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Sunday, May 22, 2016

नील गोदाम....कटा हाथी.....छूही....पीपल !

      इस बार गाँव जाने के बाद आदतन सुबह-सुबह साईकिल उठा कर चल दिया गाँव घूमने। घर से कहा गया कि कुछ खा-पीकर निकलो लेकिन जानता था कि देर हुई तो मई की चिलचिलाती धूप मुश्किल खड़ी कर देगी इसलिये चाय-नमकीन भकोस कर जल्दी-जल्दी निकल पड़ा। रास्ते में मदार, नीम, पीपल, बबूल, गूलर, महुआ, आम, मेहंदी, शमी निहारता खेतों के बीच दिख रही पगडण्डी पर साईकिल उतार चल पड़ा। वहीं गेहूँ की कटाई होने के बाद सूखे खाली पड़े खेतों के बीच मुसखोल दिखे। मुसखोल, यानि चूहों द्वारा खेतों में बनाये गये भुरभुरे बिल जिनमें गेहूँ के दाने और तमाम अनाज आदि चूहों द्वारा जमा किये जाते हैं। एक के बाद एक खेतों को पार करते फिर से सड़क पर आ गया। रास्ते में कई लोग मिले जिनसे राम-रहारी होते गई। उन लोगों से रूक कर ढेर सारा बतियाने की इच्छा भी थी लेकिन संक्षिप्त हाल-चाल से ही काम चलाना पड़ा क्योंकि आगे धूप ने रास्ता मुश्किल करना था और मैं चाहता था कि ठंडे-ठंडे माहौल में जितना ज्यादा इलाका कवर हो सके इस दौरान कवर कर लूं।
   
     भैंसों की नांद, गायों का हंकरना, गिलहरी की चिट-चिट के बीच साईकिल कच्चे रास्ते पर चल पड़ी। सामने का इलाका कुछ बदला-बदला सा लगा। ध्यान से देखने पर जी धक् से कर गया। अंग्रेजों के जमाने का नील गोदाम गायब था। वही नील गोदाम जिसने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उल्लेखनीय है कि बिहार के चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर  लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते 
थे। तब चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी से संपर्क साधा और उन्हें अपने साथ चंपारण ले गये ताकि वे देख सकें कि निलहे किसानों पर अंग्रेज किस तरह अत्याचार कर रहे हैं। नतीजतन चंपारण सत्याग्रह हुआ और तीन कठिया प्रणाली पर रोक लग गई। बाद में रासायनिक रंगों के उत्पादन ने नील उत्पादन पर असर डाला और धीरे-धीरे नील गोदाम बंद होते गये। दरअसल जिसे नील गोदाम कहा जाता है वह एक तरह से नील वाली फसल के मथने का हौज है जिसमें नील को पहले सड़ाया जाता है और फिर उसे मथा जाता है। मथने के बाद जो कुछ निकलता उसे सुखाया जाता और पावडर बनाकर पैक किया जाता था।
   
     पिछली बार जब इसगोदाम के पास से गुजरा था तब उसकी कई तस्वीरें लिया था। 


 

















     कुएँ, जिनके भारी-भरकम छूही से गड़ारी लगी रहती थी और जिससे पानी खेंचा जाता था ताकि नील सड़ाया जा सके। हौज की दीवारें, उनके निकास द्वार। ऐसी तमाम तस्वीरों को कैमरे में कैद किया था लेकिन अब वहाँ सिर्फ कुआं था। हौज गायब था। वहीं खेतों में काम कर रहे एक व्यक्ति से पूछा तो उसने बताया कि गोदाम को जेसीबी लगाकर तोड़ दिया गया। कुआँ बचा है। सुनते ही मन खट्टा हो गया। इतनी मोटी-मोटी दीवारें थीं हौज की, बिना प्लास्टर के भी सौ साल से ज्यादा यह संरचना खड़ी रही और अचानक जेसीबी लगाकर उसे तुड़वा दिया गया। युवक ने बताया कि जल्दी टूट नहीं रहा था। जेसीबी को कई बार पोज़ीशन बदलना पड़ा, कभी बायें से तो कभी दायें से, आगे-पीछे करते हुए पहले छोटा हौज तोड़ा गया और फिर उसके बगल वाला और फिर अंतिम वाला टूटा। बड़ी जबर दीवारें थीं। कुछ ज्यादा पूछ-पछोर करने पर उसने बताया कि मलवा वहाँ रखा गया है चाहो तो देख सकते हो। इसके आगे कुछ पूछने की इच्छा ही न रही। फिर भी चलते-चलते पूछ ही लिया कि ये तो सरकारी जमीन पर बना होगा ? जवाब मिला कि नहीं, गोदाम निजी जमीन पर बना था। जिन लोगों की जमीन थी उन्होंने इसे तुड़वाकर जमीन खाली कराया ताकि जगह का इस्तेमाल हो सके। कुछ क्षण रूक कर उसने बताया कि जो पुराने लोग थे वे उसे बचा कर आखिर कितने दिन रखते। उन्हें मयालगती थी इसे तोड़ते हुए। आजा-पुरखों की चीज ठहरी। इसलिये अब तक बची रही। परिवार बढ़ा तो जगह की कमी हुई और नतीजा सामने है। पूछा कि आसपास कुछ और गोदाम थे, उनकी हालत कैसी है ? जवाब मिला कि है, लेकिन टूट-फूट गया है। एक पर तो सीधे घर बना दिया है, दूसरा एकदम खत्म हो चुका था सो उस पर इमामबाड़ा बन गया है। एकाध दूसरे गाँव में है लेकिन उसके बारे में नहीं पता कि अब उनकी कैसी हालत है। है भी या नहीं पता नहीं।  
नील का सूखा पावडर पैकेट

   
    टूटे गोदाम की कुछ तस्वीरें खेंच कर युवक को नमस्कार कहते हुए आगे उस ओर बढ़ चला जहाँ नील गोदाम का मलवा पड़ा था। साईकिल खेत में ही खड़ी करके करीब पहुँचा। ऐसा लगता था जैसे किसी हाथी को कई टुकड़ों में काटा गया हो। मोटी-मोटी दीवारें, ईंटों का ढेर, चूने-गारे का जोड़....। देखकर स्तब्ध था। मलवे के साथ एक पीपल भी उखड़ा चला आया था। तस्वीरें खेंच रहा था तो दूर से एक बच्चा मुझे देख रहा था। शायद वह समझना चाहता हो कि इस मलवे में आखिर ऐसा क्या है जिसकी मैं तस्वीर ले रहा हूँ। कुछ देर ठहर कर भारी मन से लौटा। साईकिल को कुछ देर खेत में पैदल साथ-साथ खेंचते गया। आगे पगडण्डी आने पर ध्यान आया कि इस पर बैठना भी है।

जारी....

-  सतीश पंचम

पुरानी तस्वीर जिसमें नील गोदाम के हौज दिख रहे हैं

नई तस्वीर: नील गोदाम जो अब टूट चुका है....सिर्फ कुआं बचा है 



पुरानी तस्वीर जिसमें कुआँ और उसके पीछे गोदाम की दीवार दिख रही है

नई तस्वीर जिसमें सिर्फ कुआँ और उसकी छूही दिख रही है....पीछे गोदाम गायब है

 
   नील गोदाम का मलवा : 

कटे हाथी ......
 




जारी.....









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