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Sunday, May 17, 2015

भूगोल सोरठा...विज्ञान गारी सागर....इतिहास काव्य सागर !

   "एक खूबसूरत काला चश्मा उत्खनन के दौरान मिलते ही पुरातत्विदों में हर्ष की लहर दौड़ गई। टीला क्रमांक दस वाले उत्खननकर्ता ने टीला क्रमांक आठ वाले को आवाज दी तो सात और छह वाले भी दौड़े चले आये। बाकी लोग पहले से ही पहुंच चुके थे। इस काले चश्मे के बारे में जब पुरातत्विदों ने खोजबीन की तो पता चला कि चार हजार वर्ष पूर्व इसे पहन कर तत्कालीन प्रधान सेवक ने किसी विदेशी म्यूजियम में भ्रमण किया था। उस पल की तस्वीरें तत्कालीन अखबारों में प्रमुखता से छपी थीं।   वहीं इतिहासकारों के दूसरे धड़े का मानना है कि यह वो चश्मा होकर वो वाला चश्मा है जिसे पहनकर प्रधानसेवक के सामने जाने पर तत्कालीन कलेक्टर को फटकार सुननी पड़ी थी क्योंकि कलेक्टर उस चश्मे में उनसे ज्यादा जंच रहा था।
    वहीं इस चश्मे पर शोध करने वाले पीएचडी शोधार्थियों का मानना है कि धूप का चश्मा लगाने से सामने खड़े व्यक्ति की शक्ल चश्मे में दिखने लगती है.....कोई झेल लेता है तो किसी से वह भी नहीं झेला जाता। संभवत: फटकारे जाने का यही कारण रहा हो। इसके अलावा यदि वस्तुस्थिति को समझते हुए कलेक्टर अपनी मुश्किल बताता कि कैसे प्रधानसेवक के प्रखर तेज से, उनके दैदिप्यमान मुखमंडल से उसकी आँखें चौंधिया रही हैं तो बहुत संभव है अगली बार वह कलेक्टर से 'महाकलेक्टर' के रूप में प्रमोशन पा जाता" !

( ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)
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  इतिहास पढ़ना हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है। बचपन में इतिहास की किताब में छपी किसी तस्वीर को देख घंटों उसके बारे में कल्पनायें किया करता। कोई किला देख लिया तो वहां कल्पना शुरू होती, राजा यहीं से गुजरता होगा, सिपाही, द्वारपाल, घोड़े, हाथी सब यहीं से जाते होंगे, पानी का हौदा रखा जाता होगा, ऊपर गेट से फूल बरसाया जाता होगा, फूल भी ढलान पर उगी झाड़ियों में से मिलते होंगे, राजा को खुद कुछ न करना पड़ता होगा। सब उसके सहचर करते होंगे। फिर लकड़ी के घोड़े वाली तस्वीर देख कल्पना करता कि कैसे उसके भीतर बैठे तीस लोग सांस लेते होंगे, रात भर के लिये यूनानियों ने कैसे उस लकड़ी के घोड़े को किले के बाहर छोड़ा होगा और कैसे उसे खींच खांच कर किले के भीतर लाया गया होगा। रात में सिपाही घोड़े के पेट से निकले होंगे, एक एक पेंच खोला गया होगा, धीरे से बिना आवाज किये सिपाही अंधेरे में उतरे होंगे, बाहर निकल कर किले का दरवाजा भीतर से खोल अपने साथियों को आमंत्रित करते उनके चेहरे पर कैसे कैसे भाव आये होंगे। ऐसी बहुत सी कल्पनाएं थीं जिन्होंने इतिहास पढ़ने में रूचि जगाई।    

   आज भी जब किसी एतिहासिक स्थल पर पहुंचता हूं तो उसे लेकर कल्पनाएं जीवंत हो जाती हैं। मन तरह तरह के कयास लगाने लगता है। भीमबेटका की पाषाणकालिन गुफा संख्या ग्यारह के ठंडे चबूतरे पर लेटे-लेटे यूं लगा जैसे आदिकाल में पहुंच गया हूं। आग जल रही है, धुआँ इन कगारों में औंस कर रह जा रहा है, उसे ऊपर निकलने का रास्ता एक ही ओर से मिल रहा है लेकिन वहां भी जंगली झाड़ी होने से ठीक से निकास नहीं है। धुआँ आँखों में लग रहा है। इस असूझ में सामने से कोई शिकार कंधों पर लादे लिये चला आ रहा है। खाल जल्दी से अलग करना होगा वरना चींटियां लग जायेंगी। राख लेकर खाल के भीतर रगड़ना भी है ताकि खून सूख जाय। धूप में सुखाना होगा, बारिश भी आने वाली है। कितनी सारी मुश्किलें।

    इस तरह की कल्पनिक उड़ान अच्छी लगती है। सहजता से किसी स्थान को अपने साथ नत्थी कर लेता हूं। दिक्कत तब होती है जब इतिहास को तोड़ मरोड़ कर लिखा जाता है और वही पढ़ाया जाता है। धार्मिक और राजनीतिक लाभ हानि के हिसाब से इतिहास को पाल पोस कर बड़ा किया जाता है। किसी राजा को बहुत बड़ा धार्मिक और किसी को उन्माद से प्रेरित घोषित किया जाता है। किसी को धर्म का रक्षक तो किसी को विधर्मी बताकर पाठ्य पुस्तक से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है जबकि ध्यान से पढने पर वही राजा किसी और समय में विपरीत कार्य में लिप्त दिखता है, किसी को हिन्दूओं का संरक्षक कहा जाता है तो अगले ही अध्याय में उसके परिवार के संबंध मुस्लिम बादशाह के साथ नजर आते हैं। बेटी ब्याही जाती है, जागीर ली जाती है। सारा कुछ गड्डम-गड्ड। ऐसे में इतिहास को अपने हिसाब से एडजस्ट करने की कोशिश देख कोफ्त भी होती है। इस कोशिश में क्या मार्क्सवादी, क्या हिन्दूवादी और क्या मुस्लिम। सभी एक दूसरे से बढ़कर हैं। इसका कच्चा चिट्ठा अरूण शौरी ने अपनी किताब में बयां किया है कि कैसे जानेमाने इतिहासकारों ने अपनी मन मर्जी से इतिहास को तोड़ा मरोड़ा, जहां मन आया वहां घपला किया। किताब का नाम है - "Eminent Historians: Their Techniques, Their Line, Their Fraud".

   देखा जाय तो किसी इतिहास की किताब को लिखते समय बहुत ज्यादा सतर्कता, व्यापक दृष्टिकोण और उस काल के हिसाब से मान्यताओं, रूढ़ियों और भौगोलिक स्थितियों पर पैनी नजर रखना चाहिये। लेकिन ऐसा होता कहां है। जिस इतिहासकार की ग्रंथि जिस ओर लिपट जाय वह उसी ओर बढ़ता चला जाता है। पूर्वाग्रह भी कारण हो जाते हैं इस तरह के रायता फैलाने में। कोई बंदा ज्यादा धार्मिक है तो वह इतिहास लिखते वक्त राजा के धर्म को महिमामंडित करना शुरू कर देगा, आदि से लेकर अंत तक वह इसी में मुग्ध रहेगा कि राजा बड़ा धार्मिक था, उसने इतना दान-पुन्न किया, इतने मंदिर बनवाये, इतने कंगूरे, इतने अटारियां, इतने दीपस्तंभ। वह बाकी चीजों पर ध्यान ही नहीं देगा। वहीं जो इतिहासकार कुछ इस्लामिक दुनिया से प्रभावित रहेगा वह लिखते वक्त भी जेहन में शाही टेर के साथ ही लिखेगा। बादशाह को बहुत नफ़ासत और इंसाफपसंद, बाकियों को ऐरू-गैरू समझेगा। इस तरह का लेखन पढ़ने की रौ में तुरंत पकड़ में नहीं आता लेकिन अंदर ही अंदर लगने लगता है कि बंदा किसी खास मानसिकता से लिख रहा है, उसकी बातें संदिग्ध लग रही हैं। यह आभास होते ही आगे कुछ पढ़ना मुश्किल होता चला जाता है और फिर उस इतिहासकार द्वारा चाहे कितना भी विश्वास करने लायक मजबूत तथ्य पेश किया जाय, वह संदिग्ध ही लगता है। एक बार विश्वास उठा नहीं कि फिर हर जानकारी संदेह के दायरे में लगती है।

  फिर हाल फिलहाल के दशकों में राजनीतिक इतिहास लिखवाने-बनवाने की होड़ सी लगी है। जरा सा कोई इधर उधर बताये तो धरना प्रदर्शन और तोड़ फोड़ होने लगती है। इस मामले में हर कोई अपने हिसाब से इतिहास को देखना चाहता है। वह नये तथ्यों को, नई जानकारियों को मानना ही नहीं चाहता क्योंकि ऐसा करने पर उसके राजनीतिक करियर पर असर पड़ सकता है। यही वजह थी कि जब झूठ मूठ का इतिहास गढ़वाने की बयार बहने लगी तो चिढ़कर मैंने अपने हिसाब से तात्कालिक मुद्दों को इतिहास की उत्तर पुस्तिका के रूप में लिखना शुरू किया। उन मुद्दों पर चुटकी लेनी शुरू की जिन मुद्दों को लोग बिना समझे बूझे बस आंख बंद कर मान लेते हैं। वे यह नहीं समझते कि जो कुछ राजनेताओं द्वारा कहा जा रहा है वह वाकई सही है या ऐसे ही शिगूफा छोड़ा गया है। यदि यही चीजें आज से दस साल बीस साल बाद या हजार साल बाद देखी समझी जायेंगी तो क्या निष्कर्ष निकाला जायगा, उन्हें लोग किस रूप में देखेंगे ? दस बीस साल बाद की बात तो छोड़िये, एक ही बात को तुरंत के तुरंत किस रूप में लोग देखते हैं यही अगर समझ लिया जाय तो इतिहास और पुराण, इतने साल, हजार साल का जो बवंडर बो कर रखे हैं वही शांत हो जाय। कम्बख्तों को संसद में बोलते वक्त जुबान भी न लड़खड़ाई कि ज्योतिष के सामने विज्ञान बौना है। तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई उस बंदे को बोलते समय। तिस पर विज्ञान कांग्रेस में लेकर आ गये चालीस इंजनों वाले जहाज की तुकबंदी। पूरी दुनिया में थू थू करवा कर रख  दिये। मिथक और विज्ञान की मनोरम चटनी बनाकर दुनिया के सामने परोस दिये कि यही है हमारी थाती। चख कर देखो। उपर से जिस विभाग से अपेक्षा की जा रही थी कि वह आगे बढ़कर ऐसे लोगों पर लगाम कसेगा, बेसिर-पैर की हांकने पर बंदिश लगायेगा उसी की एक तथाकथित नेत्री जी ज्योतिषी के आगे हाथ पसार अपना भविष्य पढ़वाते नजर आईं। जय हो। इससे आगे क्या सोचना-समझना।

   इन्हीं सब बातों पर, ऐसे चिलगोजों पर कटाक्ष करते हुए यदा-कदा ईसवी सन् 6020 की उत्तर पुस्तिकाएं लिख देता हूं। मनमौजी व्याख्या, चुटकी लेते हुए मुद्दों को परोसने में ऊपर ऊपर से आनंद भले आये लेकिन अंदर ही अंदर एक किस्म की  पीड़ा महसूस होती है। दरअसल कोई भी इतिहास अनुरागी व्यक्ति कभी भी इतिहास को तोड़ना मरोड़ना पसंद नहीं करेगा। वह चाहेगा कि चीजों को उसी अंदाज में, उसी परिप्रेक्ष्य में देखे समझे जिस परिप्रेक्ष्य में वे चीजें इस्तेमाल होती थीं। जिस दौर में वे मान्यताएं प्रचलित थीं। ऐसी हर चीज को ज्यादा से ज्यादा सटीक ढंग से  देखने की चाहत हर इतिहास प्रेमी में होती है। संभवत: यही कारण है कि हर स्टेटस जो ईसवी सन् 6020 की उत्तर पुस्तका के रूप में लिखता हूं, उसे लिखने के बाद अंदर ही अंदर कचोट महसूस होती है। एक तरह का रीतापन, एक बेचैनी सी रहती है। यह बेचैनी वर्तमान को भविष्य के इतिहास के रूप में इंगित करते हुए और ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे में कोशिश रहती है कि इस मौजू इतिहास को लोग पढ़ भर लें, सोचें कि तथाकथित इतिहासकार, धार्मिक उन्माद से ग्रस्त लिखावटों और बनावटी इतिहास लेखन से किस तरह सचेत रहें। इस तरह की सावधानी तब और ज्यादा जरूरी हो जाती है जब चारों ओर मार-काट, हत् तेरे की धत् तेरे की, हमारा धर्म, हमारा न्याय वाली खुशफ़हमियाँ फैली हों।

 - सतीश पंचम 

Tuesday, May 12, 2015

दाऊद इन समझौता एक्सप्रेस.....


         बेल के सुहाने मौसम में खुद को हाजिर नाजिर मनवाने और जमानत पाने के लिये दाऊद समझौता एक्सप्रेस के डिब्बे के बाहर चार्ट देख रहा है| मन ही मन सोच रहा है कि ऊपर वाली सीट मिल जाती तो पंखे के ऊपर जूता रखकर सो सकता था। उधर छोटा शकील सुराही लेकर पानी लाने गया है.....एक महिला खिड़की के पास अपने दो साल के बच्चे को बैठाकर उसकी छुन्नी खिड़की से बाहर निकाल मूत्र विसर्जन करवा रही है.....इधर दाऊद की नजरें रिजर्वेशन चार्ट पर लगी हैं। मिडल सीट मिली है। छोटा शकील को साईड लोवर सीट मिली है। अगर साईड अपर मिल जाता तो भी काम बन जाता। जूता पंखे के ऊपर वहां से भी रखा जा सकता है। एक पंखा उधरइच वास्ते रहता है। फिर एक साथ साईड अपर और लोअर मिल जायगा तो नीचे वाली सीट पर छोटा शकील और वो बतियाते चले जायेंगे। लेकिन साइड अपर वाला माने तब तो।

       ट्रेन छूटने का समय हो गया और ये आया नहीं....अरे ये तो आ रहा है....नया प्लास्टिक गिलास भी खरीदा है सुराही के ऊपर औंधा करके ढंकने के लिये। ये अच्छा किया नहीं तो पैर की झाड़न सुराही में गिरती और वही पीना पड़ता। साथ रहते रहते शकील समझदार हो गया है। बकि खाने का आर्डर भी देना पड़ेगा। करेले की सब्जी और पूड़ी बनाकर घर से दे रहे थे ले लिया होता तो ठीक था लेकिन यहां भी मिल ही जायगा थाली। बस वो बाथरूम के पास लाकर रख देते हैं पेंट्री वाले वही गड़बड़ लगता हैऔर ससुरे पानी जब तक न मांगो उसका पाउच लाकर नहीं देते वैसे शकीलवा ने पानी भर दिया है सुराही में तब भी रेलवे को सोचना चाहिये कि पानी तो दे कम से कम। अउर ये जो बच्चा लेकर विंडो सीट पर बैठी है वो भारत पहुंचते पहुंचते नरक कर देगी। कभी बच्चा रोयेगा तो कभी ये चिल्लायेगी।

     अरे शकील केला भी खरीद रहा है। अच्छा है। रास्ते में कुछ न मिला तो यही सही। बकि पेट फूल जाता है अफरा से.......एही वजह से सेकन्न किलास का डब्बा गंधाता भी है। चाहते तो फर्स्ट क्लास में जाते सरेंडर करने लेकिन भारत सरकार का विशेष आग्रह था कि सेकंड में ही आना ताकि अदालत में कहा जा सके कि तुम लोग सामान्य किस्म के हो.…...बेल मिलने में आसानी होगी। बकि ये चार्जर की सुविधा खाली बाथरूम के तरफ ही है........ए शकील......जल्दी से अपना चार्जर खोंस कर कब्जा कर ले न कोई दूसरा खोंस देगा तो दिक्कत हो जायेगी। और हां मोबाइल लेकर वहीं खड़े रहनालटका कर मत हट जाना वरना गया बच्चू...…ये पाकिस्तान है। यहां लादेन तक बिना बेल के मार दिये जाते हैं फिर ये तो.....ल गाड़ी चल दी......जयभारत मईया.......जय जय।

    रास्ते में सुरक्षा जांच के लिये लोग डिब्बे में आये तो छोटा शकील की ओर शंकित नजरों से दाऊद ने देखा, शकील भी समझ गया और यूं मुस्कराया माने कहना चाहता हो कि खातिरजमाए रखें, घोड़ा, चिलम सब माकूल इंतजामात से है, कोई पकड़ नहीं पायेगा। उधर दाऊद की धड़कन बढ़ती जा रही है। कहां तो सरेंडर के लिये जा रहा है और साथ में घोड़ा-चिलम भी रख लिया है। इधर तो अपने लोग ही लादेन को मरवा देते हैं फिर वो तो दुश्मन देश है, जाने कहां कहां चेक करें। सुरक्षा जांच हो रही थी कि पता चला सुराही लीक हो रही है। दाऊद सकते में। छोटा शकील ऐसा कैसे कर सकता है। कम्बख्त को ढंग की सुराही भी खरीदने नहीं आती। वो तो बगल वाली महिला ने बताया कि सुराही में लीक वीक कुछ नहीं वो तो गाड़ी चलने से सुराही हिल डुल रही है और पानी छलक रहा है। पेंदे वाली सुराही नहीं है। कुछ सटा दो, चप्पल ओप्पल रख दो तो सुराही का हिलना डुलना बंद हो जायगा, पानी नहीं छलकेगा। दाऊद को बात जम गई। अब चप्पल कहां से लायें, यहां तो जूता पहनकर आये हैं, और सुराही के नीचे जूता रखना मतलब नहीं रखता। दो जूते रखने पर सुराही फिर हिलेगी ही। कुछ सोच कर शकील को कहा कि तेरे भी जूते निकाल कर रख दे सुराही के नीचे लेकिन वो माने तब तो। जिद पकड़ के बैठ गया कि जूते नहीं उतारूंगा। और सुराही के नीचे जूते रखने के लिये तो कत्तई नहीं। बगल खड़े सुरक्षा रक्षक के कान में बात पड़ गई कि ये भाई जान जूते उतारने में बहुत आनाकानी कर रहा है। फिर तो शुरू हुई पुलिस की दास्तान-ए-हमजा - "अबे हौले....तू शादी में आया है क्या रे.... हम तेरे सालियां लग रहे क्या जो तेरे जूते लेकर भग जायेंगे,  जूते उतार.......उतारता है कि नहीं हउले.....उतार"।

  उधर दाऊद सन्न-मन्न की कहीं जूतों में ही तो माऊजर...आई मीन घोड़ा छिपा कर नहीं रखा है। चिलम, गोली....साला मरवायेगा। इधर छोटा शकील ने शरमाते-शरमाते जूते उतारे। लेकिन ये क्या  जुराबें फटी हुई हैं। तो क्या इसीलिये शरमा रहा था  आसपास के लोगों ने मुस्करा कर एक दूसरे को देखा। पुलिस वाला भी मुस्कराया और बोला – “फटी जुराबें पहन कर इंडिया जा रहा है, रे फिट्टे मुंह हमारी नाक कटवायेगा ? कम से कम मोजे तो ढंग के पहन लिया होता”। उधर दाऊद को थोड़ी राहत महसूस हुई कि बात फटी जुराबों तक ही रह गई।

     इधर दो जूते दाऊद के और दो जूते छोटा शकील के रखकर बीच में सुराही रखी गई तो उसका हिलना-डुलना बंद। बगल वाली बर्थ से मोहतरमा ने कहा – “हाय अल्ला, अब तक सिर्फ सुना ही था कि जब तक चार जूते न पड़ जांय तब तक किसी की अकल ठिकाने नहीं आती, फिर ये देखो, सुराही तक चार जूतों के चलते ठीक हो गई”।

    उधर दाऊद मन ही मन भुनभुना रहा था। सफ़ेद वाले जूते लाहौरी मार्केट से लिये थे। बड़ा मोल-भाव करना पड़ा था। आठ सौ बोल रहा था, कम कराके छे सौ में मिला। और उस पर ये सुराही रखी गई है। इसका रंग सफ़ेद जूतों पर लग कर न जाने कैसा बना दे। पहनने पर यूं लगेगा जैसे शेख़पुरा मैदान में ऊंचे पांयचे वाले पैजामे पहन फुटबॉल खेल कर आ रहे हों और जूते बदलने तक की फुरसत न मिली हो। फिर शकील की फटी ज़ुराबें। कम्बख्त मुझे ही कह दिया होता तो वहीं लाहौरी मार्केट से इसके लिये भी मोजे ले लेता। वो दुकानदार यूं भी पीछे पड़ गया था कि बिना जुराबों के जूते अच्छे नीं लगते, वो तो मैंने ही रकम बचाने की खातिर जुराबें नहीं ली।

     खैर, किसी तरह इंडिया पहुंचूं तो पता चले कि अभी आगे क्या क्या झेलना है। हिन्दोस्तानी वजीरे आजम पता नहीं क्या-क्या कहें। सुना है वहां वीड एनर्जी भी चलती है। सरेंडर करने के बदले एकाध रकबा हाथ लग जाय तो जिंदगी बन जाय। जिंदगी भर उस रकबे में गांजा उगायेंगे, वीड एनरजी बनायेंगे, उसे मंडी में ले जाकर बेचेंगे, शकील को कह दूंगा कि भाव ताव करके बेचे, लौटते समय हम गाने भी गायेंगे  “ठंडी-ठंडी क्यारियों में बहता ठंडा पानी...... क्या दिन होंगे.....जमानत पर रिहा होंगे.....केस खतम होंगे....सल्लू भाईजान, जयललिता, रामलिंगम राजू.......आ हा हा... सारे बरी हो गये....मैं भी.....ओ शकील्  .......सुराही से उड़ेल कर एक गिलास ठंडा पानी पिला यार....गला खुश्क हो रहा है....तर कर लूं....”।


-    सतीश पंचम   

स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था

समय - वही, जब दाऊद सरेंडर करने आये और पुलिस वाला उसे देखकर कहे - "साले शकल देखी है अपनी, तू किस एंगल से दाऊद लगता है, जूते तक में लाल मिट्टी लगी है, और जूते भी सफ़ेद....भूतनी के तू जितेन्दर बनता है....जम्पिंग जैक बनता है.... चल फूट"

( Train Image courtesy : Google search)

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