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Saturday, December 26, 2015

आराम वाला स्नेह....!

 अभी दुपहरी में एक चिड़िया खिड़की के पास लोहे की ग्रिल पर बैठी चूं चूं कर रही थी। ऐसा नहीं कि खिड़की के पास पक्षी न आते हों। आते हैं। कबूतर या कौवे तो आते ही रहते हैं लेकिन किसी गौरेया का आना थोड़ी अलग बात है। उनकी चह-चह ज्यादा अच्छी लगती है। नज़र उठा कर उसे एकटक देख रहा था कि किचन से श्रीमती जी की नज़र मुझ पर पड़ी।

क्यों मुस्करा रहे हो ?”

एक चिड़िया आई है

तुम्हारे लिये आई होगी। मैं जाती हूँ तो उड़ जाती है

"उड़ जाती है ? मतलब पहले भी आती रही है। मुझसे ज्यादा तो तुम लक्की हो"।

   मुस्कराते हुए कुछ देर बैठा चिड़िया को देखता रहा। अबकी मादा चिड़िया भी नज़र आई और तुरंत ही फिर कहीं उड़ गई। कुछ क्षणों बाद नर चिड़ा सूखते कपड़ों की ओट में हो गया। फिर भी पतले कपड़े के दूसरी ओर से वह नज़र आ रहा था। चह-चह जारी थी। उठ कर करीब गया तो वह अपराजिता के गमले की ओर सटा चीं-चीं किये था। मुझे देखते ही फुर्र !
   
   वापस आकर आस-पास नज़र दौड़ाया कि कहीं कुछ बॉक्स टाइप मिल जाय तो उसमें छेद करके इसके रहने के लिये ठिकाना बना दूं। क्या पता अंडे देने की तैयारी चल रही हो। ज्ञान जी ने ऐसा ही एक बॉक्स गाँव में रहते गौरैया के लिये बनाया है।  

  इधर बॉक्स नहीं मिला तो श्रीमती जी से उस छोटी सी मिट्टी वाली मटकी के बाबत पूछा जिसे कुछ समय पहले लाया था और अक्सर यूं ही शो-पीस बनी पड़ी रहती थी। पता चला कि वह तो कब की फूट गई।

अब ?

    स्टील के एक पुराने लोटे की याद आई तो मालूम हुआ कि उसमें अभी फ्रिज में कुछ भर-भूर कर रखा है। उधर खिड़की पर चिड़िया का अता-पता नहीं। कबूतर जरूर यहाँ वहाँ गुटर-गूं कर रहे थे। सामने खुले आसमान में चील गोल दायरे में घूम रही थी। साथ-साथ नीचे वाली इमारत की छत पर उसकी परछाईं भी घूम रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से हट गया। वापस आकर बैठा।

  पहले से बना कर रख दिया होता तो अच्छा था। अब भी बॉक्स बना सकता हूँ लेकिन..... अभी बॉक्स नहीं है। क्या पता स्टील का पुराना लोटा खाली हो जाय। वैसे स्टील वाले में शायद चिड़िया न रहेगी। अंडे देगी तो रात में बच्चों को ठण्ड लगेगी। रूई-तिनका बिछाने के बावजूद स्टील के लोटे में उसे रहना अनकुस लगेगा। वैसे बिजली के खंभों में चिड़ियों को रहते देखा तो है लेकिन फिर भी। लोहे के खंभे और स्टील के लोटे में फ़र्क तो है।

  लेकिन बॉक्स कहाँ मिले ? वो हाल-फिलहाल खरीदा ग्राईंडर वाला कार्डबोर्ड बॉक्स कैसा रहेगा ? नहीं, अभी उसमें थोड़ी कमी-बेसी है। सर्विस वाले को बुलाया है। क्या पता रिटर्न करना पड़ा तो ?

  
     बॉक्स नहीं है, मिट्टी की छोटी वाली मटकी नहीं है, स्टील वाला बर्तन अनुपयुक्त है। अच्छा उसके लिये फिर कभी ठिकाना बनाउंगा। ढूंढने पर ऊपर छत से लगे सामानों में शायद एकाध बॉक्स मिल जाय। लेकिन वहाँ जाने के लिये थोड़ी मेहनत करनी होगी। बाद में आराम से जाउंगा। फिलहाल इसे लिख दूं। लिखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर उपस्थिति जरूरी है। चिड़िया का क्या है। आती-जाती रहेगी। स्टेटस थोड़ी दुबारा ध्यान में आएगा। अंतत: मसला लिख-उख कर टंग गया......

चिड़िया अभी तक नहीं आई है।  

-   सतीश पंचम

1 comment:

अजय कुमार झा said...

सोशल मीडिया पर उपस्थति जरूरी है ..जैसे ही चिड़िया खिड़की पर उपस्थित हो आप भी उपस्थित हो जाएँ ..

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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