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Sunday, December 13, 2015

ढूह...महुआ....बांग....बेहया !

     घास में रेंगती चींटी को कहीं से महुआ मिल गया है। अपने संवेदी तंतुओं से बार-बार निरख रही है, परख रही है। उसे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी मीठी और अनोखी महक वाली चीज हाथ लगी है। अंदर ही अंदर डर भी रही है कि कहीं कुछ खतरा न हो। आख़िर उसकी जानकारी में यह मौसम की पहली बदली थी। कभी नहीं देखा था यूँ किसी महुए को टपकते हुए।
    उधर दूसरी चींटी इन सबसे दूरी बना सब कुछ देख रही थी। उसके जीवन में भी यह पहली बयार थी। मह-मह माहौल ! थमते-झिझकते आखिर वह भी भदर-भदर चू रहे महुए के पेड़ के नीचे पहुंची। एक और चींटी को देख पहले वाली में थोड़ी हिम्मत आई। दोनों ही उस अनजानी-अनचीन्ही चीज़ को टटोलने में लग गये। ऊपर बैठा कौआ ताक में था कि कब ढंग का उजाला हो और वह पंख पसारे। यूं तो वह अभी भी कहीं जाकर कुछ खाने-पीने की तलाश कर सकता था लेकिन आज कुछ ठहर कर टहनी छोड़ना ठीक समझा। वैसे भी रात भर महुआ चूने से ठीक से आराम न मिला था। आशंका लगी रही कि कहीं सिर के ऊपर न टपक जाय। कई बार रात में मन किया कि पेड़ बदल दे लेकिन अंधेरे में निकलना ठीक नहीं सोच कर पड़ा रहा। फिर अब तो सुबह हो ही रही है।
    उधर ढूह पर बैठा मुर्गा मन ही मन अपनी बांग पर पसोपेश में है। पहली बांग कुछ कमज़ोर लगी थी। शायद गले का झाल ठीक से उतरा नहीं था। एक और बांग की तैयारी में था कि अचानक दड़बे पर चील का धावा हो गया। करीब ही चीं-चीं कर रहा मुर्गी का बच्चा शिकार बना। अबकी मुर्गे ने बांग देनी चाही लेकिन हिम्मत कुछ छूट सी गई थी। फिर मुर्गी कुनबे में फैली इस ताजा दहशत के दौरान बांग देना ठीक भी न था। ऐसे में उसने पंख फड़फड़ाये, कलगी हिलाई और काँटों से बचते-बचाते करीब स्थित बेर की निचली टहनी पर जा बैठा। वहाँ बैठने का कोई खास कारण तो नहीं लेकिन कभी-कभी उसे अच्छा लगता है वहां बैठना। तब और जब उसके मन में कहीं उठा-पटक चल रही हो।
     तभी एहतियात बरतने के बावज़ूद कलगी किसी नुकीले काँटे से छू भर गई। खदबदाहट में टहनी बदलनी चाही कि पंख उलझ गये। किसी तरह नुच-चिथ कर बाहर निकलने में कामयाब होने के बाद मुर्गे ने बेर और उस पर बने बया के लहराते घोंसले की ओर नज़र उठा कर देखा। कहीं कुछ खदबदाहट नहीं। सब कुछ शांत। धूप निकल आई है। सामने घूरे पर कुछ पाने की उम्मीद से उस ओर जा रहा था कि अचानक कीचड़ से सटी बैंगनी फूलों वाली बेहया की झाड़ियों की ओर चल पड़ा। वहाँ कीचड़-कादो में से छितरा-छितरा कर जो कुछ मिला उसे खाने के बाद फिर एक जोरदार बांग देने की इच्छा हुई कि तभी बेहया की झाड़ियों के भीतर से खरगोश को निकल भागते देख मुर्गा चौंक गया। इंतज़ार में रहा कि अभी कोई और भी उसके पीछे-पीछे झाड़ियों में से निकलेगा उसे पकड़ने लेकिन कोई न निकला। कहीं कुछ हलचल नहीं। धीमे कदमों से थमते-झिझकते आगे बढ़ मुर्गे ने अंतत: एक जोरदार बांग दे ही दी ! कुछ यूं मानो बेहया की झाड़ियों में छुपी उस अनजान चीज को चुनौती दे रहा हो। लेकिन झाड़ियों में कहीं कुछ न निकला। कुछ विशेष हरकत न देख कलगी को झटका दे मुर्गा घूरे की ओर बढ़ चला। झाड़ियाँ मंथर गति से हिलती-डुलती मुस्करा रही थीं।
    आख़िर उन्हें भी बड़े दिनों बाद कोई ढंग का बेहया जो मिला था !

- सतीश पंचम

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