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Sunday, January 3, 2016

तेलऊँस कड़ाही......भात....चिड़िया.....तिनका... !

    
    माँजने के लिये खुले में रखी तेलउँस, चिकट कड़ाही के करीब गौरैया फुदकते हुए पहुंची। और भी बरतन रखे थे लेकिन उनकी ओर न जा सीधे कड़ाही के गोल हैंडल पर बैठी। भीतर पानी के ऊपर तैरते तेल के गोल छल्लों पर एक नजर डाल वहीं ऊपरी सिरे पर लगे भात को अपनी चोंच में रख कड़ाही से नीचे उतर आई।

   माँजने के लिये वहीं रखी कालिख़ लगी सूखी पुआल को एक नज़र देख चिड़िया ठिठकी। इधर उधर नज़र दौड़ाने पर एक साफ़ पुआल का तिनका दिखते ही उसे चोंच में दबा फुर्र हो गई। थोड़ी देर में तेरह-चौदह साल की बच्ची घर से बाहर भरी बाल्टी के साथ निकली। बर्तनों के ढेर के आगे पीढ़ा खिसका कालिख लगी पुआल को वहीं राख में लगा-लगा बर्तनों को गीला कर माँजने लगी। पहले थाली, फिर गिलास, कटोरी....एक-एक कर बर्तन मांजे जाने लगे। बाल्टी के पानी से साफ करने के दौरान गंदला पानी ढलान पर जमी दूब पकड़ गिरने लगा। चिड़िया फिर लौटी। अबकी बर्तन मांजती बच्ची से दूरी बना दूब से टपकते पानी की बूंदों में दाल-चावल के कण तलाशती, इधर-उधर देखते वापस जा ही रही थी कि सेंवई का एक रेशा दूब के साथ चिपका नज़र आया। खाने लायक कीड़े के अंदेशे में चिड़िया ने चोंच मारते हुए सेंवई के रेशे को परखा। कुछ अलग जान दुबारा चोंच मारा, ठीक-ठाक जान रेशा चोंच में दबा वापस उड़ चली।

    दूब से टपकता पानी आगे पड़ी गिट्टी को भिगोता गंदले पानी वाले गड्ढे की ओर बह रहा था। सतह पर तैरता पुआल का तिनका बार-बार किनारे उगी घास में अटक रहा था। अंदर ही अंदर वह चाह रहा था कि चिड़िया लौटे और उसे भी चोंच में पकड़ ले उड़े। उधर बर्तनों को समेट, खाली बाल्टी में रख बच्ची वापस घर की ओर चल पड़ी थी। काफ़ी देर तक शांति रही। सन्न-मन्न। कभी-कभार किसी उड़ती टिटिहरी या ऊपर आसमान में टिहाती चील की आवाज़ सुनाई दे जाती। और तभी एक कुत्ता दुलकी चाल में आता दिखा। बर्तन मांजने वाली जगह का मुआयना करने के बाद सीधे गंदले पानी के गड्ढे में तरी लेने जा बैठा। उसके बैठते साथ सतह पर तैरता तिनका झटके से गड्ढे से सटी बाहरी घास में जा फंसा।

   उधर कालिख़ लगी पुआल की नज़र घास में फंसे तिनके पर पड़ी। सूखने के बाद धूप में चमकता तिनका अलग ही जान पड़ता था। उसका भी मन हुआ कि वह गंदले पानी के गड्ढे में नहाते हुए साफ होकर यूं ही चमके लेकिन मुश्किल थी। थोड़ी देर बाद गड्ढे में तरी लेता कुत्ता बाहर निकला, पटपटा कर अपने गीले शरीर को झाड़ा और कालिख लगी पुआल को रौंदता आगे बढ़ चला।
अबकी चिड़िया फिर लौटी। घास में पड़े सूखे तिनके को चोंच में दबाने जा ही रही थी कि पुआल के गुच्छे से अलग हुए एक लम्बे तिनके पर निगाह पड़ी। पहले तिनके का मन छोटा हो गया। अबकी चिड़िया फिर उसे छोड़ लम्बे तिनके को ही ले उड़ेगी। लेकिन नहीं, चिड़िया ने उस छोटे तिनके को ही चोंच में दबाया।

   लम्बे तिनके ने पलट कर कालिख़ लगे गुच्छे की ओर देखा तो उसे ग्लानि सी महसूस हुई। अपने में उसे एक किस्म का स्वार्थ नज़र आ रहा था। उधर पुआल के गुच्छे को लग रहा था, एक साथ न सही, एक-एक कर इसकी तरह अलग हुए तो भी उस छोटे तिनके की तरह किस्मत चमक जायेगी।


    कम से कम रोज़-रोज़ मुँह को कालिख़ तो न लगेगी।


#कल्पना

- सतीश पंचम


4 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ओह! बहुत बढ़िया।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ओह! बहुत बढ़िया।

Hemant Sharma said...

बहुत ही अच्छा लेखन है हिन्दी में इस तरहा से लिखने वाले विरले ही हैं तो लब्बोलुआब ये की लिखते रहा करें और किताब की शक्ल में भी पब्लिश करवा लें तो कोई हर्जा भी नहीँ मेरा अनुमान हैं की खर्चा तो जेब से नहीँ देना पड़ेगा साथ ही सुधि पाठकों का भला भी हो जायेगा

Hemant Sharma said...

बहुत ही अच्छा लेखन है हिन्दी में इस तरहा से लिखने वाले विरले ही हैं तो लब्बोलुआब ये की लिखते रहा करें और किताब की शक्ल में भी पब्लिश करवा लें तो कोई हर्जा भी नहीँ मेरा अनुमान हैं की खर्चा तो जेब से नहीँ देना पड़ेगा साथ ही सुधि पाठकों का भला भी हो जायेगा

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