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Tuesday, December 1, 2015

चिड़िया, चट्टान, बरगद, गिरगिट !

  पहाड़ की एक छोटी चट्टान नीचे की ओर सरकते हुए एक बड़े से बरगद की ओट में आकर फंस गई है। वहीं चीटियाँ रेंगती हुई मना रही हैं कि बरगद हटे तो चट्टान आगे सरके, आखिर कब तक इसे अपने दम पर यूं ही बरगद रोके रखेगा। पता चला चीटियाँ उसी के ऊपर से गुजर रही हैं और चट्टान गड़गड़ा कर खिसक गई। जितनी चीटियाँ होंगी सारी मारी जायेंगी।
    उधर बरगद मन ही मन सोच रहा है कि चट्टान कुछ दिन यहीं फंसी रहे तो अच्छा है। नीचे ढलान पर झाड़ियों में चिड़िया का घोंसला है। चट्टान का वहां लुढ़कते हुए जाना चिड़िया परिवार के लिये खतरा है। इन सारी हरकतों से बेखबर चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर घोंसले में पहुंची है। बच्चे चीं चीं करते हुए पहले चुग्गा देने के लिये मुंह खोल शोर मचा रहे हैं। उधर बरगद के किनारे वाली टहनी पर बैठे चिड़े को खतरे का कुछ-कुछ अंदाजा हो गया है। वह मन ही मन मना रहा है कि बरगद इस चट्टान को कुछ और समय तक अपने जटा-जूट में फंसा कर रखे तो अच्छा है।
   इधर चट्टान के मन में भी उहापोह जारी है। वह चाहता है कि जो होना हो वह जल्दी हो। आखिर कब तक यूं ही कगार पर फंसा रहेगा। पास ही रेंगता गिरगिट अपनी लपलपाती जीभ से बार-बार इस नई चट्टान को चाटना चाहता है। वह जानना चाहता है कि बेहद ऊपरी सतह से खिसके इस चट्टान में और यहाँ पहले से मौजूद चट्टान में कुछ बुनियादी फ़र्क है या दोनों ही एक समान हैं। उसकी सतह से चिपटी मिट्टी में कुछ चीटियाँ, कीड़े या कुछ नमक का अंश तो होगा ही। बरगद गिरगिट की इस मंशा को अच्छी तरह भांप रहा है। उसे आशंका है कि गिरगिट के हल्के स्पर्श से चट्टान दूसरी ओर खिसक सकती है। और तभी बरगद का एक लाल पका गोदा टूट कर नीचे गिरा और लुढ़कते हुए घोंसले से दूरी बनाते आगे झाड़ियों में जा कर गुम हो गया। अपना मन मार कर गिरगिट दूसरी ओर हट गया। चींटियाँ सहम कर जहां थी वहीं रूक गईं। चिड़ा सहम गया। बच्चे अभी उड़ने लायक नहीं हुए थे। आज एक गोदा गिरा है, कल दूसरा गिरेगा। फिर ये बरगद के गोदे पकने का मौसम है। कोई न कोई सीधे चट्टान के उस नाजुक हिस्से को छू ही देगा और फिर जो होगा उसके बारे में सोच कर ही जान निकल जाती है।
     उधर चिड़िया चुग्गा देने के बाद फिर उड़ चली थी चुग्गा लाने। मन ही मन भुनभुना रही थी कि न जाने कहाँ चला गया मेरा जोड़ीदार। बच्चे भूख से चिचिया रहे हैं और उसका है कि कहीं कुछ पता ही नहीं।


- सतीश पंचम

1 comment:

अभिषेक आर्जव said...

समझ में नहीं आया. :(

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