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Monday, December 28, 2015

शैवाल, पत्ते, हेठी.....!

  बच्चे ने चलते-चलते गोल कंकड़ उठा नदी की ओर फेंका जरूर लेकिन वह किनारे ही जाकर रह गया। एक दो उछाल के बाद पानी से थोड़ी दूर। पास ही बैठा मेंढ़क कंकड़ गिरने के साथ उछल कर कुछ दूर जा बैठा। दूब के भीतर रेंगती चींटी कंकड़ के गिरते ही ठमक गई थी। तिस पर मेंढ़क का उछल कर उसके और करीब हो जाना एक खतरा ही था। मेंढक अब भी दूसरी ओर नज़र किये बैठा था। दूब के नीचे-नीचे होकर चींटी दूसरी ओर जाने की जुगत में थी कि तभी मेंढ़क भी आ पहुँचा। वह अब भी सामने की ओर नज़रें किये कंकड़ को देखे जा रहा था। उसके फूलते पिचकते गलदोदरों के ठीक नीचे वाली दूब में चींटी फंसी थी। अब न आगे जाने की राह न पीछे। जरा सी हरकत हुई नहीं कि जान गई।

  उधर बच्चा चलते-चलते अपने फेंके कंकड़ तक आ पहुँचा था। उसी के चलते मेंढ़क को अपनी जगह बदलनी पड़ी। चींटी को अब भी पता नहीं था कि किस वजह से मेंढ़क इस ओर आ पहुँचा है। वह मन ही मन मान चुकी थी कि आज जान नहीं बचेगी। तभी बच्चे ने वही कंकड़ दुबारा उठाया और फिर से पानी में फेंका। अबकी पानी में बुड़ुक की आवाज हुई और सतह पर एक गोल दायरा बन लुप्त हो गया। भीतर मछली के पास से होते हुए कंकड़ तलहटी में थोड़ी सी गंदली मिट्टी ऊभारने के बाद जा बैठा। शैवाल के जाले कंकड़ के यूं बिना अटके, बिना फंसे सीधे नदी की तलहटी में उतर आने पर अपनी हेठी मान रहे थे। फिर कंकड़ भी खुद को कम नहीं समझ रहा था। वह कोई पत्ता, तिनका या ठंडल तो था नहीं जो शैवालों की धौंस सुने, उनमें उलझ जाय। भले ही वह छोटा सा कंकड़ ही सही लेकिन उसका भी तो नाता चट्टानों, ढूहों, टीलों से रहा है। भला शैवालों से उसका क्या मुकाबला ?

   इधर बच्चे के हटने के बाद वापस मेंढ़क अपनी पुरानी वाली जगह पर जा पहुँचा था। चींटी ने राहत की सांस ली। थोड़ी और देर रहती तो उसकी ख़ुराक बनना तय था। खैर, किसी तरह बच जाने पर चींटी फिर दूब के ऊपर नीचे होते किसी तरह आगे बढ़ी। एक सूखे गंदे परनाले के बीच से गुजर रही थी कि गंदले पानी का रेला आया और बहते हुए सीधे नदी के पानी में। सतह पर तैरते हुए किसी तरह शैवालों में फंसे एक सूखे पत्ते पर जा अटकी। चींटी को काफी देर तक परेशान करने के बाद आखिर पत्ते को शैवालों ने आजाद कर दिया। चींटी पत्ते पर सवार हो आगे बढ़ी चली जा रही थी और उधर शैवाल अपनी इस दरियादिली पर खुश थे।

   रह-रह कर तलहटी में बैठे कंकड़ को देख भी रहे थे कि उसने चींटी और पत्ते को उनकी कैद से आजाद किये जाते देखा कि नहीं ?

- सतीश पंचम

#कल्पना

Saturday, December 26, 2015

आराम वाला स्नेह....!

 अभी दुपहरी में एक चिड़िया खिड़की के पास लोहे की ग्रिल पर बैठी चूं चूं कर रही थी। ऐसा नहीं कि खिड़की के पास पक्षी न आते हों। आते हैं। कबूतर या कौवे तो आते ही रहते हैं लेकिन किसी गौरेया का आना थोड़ी अलग बात है। उनकी चह-चह ज्यादा अच्छी लगती है। नज़र उठा कर उसे एकटक देख रहा था कि किचन से श्रीमती जी की नज़र मुझ पर पड़ी।

क्यों मुस्करा रहे हो ?”

एक चिड़िया आई है

तुम्हारे लिये आई होगी। मैं जाती हूँ तो उड़ जाती है

"उड़ जाती है ? मतलब पहले भी आती रही है। मुझसे ज्यादा तो तुम लक्की हो"।

   मुस्कराते हुए कुछ देर बैठा चिड़िया को देखता रहा। अबकी मादा चिड़िया भी नज़र आई और तुरंत ही फिर कहीं उड़ गई। कुछ क्षणों बाद नर चिड़ा सूखते कपड़ों की ओट में हो गया। फिर भी पतले कपड़े के दूसरी ओर से वह नज़र आ रहा था। चह-चह जारी थी। उठ कर करीब गया तो वह अपराजिता के गमले की ओर सटा चीं-चीं किये था। मुझे देखते ही फुर्र !
   
   वापस आकर आस-पास नज़र दौड़ाया कि कहीं कुछ बॉक्स टाइप मिल जाय तो उसमें छेद करके इसके रहने के लिये ठिकाना बना दूं। क्या पता अंडे देने की तैयारी चल रही हो। ज्ञान जी ने ऐसा ही एक बॉक्स गाँव में रहते गौरैया के लिये बनाया है।  

  इधर बॉक्स नहीं मिला तो श्रीमती जी से उस छोटी सी मिट्टी वाली मटकी के बाबत पूछा जिसे कुछ समय पहले लाया था और अक्सर यूं ही शो-पीस बनी पड़ी रहती थी। पता चला कि वह तो कब की फूट गई।

अब ?

    स्टील के एक पुराने लोटे की याद आई तो मालूम हुआ कि उसमें अभी फ्रिज में कुछ भर-भूर कर रखा है। उधर खिड़की पर चिड़िया का अता-पता नहीं। कबूतर जरूर यहाँ वहाँ गुटर-गूं कर रहे थे। सामने खुले आसमान में चील गोल दायरे में घूम रही थी। साथ-साथ नीचे वाली इमारत की छत पर उसकी परछाईं भी घूम रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से हट गया। वापस आकर बैठा।

  पहले से बना कर रख दिया होता तो अच्छा था। अब भी बॉक्स बना सकता हूँ लेकिन..... अभी बॉक्स नहीं है। क्या पता स्टील का पुराना लोटा खाली हो जाय। वैसे स्टील वाले में शायद चिड़िया न रहेगी। अंडे देगी तो रात में बच्चों को ठण्ड लगेगी। रूई-तिनका बिछाने के बावजूद स्टील के लोटे में उसे रहना अनकुस लगेगा। वैसे बिजली के खंभों में चिड़ियों को रहते देखा तो है लेकिन फिर भी। लोहे के खंभे और स्टील के लोटे में फ़र्क तो है।

  लेकिन बॉक्स कहाँ मिले ? वो हाल-फिलहाल खरीदा ग्राईंडर वाला कार्डबोर्ड बॉक्स कैसा रहेगा ? नहीं, अभी उसमें थोड़ी कमी-बेसी है। सर्विस वाले को बुलाया है। क्या पता रिटर्न करना पड़ा तो ?

  
     बॉक्स नहीं है, मिट्टी की छोटी वाली मटकी नहीं है, स्टील वाला बर्तन अनुपयुक्त है। अच्छा उसके लिये फिर कभी ठिकाना बनाउंगा। ढूंढने पर ऊपर छत से लगे सामानों में शायद एकाध बॉक्स मिल जाय। लेकिन वहाँ जाने के लिये थोड़ी मेहनत करनी होगी। बाद में आराम से जाउंगा। फिलहाल इसे लिख दूं। लिखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर उपस्थिति जरूरी है। चिड़िया का क्या है। आती-जाती रहेगी। स्टेटस थोड़ी दुबारा ध्यान में आएगा। अंतत: मसला लिख-उख कर टंग गया......

चिड़िया अभी तक नहीं आई है।  

-   सतीश पंचम

Sunday, December 13, 2015

ढूह...महुआ....बांग....बेहया !

     घास में रेंगती चींटी को कहीं से महुआ मिल गया है। अपने संवेदी तंतुओं से बार-बार निरख रही है, परख रही है। उसे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी मीठी और अनोखी महक वाली चीज हाथ लगी है। अंदर ही अंदर डर भी रही है कि कहीं कुछ खतरा न हो। आख़िर उसकी जानकारी में यह मौसम की पहली बदली थी। कभी नहीं देखा था यूँ किसी महुए को टपकते हुए।
    उधर दूसरी चींटी इन सबसे दूरी बना सब कुछ देख रही थी। उसके जीवन में भी यह पहली बयार थी। मह-मह माहौल ! थमते-झिझकते आखिर वह भी भदर-भदर चू रहे महुए के पेड़ के नीचे पहुंची। एक और चींटी को देख पहले वाली में थोड़ी हिम्मत आई। दोनों ही उस अनजानी-अनचीन्ही चीज़ को टटोलने में लग गये। ऊपर बैठा कौआ ताक में था कि कब ढंग का उजाला हो और वह पंख पसारे। यूं तो वह अभी भी कहीं जाकर कुछ खाने-पीने की तलाश कर सकता था लेकिन आज कुछ ठहर कर टहनी छोड़ना ठीक समझा। वैसे भी रात भर महुआ चूने से ठीक से आराम न मिला था। आशंका लगी रही कि कहीं सिर के ऊपर न टपक जाय। कई बार रात में मन किया कि पेड़ बदल दे लेकिन अंधेरे में निकलना ठीक नहीं सोच कर पड़ा रहा। फिर अब तो सुबह हो ही रही है।
    उधर ढूह पर बैठा मुर्गा मन ही मन अपनी बांग पर पसोपेश में है। पहली बांग कुछ कमज़ोर लगी थी। शायद गले का झाल ठीक से उतरा नहीं था। एक और बांग की तैयारी में था कि अचानक दड़बे पर चील का धावा हो गया। करीब ही चीं-चीं कर रहा मुर्गी का बच्चा शिकार बना। अबकी मुर्गे ने बांग देनी चाही लेकिन हिम्मत कुछ छूट सी गई थी। फिर मुर्गी कुनबे में फैली इस ताजा दहशत के दौरान बांग देना ठीक भी न था। ऐसे में उसने पंख फड़फड़ाये, कलगी हिलाई और काँटों से बचते-बचाते करीब स्थित बेर की निचली टहनी पर जा बैठा। वहाँ बैठने का कोई खास कारण तो नहीं लेकिन कभी-कभी उसे अच्छा लगता है वहां बैठना। तब और जब उसके मन में कहीं उठा-पटक चल रही हो।
     तभी एहतियात बरतने के बावज़ूद कलगी किसी नुकीले काँटे से छू भर गई। खदबदाहट में टहनी बदलनी चाही कि पंख उलझ गये। किसी तरह नुच-चिथ कर बाहर निकलने में कामयाब होने के बाद मुर्गे ने बेर और उस पर बने बया के लहराते घोंसले की ओर नज़र उठा कर देखा। कहीं कुछ खदबदाहट नहीं। सब कुछ शांत। धूप निकल आई है। सामने घूरे पर कुछ पाने की उम्मीद से उस ओर जा रहा था कि अचानक कीचड़ से सटी बैंगनी फूलों वाली बेहया की झाड़ियों की ओर चल पड़ा। वहाँ कीचड़-कादो में से छितरा-छितरा कर जो कुछ मिला उसे खाने के बाद फिर एक जोरदार बांग देने की इच्छा हुई कि तभी बेहया की झाड़ियों के भीतर से खरगोश को निकल भागते देख मुर्गा चौंक गया। इंतज़ार में रहा कि अभी कोई और भी उसके पीछे-पीछे झाड़ियों में से निकलेगा उसे पकड़ने लेकिन कोई न निकला। कहीं कुछ हलचल नहीं। धीमे कदमों से थमते-झिझकते आगे बढ़ मुर्गे ने अंतत: एक जोरदार बांग दे ही दी ! कुछ यूं मानो बेहया की झाड़ियों में छुपी उस अनजान चीज को चुनौती दे रहा हो। लेकिन झाड़ियों में कहीं कुछ न निकला। कुछ विशेष हरकत न देख कलगी को झटका दे मुर्गा घूरे की ओर बढ़ चला। झाड़ियाँ मंथर गति से हिलती-डुलती मुस्करा रही थीं।
    आख़िर उन्हें भी बड़े दिनों बाद कोई ढंग का बेहया जो मिला था !

- सतीश पंचम

Tuesday, December 1, 2015

चिड़िया, चट्टान, बरगद, गिरगिट !

  पहाड़ की एक छोटी चट्टान नीचे की ओर सरकते हुए एक बड़े से बरगद की ओट में आकर फंस गई है। वहीं चीटियाँ रेंगती हुई मना रही हैं कि बरगद हटे तो चट्टान आगे सरके, आखिर कब तक इसे अपने दम पर यूं ही बरगद रोके रखेगा। पता चला चीटियाँ उसी के ऊपर से गुजर रही हैं और चट्टान गड़गड़ा कर खिसक गई। जितनी चीटियाँ होंगी सारी मारी जायेंगी।
    उधर बरगद मन ही मन सोच रहा है कि चट्टान कुछ दिन यहीं फंसी रहे तो अच्छा है। नीचे ढलान पर झाड़ियों में चिड़िया का घोंसला है। चट्टान का वहां लुढ़कते हुए जाना चिड़िया परिवार के लिये खतरा है। इन सारी हरकतों से बेखबर चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर घोंसले में पहुंची है। बच्चे चीं चीं करते हुए पहले चुग्गा देने के लिये मुंह खोल शोर मचा रहे हैं। उधर बरगद के किनारे वाली टहनी पर बैठे चिड़े को खतरे का कुछ-कुछ अंदाजा हो गया है। वह मन ही मन मना रहा है कि बरगद इस चट्टान को कुछ और समय तक अपने जटा-जूट में फंसा कर रखे तो अच्छा है।
   इधर चट्टान के मन में भी उहापोह जारी है। वह चाहता है कि जो होना हो वह जल्दी हो। आखिर कब तक यूं ही कगार पर फंसा रहेगा। पास ही रेंगता गिरगिट अपनी लपलपाती जीभ से बार-बार इस नई चट्टान को चाटना चाहता है। वह जानना चाहता है कि बेहद ऊपरी सतह से खिसके इस चट्टान में और यहाँ पहले से मौजूद चट्टान में कुछ बुनियादी फ़र्क है या दोनों ही एक समान हैं। उसकी सतह से चिपटी मिट्टी में कुछ चीटियाँ, कीड़े या कुछ नमक का अंश तो होगा ही। बरगद गिरगिट की इस मंशा को अच्छी तरह भांप रहा है। उसे आशंका है कि गिरगिट के हल्के स्पर्श से चट्टान दूसरी ओर खिसक सकती है। और तभी बरगद का एक लाल पका गोदा टूट कर नीचे गिरा और लुढ़कते हुए घोंसले से दूरी बनाते आगे झाड़ियों में जा कर गुम हो गया। अपना मन मार कर गिरगिट दूसरी ओर हट गया। चींटियाँ सहम कर जहां थी वहीं रूक गईं। चिड़ा सहम गया। बच्चे अभी उड़ने लायक नहीं हुए थे। आज एक गोदा गिरा है, कल दूसरा गिरेगा। फिर ये बरगद के गोदे पकने का मौसम है। कोई न कोई सीधे चट्टान के उस नाजुक हिस्से को छू ही देगा और फिर जो होगा उसके बारे में सोच कर ही जान निकल जाती है।
     उधर चिड़िया चुग्गा देने के बाद फिर उड़ चली थी चुग्गा लाने। मन ही मन भुनभुना रही थी कि न जाने कहाँ चला गया मेरा जोड़ीदार। बच्चे भूख से चिचिया रहे हैं और उसका है कि कहीं कुछ पता ही नहीं।


- सतीश पंचम

बरगद, पीपल, तितली, जटा-जूट

    बरगद की जटाओं पर कहीं से एक तितली आकर बैठ गई। रंग-बिरंगी तितली का स्पर्श होते ही जटाओं में कानाफूसी शुरू हुई। मोटी डाल वाली जटा ने पतली से पूछा कि,‘ये कौन है जो आ बैठी है?’ उसे भी कुछ ज्‍़यादा पता न था। रात-दिन कई तरह के जीव, कीड़े-मकौड़े, मच्छर, भुनगे, गिलहरी वगैरह आते-जाते रहते हैं लेकिन किसी तितली का आना न के बराबर होता है। करीब से उड़ते जरूर देखा है लेकिन कभी उसकी जानकारी में ऐसा नहीं हुआ कि कोई आकर जटाओं पर बैठ जाय।
     उधर पीपल के पेड़ से निकली जटियल दाढ़ी ने कान लगा कर बरगद की जटाओं की बातचीत सुननी चाही पर उनकी बातचीत इतनी सांय-फुस चल रही थी कि कुछ पता न चल रहा था। पीपल के पत्ते शोर मचा रहे थे सो अलग।
   तितली थोड़ी देर जटाओं पर बैठने के बाद दूसरी ओर उड़ चली। दायें-बायें....सामने, ऊपर....तिरछे उड़ते-उड़ते तितली फिर से बरगद की ही किसी दूसरी जटा पर बैठ गई। अबकी बरगद की जटाओं में कुछ ज्‍़यादा ही सिहरन देखी गई। वे इतने चटक और रंगीन स्पर्श के आदी न थे। पीपल की जटियल दाढ़ी ने अबकी बात पकड़ ली। उसे समझ आ गया कि बरगद की जटाओं में क्यूँ बेचैनी फैली है। इसके पहले उसे भी तितली के स्पर्श ने इसी तरह सिहराया था। पीपल के पत्तों ने खड़खड़ाया न होता तो तितली काफी देर तक वहीं बैठी रहती।
      इसी बीच हवा का तेज झोंका आया और बरगद की दूसरी जटा ने तितली के रंगीन पंखों तक पहुँचना चाहा। इससे पहले कि छुए, तितली उड़ चली। बाकी जटाओं ने उस जटा की बदमाशी पर नाराजगी जताई तो उसने हवा का बहाना बताया। तितली फिर से उसी राह आड़े-तिरछे, दायें-तिरछे होकर उड़ चली।
     अबकी पीपल की ओर तिरछे बढ़ रही थी कि फ्लाय कैचर ने झपट्टा मारा और तितली को अपनी चोंच में दबा ये गया वो गया। पीपल के पत्ते हरहराते रह गये, बरगद के पत्तों ने दुख तो जताया लेकिन हमेशा की तरह प्रकट न किया। वैसे भी पीपल के पत्तों के मुकाबले बरगद के पत्ते कुछ ज्‍़यादा स्थिर रहते हैं। सबसे ज्यादा अफ़सोसजनक मंज़र था बरगद की जटाओं में। एक तरह की बेचैनी और कसमसाहट दिख रही थी। उनमें भी उसे ज्‍़यादा जिसने थोड़ी सी हवा चलने पर तितली को छूना चाहा था।
    उधर पीपल की जटियल दाढ़ी अब शांत थी। आज उसे एक किस्म की राहत सी मिल रही थी यह सोच कर कि जब कुछ समय पहले उसके यहाँ भी तितली का आगमन हुआ था तो ऐसी कोई दुर्घटना न हुई थी। तितली जैसे हँसती-खिलखिलाती आई थी वैसे ही वापस उड़ गई थी !
  - सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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