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Tuesday, December 1, 2015

बरगद, पीपल, तितली, जटा-जूट

    बरगद की जटाओं पर कहीं से एक तितली आकर बैठ गई। रंग-बिरंगी तितली का स्पर्श होते ही जटाओं में कानाफूसी शुरू हुई। मोटी डाल वाली जटा ने पतली से पूछा कि,‘ये कौन है जो आ बैठी है?’ उसे भी कुछ ज्‍़यादा पता न था। रात-दिन कई तरह के जीव, कीड़े-मकौड़े, मच्छर, भुनगे, गिलहरी वगैरह आते-जाते रहते हैं लेकिन किसी तितली का आना न के बराबर होता है। करीब से उड़ते जरूर देखा है लेकिन कभी उसकी जानकारी में ऐसा नहीं हुआ कि कोई आकर जटाओं पर बैठ जाय।
     उधर पीपल के पेड़ से निकली जटियल दाढ़ी ने कान लगा कर बरगद की जटाओं की बातचीत सुननी चाही पर उनकी बातचीत इतनी सांय-फुस चल रही थी कि कुछ पता न चल रहा था। पीपल के पत्ते शोर मचा रहे थे सो अलग।
   तितली थोड़ी देर जटाओं पर बैठने के बाद दूसरी ओर उड़ चली। दायें-बायें....सामने, ऊपर....तिरछे उड़ते-उड़ते तितली फिर से बरगद की ही किसी दूसरी जटा पर बैठ गई। अबकी बरगद की जटाओं में कुछ ज्‍़यादा ही सिहरन देखी गई। वे इतने चटक और रंगीन स्पर्श के आदी न थे। पीपल की जटियल दाढ़ी ने अबकी बात पकड़ ली। उसे समझ आ गया कि बरगद की जटाओं में क्यूँ बेचैनी फैली है। इसके पहले उसे भी तितली के स्पर्श ने इसी तरह सिहराया था। पीपल के पत्तों ने खड़खड़ाया न होता तो तितली काफी देर तक वहीं बैठी रहती।
      इसी बीच हवा का तेज झोंका आया और बरगद की दूसरी जटा ने तितली के रंगीन पंखों तक पहुँचना चाहा। इससे पहले कि छुए, तितली उड़ चली। बाकी जटाओं ने उस जटा की बदमाशी पर नाराजगी जताई तो उसने हवा का बहाना बताया। तितली फिर से उसी राह आड़े-तिरछे, दायें-तिरछे होकर उड़ चली।
     अबकी पीपल की ओर तिरछे बढ़ रही थी कि फ्लाय कैचर ने झपट्टा मारा और तितली को अपनी चोंच में दबा ये गया वो गया। पीपल के पत्ते हरहराते रह गये, बरगद के पत्तों ने दुख तो जताया लेकिन हमेशा की तरह प्रकट न किया। वैसे भी पीपल के पत्तों के मुकाबले बरगद के पत्ते कुछ ज्‍़यादा स्थिर रहते हैं। सबसे ज्यादा अफ़सोसजनक मंज़र था बरगद की जटाओं में। एक तरह की बेचैनी और कसमसाहट दिख रही थी। उनमें भी उसे ज्‍़यादा जिसने थोड़ी सी हवा चलने पर तितली को छूना चाहा था।
    उधर पीपल की जटियल दाढ़ी अब शांत थी। आज उसे एक किस्म की राहत सी मिल रही थी यह सोच कर कि जब कुछ समय पहले उसके यहाँ भी तितली का आगमन हुआ था तो ऐसी कोई दुर्घटना न हुई थी। तितली जैसे हँसती-खिलखिलाती आई थी वैसे ही वापस उड़ गई थी !
  - सतीश पंचम

1 comment:

अभिषेक आर्जव said...

ये बोध कथाओं जैसा कुछ है.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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