिखा देते हैं। अपनी गलतियों को चुनाव के हिसाब से सुधार भी लेते हैं। पहले जो चुनाव सही लग रहा होता था वही बाद में गलत भी लगने लगता है। पहले जिन्हें काँग्रेस में रहनुमा नज़र आते थे वे भाजपा में ढूँढने लगे। कुछ क्षेत्रिय दल भी छुटभैया टाईप रहनुमा हो लिये। यह सब चलता ही रहेगा। कोई 31 परसेंट को कोस रहा होगा तो कोई 69 परसेंट की गलती बता रहा होगा। अंदर ही अंदर जानते सभी हैं कि गलतियाँ हो रही हैं सुधार भी होंगे ही। दिक्कत यही कि सुधार की रफ्तार थोड़ी धीमी है। नकारात्मक ज्यादा नज़र आता है, सकारात्मक कम। लाश तक ले जाने के लिये सुविधा नहीं मिल पा रही और नंग-धड़ंग बाबा-साबा सांविधानिक प्रवचन बांटते फिरते हैं। ज्ञान-विज्ञान की छोड़ कर जाहिलों जैसी बातें करते हैं। कहीं कुछ तो कहीं कुछ। हर ओर जैसे दौं सी लगी है। इसके बावज़ूद कहीं कुछ अच्छा होता है, नज़र आता है तो मन खुश हो जाता है। दिक्कत ये कि खुश करने लायक बातें याद करने पर भी बहुत कम याद आती हैं। जेहन में नकारात्मकता इतनी होने लगे तो चिंता होनी स्वाभाविक है।
  
   बहरहाल शान से फहरते इस विशालकाय झंडे के कुछ और चित्रों को देखें.....! 


 जारी....

- सतीश पंचम









1 comment:

राजेंद्र गुप्ता Rajendra Gupta said...

बहुत सुन्दर. आपने घर बैठे हैदराबाद का तिरंगा दिखा दिया. सटीक कमेंटरी के साथ.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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