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Sunday, February 21, 2016

वासन्ती.....चेकायन !

   कुछ अनुभव रोचक होते हैं। अपने आप में अलग सी बानगी लिये हुए।  इस बार गाँव जाने पर कुछ कुछ वैसा ही अनुभव हुआ। एक विवाह समारोह के दौरान जब बारात घर से निकली तो  ढेर सारी गाड़ियों का काफिला चल पड़ा। आगे पीछे धूल उड़ाती गाड़ियां जब शहर की ओर बढ़ ही रहीं थी कि मोबाइल पर कॉल आई - फलां रूट पर चेकिंग चल रही है जिनके पास गाड़ी के पेपर न हों वो बायपास से गाड़ियां निकालें।

  मैं कुछ समझ पाता कि धड़ाधड़ साथ बैठे लोगों ने अपने साथियों को फोन घुमाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे सब शांत। पूछने पर पता चला कि गाँव देहात में सब लोग गाड़ी का कागज लेकर नहीं चलते। यहां कौन सा हमेशा ट्रैफिक हवलदार रहता है कि गँवई सड़क पर खड़ा मिले। जब शहर की ओर निकलना होता है तो पेपर साथ ले लिया जाता है वरना जै राम जी की।

     आज चेकिंग इसलिये चल रही है क्योंकि लगन तेज है, विवाह आदि का दिन है। ढेर सारी गाड़ियों का काफिला शहर के रस्ते गुजरेगा।  किसी के पास पेपर होगा किसी के पास नहीं और  इसी के चलते पुलिस वालों को थोड़ा बहुत खाने कमाने का मौका मिल जायगा। चेकिंग तो महज बहाना है।  मैं मन ही मन अपने इन साथियों की चतुराई पर मुग्ध था। एक तरह का यूज टू वाला माहौल लगा। लोगों को इन सब की आदत पड़ गई है।

 अभी यह सब चल ही रहा था कि फिर फोन आया नचनियों के लिये ठेके पर से थोड़ा माल मसाला लेना है। गाड़ी आगे रोककर ले लेना नहीं तो ससुरे ढंग से नहीं नाचेंगे। मैंने फिर प्रश्नवाचक निगाहों से एक को देखा तो वो मुस्कराते हुए बोला चिंता मत करो समझा दूंगा। एक ने बताया कि जब गाँवों में नाच गाने और बैंड बाजे वालों का सट्टा होता है तो साथ ही एक सादे कागज पर वो लिख देते हैं कि इतने हजार का मेहनताना और पंद्रह - बीस बोतल अलग से।  यानि नचनियों के लिये शराब आदि का भी इंतजाम करना पड़ेगा। मैं मन ही मन इस गँवई डांस प्रोग्राम के कांट्रेक्ट पेपर पर मुग्ध हो रहा था कि कैसी तो अलग किस्म की अर्थव्यवस्था चलती है यहां। न वैट का चक्कर न रिटर्न फिटर्न का तामा झामा। जो है सो सादे कागजों पर । 

  अब गाड़ी आगे ही आगे बढ़ी जा रही थी और हमारी निगाहें उस बोर्ड की ओर टंगी थी जहां पर कि लिखा होता है 

 जानेवाले ध्यान किधर है
 मधुशाला इधर है

  देखते देखते एक जगह वह दुकान दिख गई जिस पर कि लिखा था - सरकारी लायसेंस प्राप्त मान्य शराब की दुकान।

 गाडी़ को साइड में लगाया गया। उतर कर हाथ पैर सीधे करते हुए शराब की दुकान की ओर बढ चला। साथ में औऱ लोग भी थे। अभी कुछ दूर था कि शराब का ऐसा भभका छूटा कि आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन शराब लेना तो था ही। मन मारकर आगे बढ़ा। काउंटर पर बैठे शख्स को देखकर लगा कि जरूर ये केस्टो मुखर्जी का अवतार है। रह रहकर हिचकी ले रहा था। 

  मुझे कभी इस तरह से शराब वगैरह लेने का अनुभव नहीं था। न ही कभी लेना चाहूं ,  लेकिन  अब जो सामने था सो था। एक ने पूछा कितने वाला है।

 जवाब मिला -  कितने वाला लोगे....हिक्

 अब दूसरे ने कहा - वही दे दो संतरा मुसम्मी टाइप।

सादा वाला या मसाला वाला.....हिक्

मसाला दे दो।

ये लो ....हिक्.....और चाहिये.... हिक्......

 हां यार दे दो....। पूरा थैला भर दो.....ससुरे पियें जितना पीना है। नाचना चाहिये बस्।

 काउंटर पर बैठे  उस शख्स का  इस तरह हिचकी लेते हुए विशेष अंदाज में पूछना पछोरना मुझे उस गाने की 
याद दिला रहा था जिसके शब्द थे

थाने मे बइठे दरोगा जी लें हिचकी
लगता है साहिब ने मारी है चुसकी

    उधर थैला भर कर शराब खरीदने के बाद वापस लौटे तो मैंने राहत की सांस ली। वहां खड़े खड़े मेरा सिर चकरा रहा था, पता नहीं पीते कैसे हैं इस तरह की शराब।  यूं तो मैंने भी एक दो बार बीयर का सेवन किया है,  लेकिन उसे चखना ही कहा जायगा, पीना नहीं। फिर ये तो देसी था। जो पियें वो जानें।
 
   गाड़ी में आकर वापस बैठा और मन ही मन सोचने लगा कि यार आजकल शायद बिना पिये पिलाये कोई शादी ब्याह नहीं हो पाता लगता है। उधर बारात की दूसरी गाड़ी दिखी जिसमें कि स्कॉच और विस्की का कैरट लादा जा रहा था। बगल में ही बोर्ड दिखा जिसपर लिखा था - यहां पर मिलती है महाठंडी बियर। संभवत : चिल्ड बियर का ही तर्जुमा है 'महाठंड' ।

 उधर अगले दिन मुझे जमीन पर गिरी हुई उसी तरह की एक खाली बोतल दिखी जिसे कि शराब के ठेके वाले के यहां से लिया गया था। खाली बोतल और उस पर लगे लेबल को देख मन हुआ कि देखूं तो क्या लिखा है इसपर। पास स्थित कैमरे से उसकी तस्वीर उतारी। तस्वीर उतारने के दौरान ही ध्यान गया कि  बोतल पर चिपका  लेबल डबल चिपकाया लगता है । एक के उपर एक ।

    लेबल पर मैन्युफैक्चरिंग डेट वगैरह लिखी थी। शंका हुई कि अंदर वाले लेबल पर कुछ और डेट वगैरह न लिखी गई हो। लेकिन बोतल को हाथ से उठाने की हिम्मत न हुई। एक तो वैसे भी गाँव के बच्चे चेकाबाजी किये रहते हैं। यहां चेकाबाजी से तात्पर्य शराब आदि की खाली बोतलों में बच्चे मूत्र विसर्जन कर उसे पेड़ से लटका देते है या पेड़ की किसी डाली पर रख देते हैं औऱ छोटे छोटे कंकड़ पत्थरों से उस बोतल पर निशाना साधते हैं। ये अपने आप में गँवई बच्चों की अलग किस्म की मौज होती है, फ्री फंड का खेल होता है जिसका अंदाजा शहर के लोग शायद न लगा पायें। शहर मे तो एस्सेल वर्ल्ड और वो तमाम मनोरंजन के साधन होते हैं। लेकिन गाँवों में इस तरह के क्रियेटिव फिरी फण्ड वाले खेल बच्चे खुद से खोज ओज कर  खेलते हैं। वहां उन्हें इसके लिये पैसा नहीं देना पड़ता।

- सतीश पंचम

(January 2011, Repost)

2 comments:

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बढ़िया

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन देश की पहली मिसाइल 'पृथ्वी' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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