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Saturday, May 7, 2016

आफ़तकाल !


  अंदर ही अंदर लोग यह मानने लगे हैं कि डिग्री में कुछ तो झोल-झपाटा है वरना इतनी हाय-तौबा न मचती। सब कुछ सच्चा होता तो साहब खुद ही सारा कुछ सामने रख देते। यह विश्वास कुछ कुछ उतना ही खरा है जितना लोग केजरीवाल के बारे में मानते हैं कि वे कितना भी नेक बनें, कितनी भी ईमानदारी शो-ऑफ़ करें, कुछ न कुछ तो उनकी भी कमियाँ हैं जो सबसे गाली खाते रहते हैं। कभी मुँह छुपाकर विज्ञापन दिखाते हैं तो कभी फुल पेज में पूरा बखान ही बखान।

    ऐसा ही कुछ अंदरूनी विश्वास गाँधी परिवार के प्रति या हर उस राजनीतिक घराने के प्रति है जिसकी कमाई दनादन बढती चली गई है। लोग अंदर ही अंदर मानते हैं कि बिना झोल-झपाटे के ये तीव्रतर प्रगति संभव ही नहीं है। फिर दामाद जी का भी कुछ लुक-शुक वैसा ही है जिसे देख लगता है मानों कहीं के कोई बाउन्सर हो। वैसे भी आम जन में निराशा के चलते एक किस्म की हीन ग्रंथि काम करती है। ऐसे लोगों को देख वह ग्रंथि और सुदृढ़ हो जाती है।

    रही बात साहब की तो वह डिग्री मामले में जब तक अदालती चक्कर से बचे रहे तभी तक ठीक वरना वहाँ पहुंचते ही मामला सुहाना हो जायगा। खोद-खोद के पूछ-पछोर होगी सो अलग। जितेन्दर तोमर का हाल तो जान ही रहे हैं। विरोधी खार खाये बैठे हैं सो अलग। अब तक के विकास-फिकास का काम तो सब दिख ही रहा है। कुल जमा पूंजी में साक्षी, प्राची, सुब्बू, योगी, ईरानी, बीफ, उत्तराखण्ड, रोहित, जेएनयू, कन्हैया-वन्हैया ही छाये रहे। जो बचा था वह डिग्री पूरी कर रही है। फिर इन दिनों चीफ़ जस्टिस जी भी कुछ भावुक लग रहे हैं। भावनाओं में बहकर डिग्री की सघन जाँच होने लगी तो मुश्किल हो जायगी। जल्दीबाजी में पुराने जमाने के कागज़ का लुक देने के लिये चाय के गिलास की गीली पेंदी, मोमबत्ती की जलती लौ से किनारों को कत्थई करने वाला काम भी नहीं होता। मिस्टेक हो जाती है।

    बाय द वे सुनने में आया कि बिल क्लिंटन ने जब मोनिका के साथ अपने संबंधों का खुलासा किया था तो अमरीकी समाज ने उनके द्वारा सब सच-सच बताने की हिम्मत को सराहा था। उन्हें इस्तीफ़ा देने से रोकने में उस साफ़गोई का बहुत बड़ा हाथ था। इधर जब भारत आये थे तो महाराष्ट्र के नेता कृपाशंकर सिंह ने एअरपोर्ट पर बड़ी देर तक हाथ मिलाते हुए उनसे पूछा था कि आप चाहते तो उसे रास्ते से हटा सकते थे लेकिन आप ने वह नहीं किया इसलिये लोगों को आश्चर्य है। बिल क्लिंटन मुस्करा कर रह गये। थैंक्यू कह आगे बढ़ गये।

    वह तो थी दूसरे देश की बात लेकिन अपने यहाँ अभी वह उदारता नहीं आई है। यहाँ फर्जी डिग्री को लेकर सच्चाई स्वीकारने का चलन सिर्फ़ फ़िल्मों में है मसलन मुन्नाभाई MBBS या शाहरूख़ की फिल्म 'कभी हाँ, कभी ना' जैसी फिल्मों में ! जब तक यह स्वीकार समाज में न आये, तब तक इन्तज़ार किया जाय ! क्या पता सत्य का राजनीतिक ज्वार आये और किनारे पर पड़े सीप, घोंघे, हार-फूल, लकड़ी-डंठल, काँग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा को भिगोता वापस लौट जाय !

ऑफ़्टरऑल इट्स 'आफ़तकाल' !

- सतीश पंचम

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