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Saturday, October 3, 2015

झालर, पंखुड़ी, पेड़, पानी, बगुला, मंच और तालाब !

   
  कभी-कभी साधारण पेड़-पौधों सा नजर आने वाला कोई पेड़ या पौधा थोड़ा ध्यान से देखने पर कुछ अलग नज़र आता है। उसकी पत्तियां, डंठल, फूल सभी कुछ औरों के मुकाबले नये किस्म के लगते हैं। थोड़ा और ध्यान देने पर उसकी विशेषताएं खुद-ब-खुद आकर्षित करने लगती हैं। तब उसके बारे में पता करने की इच्छा बढ़ती जाती है। नाम क्या है ? किस लिये इसका इस्तेमाल होता है ? कहां पाया जाता है ? कोई औषधिय उपयोग है या यूं ही जंगल झाड़ी का हिस्सा है ? ऐसी तमाम बातें एक-एक कर मन में आने लगती हैं। ऐसे ही किस्म के पेड़ से अबकी सामना हुआ मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में।
   
    पहली नजर में तो यह आम पेड़ ही दिख रहा था। लेकिन ध्यान से देखा तो इसके नीचे की ओर झुकी पत्तियों में झालर सी दिखी। फिर जिस ओर खड़ा होकर देख रहा था वहां सूरज की रोशनी पत्तियों से होकर मुझ तक पहुंच रही थी। ऐसे में उस झालर के कुछ नये पत्ते ऑप्टिकल ब्राइटनेस की वजह से और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहे थे। मोबाइल कैमरे से तस्वीरें लेने के बाद इसकी छांव से बाहर निकला और थोड़ा दूर हट कर पेड़ को देखने लगा। इस बार और भी हैरानी हुई। पत्तियाँ ऊपर से नीचे की ओर एक विशेष अंदाज में झुकी हुई थीं। ऐसा लगता था पेड़ खुद ही अपने पत्तों की ढेरी निकाल-निकाल कर उन्हें धूप दिखा रहा हो। इसका नाम पता करना चाहा तो कहीं कुछ था ही नहीं। तने से सिर्फ अधटूटा पतला तार लटक रहा था। जाहिर है पहले वहां नाम वाली पट्टिका थी लेकिन कौवों ने घोंसला बनाने के लिये तार को आड़ा-टेढ़ा करके तोड़ लिया था और वहां सिर्फ झूलता हुआ तार ही बचा था। आस-पास नजर दौड़ाया तो उस तरह का पेड़ दिखा ही नहीं। तभी इसकी फुनगी पर नजर पड़ी जहां इक्का दुक्का फूल खिले थे। वहां तक कैमरा क्या पहुंचता। सो जैसे तैसे मोबाइस से जूम करके तस्वीर खेंचा। इस पेड़ के बारे में जानने की उत्सुकता बनी हुई थी। सो थोड़ा-आसपास और ढूंढा। कहीं कुछ नहीं। मायूस होकर थोड़ा आगे बढ़ा। इक्का दुक्का तस्वीरें लेने के बाद देखा तो सामने वैटरनरी स्टूडेंट्स का ग्रुप चला आ रहा था। पशु-चिकित्सालयों के बच्चे हाथ में घास लेकर एमू के पिंजरे के पास जमा हो गये। कुछ देख-ताक कर रहे थे। इच्छा तो हुई कि उनके कार्यकलाप देखे जांय लेकिन जेहन में वह पेड़ घूम रहा था सो वहां से हट कर दूसरी ओर चल पड़ा।   

        थोड़ा आगे जाने पर वैसा ही पेड़ दिखा। सुखद आश्चर्य ! अबकी उस पर नाम वाली पट्टिका भी थी जिस पर लिखा था – Burmese Pink Cassia. नीचे गिरे डंठल, पत्तों को टटोला तो उनके बीच से कुछ गिरे हुए फूल भी मिल गये। कुछ अधखिले थे कुछ पूर्ण विकसित। पंखुड़ियों का आकार-प्रकार काफी आकर्षित कर रहा था। सूंघने पर उनमें जरा भी महक नहीं मिली। एक अधखिले फूल को थोड़ा सा खोला तो भीतर गुलमोहर के तंतुओं सी रचना दिखी जिनके सिर पर गेहूं के दानों सा पुंकेसर जुड़ा हुआ था। अक्सर बचपने में गुलमोहर के तंतुओं से बहुत खेला है। एक दूसरे तंतुओं के सिर फंसा कर विपरीत दिशा में खेंचने पर जिस खिलाड़ी के तंतुओं के सिर पर जुड़े गेहूं के आकार वाले दाने टिके रहते वह जीत जाता। अमूमन दो-तीन तंतुओं की भिड़न्त के बाद पहला कमजोर हो जाता और टूटने पर गुलमोहर की पंखुड़ी में से दूसरा निकालना पड़ता। लेकिन कभी ऐसा भी होता कि अकेला एक तंतु सामने वाले खिलाड़ी के दस बारह से जीत जाता। उस लक्की तंतु को तब बचाकर रख लिया जाता कि इसने बहुत मेहनत की। अब आराम करे।
   
      किंतु यहां इस Burmese pink cassia के तुंतु इतने छोटे थे उनसे खेलना मुश्किल था। हां, दिखने में जरूर खूबसूरत थे। तस्वीरें लेने के बाद कुछ देर वहां ठहर कर आगे बढ़ गया। कई और तस्वीरें लिया। एक जगह गमलों में कुछ करौंदे के आकार के फल देख ठहर गया। उन्हें टटोल ही रहा था कि एक ललछहूँ पका फल नजर आया। उसे तोड़ कर मुंह में रखा तो पिच्च से फूट गया। फूटते साथ मुंह का स्वाद कड़वा-कसैला हो गया। तुरत-फुरत आक-थू करके उगला। थोड़ा सा राहत मिलने के बाद ज्ञान हुआ कि अकेले होने पर बोटॉनिकल गार्डन में इस तरह का एडवेंचर ठीक नहीं। कहीं कुछ उल्टा-सीधा फल हुआ तो मुश्किल हो जायगी। भुगतना पड़ सकता है। लेकिन जानने की जिज्ञासा जो न कराये। एक बार ऐसे ही किसी पेड़ की छाल मुंह में रख लिया था। पत्तियों के मसलने  से पता नहीं चल रहा था कि कौन सा पेड़ है, स्वाद कैसा है तो उसकी छाल थोड़ा सा तोड़ कर मुंह में रख कर देखना चाहा कि कैसा है। पहले पहल तो यूं लगा जैसे दालचीनी लकड़ी हो लेकिन बाद में कुछ जलन सी हुई तो उगलना पड़ गया। नाम आज तक नहीं पता चला। कभी गाँव जाना हुआ तो किसी से पूछ कर ही पता चलेगा। वैसे भी वहां कौन से बोटॉनिस्ट बैठे हैं। उनके लिये तो जैसे सब पेड़, वैसे ये भी एक पेड़।

  वहां से आगे बढ़ते हुए कुछ और देख-ताक के बाद सामने एक हरसिंगार को छोटा से पेड़ नजर आया। कुछ फूल झड़े थे। उसी के बगल में ठूंठ हुआ एक अलग पेड़ खड़ा था जिसके तने से सफ़ेद फंगस / कुकुरमुत्ते सी आकृति निकली हुई थी। जाहिर है वह पेड़ अब सड़ रहा था। एक ओर हरसिंगार, एक ओर सड़ा पेड़। प्रकृति भी अद्भुत है। सड़े पेड़ से याद आया वहीं गार्डन में एक कुमकुम का भी पेड़ था जो अब एकदम ठूंठ हो चुका है। देखने से लग रहा है कि अब शायद ही हरा हो लेकिन कुछ कहा नहीं जा सकता। कई बार ऐसे-ऐसे पेड़-पौधों को फिर से हरियराते देखा है जिन्हें देखने पर लगता था कि अब ये एकदम मर चुका है। लेकिन मौसम बदला नहीं कि उन्हीं में नये पत्ते निकलते देखा है। इसलिये कुमकुम के उस पेड़ के लिये अपनी ओर से उम्मीद तो बनाये रखा है बाकी प्रकृति और वहां के कर्मचारी जानें।

       वहीं एक विदेश जोड़ा अपने बच्ची के साथ हंसता खेलता नजर आया। पिता आंखें बंद करता और बच्ची छुप जाती। मां फोटो क्लिक करती। उन्हें देख अच्छा लग रहा था। वहां से होते हुए बोटॉनिकल गार्डन के उस हिस्से की ओर बढ़ गया जहां तालाब है। शांत पानी के पास खड़ा होना अच्छा लगा। वैसे भी पानी कहीं भी हो, यदि वह शांत हो या धीरे-धीरे बह रहा हो तो उसके पास खड़े होने में एक तरह का सुकून सा मिलता है। संभवत: जीवों की  प्रकृतिगत मेनुफैक्चरिंग ही इस तरह की गई है कि जहां कहीं साफ़ पानी दिखे या उसके आस-पास का स्वास्थ्यकर माहौल मिले पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, मनुष्य सभी एक किस्म की ठहर देते ही हैं। 
     
      उसी तालाब में देखा एक चौरस चबूतरे पर एक बगुला यूं बैठा है मानों वह मच पर हो और तालाब को संबोधित कर रहा हो। रह-रहकर अपने पंखों को सुलझाता, साफ करता फिर अपनी उसी संबोधन मुद्रा में आ जाता। उसे देख ख्याल आया कि संभवत: यह खा-पीकर उस चबूतरे पर बैठा है जो जलीय जीवों मसलन मछलियों, मेंढ़कों के लिये संदेश है कि अब उससे खतरा नहीं है वरना खाया-अघाया बगुला यूं खुले में मंच पर नहीं बैठता। तब वह भी और बगुलों की तरह मंच मछलियों की टोह में मगजमारी कर रहा होता, पानी में ठहर-ठहर कर अपने लिये भोजन तलाशता।
  
       इसी बीच कई और ख्याल आये मानों वह बगुला तालाब के बीच कविता पाठ कर रहा हो और जलचरों से उम्मीद कर रहा हो कि वे उसकी सराहना करेंगे लेकिन मछलियां बाहर ही नहीं आ रही थीं। वे सभी कवि जी को देखकर जाने कहां दुबक गईं थीं। फिर ख्याल आया कि हो सकता है वह मंच पर बैठा कांग्रेसी युवराज है जिसे सुनने के लिये लोग नहीं मिल रहे। कहीं आस-पास शीला दीक्षित भी हो सकती हैं जो अपील करें कि अरे आप लोग सुन तो लिजिये। हांलाकि मैं प्रकृति के आनंद के बीच राजनैतिक एंगल लाने से बचता रहा हूं लेकिन आजकल दिनों-दिन राजनीतिक स्टेटस सोशल मीडिया की ओर से इतने ज्यादा ठेले जाते हैं कि जाने-अनजाने जेहन में वह बात आ ही जाती है। यही वजह है कि खुद को दिमागी रूप से ठीक-ठाक रखने के लिये कईयों के स्टेटस म्यूट कर चुका हूं या अनफ्रेण्ड कर चुका हूं। नहीं चाहिये ऐसी सड़ांध जहां दिमाग का भुरता बन जाय और सहज सोच भी प्रभावित होने लगे।  
       
      आगे और कभी कई नजारे लिये, पानी में बहते पत्तों को धीरे-धीरे सरकते देखा, कुछ बुलबुलों का बनना बिगड़ना देखा। एकाध बड़ा बुडुक्का फूटता तो हल्की सी जल-तरंग बनती। सतह पर बहते पत्ते लहराते जरूर लेकिन अंतत: वहीं जमे रहते। हौले-हौले किनारे की ओर सरकते पत्तों के बीच एकाध सूखे तैरते डंठल भी नजर आये जिनपर बड़ी-बड़ी चींटियां रेंग रही थीं। उन्हें देख कर लग रहा था मानों वे pirates of the Caribbean sea की तर्ज पर pirates of the Botanical pond हों ! जहां कहीं सीमेंटी दिवार का किनारा मिला कि फट से उन दीवारों पर चढ़ना शुरू। फिर तो लूट लो जितना लूट सकते हो। कहीं चिड़ियों के फूटे अंडे, कहीं किसी कौवे द्वारा छोड़े गये मांस के कण तो कहीं मरी गिलहरी के अवशेष! हर ओर कुछ न कुछ उपलब्ध ! हां, उनमें भी श्रेष्ठतम् की चाह बनी रहती है। जो ज्यादा अच्छा है वही लेना है, न मिला तो उससे कम वाले पर धावा बोलो। मिल गया तो ठीक वरना उससे कम वाले तक पहुंचो लेकिन कोशिश यही कि अच्छा वाला चाहिये। ताजा मांस मिला तो ठीक, वरना बासी ही सही, वह भी न मिला तो अंडों के छिलके ही सही.....न मिले तो सूखी कड़ी हो चुकी गिलहरी ही सही !
         
      देखा जाय तो हम सभी में वह Pirates वाले गुण(?) ही हैं। अच्छे की चाह ब्राण्डेड की ओर ले जाती है, वह न मिल पाये या आमदनी के बाहर की चीज हो तो सस्ता वाला ही सही, वह न मिल पाये तो उससे खराब वाला सेकंड हैंड ही सही। वह भी नहीं तो एक उम्मीद कि आज नहीं है तो क्या हुआ.....कल हो सकता है किस्मत खुल जाय, कुछ मेहनत से कुछ तिकड़म से कुछ हिसाब बन जाय और हम भी ढंग के आदमी बन जांय। यह चाह, यह उम्मीद, यह मेहनत बनी रहे तो अच्छा है। वैसे भी इसकी कोई गारंटी नहीं कि मेहनत से कमाये पैसों से आप अपनी पहुंच की चीजें खा पायें। हाल-फिलहाल की घटनायें देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। दादरी में गाय का मांस खाने के शक में एक व्यक्ति को मार दिया गया। और भी जगह दंगा-फ़साद होता ही रहा है लेकिन हम चेत नहीं पाते। 


     चार साल पहले मुंबई के काला घोड़ा आर्ट फ़ेस्टिवल के दौरान एक तस्वीर खेंचा था जिसमें दर्शाया गया था कि लोग खाने के टेबल के इर्द-गिर्द बैठे हैं। बीच में खाना रखा है। खाने से सट कर रोजमर्रा के काम आने वाले औजार रखे हैं जिनके दम पर मनुष्य मेहनत करता है, रोजी-रोटी कमाता है, अपना पेट भरता है। उन औजारों के बाद तरह-तरह के धार्मिक चिन्ह रखे गये थे। यानि लोगों को खाना है तो पहले धार्मिक चिन्हों से होते हुए आगे हाथ बढ़ायें, औजारों को पार करें और तब अपने लिये निवाला तोड़ें। यही आज कल की सच्चाई है। वही हो रहा है। ऐसे में साहिर लुधियानवी का लिखा चित्रलेखा फिल्म का वह गीत बरबस ही याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि – 

     "ये पाप है क्या....ये पुण्य है क्या….. रीतों पर धर्म की मुहरें हैं....हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे.....संसार से भागे फिरते हो.....!"

         देखा जाय तो हम सभी इस संसार से भागे फिर रहे हैं। कभी धर्म की शरण जाते हैं, कभी जादू की, कभी ढोंगी बाबाओं की शरण तो कभी संत का चोला पहने धूर्तों की शरण। बेहतर हो सहज ढंग से हम अपने आप को परखें, सहज ढंग से सोचें, सहजता की ओर बढ़ें तो थोड़ी तकलीफ़े कम हो जाएंगी। वैसे भी संसार में सैकड़ों मसले हैं जिन्हें देख-ताक कर मुंह चुराने को जी चाहता है, अपने आप से भी और दुनिया से भी। नजरें मिलाते झिझक होती है। ऐसे में प्रकृति का ठौर मिल जाय तो नजरें चुराना आसान हो जाता है। वैसे भी पायरेटपना तो अपने अंदर है ही। थोड़ी प्रकृतिगत चोरी यह भी सही !

  -    सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कुमकुम, हरसिंगार, पलाश, पीपल, बांस के साथ-साथ बर्मा का भी एक पेड़ लहलहा रहा है।

समय - वही, जब स्नान-ध्यान के बाद लोग पेड़ की जड़ में जल चढ़ा रहे हों और वह मन ही मन हंसते हुए कहे - "अरे अभी तो मेरी टहनी पर कौवा मांस लेकर बैठा था, तुम आये और वह उड़ा"
  

2 comments:

P.N. Subramanian said...

जानकारियों से भरपूर । मन प्रसन्न हो गया।

P.N. Subramanian said...

जानकारियों से भरपूर । मन प्रसन्न हो गया।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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