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Tuesday, May 12, 2015

दाऊद इन समझौता एक्सप्रेस.....


         बेल के सुहाने मौसम में खुद को हाजिर नाजिर मनवाने और जमानत पाने के लिये दाऊद समझौता एक्सप्रेस के डिब्बे के बाहर चार्ट देख रहा है| मन ही मन सोच रहा है कि ऊपर वाली सीट मिल जाती तो पंखे के ऊपर जूता रखकर सो सकता था। उधर छोटा शकील सुराही लेकर पानी लाने गया है.....एक महिला खिड़की के पास अपने दो साल के बच्चे को बैठाकर उसकी छुन्नी खिड़की से बाहर निकाल मूत्र विसर्जन करवा रही है.....इधर दाऊद की नजरें रिजर्वेशन चार्ट पर लगी हैं। मिडल सीट मिली है। छोटा शकील को साईड लोवर सीट मिली है। अगर साईड अपर मिल जाता तो भी काम बन जाता। जूता पंखे के ऊपर वहां से भी रखा जा सकता है। एक पंखा उधरइच वास्ते रहता है। फिर एक साथ साईड अपर और लोअर मिल जायगा तो नीचे वाली सीट पर छोटा शकील और वो बतियाते चले जायेंगे। लेकिन साइड अपर वाला माने तब तो।

       ट्रेन छूटने का समय हो गया और ये आया नहीं....अरे ये तो आ रहा है....नया प्लास्टिक गिलास भी खरीदा है सुराही के ऊपर औंधा करके ढंकने के लिये। ये अच्छा किया नहीं तो पैर की झाड़न सुराही में गिरती और वही पीना पड़ता। साथ रहते रहते शकील समझदार हो गया है। बकि खाने का आर्डर भी देना पड़ेगा। करेले की सब्जी और पूड़ी बनाकर घर से दे रहे थे ले लिया होता तो ठीक था लेकिन यहां भी मिल ही जायगा थाली। बस वो बाथरूम के पास लाकर रख देते हैं पेंट्री वाले वही गड़बड़ लगता हैऔर ससुरे पानी जब तक न मांगो उसका पाउच लाकर नहीं देते वैसे शकीलवा ने पानी भर दिया है सुराही में तब भी रेलवे को सोचना चाहिये कि पानी तो दे कम से कम। अउर ये जो बच्चा लेकर विंडो सीट पर बैठी है वो भारत पहुंचते पहुंचते नरक कर देगी। कभी बच्चा रोयेगा तो कभी ये चिल्लायेगी।

     अरे शकील केला भी खरीद रहा है। अच्छा है। रास्ते में कुछ न मिला तो यही सही। बकि पेट फूल जाता है अफरा से.......एही वजह से सेकन्न किलास का डब्बा गंधाता भी है। चाहते तो फर्स्ट क्लास में जाते सरेंडर करने लेकिन भारत सरकार का विशेष आग्रह था कि सेकंड में ही आना ताकि अदालत में कहा जा सके कि तुम लोग सामान्य किस्म के हो.…...बेल मिलने में आसानी होगी। बकि ये चार्जर की सुविधा खाली बाथरूम के तरफ ही है........ए शकील......जल्दी से अपना चार्जर खोंस कर कब्जा कर ले न कोई दूसरा खोंस देगा तो दिक्कत हो जायेगी। और हां मोबाइल लेकर वहीं खड़े रहनालटका कर मत हट जाना वरना गया बच्चू...…ये पाकिस्तान है। यहां लादेन तक बिना बेल के मार दिये जाते हैं फिर ये तो.....ल गाड़ी चल दी......जयभारत मईया.......जय जय।

    रास्ते में सुरक्षा जांच के लिये लोग डिब्बे में आये तो छोटा शकील की ओर शंकित नजरों से दाऊद ने देखा, शकील भी समझ गया और यूं मुस्कराया माने कहना चाहता हो कि खातिरजमाए रखें, घोड़ा, चिलम सब माकूल इंतजामात से है, कोई पकड़ नहीं पायेगा। उधर दाऊद की धड़कन बढ़ती जा रही है। कहां तो सरेंडर के लिये जा रहा है और साथ में घोड़ा-चिलम भी रख लिया है। इधर तो अपने लोग ही लादेन को मरवा देते हैं फिर वो तो दुश्मन देश है, जाने कहां कहां चेक करें। सुरक्षा जांच हो रही थी कि पता चला सुराही लीक हो रही है। दाऊद सकते में। छोटा शकील ऐसा कैसे कर सकता है। कम्बख्त को ढंग की सुराही भी खरीदने नहीं आती। वो तो बगल वाली महिला ने बताया कि सुराही में लीक वीक कुछ नहीं वो तो गाड़ी चलने से सुराही हिल डुल रही है और पानी छलक रहा है। पेंदे वाली सुराही नहीं है। कुछ सटा दो, चप्पल ओप्पल रख दो तो सुराही का हिलना डुलना बंद हो जायगा, पानी नहीं छलकेगा। दाऊद को बात जम गई। अब चप्पल कहां से लायें, यहां तो जूता पहनकर आये हैं, और सुराही के नीचे जूता रखना मतलब नहीं रखता। दो जूते रखने पर सुराही फिर हिलेगी ही। कुछ सोच कर शकील को कहा कि तेरे भी जूते निकाल कर रख दे सुराही के नीचे लेकिन वो माने तब तो। जिद पकड़ के बैठ गया कि जूते नहीं उतारूंगा। और सुराही के नीचे जूते रखने के लिये तो कत्तई नहीं। बगल खड़े सुरक्षा रक्षक के कान में बात पड़ गई कि ये भाई जान जूते उतारने में बहुत आनाकानी कर रहा है। फिर तो शुरू हुई पुलिस की दास्तान-ए-हमजा - "अबे हौले....तू शादी में आया है क्या रे.... हम तेरे सालियां लग रहे क्या जो तेरे जूते लेकर भग जायेंगे,  जूते उतार.......उतारता है कि नहीं हउले.....उतार"।

  उधर दाऊद सन्न-मन्न की कहीं जूतों में ही तो माऊजर...आई मीन घोड़ा छिपा कर नहीं रखा है। चिलम, गोली....साला मरवायेगा। इधर छोटा शकील ने शरमाते-शरमाते जूते उतारे। लेकिन ये क्या  जुराबें फटी हुई हैं। तो क्या इसीलिये शरमा रहा था  आसपास के लोगों ने मुस्करा कर एक दूसरे को देखा। पुलिस वाला भी मुस्कराया और बोला – “फटी जुराबें पहन कर इंडिया जा रहा है, रे फिट्टे मुंह हमारी नाक कटवायेगा ? कम से कम मोजे तो ढंग के पहन लिया होता”। उधर दाऊद को थोड़ी राहत महसूस हुई कि बात फटी जुराबों तक ही रह गई।

     इधर दो जूते दाऊद के और दो जूते छोटा शकील के रखकर बीच में सुराही रखी गई तो उसका हिलना-डुलना बंद। बगल वाली बर्थ से मोहतरमा ने कहा – “हाय अल्ला, अब तक सिर्फ सुना ही था कि जब तक चार जूते न पड़ जांय तब तक किसी की अकल ठिकाने नहीं आती, फिर ये देखो, सुराही तक चार जूतों के चलते ठीक हो गई”।

    उधर दाऊद मन ही मन भुनभुना रहा था। सफ़ेद वाले जूते लाहौरी मार्केट से लिये थे। बड़ा मोल-भाव करना पड़ा था। आठ सौ बोल रहा था, कम कराके छे सौ में मिला। और उस पर ये सुराही रखी गई है। इसका रंग सफ़ेद जूतों पर लग कर न जाने कैसा बना दे। पहनने पर यूं लगेगा जैसे शेख़पुरा मैदान में ऊंचे पांयचे वाले पैजामे पहन फुटबॉल खेल कर आ रहे हों और जूते बदलने तक की फुरसत न मिली हो। फिर शकील की फटी ज़ुराबें। कम्बख्त मुझे ही कह दिया होता तो वहीं लाहौरी मार्केट से इसके लिये भी मोजे ले लेता। वो दुकानदार यूं भी पीछे पड़ गया था कि बिना जुराबों के जूते अच्छे नीं लगते, वो तो मैंने ही रकम बचाने की खातिर जुराबें नहीं ली।

     खैर, किसी तरह इंडिया पहुंचूं तो पता चले कि अभी आगे क्या क्या झेलना है। हिन्दोस्तानी वजीरे आजम पता नहीं क्या-क्या कहें। सुना है वहां वीड एनर्जी भी चलती है। सरेंडर करने के बदले एकाध रकबा हाथ लग जाय तो जिंदगी बन जाय। जिंदगी भर उस रकबे में गांजा उगायेंगे, वीड एनरजी बनायेंगे, उसे मंडी में ले जाकर बेचेंगे, शकील को कह दूंगा कि भाव ताव करके बेचे, लौटते समय हम गाने भी गायेंगे  “ठंडी-ठंडी क्यारियों में बहता ठंडा पानी...... क्या दिन होंगे.....जमानत पर रिहा होंगे.....केस खतम होंगे....सल्लू भाईजान, जयललिता, रामलिंगम राजू.......आ हा हा... सारे बरी हो गये....मैं भी.....ओ शकील्  .......सुराही से उड़ेल कर एक गिलास ठंडा पानी पिला यार....गला खुश्क हो रहा है....तर कर लूं....”।


-    सतीश पंचम   

स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था

समय - वही, जब दाऊद सरेंडर करने आये और पुलिस वाला उसे देखकर कहे - "साले शकल देखी है अपनी, तू किस एंगल से दाऊद लगता है, जूते तक में लाल मिट्टी लगी है, और जूते भी सफ़ेद....भूतनी के तू जितेन्दर बनता है....जम्पिंग जैक बनता है.... चल फूट"

( Train Image courtesy : Google search)

1 comment:

अन्तर सोहिल said...

आह! बढिया व्यंग्य

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