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Saturday, April 2, 2016

अमरूद कसम !

      पत्तों के सरसराने के साथ जमीन पर रेंगता कनखजूरा थोड़ा सा ठिठका और फिर आगे रेंगता चला गया। पास ही गिरी पुरानी डाल की निचली ओर दुबका गिरगिट भी उन सूखे पत्तों की आहट से ठमक गया। कच्ची ढलान पर कचर-पचर करती मैना के पंख फड़के और डैने के दोनों ओर की सफ़ेदी पल भर के लिये झलकी और तुरत-फुरत उन्हीं पंखों में गुम भी हो गई। ऊपर तोतों का झुण्ड टांय-टांय करता उड़ता चला जा रहा था।


   इधर नीम की गाछ धीरे-धीरे हिलोर ले रही थी, बाँस आपस में रगड़ खाते हुए चरर-चक आवाजों के बीच धींगामुश्ती में लगे थे कि मेहंदी की महकती हवा के झोंके ने दस्तक दी। कई बार पहले भी झाड़ियों की ओर से महकती हवा के झोंके पहुंचे थे लेकिन पता नहीं चल रहा था कि आखिर वह मेहंदी की झाड़ी किन झाड़ियों-झुरमुटों के बीच दुबकी है। कच्चे अमरूद के कसैले स्वाद के बीच बच्चों का झुण्ड उसके तने से चिपकी पपड़ियों को तने से अलग कर रहा था। एकाध ने अमरूद की कसैली पत्ती को मुंह में रख कूचना शुरू किया और देखा-देखी दूसरों ने भी हाथ में रखे कच्चे अमरूदों को फेंक पत्तों को कूचना-थूकना शुरू किया। एकाएक उनमें से किसी एक की नज़र सबसे ऊपर की ओर गई जहाँ तमाम कच्चे अमरूदों के बीच एक में पीलापन झलक रहा था। सीधे तो नहीं लेकिन पत्तियों के बीच से पीलापन ध्यान से देखने पर ही मालूम पड़ता था। बस, उंगली दिखाने की देर थी कि सबने धावा बोल दिया। लंबे लड़के ने कोशिश की कि किनारे की ओर झुकी टहनी के पत्तों को पकड़ नीचे ले आये तो साथ-साथ अमरूद भी मिले लेकिन वह तो किसी और टहनी पर टंगा था। मेहनत बेकार गई। मझले ने पपड़ियों वाले तने पर संभल कर पैर रखते ऊपर चढ़ना शुरू किया लेकिन पकड़ छूटी जा रही थी। एक उसने जिसकी निगाह उस पीले अमरूद पर पड़ी थी पास रखे लकड़ी के सोंटे से कोशिश की लेकिन वह भी काम न आया। एक दूसरे ने निशाना साध कर ढेला फेंकना चाहा लेकिन पेड़ पर आधे तक चढ़ आये किसी और बच्चे को देख ढेला फेंकने का इरादा छोड़ दिया। वैसे भी पिछले हफ़्ते वह इसी हरकत के चलते डांट खा चुका है। गिट्टी सीधे जाकर छोटे की कनपटी पर लगी थी। बहुत रोया था वह लेकिन आज दुबारा नहीं रूलाना।

     इस बीच सबसे ऊपरी टहनी पर पहुंचने के बाद पता लगा कि वह सिर्फ़ एक पीली पत्ती थी अमरूद नहीं। आख़िर नज़रें ऐसे कैसे धोखा खा सकती हैं। वह भी सबकी एक साथ ? मन मसोसकर ठमकते बच्चों ने उस एक का मजाक उड़ाना शुरू किया जिसने सबसे पहले पक चुके पीले अमरूद को देखने का दावा किया था लेकिन दावेदार था कि अब भी दावा छोड़ने के लिये राजी नहीं। अपने गले की चमड़ी चुटकी में दबा कसम खा रहा था कि उसने पीला अमरूद देखा था। वह पीला पत्ता नहीं सचमुच का अमरूद था। हाँ, अच्छा-पका हुआ अमरूद।

     उन सबके बीच एक और भी था जो शांत था। उस बच्चे का मजाक नहीं उड़ा रहा था। आख़िर चुप्पे से निशाना साध कर ढेला उसी ने तो चलाया था भले उस आधे तक चढ़ आये बच्चे को न लगा हो लेकिन अमरूद को तो लगा था। न सिर्फ़ लगा बल्कि वह टूट कर तेजी से झाड़ियों की ओट में भी जा गिरा था। जिसके गिरते ही वहाँ बैठी मैना के डैने चौंकने के कारण एक बार फिर खुले और अपने पंखों के किनारे वाली सफ़ेद झलक दिखा दुबारा गुम हो गये।

  इधर अपनी चुटकी में गले की चमड़ी दबाये लड़का अब भी कसम खा रहा था। अबकी कसम भगवान से हटकर विद्या कसम पर पहुँची थी।


- सतीश पंचम

#कल्पना

1 comment:

महेंद्र मिश्र said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति ... जय मां भवानी

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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