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Sunday, March 20, 2016

ट्रेन स्कैनर.....


    वो जो खिड़की के पास बैठा शख्स है, नाम – विमल.....विमल प्रजापति। बड़ी जद्दोजहद के बाद यह सीट मिल सकी। ट्रेन रूकी भी नहीं थी कि लपक कर चढ़ना पड़ा। जानता है कि खतरा है लेकिन क्या करे। वैसे भी हार्मोन किसी के सगे नहीं होते। विन्डो सीट पर हवा खाने की चाहत हार्मोन्स बख़ूबी जानते हैं इसलिये कभी किसी को धकियाने से परहेज नहीं करते। न चाहते हुए भी धीमी चलती ट्रेन को देख हाथ की मांसपेशियाँ खुद-ब-खुद सक्रिय हो जाती हैं। स्नायु तंत्र अपने लच्छों के जरिये जब तक दिमाग को खबर करे, बंदा ट्रेन में सशरीर उपस्थित। कभी किसी और का हार्मोन ज्यादा जोर मार दे तो लड़ने-भिड़ने वाली विसंगति। बगल में ही एक और है। कल की बात याद कर रहा है। शर्मा ने नौकरी छोड़ने से पहले अपने आखरी मेल में सभी को मार्क किया था सिवाय उसके। वो तो बात-चीत में पता चला कि शर्मा का गुड-बाय मेल है। नई नौकरी फॉर बैटर अपॉर्च्युनिटी वाला किस्सा। लेकिन आश्चर्य, उसे मार्क नहीं किया गया था। हो सकता है भूल गया हो।

   इधर ये नीली शर्ट वाला अमरेन्द्र। सोच रहा है कि शाम को लौटते ही पहले नई बनियान खरीदनी है। अभी जो पहना है उसमें बड़े-बड़े छेद हो गये हैं। शुक्र है शर्ट मोटी और गाढ़े नीले रंग की है। छेद छुप जाते हैं। कल तो सफ़ेद वाली शर्ट पहन तो सकता है लेकिन बनियान का टंटा। दूसरी में भी छेद है। वैसे भी सफ़ेद में बनियान का छेद ज्यादा दिखेगा। कैसे भी करके आज लौटते समय बनियान लेनी ही है। दो कुर्सी छोड़ बीच में बैठा बिजेन्दर पात्रा। रात का बचा भात सुबह नमक डाल कर प्याज़ का तड़का लगा जल्दी-जल्दी खा-पीकर काम पर निकला है। साड़ी की दुकान पर काम करता है। कल देर होने से सेठ गुस्सा हो गया। क्या करे। आठ-पन्दरह का गाड़ी छूट गई थी। बाद वाली भरी हुई आई। कुछ ओवरहेड वायर टूटने का अनाउंसमेंट सुना था। बाद में मालूम नहीं। अभी चढ़ते समय चप्पल भी टूट गई। जूता पहनने की सोचा तो है लेकिन अगले महीना खरीदेगा। इस महीना कड़की है। वैसे वो पुल के पास फुटपाथ के यहाँ स्पोर्ट वाला शू अच्छा था। तीन सौ में दे रहा था लेकिन अगले महीना देखेगा। चप्पल के लिये उतरने साथ मोची ढूंढना पड़ेगा। कील ठोंकने पर भी आठ-दस दिन चल गया तो बहुत है।

   इधर ये मनीष संघवी। टिफ़िन में चपाती और मेथी की सब्जी है। वही सुबह नाश्ता भी हुआ। पत्नी को कितनी बार बोला था कि नाश्ते में कुछ अलग बनाया कर लेकिन नहीं। वही चीज नाश्ते में खाओ और वही लंच लेकर जाओ। वैसे भी सुबह पानी आने का समय रहता है, बच्चों के स्कूल जाने की तैयारी। एक बार नाश्ता बनाओ और एक बार खाना तो काम ज्यादा पड़ जायेगा। ऐसा नहीं कि मनीष भाई ये सब नहीं समझते लेकिन क्या करें। कुछ इस पर हैरानी कि जो औरतें नौकरी करती हैं आखिर वो कैसे संभाल लेती हैं ? उनकी वाली तो घरेलू महिला ठहरी। सारा दिन घर में रहती है लेकिन फिर भी उसका काम ही खत्म नहीं होता। कभी गेहूं साफ कर रही है तो कभी कपड़े धो रही है। बर्तन वाली को पुराने कपड़े दे रही है.... कभी कुछ तो कभी कुछ। आखिर कैसे नौकरी वाली औरतें सारा कुछ कर लेती हैं। घर भी संभालती हैं, नौकरी भी करती हैं।

  हिमेश भाई की अलग परेशानी......आज फिर टिफिन में आलू-गोभी और चपाती है। फिर से आज ऑफ़िस में साथियों की खिट-खिट रहेगी खाने के समय। "खमन ढोकला लाओ ना हिमेश भाई। थेपला भी चलेगा"। अब एक दिन बन गया तो बन गया। रोज-रोज थोड़ी कोई यह सब खाते रहता है। लेकिन ये लोग बोलते ऐसे हैं जैसे रोज अपने-अपने घर मसाला डोसा, इडली, वड़ा-पाव और पूरी-भाजी ही चाँपते हों। वैसे आज लाईट बिल भी भरना है। ऑनलाईन तो भरता था लेकिन मिश्रा का अकाउंट जबसे खाली हुआ है तब से थोड़ा डर लगने लगा है। वैसे भी लाईन में लगने का जमाना चला गया। थोड़ी सिक्योरिटी वाले हिसाब से बिल तो भरना पड़ेगा। वर्चुअल की बोर्ड से भरेगा तो शायद कम खतरा हो। हाँ, वर्चुअल की-बोर्ड से ही पेमेंट करना होगा। तेल लगाने गया बैंकिंग ऐप। खाली-पिली पनौती। मिश्रा का दिल जानता है कि कितना भारी पड़ा ऑनलाईन वाला ट्रांजेक्शन। वो भी तो चूतिया है। क्या जरूरत थी होटल वाले को कार्ड और पिन बोल-बोल कर बताने की। ज्यादा शानपट्टी किया तो गया। बैठे बैठे एसएमएस आते रहा कि अभी बीस हजार निकाला है। अभी पांच हजार निकाला है। साला कुछ नहीं कर सका। लेकिन आज लाईट का बिल तो भरना है।

  लेडिज़ डिब्बे में अलग माहौल चल रहा है। जल्दीबाजी में ट्रेन में चढ़ते हुए रंजना के हाथों पर खरोंच लग गई है। पता नहीं किसने नुकीले कड़े पहने हैं। वो पिंक वाली का ही होगा। जिग-ज़ैग स्पायरल कड़ा पहन कर वह भी साथ चढ़ी थी। छिनाल को संभल कर चढ़ा नहीं जाता। वो भी ट्रेन के सफर में नुकीले कड़े पहन कर चल रही है। पूरा अंगूठा रगड़ उट्ठा है। अभी एक दो दिन तक भुगतना पड़ेगा। बगल में बैठी काव्या की अलग परेशानी है। धुकधुकी लगी है कि कहीं आज शुरू न हो जाय। थोड़ा डार्क कपड़ा पहनना चाहिये था। हमेशा इंडिकेशन मिलते ही एक दो पैड पर्स में रख लेती थी लेकिन आज तो लेना ही रह गया। कमर दर्द अलग से। किसी तरह ऑफ़िस पहुंचे तो वीणा से ले लेगी। वैसे उसके पास हमेशा एक दो रहता ही है। ऑफ़िस के ड्रॉवर में ही रखती है। मिल जाना चाहिये उसके पास से। रास्ते में मेडिकल शॉप तो पड़ता है लेकिन उतना बड़ा पैकेट लेकर रखे कैसे। छोटा वाला तो काम का ही नहीं होता। एक्स्ट्रा लार्ज ही लेना पड़ेगा। उपर से वो मेडिकल वाला भी तनिक छिछोरा है। एक्स्ट्रा लार्ज बोलते ही मुस्कराने लगता है हरामी.....।

   पीछे वाली सीट पर बैठी आशू की अलग परेशानी। दो लड़कों की ओर से रिश्ते की बात चल रही है। दोनों ही काम करते हैं। अच्छी सैलरी है लेकिन एक में जहाँ शादी के बाद घर में बैठाये रखने के चांसेस हैं तो दूसरे में नौकरी करते रहने के। वैसे भी यह नौकरी जहाँ कर रही है कुछ जम नहीं रहा। रोज कुछ न कुछ खिट-खिट। कभी ये मिसआउट हो गया तो कभी वो ऑर्डर प्लेस नहीं हुआ। कभी किसी का रिपोर्ट अपडेट नहीं हुआ। सैलरी भी कम। वैसे शादी के बाद काम न करने का ऑप्शन अच्छा तो है लेकिन फिर भी....नौकरी रहेगी तो कल को कुछ हुआ तो कम से कम अपने से तो.... इतना सब क्या सोचना लेकिन फिर भी सोचना तो पड़ता है !

   उधर बिना-बांह वाली ब्लाऊज़ पहनी स्मिता की अलग परेशानी है। बार-बार हाथ ऊपर हैंडल पकड़ने के लिये उठाना पड़ रहा है। कितना भी ढंको, अनशेवन आर्म-पिट दिख ही जाता है। पहले ध्यान ही नहीं आया वरना दूसरा कुछ स्लीवज् वाला पहन के निकलती। वैसे भी है तो लेडिज़ कम्पार्टमेंट फिर भी....वैसे अच्छा है कि सारी की सारी मोबाइल में ही बिज़ी रहती हैं। ज्यादा ऊपर नज़र उठा के देखती नहीं....इट्स गुड...!    

   दूसरी ओर पहले दर्जे में अलग चिंताएं चल रही हैं। करतार सिंह यू एस का वीज़ा मिलने में हो रही देरी से चिंतित हैं। पता नहीं टिकट टाईम पे हो पायेगा या वही महंगे वाले में जाना पड़ेगा। साले लोग जल्दी से बोलते भी तो नहीं। उधर इकोनॉमिक टाईम्स को पलट कर देखते हुए भाटिया सेंसेक्स देख रहे हैं। कल ही निकेई गिरा था। नैस्डैक उपर को था। निफ़्टी का अलग झोल। समझ ही नहीं आ रहा कि मार्केट ऊपर जाने वाला है या नीचे। पीछे बैठे अहमद गुल परेशान हैं कि अबकी स्टेशनरी का ऑर्डर मिलेगा कि नहीं। लास्ट टाईम कंपनी वालों को डायरी दे दिया होता तो शायद उम्मीद बनती। दूसरी पार्टी ने वालेट बांटा था। लेडिज़ लोग को हैंड-बैग। लेकिन उतना खरचा करके ऑर्डर मिले भी तो कितना कमायेगा। मार्जिन पर असर पड़ेगा ही। फिर भी सबको एक डायरी दे देता तो अच्छा था। नहीं कुछ तो कम से कम ये तो लगता था कि हाँ, कोशिश तो किया था। लेकिन अभी ? उधर वो छोटी के लिये शादी भी देखना है। लड़का भी सब एक से एक हाई-फाई फण्डू। साले एमबीए करके खाली बीस-बाईस हजार तक ही उठा रहे हैं। क्या तो कमायेंगे और क्या खायेंगे। वो आई टी वाला था लेकिन नौकरी छोड़ के खुद ही पता नहीं क्या क्या करता है। कमाई का पता नहीं लेकिन सर्वर भाड़े पे देकर कमाने की बात बताता है। क्या पता कमाता भी है या खाली-पिली होशियारी चोदता है।      

    ट्रेन अगले स्टेशन पर खड़ी हुई और नई सवारी का रेला फिर आ पहुंचा है। उतरने-चढ़ने के दौरान फिर से रस्साकशी, फिर से चल अन्दर, चलो अन्दर, थोड़ा अन्दर चलो की आवाजें। अबकी एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति भी चढ़े हैं। एक झोला है साथ में। किसी तरह अंदर पहुंचने के बाद खड़े हुए तो एक ने माँ जी को बैठने के लिये जगह दी। वह एक जिसने जगह दी, पिछले ही हफ़्ते अपने बुज़ुर्ग माता-पिता को गाँव की ट्रेन में बैठा कर आया है। आँख का पानी अभी बचा है शायद। एक उम्मीद यह भी कि क्या पता आज वह किसी और के माता-पिता के लिये जगह दे रहा है तो हो सकता है कल को कोई उसके माता-पिता के लिये भी जगह दे। आशीष ट्रांसफ़र भी होते हैं, एक्सचेंज भी हो सकते हैं और डिस्पोज़ भी। बाकी तो जितना हो सके अपने से कर ही रहा है वह एक

    हाँ, दिक्कत में है तो वह दूसरा आदमी जो ठीक उसकी बगल में खड़ा है। सुबह चाय में शक्कर को लेकर पत्नी से लड़-भिड़ कर आया है। पत्नी ने भी दो-चार बात सुना दिया तो तैश में आ गया। एक झापड़ मारने के बाद पत्नी ने जो रोना-धोना मचाया कि यह बाकी की चाय छोड़ कर आ गया। उसे अफ़सोस है कि छोटी सी बात पर थप्पड़ लगा दिया। अब सारा दिन मूड़ खराब रहेगा। लेकिन खराब भी क्यों रहेगा। अभी जाकर ऑफिस में जुट जायेगा। जहाँ दो चार लोगों से इधर-उधर बात हुई तो ध्यान बंट जायेगा। दिक्कत पत्नी को होगी। वह सारा दिन घर में घुटी-घुटी रहेगी। कुछ भी हो, कंट्रोल करना चाहिये था। वैसे आज हो सके तो जाकर मना लेगा। मनाना भी क्या। वह तो पहले से मनी रहेगी। बहुत होगा तो मुंह फुलाये रहेगी। थोड़ा सा बोला-चाली हुई नहीं कि खुद ही बोल पड़ेगी। सुन लिया जायगा। हाँ, उसकी नाईटी का कुछ करना पड़ेगा। काफी घिस गया है। दूसरी और भी है लेकिन उसको यही पसंद है तो क्या किया जाय। एक अच्छी वाली लेनी है अबकी। साथ में जाकर खरीदा जाय तो अच्छा रहे।

    पीछे कानों में इयरफोन लगाये मोबाइल पर पिक्चर देखता युवक मन ही मन उस शख्स को गरिया रहा है जिसने मेमरी कार्ड गलत-सलत भर दिया है। एयरलिफ़्ट के साथ नीरजा भी बोला था लेकिन सिर्फ एयरलिफ्ट डाल के छोड़ दिया और पैसा पूरा लिया। वापस उसके पास जाना पड़ेगा। एक और है जो गोविंदा के गाने बिना इयर-फोन सुन रहा है और बाकियों को सुनवा रहा है। तेरे प्यार में दिल दिवाना है....तेरे प्यार में दिल दिवाना है.....। उधर अगला स्टेशन आने की तैयारी में है। ट्रेन धीमी हो रही है। अबकी फिर किसी के हार्मोन उफ़ान पर होंगे। मोटर न्यूरान और तमाम तंतुओं के लच्छे फिर से किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहेंगे तब तक बंदा ट्रेन के अंदर दाख़िल भी हो चुका होगा।

   एक नई चिंता वाला शख़्स ! आज ऑफ़िस में पूजा हो रही है। जुराब फटी है। जूते निकालना पड़ गया तो मुश्किल हो जायगी। वैसे रास्ते में कपड़ों की दुकान तो पड़ती है।   


-    सतीश पंचम     
    

             

1 comment:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह भाई वाह, जितने लोग उतनी बातें, उतने मसले और उतनी ही चिन्ताएं।
रचनात्मकता उफ़ान मार रही है। एकदम मस्त।

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