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Sunday, June 21, 2015

रे मना तू तनिक ध्यान बंटा !

     हर बात में रोना कि योगा मत करो कि देश भूखा है...नंगा है.....अंतड़ियां भीतर हैं....बाहर हैं....हर वक्त का रोना अजीब लगता है। ध्यान बंटाने के लिये योग दिवस, स्वच्छता दिवस, बीमाबाजी सब हो रहा है तो होण दो, कुछ पॉजिटीव ही हो रहा है। सब जानते हैं कि और कामों के साथ-साथ सरकार द्वारा ध्यान बंटाने की यह भी एक कवायद है, लोगों में अपनी इमेज बनाने की एक तरह की कोशिशें हैं। इसी बहाने कुछ अच्छा हो रहा है तो किया जाय। बाकी तो विकास, शिक्षा, भ्रष्टाचार, अचार सब दुनियावी बातें तो दिल बहलाने के लिये हैं, हुआ तो ठीक न हुआ तो क्या फर्क पड़ता है। सरकार तो चल रही है न। पत्रकार बिना कहे बिछे जा रहे हैं, स्तुतिगान और लारा लप्पा बिना कहे गा रहे हैं।

       दूरदर्शन पर आज ही मोदी द्वारा योग किये जाने के दौरान कमेंटरी पढ़ी जा रही थी कि - मोदी जी योग से बहुत प्रभावित हैं, वो कहते हैं कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" ........अब जहां इतना सब चल रहा है तो थोड़ा बहुत घालमेल तो हो ही जाता है, भले यह गाँधी जी द्वारा कहा गया हो कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है"....अब उसे मोदी के लिये दूरदर्शन द्वारा कहा जा रहा है ....इतना घालमेल तो मानवता के नाते चलता है। बाकी नीयत तो ठीक है - ऐसा भी कहा जा सकता है। मानवता ठहरी।

     उधर बिहार में चुनाव हैं तो बड़े शाह दल बल के साथ पटना पहुंचे हैं। भारी भरकम शरीर के साथ कोई तड़ीपार हो और योग करते हुए उसके लिये कहा जाय कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" तो अच्छा लगेगा क्या ?

     उधर वसुंधरा जी भी योग करती दिखीं। ताड़ासन करते हुए पैरों को रह रहकर जमीन पर ला रही थीं। उनसे ठीक से खड़े भी नहीं हुआ जा रहा था। वो शायद जताना चाहती थीं कि वो जमीन से जुड़ी नेत्री हैं। ऐसे ही बाकी के नेता-नेती लोग भी होंगे। ऐसे में हर एक के साथ "मेरा जीवन ही मेरा संदेश" वाली तख्ती चस्पां कर दी जाय तो भावपूर्ण और स्मितहास्य का लहरदार मिश्रण ही बन जाय।

 सोचिये कि किस किस की तस्वीर के साथ "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" जैसा आदर्श वाक्य क्या क्या गुल खिला सकता है। हर एक की तस्वीर के साथ यह घोषवाक्य अलग अलग ध्वनित होगा। उसकी काट, उसकी मार, उसकी चोट हर एक के लिये 'सेल्फी कोटेशन' टाईप होगी।


     कहीं बाबा रामदेव कह रहे हैं - मेरा जीवन ही मेरा संदेश है, पीछे पतंजली का बैनर लहरा रहा है......कहीं माँझी की तस्वीर के साथ चस्पां है कि - मेरा जीवन ही मेरा संदेश है.....पीछे आम और लीची झूल रहे हैं।........नजीब जंग की तस्वीर के साथ अलग ही प्रभाव उत्पन्न होगा। तब और जब केजरीवाल की तस्वीर के बगल में नजीब जंग की तस्वीर लगी हो और दोनों ही अपने अपने जीवन को संदेशमय बनाने के लिये प्रतिबद्ध दिखें। केजरीवाल लिखें तो जंग मिटायें और जंग लिखें तो उसे केजरीवाल मिटायें। इस सब में बैनर और होर्डिंग की ऐसी तैसी होती रहे तो होण दो। जहां इतना खर्चा चल रहा है तो थोड़ा और सही।

    फिर एक दिल्ली वाले जीतेन्द्र तोमर तो हैं ही। इन दिनों शैक्षिक पर्यटन पर हैं। जहां जाते हैं दरों-दिवारों से, क्लास की बेंच, कुर्सी, डस्टर, कलम सब से खूब हिल मिल रहे हैं। स्कूलों के बच्चे जैसे पहले स्याही फेंक कर खेलते थे, अब भी उनके साथ वैसा ही खेल रहे हैं। कहीं कोई फर्क नहीं। इसलिये और किसी की तस्वीर के साथ यह वाक्य संरचना जमे या न जमे लेकिन जीतेन्द्र तोमर की तस्वीर के साथ यह पंक्ति खूब फबेंगी। ऐसे ही कई और होंगे। मसलन ललित मोदी, राघव, मदेरणा, तिवारी, रेड्डी, करूणा, राजा, कनिमोई, सोमनाथ  सब की अपनी कहानी....सबके जीवन का अपना अलग संदेश। अब यह डिपेंड करता है कि कौन कितना किसके जीवन से प्रभावित होता है, हो पाता है। वैसे एक मनीष सिसोदिया भी हैं। पता ही नहीं चल रहा कि उनके तस्वीर के साथ मेरा जीवन ही....वाली पंक्तियां लिखी जांय तो क्या संदेश निकलेगा। उन से बेहतर तो देश की HRD मंत्री हैं, कम से कम ज्योतिषी को हाथ दिखाती उनकी तस्वीर से देश में कुछ संदेश तो जाता है। कुछ पोथी-पत्राधारकों के बीच वेकेंसियों वाले अच्छे दिनों की आशा का संचार तो होता है।


- सतीश पंचम

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

क्या कहा जाये सिवाय इसके कि मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है।

GYANDUTT PANDEY said...

हम तो योग कर रहे थे। आप ने ध्यान बंटा दिया।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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