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Sunday, October 4, 2015

जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी किताब - Animal Farm

   
 एनीमल फॉर्म की कहानी ब्रिटिश दौर में बिहार के मोतीहारी में जन्मे जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी गई है जिसे पढ़ते समय जेहन में बार-बार अतीत और वर्तमान की कई राजनीतिक परिस्थितियां तैरने लगती हैं जबकि इसे मूलत: व्यंगात्मक शैली में लिखा गया था रूसी तानाशाह स्टॉलिन के लिये।   

   कहानी के अनुसार पशुबाड़े में एक बार पशु विद्रोह कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे दो पैरों वाले इंसानों द्वारा जबरी इस्तेमाल किये जा रहे हैं। एक पशुगीत लिखा जाता है जिससे सभी प्रेरणा पाते हैं। बाद में आदमियों को भगाने के दौरान युद्ध होता है और स्नोबॉल नाम का जानवर घायल हो जाता है। एक और जानवर इस युद्ध में मारा जाता है जिसके नाम पर स्मारक बना दिया जाता है। सभी जानवर दो पैरों वाले इंसानों से मुक्ति पाने का जश्न मनाते हैं, उनके रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाले सामानों को, गुलामी के प्रतीकों को जला देते हैं और एक सात सूत्री नया विधान लिखा जाता है। 

कुछ दिन पशुबाड़े की शासन-व्यवस्था ठीक-ठाक चलने के बाद दबंग सूअर इन्सानों के कमरों में यह कह कर कब्जा कर लेते हैं कि काम-काज के सुचारू रूप से चलने के लिये अलग व्यवस्था होनी चाहिये। हम आप सब की भलाई के लिये ही कर रहे हैं। सभी लोग इसका अंदर ही अंदर विरोध करते हैं कि ये तो उन सातवें नियम का उल्लंघन है जिसके अनुसार सभी पशु बराबर हैं। लेकिन कोई ज्यादा विरोध नहीं कर पाता। इसी बीच एक नई बात कही जाती है कि सात सूत्री विधान याद करने में मुश्किल है इसलिये इसमें ऐसी बात जोड़ी जाय जो सातों को अभिव्यक्त कर सके। इसलिये एक सूक्त वाक्य दिया जाता है – चार टाँगें अच्छी, दो टाँगें खराबभेड़ों को यही रटने कहा जाता है और वे इसे जब तब इसे रटती रहती। तमाम तरह के बदलाव होते हैं, नई शिक्षा नीति बनाई जाती है, बिल्ली को शिक्षा विभाग सौंपा जाता है। इसी दौरान मोसेस नाम के बड़बोले कौवे का भी प्रसंग आता है जिसमें वह दावा करता है वह एक ऐसे रहस्यमय पहाड़ के बारे में जानता है जिसका नाम मिसरी पर्वत है और मरने के बाद सभी जानवर वहीं पहुँचते हैं। यह पर्वत बादलों से ऊपर आकाश में कहीं स्थित है। मौसेस का कहना था कि मिसरी पर्वत पर सप्ताह के सातों दिन रविवार रहता है और तिपतिया घास तो वहाँ साल के हर मौसम में उगती है। गुड़ की भेली और अलसी की खली तो वहाँ बाड़ों पर उगती है। सभी पशु मौसेस से नफरत करते थे क्योंकि वह बातें तो बहुत बनाता था लेकिन काम कुछ भी नहीं करता था। लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो मिसरी पर्वत पर विश्वास करते थे। 
  
 समय बीतता है और स्नोबॉल नाम का सूअर विकास की अवधारणा रखते हुए एक पवनचक्की लगाने की बात करता है जिससे लोगों को तीन दिन ही काम करना पड़े और लोग बाकी दिन आराम कर सकें। इसका विरोध नेपोलियन नाम का सूअर यह कह कर करता है कि हमें खाद्यान उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है, पवनचक्की की नहीं। बाद में आपसी मन मुटाव के बीच वोटिंग के समय नारा गूंजता है- स्नोबॉल को वोट दो, सप्ताह में तीन दिन काम करोऔर नेपोलियन को वोट दो और भरी हुई नाद पाओ।बैंजामिन नाम का गधा ही ऐसा अकेला पशु रहता है जो किसी की तरफ नहीं झुकता।
   
    इस बीच पवनचक्की के पक्ष में भावपूर्ण अपीलें होने लगीं। आवेशपूर्ण वाक्यों में स्नोबॉल ने सपने दिखाने शुरू किये कि अब पशुओं की पीठ पर से घिनौना बोझ उतार दिया जाएगा। पवनचक्की से बिजली थ्रैशिंग मशीनें, हल, हेंगा, लोढ़े चलेंगे, तेजी से कटाई होगी, फसल के गट्ठे बाँधे जा सकेंगे। थान को अपनी बिजली, रोशनी, ठंडा और गर्म पानी और बिजली का हीटर मिल सकेगा। कुछ लोग तो इस बात पर स्नोबॉल के समर्थक बन गये लेकिन कुछ विरोधी ही रहे। अचानक नेपोलियन अपने कुत्तों के साथ स्नोबॉल पर हमला करके उसे बाडे से बाहर खदेड़ देता है। इस आकस्मिक सत्ता परिवर्तन के औचित्य को सिद्ध करने के लिये मोटे-थुलथुल काया वाले स्क्वीलर को भेजा जाता है जिसमें वह यह बताने में सफल होता है कि स्नोबॉल इन्सानों से मिला हुआ था और उन्हीं की तरह हमें पवनचक्की जैसे भौतिक चीजों के जरिये फिर से गुलाम बनवाना चाहता था। जबकि स्क्वीलर के बारे में दूसरों का कहना था कि वह इतना माहिर है कि काले को सफेद में बदल सकता है।

     समय बीतने के साथ नेपोलियन स्कवीलर के जरिये पशुबाड़े पर अपना कब्जा बढ़ाते चला जाता है। तरह तरह के आंकड़े पेश करता है कि इस बार 200 प्रतिशत खाद्यान में बढ़ोतरी हुई, तीन सौ प्रतिशत हुई लेकिन पशुओं तक उसका लाभ मिले तब तो। उन्हें पता ही नहीं चलता कि जब इतना ज्यादा विकास हुआ है तो वह दिखता क्यों नहीं, हम अब भी भूखे क्यों हैं ? इस बीच अचानक नेपोलियन भी कहने लगता है कि हमें पवनचक्की बनानी होगी। लोग आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि पहले तो विरोधी थे, अब क्यों उसका समर्थन करने लगे ? तो नेपोलियन के करीबी स्कवीलर के जरिये कहलवाया जाता है कि - नेपोलियन दरअसल कभी भी पवनचक्की के विरुद्ध नहीं था। इसके विपरीत, यह नेपोलियन ही था जिसने शुरू-शुरू में पवनचक्की का समर्थन किया था, सच तो यह है कि वे नेपोलियन के कागजों में से चुराए गए थे। वास्तव में पवनचक्की नेपोलियन के दिमाग की ही उपज थी। देखते-देखते पवनचक्की का निर्माण शुरू हो जाता है। इसी दौरान नेपोलियन अपने पुराने मालिक जोंस के बिस्तर पर जाकर सोना शुरू करता है। लोगों में सुगबुगाहट होती है ये उन सात धर्मादेशों में से एक का उल्लंघन हैं। धर्मादेश पढ़े जाते हैं जिके अनुसार  कोई भी पशु चादरों के साथ बिस्तर पर नहीं सोएगा

लोग हैरान होते हैं कि इसमें चादरों का जिक्र कैसे आ गया जबकि मूल धर्मादेश में तो सिर्फ यही लिखा था कि – कोई भी पशु बिस्तर पर नहीं सोऐगाफिर ये सब कैसे ? इसी तरह के कई और बदलाव देखने मिलते हैं। मूल धर्मादेशों के शब्दों में समय समय पर हेरफेर किया जाता है।सूअरों को जब शराब पीते देखा गया तो पाया गया कि धर्मादेश में एक और शब्द जोड़ा गया है – बहुत अधिक शराब नहींजबकि मूल में लिखा था कि – पशु शराब नहीं पियेंगे। अब लिखा है कि पशु बहुत अधिक शराब नहीं पियेंगे। यह चक्कर क्या है? इसी दौरान पुराने पशु गीत को बदलने की कवायद की जाती है कि वह तो पुराने संघर्ष से जुड़ा था, अब उसकी जरूरत नहीं। प्रेरणा गीत फिर से लिखा जाय। तमाम तरह के पुराने दस्तावेज भी खंगाल कर देखे जाते हैं और इस तरह से प्रचारित किये जाते हैं मानों कि स्नोबॉल ने इंसानों से युद्ध के दौरान गद्दारी की साजिशें रची हो। लोग तर्क देते हैं कि तबेले के युद्ध में स्नोबॉल जख्मी हुआ था, उसे वीरता पदक मिला था तो नेपोलियन उस जख्म को ही झूठा बता देता है यह कह कर कि उसके काटने से ही वह घायल हुआ था, तबेले के स्वतंत्रता युद्ध में उसका कोई योगदान नहीं था।

 धीरे-धीरे मोटे-थुलथुल आकार के स्कवीलर और अपने पाले कुत्तों के जरिये नेपोलियन सूअर पूरी तरह कब्जा कर लेता है। अपने विरोधियों को मार देता है। इसी बीच पवनचक्की के निर्माण के लिये पड़ोसी पशु-बाड़े के मालिक से बात चलाई जाती है। लोग हैरान होते हैं कि दो टांगों वाले मनुष्य से क्यों मदद ली जा रही है। तब तर्क दिया जाता कि विकास के लिये यह जरूरी है। कुछ भेड़ों से सूक्त वाक्य बदल कर रटवाया जाता है जिसमें कि पहले से उलट अब कहलवाया जाता है कि – चार टाँगें अच्छी, दो टाँगें ज्यादा अच्छी। पशु हैरान होते हैं कि ये सब क्या चल रहा है, जो चीज पहले खराब कही जा रही थी अब नेपोलियन के आते ही अच्छी कैसे मान ली गई। उधर पुराने दस्तावेजों के साथ हेऱफेर जारी रहता है। फरार सूअर स्नोबॉल को अपराधी घोषित कर दिया जाता है। पशुबाड़े में हुई किसी भी गडबड़ी के लिये उसे ही जिम्मेदार माना जाता। उधर बूढ़े होते पशुओं के लिये रिटायरमेंट की बात होती है लेकिन उन्हें पेंशन के नाम पर टरकाया ही जाता है। उपर से पशुबाड़े के उत्थान के नाम पर नये नये विचार थोपे जाते, मोटे स्कवीलर को विरोधियों को कुचलने का काम सौंपा जाता। देखते ही देखते पशुबाड़े की रौनक गुम होने लगती है। ऐसे में पशुबाड़े के प्राणियों को समझ नहीं आता कि वे पुराने मालिक के समय ज्यादा खुश थे या अपने इस नई आजादी के दौर में ज्यादा खुश हैं।

  बेहतरीन कथानक और बेहतरीन समझ के साथ लिखी गई इस व्यंग्य रचना को हो सके तो हर किसी को पढ़ना चाहिये ताकि वे जान सकें कि दबंगों का कब्जा पूरी शासन व्यवस्था पर कैसे होता है, कैसे एक विशिष्ट वर्ग के लाभ के लिये नियम तोड़े-मरोड़े जाते हैं, कैसे अतीत के पन्नों को लीप-पोतकर बराबर किया जाता है। तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया जाता है। फिर इसमें सिर्फ एक पक्ष ही नहीं होता, वे सभी होते हैं जिन्हें सत्ता का स्वाद मिलता है। स्नोबॉल भी अपने शासन के दौरान धूर्तता से बाज़ नहीं आता था और नेपोलियन भी। हर किसी के पास अपनी धूर्तता को साबित करने के तर्क होते हैं। हर किसी के पास उसे लागू करने के लिये जोर-जबरदस्ती का विकल्प होता है। ऐसे में जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी इस पुस्तक को पढ़ना और जरूरी हो जाता है ताकि भेड़चाल से बचा जाय, अपनी मेधा और अपनी सहज सोच के जरिये भावनाओं में न बहकर निर्णय लिये जा सकें।

     मूल पुस्तक का अनुवाद सूरज प्रकाश जी ने किया है, और प्रकाशित किया है दिल्ली के यश पब्लिकेशन्स ने। सूरज जी को इस पुस्तक के बेहतरीन अनुवाद के लिये बहुत-बहुत बधाई। वैसे मैंने भी यह पुस्तक हाल फिलहाल ही पढ़ी है जबकि इसके अंग्रेजी वर्शन को घर में लाकर रखे हुए पांच-छह साल हो गये थे। आज पढूंगा, अब पढ़ूंगा कहते कहते वक्त गुज़रता गया और जब पढ़ा को दिल बाग-बाग हो गया। कमाल की कल्पना और कमाल का विवरण। पता नहीं स्टॉलिन ने इसे 1945 में पढ़ा था या नहीं ! पढ़ता तो जरूर एक बार अपने तंबाखू वाले पाईप में जलती तीली रखने से पहले इधर-उधर देख लेता कि कहीं जॉर्ज ऑर्वेल तो नहीं देख रहे वरना फिर से एक नया व्यंग्य......!       

- सतीश पंचम

3 comments:

Astrologer Sidharth said...

आज से दो साल पहले मैंने इसे केजरीवाल से जोड़कर देखा था, बाद में अक्षरश: सटीक साबित हुआ। सभी जानवर समान हैं, कुछ अधिक समान हैं। :)

Smart Indian said...

एक कालजयी कृति पर एक सुंदर आलेख!

Jamshed Azmi said...

बहुत ही सुंदर आलेख की प्रस्‍तुति। पठनीय और रोचक पोस्‍ट। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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