सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, October 11, 2016

खुला मैदान नॉट अवेलेबल !

मेरे घर के करीब हर साल जलने वाला रावण धीरे-धीरे ग्लेशियर की तरह खिसकता जा रहा है। पहले हर साल दशहरे के दिन मेरे स्कूल के बड़े मैदान में जलाया जाता था। बरसात खत्म होते साथ हरी-हरी घास के बीच जब अक्टूबर में चारों ओर टिड्डियां नज़र आने लगतीं, हेलिकॉप्टर वाले कीड़े उड़ते, हल्की-हल्की ठंड शुरू होती तब बड़ा सा पिंक कलर का रावण अवतरित होता और रस्सी तान कर उसे खड़ा किया जाता। धीरे-धीरे स्कूल के उस बड़े मैदान को फुटबॉल मैदान के रूप में बदल दिया गया। हरी घास को इस तरह कटिंग की जाने लगी मानों पोलो मैदान हो। अब भी वहां पहुंच जाओ तो दिल खुश हो जाता है। याद आता है कि कड़ी धूप की परवाह किये बगैर यहीं टिफिन खोल कर गोल घेरा बना खाना खाया जाता था। फुरसत मिली तो यूं ही बैठे-ठाले घास तोड़ कर उसे दातों तले दबा लिया।
इस बीच स्कूल प्रबंधन ने मैदान खराब होने का कारण बता वहाँ रावण जलाने पर रोक लगा दी। अगले साल से रावण बगल ही सटे दूसरे मैदान में जलने लगा। वह मैदान देख रेख के मामले में थोड़ा खराब था। म्युनिस्पेलिटी का था। चारों ओर गंदगी। कहीं बियर की बोतल तो कहीं घूरे। तब भी बच्चे वहाँ क्रिकेट खेलते रहते। फुटबॉल या ऐसा ही कुछ गेम यदा कदा हो जाता। ऐसे ही माहौल में रावण को लाकर जलाया जाता था। इधर सरकारी महकमे ने थोड़ी नज़रें इनायत की और मैदान में घास उगाई गई। मिट्टी-खाद डाल कर कुछ पेड़-पौधे लगाये गये। माहौल खुशनुमा हुआ। चारों ओर एक सीमेंट का गोल दायरा बना कर वॉकिंग के लिये इंतजाम किया गया। अब वहाँ सुबह शाम वॉक के लिये लोग आते हैं। बच्चों का क्रिकेट खेलना बंद हो गया है। उन्होंने जगह बदल कर थोड़ी दूर पर एक दूसरे मैदान में खेलना शुरू कर दिया है। इस बीच सरकार ने निर्णय लिया है कि अब से रावण यहाँ नहीं जलेगा। मैदान खराब होता है। लोगों की भीड़ पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाती है। इसलिये अब इसे दूसरी जगह जलाया जाय।
अब नई जगह के बारे में पता चला यह वही थोड़ी दूर वाला मैदान है जिसमें बच्चे म्युनिस्पैलिटी वाले मैदान से छिटक कर खेलने आते थे। फिलहाल यह वाला मैदान देख रेख की कमी के चलते उबड़-खाबड़ है। यह भी सरकारी मैदान है। घूरे, गड्ढे, कंकड़, बजरी ज्यादा है लेकिन एक तरह का कामचलाऊ मैदान तो है जिसमें रावण भी जलाया जा सकता है और बच्चे क्रिकेट भी खेल सकते हैं।
देखा जाय तो आगे-आगे क्रिकेट और पीछे-पीछे रावण....इसका उलटा भी कहा जा सकता है कि आगे-आगे रावण, पीछे-पीछे क्रिकेट। एक हिसाब से हरियाली और रावण के बीच छत्तीस का आंकड़ा लग रहा है। जितना लोग सभ्य होकर वॉक करेंगे, गार्डन-शार्डन बनवायेंगे,उतना ही रावण वहां से खिसकता जायगा।
उसके जलने की संभावना वहीं बची रहेगी जहाँ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हों या कोई खुला मैदान हो। अब इसमें कोई विकासवाद ढूंढे, डार्विन का सिद्धांत ढूंढे तो अलग बात है वरना सच तो यही है कि सभ्यता-फूल-फव्वारे के नाम पर बच्चों के लिये मैदान कम होते जा रहे हैं। वैसे भी आजकल बच्चों को कहाँ समय मिलता है। वे कहीं मोबाइल में लगे हैं तो कहीं क्लासेस जा रहे हैं। माँ-बाप भी खेलने अब कम ही भेजते हैं। हाँ, एकेडमी वगैरह हो तो वहाँ तगड़ी फीस देकर भेजेंगे। तब बात अलग हो जाती है। इस बीच ओलंपिक मेडल का रोना भी बदस्तूर जारी रहता है। हिप्पोक्रेसी में तो हम सब आगे हैं ही। उसका मेडल तो बेमांगे मिल जाना चाहिये लेकिन पता नहीं चल रहा कि उसकी एजेंसी किसके पास है।
- सतीश पंचम
स्थान - वही, जहाँ साल-दर-साल रावण ग्लेशियर की तरह खिसकता जा रहा है।
समय - वही, जब अपनी गेंद रावण के करीब जाते देख बच्चा कहे - "ए रावण, खड़ा-खड़ा दांत क्या दिखा रहा है - बॉल फेंक !"

Wednesday, September 7, 2016

'ऑकुपाई चारपाई'.......गंवई मानस !

मेरे गाँव में प्रधान के चुनाव के वक्त एक चुनाव चिन्ह चारपाई भी थी 
  काँग्रेस पार्टी वाला वह खाट मर्मज्ञ जो कोई भी रहा हो लेकिन चुनावी सभाओं के लिये दिया गया उसका खाट पंचायतवाला आईडिया कमाल का रहा । इसलिये भी कि अमूमन लोग किसी मसले पर खाट शब्द सुनते ही उसका शब्द-युग्म या उससे जुड़ा नकारात्मक मुहावरा बोलना शुरू कर देते हैं मसलन - खाट खड़ी कर देना, खटिया खड़ी बिस्तरा गुल, खाट के ठाठ टाईप। लेकिन खाट पंचायत के दौरान काँग्रेसी सभाओं में जो कुछ भी हुआ उसकी शायद कम ही लोगों को उम्मीद हो । कम ही इसलिये कहना चाहिये क्योंकि जो लोग गाँव-देहात से जुड़े हैं वे जानते हैं कि शादी-ब्याह के दौरान खाट को लेकर कितनी बमचक मचती है। पहले जब बारात आती थी तो लोग समूचे गाँव में निकलते थे कि हर घर से एक-एक खाट ले लो। बाद में बारात लौटने के बाद लौटा दिया जाता था। हर कोई देता भी था क्योंकि आज नहीं तो कल उनके यहाँ भी शादी ब्याह के मौके पर बारातियों के लिये खाट की जरूरत पड़ेगी और आज ना कहने का मतलब है कि अपने टाईम मुश्किल झेलना। इस दौरान वह घर सबसे पहले खाट दे देता था जिसके यहाँ हाल-फिलहाल बारात आने वाली हो। सिर्फ खाट ही नहीं, तकिया, दरी, गद्दा, कण्डाल सभी कुछ सामूहिक रूप से इस्तेमाल होता था।
   
    इसमें कई लोग चालाकी कर जाते थे। जब जानते कि लगन का टाईम है तो अच्छी वाली खाट भीतर वाले घर में छुपा देते या उस पर गुदड़ी डाल देते। कुछ तो रात-दिन सूखी दाल को ही फैला कर सुखवाते। नहीं कुछ तो बूढ़े-बुजुर्गों को लिटा देते कि सोये रहो, जब बटोरने वाले आयेंगे तो कह दिया जायगा कि अभी खाली नहीं है, देख रहे हैं वे खटिया पर ही हग-मूत रहे हैं, कैसे दे दें ? जानने वाले भी समझ ही जाते क्योंकि यही तो वह सब भी किये हैं। खैर, आगे समय बदला और ग्राम्य सामूहिकता की हूंट-टूंट के बीच बाजारवाद की पहुंच ने एक धक्का दे दिया। अब लोग टेंट हाऊस से खटिया बिस्तरा लाने लगे। यह सोच बनने लगी कि जैसे बाकी खरचे वैसे एक यह भी सही। कौन जाय लोगों से घर-घर मांगने कि खटिया दे दो, बिस्तरा दे दो। इस सिकुड़ती सामूहिकता के बीच नौजवान भी लोगों से मांगने में शर्माने लगे क्योंकि यही वह तबका था जिसके जिम्मे इन सब चीजों के जुटाने की जिम्मेदारी होती थी। नौकरी करने वाले परिजनों के जरिये बाहर से रूपया-पैसा आने लगा तो लोग भी हाथ खोलने लगे। नये-नये टेंट हाऊस खुलने लगे। रोजगार का एक नया जरिया बना। भले ही सामूहिकता की कीमत पर यह बदलाव हुआ लेकिन हुआ।

   
    इसके बाद वह दौर आया कि बारातों में द्वार पूजा के समय ही लोग टेंट हाऊस से आये फोल्डिंग खाट को अपने लिये छांट लेते और पास ही के खेत में कहीं अंधेरे में जाकर फेंक आते ताकि खाना खाने के बाद लौटकर ठाठ से खाट पर सो सकें । इधर द्वार-पूजा का कार्यक्रम चलता, नचनिया नाचते हुए पसीने-पसीने हो जाता । ऐसे में कुछ की नज़र कन्या पक्ष की ओर खड़ी सुंदर बालाओं पर तो कुछ की नज़र ट्रैक्टर से उतरते खाट पर । कुछ ऐसे भी होते हैं जो नाचते नाचते जमीन में गड़े खूंटे पर नज़र रखते हैं और इसके पीछे गंवईं कारण भी है। होता यह है कि बारात आने के रास्ते में जो कुछ गाय-बैल, बकरी, भैंस बंधे होते हैं उन्हें हटाकर कहीं पेड़ से तो कहीं घर के पिछवाड़े बांध दिया जाता है लेकिन खूंटा वहीं गड़ा रहने दिया जाता है। नतीजतन लोग नाचते हुए कितना ललनाओं की ओर देखें, कितना भी मानें कि पीली वाली देख रही है तब भी उनकी नज़र जमीन में गड़े खूंटे को देख रही होती है कि कहीं अंगूठे में ठेस न लग जाय वरना लत्ता बांधकर घूमना पड़ेगा।

    इस बीच कुछ बारातें शालीन किस्म की होती हैं। उसके बाराती थोड़ा धैर्यवान किसिम के होते हैं। गोधूलि बेला में जब ट्रैक्टर से फोल्डिंग खाट उतरती है तो वे उन खाटों को यूं देख कर निकल जाते हैं मानों उनकी कोई वैल्यू ही नहीं। यहाँ तक कि द्वार पूजा के समय भी ये पूरे मनो योग से कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं, पूरे धीर-गंभीर होकर मिठाई वाला दोना थामते हैं, पानी पिलाने वाले को इज्जत से बुलाते हैं कि भाई तनिक इनको भी दिजिये। यह अलग बात है कि इस इनको भी में मुझे भी दिजिये वाला भाव शामिल होता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो ट्यूब लाईट से दूर कोने वाली जगह तलाशते हैं ताकि मन भर लड्डू पेड़ों का ध्वंस किया जा सके। जो मिठाई पसंद न आये उसे कल्ले से जमीन पर गिरा दें और सिर्फ गुलाब-जामुन और छेना, बर्फ़ी पर आईंस्टाईन के E=MC स्क्वेयर वाली थ्योरी अप्लाय की जा सके। उजाले में यह थ्योरी फेल होने के चांसेस रहते हैं क्योंकि कोई परिचित इस तरह उन्हें भकोसते देख मुस्करा सकता है। यहाँ ट्यूबलाईट से दूर अंधेरे में इज्जत बनी रहती है।
ठंड का मौसम हो तो  पार्टियाँ अलाव के जरिये भी लोगों को जुटा लें 
  
    फिर थोड़ी देर बाद दूसरी ओर शादी-विवाह चलने लगता है तो दूसरी ओर खाने की पंगत शुरू हो जाती है। लोग ललकार ललकार कर बांटने वालों को प्रोत्साहित करते हैं कि अरे यहाँ दाल दिजिये, यहाँ गुलाब जामुन रखिये। यहाँ खटमिट्ठी आम की फांकी रखिये। यहाँ कटहल का रसेदार दिजिये। सभी काम में लगे होते हैं तो कुछ का काम यही रहता है कि देखो कोई नौजवान बांटते-बांटते रसगुल्ले वाली बाल्टी लेकर अंधेरे में अपने घर की ओर न चल दे। तो कुछ का काम रहता है कि भले ही कुछ काम न करें लेकिन ऐसा हाव-भाव बनाये रहें जैसे वही सब कंट्रोल कर रहे हैं। ऐसे लोगों को गंवईं बोली में कहा जाता है कि – पिसान पोत कर भण्डारी बननामतलब भण्डार घर की सामग्री की देखभाल करने वाला कोई और है लेकिन अपने शरीर पर पिसान यानि गेहूँ का आटा पोत कर भण्डार गृह का मालिक बना कोई और घूम रहा है। देखा जाय तो इस तरह के आटा पोत भण्डारी हर जगह हैं। राजनीति से लेकर ठेलानीति तक। पता चला राकेट भेजने की तैयारी किसी और ने करी लेकिन छोड़ते समय सरकार बदल गई और भण्डारी जी पहुंच गये कि जो किया हमने ही किया।
  
    खैर, खान-पान के दौरान ऐसा भी समय आता है कि कुछ बाराती पहली पंगत में बैठ कर खाना खाने के लिये टूट पड़ते हैं। इस पहली पंगत वाला लॉजिक ये कि जल्दी से खाना फिनिश करें और सबसे पहले ट्रैक्टर से उतरे खाट पर रात भर के लिये कब्जा जमा लें वरना कहीं शामियाने में सबके बीच बैठ कर नाच देखना पड़ेगा, नींद लगेगी सो अलग। इस तरह खाट मिल जायेगी तो सोओ चाहे जागो अपनी मर्जी। फिर कुछ ऐसे भी रहते हैं कि द्वार पूजा के समय ही भकोस कर खा लेते हैं ताकि खाना कम खाना पड़े और सबसे पहले खाट पर कब्जा जमाया जाय। कुछ तो ऐसे भी होते हैं कि अपने घर भले ही बोरा बिछा कर सोते हों लेकिन बारात में उन्हें खाट चाहिये ही चाहिये। खाट न मिला तो समझो इज्जत में कमी कर दी। वैसे खाट के लिये इस आतुरता की वजह यह भी है कि खाने के बाद तुरंत तो कुछ ज्यादा नींद नहीं लगती, चकर-पकर में, हंगामें नाच-गाने के बीच कुछ देर चल जाता है लेकिन जैसे जैसे रात के दो-तीन बजते हैं तो नींद अपना पूरा जोर मारती है। सुबह चार-बजते बजते तो अच्छे-अच्छे नचदेखुआ भी नींद में धराशायी होने लगते हैं। ऐसे में खाट बड़ी काम आती है सिर्फ खुद के लिये ही नहीं बाकी जीव-जंतुओं के लिये भी। पता चला इधर आप अकेले खाट पर सो रहे हैं और सुबह नींद खुले तो पैताने के पास कोई गाँव का कुत्ता भी गोल-मटोल होकर सोया है। दोनों ओर से शांति-पूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल।     
   
    फिर धीरे-धीरे वह माहौल भी खत्म होने लगा और लोग अपने बाईक से या किसी गाड़ी से बारातों में जाने लगे। जो नज़दीकी परिजन होते वे तो शादी ब्याह के लिये रूक जाते और जो सिर्फ प्योर बाराती रहते वे खाना खाने के बाद अपनी-अपनी गाड़ी उठा चल देते। बारात का मजा भी लिया और रात ही में घर भी पहुंच लिये। ऐसे वक्त पर जो अपने घनिष्ठ को रोकना चाहता है तो एकाध मजाकिया फब्ती भी कस ही देता है, मसलन क्या घर पर जाकर पत्नी की रखवाली करने जा रहे हो ? क्या करोगे जाकर ? ठहर जाओ, बारात में आये हो तो बाराती बन कर रहो । लेकिन लोग-बाग रहते हैं कि इस मजाक को मुस्की मारते निकल लेते हैं। घर पर जा कर अपने वाले खाट पर सोयेंगे कि टेंट हाऊस वाले नॉयलॉन के फोल्डिंग खाट पर सोयेंगे !
  
    इस लिहाज से देखा जाय तो काँग्रेस की सभा के बाद खाट लूट ले जाने को हैरान होकर सिर्फ़ शहर वाले देख रहे हैं। वह भी वे और आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं जो ऑफ़िस की मीटिंग या सेमिनार के दौरान मिले पेन को अपनी जेब में खोंस कर चल देते हैं। बिना एक लाईन लिखे पैड को अपने बैग में ठूंस कर चल देते हैं। ऐसे लोगों को तब आश्चर्य नहीं होता जब वे गोलगप्पे वाले से अंत में एक सूखा देने की गुज़ारिश करते हैं याकि धनिया-मिर्ची लेते हुए कड़ी पत्ता डालने की जिद करते हैं। तब भी नहीं जब थैली पास में होने के बावजूद सामान खरीदते समय प्लास्टिक की पन्नी के लिये दुकानदार से बकझक करते हैं। ऐसे ही लोग शायद इस खाट लूट पर ज्यादा हैरान हैं। 

        उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि यह खाट, यह चारपाई एक तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक है जिसके चारों पाये लोकतंत्र के उन चार स्तंभों की तरह है जिस पर लोकतंत्र टिका हुआ है। एक भी पाया कमजोर हुआ तो मुश्किल खड़ी हो जायगी। देखा जाय तो वे गाँव वाले ही थे जिन्होंने सही अर्थों में चारपाई वाले लोकतंत्र का सम्मान किया। दुनिया भले जैस्मिन रिवोल्यूशन के जरिये ऑकुपाई तहरीर स्क्वेयर करे, ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट करे...लेकिन हमने अपनी मौलिकता बनाये रखी और बिना किसी उकसावे के अपने लिये ऑकुपाई चारपाई’ जैसा अनूठापन गढ़ लिया। यह ऑकुपाई चारपाई रिवोल्यूशन अपने आप में अनूठा इसलिये भी है कि अब तक लोग अकेले सभा में आते थे, कुर्सी पर बैठते थे और भाषण सुन कर चले जाते थे। लेकिन उस खाट मर्मज्ञके चलते अब लोग जान गये कि चुनावी सभाओं में खाट भी पाई जा सकती है। ऑकुपाई की जा सकती है। ऐसे में लोग अब सपरिवार चुनावी सभा में आयेंगे। एक साथ परिवार के लोग एक या दो खाट पर कब्जा जमा कर बैठ जायेंगे। अकेले होने पर आखिर कब तक किसी को कहेंगे कि भाई तू उठ जा, या कम बैठ ।  पूरा परिवार एक साथ होने पर गारंटी रहेगी कि एक या दो खाट पर एक साथ बैठ कब्जा कर लिया जाय। फिर कितना तो विलक्षण माहौल होगा जब घर से लोग टिफिन लेकर पहुंचेंगे । एक ही खाट पर बैठ कर खायेंगे, भोजन-भाजन करेंगे। पानी की व्यवस्था तो कार्यकर्ता लोग कर ही देंगे। इस बहाने चुनावी सभा में भीड़ भी बढ़ेगी। दूसरे दल भी इस खाट समस्या पर सोचेंगे और कुछ करेंगे वरना हो सकता है कि चुनावी सभा से लाई खाट पर बंदा सोते हुए आराम पाये और उसी पार्टी को वोट कर दे जिसके यहाँ से खाट लाई गई। कुछ तो ऐसे भी होंगे जो खुद ही घर पहुंचा दें अपने चुनाव निशान के साथ। पता चला कमल के चुनाव चिन्ह वाला खाट अलाने के यहाँ तो पंजे के निशान वाला ढेकाने के यहाँ। कोई हाथी लेकर पहुंचेगा तो कोई साईकिल लेकर। रस्सी में भी रंगत नज़र आ ही जाएगी।
   
    फिर ये वो देश है कि जहाँ पार्टियों के बैनर तक फाड़ कर लोग अपने लिये हवादार चड्ढी सिलवा लेते हैं, ये तो खाट है जिसे सिर पर रख लोग आधी धूप और आधी छाँव में चलते परम आनंद की प्राप्ति कर सकते हैं । मन किया तो काँग्रेसी खाट पर भाजपाई बैनर भी बिछा सकते हैं और वहीं लेटे-लेटे मन की बात भी सुन सकते हैं। 

- सतीश पंचम


Saturday, September 3, 2016

बत्तख, तोते, हरी घास, विशालकाय तिरंगा...... हैदराबाद यात्रा - 2

    हैदराबाद के खूबसूरत संजीवैय्या पार्क में घूमते हुए एक जगह घास के खूबसूरत टीले नज़र आये। देखने से लगता था जैसे कश्मीर की वादी हो। कहीं सरपट ढलान तो कहीं तिरछी चढ़ाई। नर्म घास पर जूते उतार कर चलने का मन हुआ कि एकाएक बत्तखों का कुनबा खदबदाते हुए सामने से गुज़रा। यह एक पानी का छोटा सा खूबसूरत कुंड था। कुछ कमल खिले थे। ऊपर तोतों का कुनबा टांय-टांय करता उड़ा चला जा रहा था। पास ही एक गिलहरी चिट्-चिट् करती इत-उत फुदक रही थी। कुछ देर वहां ठहर कर आगे बढ़ा। जब यहां आ रहा था तब बहुत दूर से एक विशालकाय तिरंगा झंडा लहराता दिख रहा था। जिज्ञासावश उस ओर बढ़ता चला गया। 

    जैसे-जैसे करीब पहुंचा दिलचस्पी बढ़ती गई। अब झंडे के फड़फड़ाने की आवाज साफ़ सुनाई देने लगी थी। यूं कपड़ों के फड़फड़ाने की आवाज़ हम सबने कब सुनी है ? बहुत हुआ तो प्लास्टिक की बरसाती शीट या किसी बैनर का फड़फड़ाना ही सुना होगा वह भी बहुत हल्के से लेकिन यहाँ मामला कुछ अलग था। यह तिरंगा झंडा इतना विशाल था, इतना फैलाव लिये था कि देखते ही बनता था। इसके फड़कने की आवाज में अलग ही रोमांच महसूस हो रहा था। काफी देर तक उस तिरंगे झंडे को हैरान हो देखता रहा। विशालकाय पोल के ऊपरी सिरे पर अशोक के चार सिंह वाला राजचिन्ह सुशोभित था। ध्यान से देखने पर पोल के पास एक सूचना पट्टी दिखी जिस पर झंडे की उंचाई 291 Feet दर्शायी गई थी। तेलंगाना राज्य बनने के दो साल पूरे होने के अवसर पर हाल ही में इस विशालकाय तिरंगे झंडे का निर्माण किया गया था। कपड़े की लंबाई 108x72 Feet थी, वजन लगभग 66 किलो। इतने विशाल आकार के झण्डे को फहरते देख समझा जा सकता है कि उसकी आवाज़ में रोमांच आखिर क्यों कर था।

   पोल को ध्यान से देखा तो वह बड़े-बड़े नट-बोल्ट के जरिये एक प्लेटफॉर्म से जुड़ा था। उन नट-बोल्टों के पास ही एक तार और प्लेट देखने से पता चला कि यहाँ से पोल में अर्थिंग दी गई है ताकि आकाशी बिजली से बचाव हो सके। कुछ नवयुवक उस सीमेंट के प्लेटफॉर्म पर बैठे थे। पोल को छूकर देखा। थोड़ा सा ठनठना कर भी देखा, अच्छा लग रहा था। कुछ तस्वीरें लेने की कोशिश की लेकिन झंडा इतना विशालकाय कि कैमरे में अंट ही नहीं रहा था। नतीजतन कुछ दूर हटकर फोटो खेंचनी पड़ी। इसी दौरान झंडे के कपड़े पर ध्यान गया तो पता चला इसे चौड़ी पट्टियों वाले कई स्तरों से जोड़ कर बनाया गया है। कई थान लगे होंगे इसे बनाने में। जब उन पट्टियों की चौड़ाई ध्यान से देखा तो लगा कि हो न हो यह कपड़ा किसी एअरजेट या रशियन सुल्ज़र मशीन पर बना होगा क्योंकि इतने चौड़े पन्हे के कपड़े उन्हीं मशीनों पर बनते हैं। हथकरघे पर नहीं या फिर किसी चौड़ी कालीन की बुनाई वाला तरीका होगा लेकिन बाद में नेट पर सर्च किया तो पता चला यह निटेड पोलीस्टर है। निटींग मशीन पर बना है।

   थोड़ी देर ठहर कर देखने के बाद सफ़ेद पट्टियों के बीच चकती सी दिखी। अबकी थोड़ी हैरानी हुई कि आखिर क्या बात है जो सीधे-सीधे पट्टियों को जोड़ने के बावजूद बीच में चकती लगानी पड़ी। क्या वहां से कपड़ा कम पड़ गया था या उसे सिलने के लिये तकनीकी मुहाना छोड़ा गया था ताकि विशालकाय झंडे के भीतर पहुंचकर सिरो को जोड़ा जाय। बहरहाल मामला समझ न आया लेकिन इतना जरूर पता चला कि जब झंडा नया होगा तो इस तरह की चकती नज़र न आई होगी लेकिन इतने दिनों तक फहरते रहने के कारण उस पर धूल-मिट्टी, धुआँ-कोहरे का असर पड़ने से तमाम जोड़ दिखाई देने लगे, यहाँ तक कि सफ़ेद कपड़ों के बीच लगी सफ़ेद चकती भी। कैमरे में उसे कैद करने की बहुत कोशिश की लेकिन न हो सका। रिसोल्यूशन कम पड़ रहा था फिर मेरी दिलचस्पी इसकी आवाज़ और फहरने में थी।

   काफ़ी देर तक झंडे के आसपास घूमने के बाद लौटने लगा। कुछ दूर जाने के बाद झंडे को फिर से देखा। अच्छा लग रहा था लेकिन जेहन में एक बात बार-बार आ रही थी कि हमारे नेता इस तरह से झण्डों के प्रदर्शन से लोगों का ध्यान खेंचने में कामयाब तो हो जाते हैं जिसके चलते थोड़ी देर के लिये लोगों का मन बहलाव हो जाता है। मैं खुद घास के खूबसूरत इलाके से टहलते-टहलते यहाँ खिंचा चला आया। तालाब, बतख, तोते, गिलहरी, गुलाब, गेंदा सभी कुछ के बीच विशालकाय झण्डा अलग ही आकर्षण का केन्द्र रहा।
  
   वैसे एक बात जरूर जेहन में आती है कि इतना बड़ा, खूबसूरत और आकर्षक झण्डा इसलिये बन पाया क्योंकि बड़े-बड़े आकार की ढेर सारी चौड़ी पट्टियों को एक के बाद एक मजबूत डोर से जोड़ा गया। विशाल आकार के पोल को कई टुकड़ों में लाकर जोड़ने के बाद प्लेटफॉर्म पर ढेर सारे नट-बोल्ट लगाकर कसे गये, बैलेंस करने के लिये दो मोटे-मोटे तारों के सिरे ताने गये ताकि स्थिरता बनी रहे और झण्डा शान से लहराता रहे। ठीक यही स्थिति हमारे देश की भी है। यह भी खूबसूरत और आकर्षक तभी लग सकेगा जब इसके तमाम सिरों को एक दूजे से जोड़ा जाय, इसके नट-बोल्ट ठीक से कसे रहें, बैलेंस बना रहे। यह नहीं कि कार्यपालिका अपनी ओर के तार को ज्यादा तानने की कोशिश करे और विधायिका अपनी ओर, न्यायपालिका अपनी ओर। सभी का संतुलन जरूरी है वरना तो पत्रकारिता वाला तार पहले ही छटक गया है। रात-दिन एलियन, जादू, पाताल, निर्मल-राधे गाता ही रहता है। विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका सभी में जंग लग ही चुकी है। आपसी तना-तनी में तारों के टूटने का खतरा बना ही रहता है। रही-सही कोर-कसर पूरी करने कॉर्पोरेट वाले तो जुटे ही हैं।
   
    उम्मीद करता हूँ देश अब तक जैसे लहरते-फहरते बढ़ता रहा है वैसे ही आगे भी बढ़ता रहेगा। पीछे ले जाने के लिये तमाम उद्दम लगे होने के बावज़ूद लोग कभी-कभी समझदारी दिखा देते हैं। अपनी गलतियों को चुनाव के हिसाब से सुधार भी लेते हैं। पहले जो चुनाव सही लग रहा होता था वही बाद में गलत भी लगने लगता है। पहले जिन्हें काँग्रेस में रहनुमा नज़र आते थे वे भाजपा में ढूँढने लगे। कुछ क्षेत्रिय दल भी छुटभैया टाईप रहनुमा हो लिये। यह सब चलता ही रहेगा। कोई 31 परसेंट को कोस रहा होगा तो कोई 69 परसेंट की गलती बता रहा होगा। अंदर ही अंदर जानते सभी हैं कि गलतियाँ हो रही हैं सुधार भी होंगे ही। दिक्कत यही कि सुधार की रफ्तार थोड़ी धीमी है। नकारात्मक ज्यादा नज़र आता है, सकारात्मक कम। लाश तक ले जाने के लिये सुविधा नहीं मिल पा रही और नंग-धड़ंग बाबा-साबा सांविधानिक प्रवचन बांटते फिरते हैं। ज्ञान-विज्ञान की छोड़ कर जाहिलों जैसी बातें करते हैं। कहीं कुछ तो कहीं कुछ। हर ओर जैसे दौं सी लगी है। इसके बावज़ूद कहीं कुछ अच्छा होता है, नज़र आता है तो मन खुश हो जाता है। दिक्कत ये कि खुश करने लायक बातें याद करने पर भी बहुत कम याद आती हैं। जेहन में नकारात्मकता इतनी होने लगे तो चिंता होनी स्वाभाविक है।
  
   बहरहाल शान से फहरते इस विशालकाय झंडे के कुछ और चित्रों को देखें.....! 


 जारी....

- सतीश पंचम









Sunday, August 28, 2016

Hockey Pockey, Plain Talk, Double Talk, मधुलेखा, कांची....in हैदराबाद !

   अमूमन किसी जगह एक बार घूमने जाने के बाद हम चाहते हैं कि कुछ नई सी जगह देखी जाय लेकिन फूल-पत्तों, पेड़-पौधों, घास-फूस का मामला इससे थोड़ा अलग है। इनका आनंद तभी मिलता है जब उन्हीं को फिर से दुबारा देखा जाय किसी और मौसम में, किसी और टाईम-जोन में। इसलिये करीब डेढ़ साल बाद दुबारा हैदराबाद जाने का मौका मिला तो समय निकाल कर फिर से हैदराबाद के उसी संजीवैया पार्क जा पहुंचा जहाँ पिछली बार आया था। तब सर्दियों का खुशनुमा मौसम था। पार्क बन ही रहा था। रोज़ गार्डन में गुलाब तो खूब खिले थे लेकिन जाने की मनाही थी। उद्घाटन वगैरह का चक्कर ठहरा। खैर, इस बार जाने पर पेड़-पौधे तो खूब दिखे लेकिन फूलों की कमी दिखी। अगस्त का महीना ठहरा। हरियाली भरपूर लेकिन रंगत में कमीं थी। इस कमी को पूरा करने के लिये रोज़ गार्डन के गुलाब जरूर कोशिश कर रहे थे लेकिन बात वहां भी नहीं जम रही थी। अधिकतर क्यारियों में गुलाब की सेपलिंग्स लगी थीं। कहीं गुलाब खिले थे तो कहीं उनके ठूंठ गड़े थे। शायद कुछ दिनों में उनमें पत्तियों की झालर भी सजने लगे।
   
    गनीमत यह थी कि हर गुलाब की प्रजाति के साथ उसके नाम की तख़्ती लगी थी। कुछ के नाम आकर्षक थे तो कुछ के नाम एकदम से अनसुने। एक गुलाब की प्रजाति दिखी – प्लेन टॉक तो दूसरे गुलाब का नाम था डबल टॉक। एक प्रजाति थी – Passionate Kisses. एक गुलाब की प्रजाति दिखी जिसका नाम था – My Valentine. ऐसे ही कुछ नाम और थे – Hokey Pokey, Funny Girl, Glory of Jaipur, Pride of Midnapore, Ganges Mist, मधुलेखा, कांची, श्वेता, गायत्री….। तो कुछ गुलाब की प्रजातियाँ ऐसी थीं जो climber थीं। लता की तरह फैलते हुए पूरे इलाके को गुलाबों से ढंक देती थीं। ऐसी ही एक प्रजाति थी Amadeds. हांलाकि उसमें फूल नहीं लगे थे लेकिन कल्पना की जा सकती है कि जब उसमें चटक लाल रंग के फूल खिलते होंगे तो क्या नज़ारा रहता होगा।
   
    वहीं पास ही क्यारी में बारदान बिछे थे। छोटे-छोटे गोलाकार आकार में कटे हिस्सों को देख अंदाजा लगाया कि यहाँ गुलाब की कलम लगाने के लिये जगह छोड़ी गई है। थोड़ा सा ध्यान दिया तो बारदान का रंग और उस पर खिंची रेखाओं को देख यूं लगा मानों वह हमारे पीएम साहब का करोड़ी सूट वाला कपड़ा हो जिस पर कि नामावली बुनी गई थी। लेकिन नहीं, यह साधारण बारदान ही था जिसे क्यारी में बिछा कर सतह पर कुछ इस तरह इंतजाम किया गया था ताकि पानी देने पर ज्यादा देर तक पौधों के आस-पास नमी और ऊमस बनी रहे। खैर, राजनीतिक बातों का असर इतना कि हम प्रकृति को देखने के लायक भी न रहे। उसमें भी कुछ न कुछ नकारात्मक पुट ढूंढ ही लेते हैं। यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
  
   खैर, आगे और भी कई खूबसूरत नज़ारे दिखे। माहौल खुशनुमा लग रहा था। सामने ही एक उंचे टीले के पास जापानी ढंग से लकड़ी की छवाई वाला खूबसूरत गेट बनाया गया था। सुबह के ठंडे मौसम में ओंस की बूंदे लकड़ी का किनारा थामें चूने के लिये बेताब नज़र आ रही थीं लेकिन ठिठकी थीं। शायद अभी न जाओ छोड़ कर....दिल अभी भरा नहींसरीख़ा मामला लग रहा था। जब लबा-लब भर जायेंगी तो बूंदें खुद ही छोड़ कर चल देंगी।

   
   एक जगह छोटा सा मझोले आकार का पेड़ दिखा। खूबसूरत पेड़। पता नहीं चला कि आखिर वह किस प्रजाति का पेड़ है लेकिन सुंदर लग रहा था। उसके करीब ही खूबसूरत गुलाब घड़ी नज़र आई। न जाने वह कौन आर्किटेक्ट था जिसने अपनी प्यारी सी कल्पना के जरिये कांटों वाले गुलाब और घड़ी के कांटों के बीच मेटॉफ़र सा बुन दिया।

जारी....

- सतीश पंचम







हुसैन सागर झील में मछलियों की टोह लेता मछुआरा


Thursday, May 26, 2016

हॉर्नबिल परसाद....मधुमक्खी......कोल्हू का घोड़ा !

हॉर्नबिल प्रसाद तार पर बैठे हुए
    कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ा जा रहा था कि अचानक एक पक्षी सामने से पंख फड़फड़ाते निकला और कुछ दूर जाकर तार पर बैठ गया। ध्यान से देखा तो यह हॉर्नबिल पक्षी था। अमूमन पूर्वांचल में ये पक्षी नहीं दिखता। तुरंत मोबाइल से उसकी तस्वीर खेंचा। एक ही क्लिक ले पाया कि हॉर्नबिल परसाद जैसे प्रकट हुए थे वैसे ही फुर्र से गायब भी हो गये। सामने एक विशाल पीपल का पेड़ था। वहीं किसी कोटर में महाशय का घर था। साईकिल से पीछा करते हुए वहाँ पहुँचा तो उनका पता ही नहीं। पीपल के पत्ते मजे से खड़खड़ा रहे थे। सामने एक डाल पर नज़र पड़ी तो वहाँ मधुमक्खियों का विशालकाय छत्ता था। लगातार मधुमक्खियों के आने-जाने से, उनकी हलचल से छत्ता हल्के-हल्के फूल-पिचक रहा था। यूँ लग रहा था जैसे उसमें जान हो, कुछ-कुछ हार्ट-बीट की तरह !  इस तरह का विशालकाय़ छत्ता मध्य प्रदेश के भीमबेटका में देखा था। वहाँ भी छत्ता इसी तरह मधुमक्खियों की हलचल के कारण हार्ट-बीट शैली में फूल-पिचक रहा था। बहुत संभव है पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट कम होती तो मधुमक्खियों की भनभनाहट भी सुनाई देती। सारंगा मधुमक्खियों के बारे में सुना है कि वे बहुत खतरनाक होती हैं और उनके छत्ते से भन्नाहट की आवाजें भी तेज सुनाई देती हैं।




   आगे जाने पर पत्थर का कोल्हू दिखा जिस पर विभिन्न आकार-प्रकार के जानवर उकेरे गये थे। गिलहरी, तोता, घोड़ा, चाँद, युद्ध का दृश्य, बैल। पहले इन कोल्हूओं में तेल या गन्ने की पेराई होती थी। अब ये सिर्फ खेती-बाड़ी के औजारों को तेज़ करने के काम आते हैं। किसी की दरांती नहीं चल रही या हंसुआ-चाकू भोथरा हो गया तो पहुंच गया कटोरी में पानी लेकर। वहीं भिगो कर औजारों को कोल्हू के पत्थर से रगड़ेगा और धार आने के बाद कटोरी का पानी फेंक चल देगा। बच्चे जरूर उस पर बैठते हैं। खेलते कूदते हैं। इन कोल्हूओं के बारे में पहले भी सफ़ेद घर पर जिक्र कर चुका हूँ। गाजीपुर के लेखक विवेकी राय जी ने भी अपनी किताब में इन कोल्हुओं का जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि -  इन कोल्हुओं को लोग हाथोंहाथ उठाकर एक गाँव से दूसरे गाँव करते डगरा लाते थे। कहीं पहाड से आती थीं यह बनकर 
  
    
आगे विवेकी राय जी लिखते हैं कि - “जिन लोगों को पथरीया की जरूरत होती थी वे पहाड पर जाकर उसे गढवाते थे। और ऐसा भाईचारा था लोगों के बीच कि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग ढकेल कर पहुँचा देते थे। जिस गाँव में पथरीया पहुँच जाती थी उस गाँव के लोगों की जिम्मेदारी हो जाती थी कि ढकेल कर अगले गाँव में पहुँचा दें। किसी का कोल्हू गाँव में रह जाना पूरे गाँव के लिये लज्जा की बात मानी जाती थी 

   इन पथरियों पर पहचान के लिये सूरज, चाँद, हिरन  आदि की आकृतियां बनी होती थीं। अब हर समय तो कोई इतने लंबे समय तक इन कोल्हूओं के साथ नहीं चल सकता था। सो एक गाँव से दूसरे गाँव, दूसरे से तीसरे……निशान के आधार पर कोल्हू सरका दिया जाता था। जिसका कोल्हू गाँव में पहुँचता था, वह इन निशानों को देख कर उसे ले लेता था। 
      
         वैसे, बदलते समय के साथ, लोगों में आये दुराव के साथ एक मुहावरा भी बना है – ‘सीवान का कोल्हू होना’ -  माने ऐसा काम जिसमें सब लोग पूरी तरह सहयोग नहीं करते। किसी सामूहिक काम में जब कोई आधे मन से बल लगाता दिखता है तो कहा जाता है कि क्या सीवान ( गाँव) का कोल्हू टारने ( हटाने) आए हो"।

   मजे की बात ये कि सीवान शब्द सुनते ही वहाँ के एक जेलियर अपराधी शहाबुद्दीन का नाम जेहन में कौंधता है। वह भी एक तरह का कोल्हू ही है जिसे सभी राजनीतिक दल आधे-अधूरे मन से टारने का नाटक कर रहे हैं यही वजह है कि वह टर नहीं रहा है वरना क्या मजाल कि ऐसा खूंखार व्यक्ति अब तक स्वछंद रहे।  

कटा हुआ कोल्हू....बिल्कुल सादा...न डिजाइन न कुछ
   आगे कुछ और कोल्हू मिले। एक ऐसा भी कोल्हू मिला जिस पर कोई निशान न था। बिल्कुल प्लेन। अजीब बात ये कि उसकी गोलाई का एक हिस्सा कटा हुआ था। थोड़ा बहुत आसपास के लोगों से पूछा तो उन्हें इसके बारे में जानकारी ही न थी। अब तक मैंने जितने कोल्हू देखे थे सब पर कुछ न कुछ डिजाइन बना था। यह इस प्रकार का अकेला कोल्हू था। ऐसे मामलों में जब कुछ जानकारी न मिले तो अनुमान से काम चलाना पड़ता है। कोल्हू को छूकर सहलाते हुए इसके टूटे किनारे को देख समझ रहा था कि एक बात मन में आई। क्या पता कोल्हू गोलाई में तो सही सलामत कट गया हो लेकिन गढ़ते समय हो सकता है किनारे से कट गया हो। संभवत:  इसी खराबी के चलते इस पर आगे काम न किया गया हो और तमाम कोल्हूओं के साथ कम दाम में या मुफ्त में ही घेलुआ के तौर पर दे दिया गया हो। लेकिन जिसने भी इसे मुफ्त में लिया होगा उसे लाने में अच्छी खासी परेशानी हुई होगी। गोलाकार कोल्हू को लुढ़काते हुए तो लाया जा सकता है लेकिन इस तरह के कटे कोल्हू को भारी-भरकम बैलों वाली गाड़ी से या गोलाकार लट्ठों पर ठेलते हुए ही लाया जा सकता है। 

 

   वहाँ से हटकर आगे बढ़ा तो एक और विचित्र नज़ारे से सामना हुआ। सामने जमीन पर गड़े कोल्हू से घोड़ा बंधा था। कोल्हू के ऊपरी हिस्से में ईंट-गारा जोड़कर नांद बना दी गई थी। घोड़ा उसी नांद में अपना थूथन धंसाये खबर-खुबर खा रहा था। मजेदार दृश्य था। कोल्हू का बैल सुना था आज कोल्हू का घोड़ा भी देख लिया। वैसे घोड़ा शानदार था। उसके स्वभाव से परिचित नहीं था वरना उसके पुट्ठों पर हाथों से खरहरा करता। आस-पास उसका मालिक भी नज़र नहीं आ रहा था कि कुछ सहायता मिलती। 

   
 खैर, वहाँ से आगे बढ़ा तो सौ साल से भी पुराना वह नील गोदाम दिख गया जिसके बारे में बताया गया था कि उसके उपर ईंट जोड़कर घर बना लिया गया है। साईकिल दूर खड़ी करके वहाँ पहुंचा। मकान को देखने पर स्पष्ट हो जाता था कि निचले हिस्से की ईंटे अलग हैं और ऊपर की अलग। खेत में काम कर रहे एक किसान से पूछा तो उसने बताया कि अभी लोग हैं नहीं कहीं गये हुए हैं। मैंने आसपास घूम कर नज़ारा लिया। नील गोदाम से सटा कुआँ सही सलामत दिखा। अपने सौ साल से भी ज्यादा पुरातन रूप में अनोखा लग रहा था। उसके भीतरी हिस्से में नीम और पीपल की बहुतायत दिखी। झुक कर देखना चाहा तो किसान ने मना कर दिया। चेतावनी मिली कि कुएं की ऊपरी सतह पर उगे नीम और पीपल की दरारों में कभी कभी सांप या बिच्छु रहते हैं, थोड़ा सा ‘फरकेहोकर फोटू हिंचिये। किसी तरह दो-चार फोटू खेंचकर जब मुड़ने लगा तो कुएँ की भीतरी संरचना में एक परत पर ध्यान गया। समूची दीवारें तो 'इंग्लिश बांड' शैली में ईंट जोड़कर बनी थी लेकिन ज्यों ही एक निश्चित उंचाई आ जाती वहीं ईंटों की एक परत तिरछी हो जाती। यह परतें थोड़ी-थोड़ी देर बाद लगातार नीचे दिखतीं चली गई थीं। कुएं की भीतरी डिजाइन पसंद आई। इसे इंग्लिश बांड शैली का उत्कृष्ट नमूना कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी। देखा जाय तो इस तरह के इंग्लिश बांड शैली में ईंटों की जुड़ाई हड़प्पा मोहनजोदड़ो काल में भी था लेकिन उसका नामकरण इंग्लिश बांड ही ज्यादा प्रसिद्ध है। 

     कुछ क्षण वहाँ ठहर कर निकलने को था कि अबकी फिर से वह हॉर्नबिल पक्षी पंख फड़फड़ाता नज़र आया। इससे पहले कि कैमरा लेकर उसे कैप्चर करूं....हार्नबिल प्रसाद ये जा....वो जा और गुम....!




  - सतीश पंचम

 जारी......




सौ साल से ज्यादा पुराने कुएं में ईंटों की जुड़ाई में कुछ दूरी के बाद ईंटों की तिरछी परत नज़र आती है






कुआँ और नील गोदाम


Sunday, May 22, 2016

नील गोदाम....कटा हाथी.....छूही....पीपल !

      इस बार गाँव जाने के बाद आदतन सुबह-सुबह साईकिल उठा कर चल दिया गाँव घूमने। घर से कहा गया कि कुछ खा-पीकर निकलो लेकिन जानता था कि देर हुई तो मई की चिलचिलाती धूप मुश्किल खड़ी कर देगी इसलिये चाय-नमकीन भकोस कर जल्दी-जल्दी निकल पड़ा। रास्ते में मदार, नीम, पीपल, बबूल, गूलर, महुआ, आम, मेहंदी, शमी निहारता खेतों के बीच दिख रही पगडण्डी पर साईकिल उतार चल पड़ा। वहीं गेहूँ की कटाई होने के बाद सूखे खाली पड़े खेतों के बीच मुसखोल दिखे। मुसखोल, यानि चूहों द्वारा खेतों में बनाये गये भुरभुरे बिल जिनमें गेहूँ के दाने और तमाम अनाज आदि चूहों द्वारा जमा किये जाते हैं। एक के बाद एक खेतों को पार करते फिर से सड़क पर आ गया। रास्ते में कई लोग मिले जिनसे राम-रहारी होते गई। उन लोगों से रूक कर ढेर सारा बतियाने की इच्छा भी थी लेकिन संक्षिप्त हाल-चाल से ही काम चलाना पड़ा क्योंकि आगे धूप ने रास्ता मुश्किल करना था और मैं चाहता था कि ठंडे-ठंडे माहौल में जितना ज्यादा इलाका कवर हो सके इस दौरान कवर कर लूं।
   
     भैंसों की नांद, गायों का हंकरना, गिलहरी की चिट-चिट के बीच साईकिल कच्चे रास्ते पर चल पड़ी। सामने का इलाका कुछ बदला-बदला सा लगा। ध्यान से देखने पर जी धक् से कर गया। अंग्रेजों के जमाने का नील गोदाम गायब था। वही नील गोदाम जिसने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उल्लेखनीय है कि बिहार के चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर  लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते 
थे। तब चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी से संपर्क साधा और उन्हें अपने साथ चंपारण ले गये ताकि वे देख सकें कि निलहे किसानों पर अंग्रेज किस तरह अत्याचार कर रहे हैं। नतीजतन चंपारण सत्याग्रह हुआ और तीन कठिया प्रणाली पर रोक लग गई। बाद में रासायनिक रंगों के उत्पादन ने नील उत्पादन पर असर डाला और धीरे-धीरे नील गोदाम बंद होते गये। दरअसल जिसे नील गोदाम कहा जाता है वह एक तरह से नील वाली फसल के मथने का हौज है जिसमें नील को पहले सड़ाया जाता है और फिर उसे मथा जाता है। मथने के बाद जो कुछ निकलता उसे सुखाया जाता और पावडर बनाकर पैक किया जाता था।
   
     पिछली बार जब इसगोदाम के पास से गुजरा था तब उसकी कई तस्वीरें लिया था। 


 

















     कुएँ, जिनके भारी-भरकम छूही से गड़ारी लगी रहती थी और जिससे पानी खेंचा जाता था ताकि नील सड़ाया जा सके। हौज की दीवारें, उनके निकास द्वार। ऐसी तमाम तस्वीरों को कैमरे में कैद किया था लेकिन अब वहाँ सिर्फ कुआं था। हौज गायब था। वहीं खेतों में काम कर रहे एक व्यक्ति से पूछा तो उसने बताया कि गोदाम को जेसीबी लगाकर तोड़ दिया गया। कुआँ बचा है। सुनते ही मन खट्टा हो गया। इतनी मोटी-मोटी दीवारें थीं हौज की, बिना प्लास्टर के भी सौ साल से ज्यादा यह संरचना खड़ी रही और अचानक जेसीबी लगाकर उसे तुड़वा दिया गया। युवक ने बताया कि जल्दी टूट नहीं रहा था। जेसीबी को कई बार पोज़ीशन बदलना पड़ा, कभी बायें से तो कभी दायें से, आगे-पीछे करते हुए पहले छोटा हौज तोड़ा गया और फिर उसके बगल वाला और फिर अंतिम वाला टूटा। बड़ी जबर दीवारें थीं। कुछ ज्यादा पूछ-पछोर करने पर उसने बताया कि मलवा वहाँ रखा गया है चाहो तो देख सकते हो। इसके आगे कुछ पूछने की इच्छा ही न रही। फिर भी चलते-चलते पूछ ही लिया कि ये तो सरकारी जमीन पर बना होगा ? जवाब मिला कि नहीं, गोदाम निजी जमीन पर बना था। जिन लोगों की जमीन थी उन्होंने इसे तुड़वाकर जमीन खाली कराया ताकि जगह का इस्तेमाल हो सके। कुछ क्षण रूक कर उसने बताया कि जो पुराने लोग थे वे उसे बचा कर आखिर कितने दिन रखते। उन्हें मयालगती थी इसे तोड़ते हुए। आजा-पुरखों की चीज ठहरी। इसलिये अब तक बची रही। परिवार बढ़ा तो जगह की कमी हुई और नतीजा सामने है। पूछा कि आसपास कुछ और गोदाम थे, उनकी हालत कैसी है ? जवाब मिला कि है, लेकिन टूट-फूट गया है। एक पर तो सीधे घर बना दिया है, दूसरा एकदम खत्म हो चुका था सो उस पर इमामबाड़ा बन गया है। एकाध दूसरे गाँव में है लेकिन उसके बारे में नहीं पता कि अब उनकी कैसी हालत है। है भी या नहीं पता नहीं।  
नील का सूखा पावडर पैकेट

   
    टूटे गोदाम की कुछ तस्वीरें खेंच कर युवक को नमस्कार कहते हुए आगे उस ओर बढ़ चला जहाँ नील गोदाम का मलवा पड़ा था। साईकिल खेत में ही खड़ी करके करीब पहुँचा। ऐसा लगता था जैसे किसी हाथी को कई टुकड़ों में काटा गया हो। मोटी-मोटी दीवारें, ईंटों का ढेर, चूने-गारे का जोड़....। देखकर स्तब्ध था। मलवे के साथ एक पीपल भी उखड़ा चला आया था। तस्वीरें खेंच रहा था तो दूर से एक बच्चा मुझे देख रहा था। शायद वह समझना चाहता हो कि इस मलवे में आखिर ऐसा क्या है जिसकी मैं तस्वीर ले रहा हूँ। कुछ देर ठहर कर भारी मन से लौटा। साईकिल को कुछ देर खेत में पैदल साथ-साथ खेंचते गया। आगे पगडण्डी आने पर ध्यान आया कि इस पर बैठना भी है।

जारी....

-  सतीश पंचम

पुरानी तस्वीर जिसमें नील गोदाम के हौज दिख रहे हैं

नई तस्वीर: नील गोदाम जो अब टूट चुका है....सिर्फ कुआं बचा है 



पुरानी तस्वीर जिसमें कुआँ और उसके पीछे गोदाम की दीवार दिख रही है

नई तस्वीर जिसमें सिर्फ कुआँ और उसकी छूही दिख रही है....पीछे गोदाम गायब है

 
   नील गोदाम का मलवा : 

कटे हाथी ......
 




जारी.....









Saturday, May 7, 2016

आफ़तकाल !


  अंदर ही अंदर लोग यह मानने लगे हैं कि डिग्री में कुछ तो झोल-झपाटा है वरना इतनी हाय-तौबा न मचती। सब कुछ सच्चा होता तो साहब खुद ही सारा कुछ सामने रख देते। यह विश्वास कुछ कुछ उतना ही खरा है जितना लोग केजरीवाल के बारे में मानते हैं कि वे कितना भी नेक बनें, कितनी भी ईमानदारी शो-ऑफ़ करें, कुछ न कुछ तो उनकी भी कमियाँ हैं जो सबसे गाली खाते रहते हैं। कभी मुँह छुपाकर विज्ञापन दिखाते हैं तो कभी फुल पेज में पूरा बखान ही बखान।

    ऐसा ही कुछ अंदरूनी विश्वास गाँधी परिवार के प्रति या हर उस राजनीतिक घराने के प्रति है जिसकी कमाई दनादन बढती चली गई है। लोग अंदर ही अंदर मानते हैं कि बिना झोल-झपाटे के ये तीव्रतर प्रगति संभव ही नहीं है। फिर दामाद जी का भी कुछ लुक-शुक वैसा ही है जिसे देख लगता है मानों कहीं के कोई बाउन्सर हो। वैसे भी आम जन में निराशा के चलते एक किस्म की हीन ग्रंथि काम करती है। ऐसे लोगों को देख वह ग्रंथि और सुदृढ़ हो जाती है।

    रही बात साहब की तो वह डिग्री मामले में जब तक अदालती चक्कर से बचे रहे तभी तक ठीक वरना वहाँ पहुंचते ही मामला सुहाना हो जायगा। खोद-खोद के पूछ-पछोर होगी सो अलग। जितेन्दर तोमर का हाल तो जान ही रहे हैं। विरोधी खार खाये बैठे हैं सो अलग। अब तक के विकास-फिकास का काम तो सब दिख ही रहा है। कुल जमा पूंजी में साक्षी, प्राची, सुब्बू, योगी, ईरानी, बीफ, उत्तराखण्ड, रोहित, जेएनयू, कन्हैया-वन्हैया ही छाये रहे। जो बचा था वह डिग्री पूरी कर रही है। फिर इन दिनों चीफ़ जस्टिस जी भी कुछ भावुक लग रहे हैं। भावनाओं में बहकर डिग्री की सघन जाँच होने लगी तो मुश्किल हो जायगी। जल्दीबाजी में पुराने जमाने के कागज़ का लुक देने के लिये चाय के गिलास की गीली पेंदी, मोमबत्ती की जलती लौ से किनारों को कत्थई करने वाला काम भी नहीं होता। मिस्टेक हो जाती है।

    बाय द वे सुनने में आया कि बिल क्लिंटन ने जब मोनिका के साथ अपने संबंधों का खुलासा किया था तो अमरीकी समाज ने उनके द्वारा सब सच-सच बताने की हिम्मत को सराहा था। उन्हें इस्तीफ़ा देने से रोकने में उस साफ़गोई का बहुत बड़ा हाथ था। इधर जब भारत आये थे तो महाराष्ट्र के नेता कृपाशंकर सिंह ने एअरपोर्ट पर बड़ी देर तक हाथ मिलाते हुए उनसे पूछा था कि आप चाहते तो उसे रास्ते से हटा सकते थे लेकिन आप ने वह नहीं किया इसलिये लोगों को आश्चर्य है। बिल क्लिंटन मुस्करा कर रह गये। थैंक्यू कह आगे बढ़ गये।

    वह तो थी दूसरे देश की बात लेकिन अपने यहाँ अभी वह उदारता नहीं आई है। यहाँ फर्जी डिग्री को लेकर सच्चाई स्वीकारने का चलन सिर्फ़ फ़िल्मों में है मसलन मुन्नाभाई MBBS या शाहरूख़ की फिल्म 'कभी हाँ, कभी ना' जैसी फिल्मों में ! जब तक यह स्वीकार समाज में न आये, तब तक इन्तज़ार किया जाय ! क्या पता सत्य का राजनीतिक ज्वार आये और किनारे पर पड़े सीप, घोंघे, हार-फूल, लकड़ी-डंठल, काँग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा को भिगोता वापस लौट जाय !

ऑफ़्टरऑल इट्स 'आफ़तकाल' !

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.