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Monday, December 28, 2015

शैवाल, पत्ते, हेठी.....!

  बच्चे ने चलते-चलते गोल कंकड़ उठा नदी की ओर फेंका जरूर लेकिन वह किनारे ही जाकर रह गया। एक दो उछाल के बाद पानी से थोड़ी दूर। पास ही बैठा मेंढ़क कंकड़ गिरने के साथ उछल कर कुछ दूर जा बैठा। दूब के भीतर रेंगती चींटी कंकड़ के गिरते ही ठमक गई थी। तिस पर मेंढ़क का उछल कर उसके और करीब हो जाना एक खतरा ही था। मेंढक अब भी दूसरी ओर नज़र किये बैठा था। दूब के नीचे-नीचे होकर चींटी दूसरी ओर जाने की जुगत में थी कि तभी मेंढ़क भी आ पहुँचा। वह अब भी सामने की ओर नज़रें किये कंकड़ को देखे जा रहा था। उसके फूलते पिचकते गलदोदरों के ठीक नीचे वाली दूब में चींटी फंसी थी। अब न आगे जाने की राह न पीछे। जरा सी हरकत हुई नहीं कि जान गई।

  उधर बच्चा चलते-चलते अपने फेंके कंकड़ तक आ पहुँचा था। उसी के चलते मेंढ़क को अपनी जगह बदलनी पड़ी। चींटी को अब भी पता नहीं था कि किस वजह से मेंढ़क इस ओर आ पहुँचा है। वह मन ही मन मान चुकी थी कि आज जान नहीं बचेगी। तभी बच्चे ने वही कंकड़ दुबारा उठाया और फिर से पानी में फेंका। अबकी पानी में बुड़ुक की आवाज हुई और सतह पर एक गोल दायरा बन लुप्त हो गया। भीतर मछली के पास से होते हुए कंकड़ तलहटी में थोड़ी सी गंदली मिट्टी ऊभारने के बाद जा बैठा। शैवाल के जाले कंकड़ के यूं बिना अटके, बिना फंसे सीधे नदी की तलहटी में उतर आने पर अपनी हेठी मान रहे थे। फिर कंकड़ भी खुद को कम नहीं समझ रहा था। वह कोई पत्ता, तिनका या ठंडल तो था नहीं जो शैवालों की धौंस सुने, उनमें उलझ जाय। भले ही वह छोटा सा कंकड़ ही सही लेकिन उसका भी तो नाता चट्टानों, ढूहों, टीलों से रहा है। भला शैवालों से उसका क्या मुकाबला ?

   इधर बच्चे के हटने के बाद वापस मेंढ़क अपनी पुरानी वाली जगह पर जा पहुँचा था। चींटी ने राहत की सांस ली। थोड़ी और देर रहती तो उसकी ख़ुराक बनना तय था। खैर, किसी तरह बच जाने पर चींटी फिर दूब के ऊपर नीचे होते किसी तरह आगे बढ़ी। एक सूखे गंदे परनाले के बीच से गुजर रही थी कि गंदले पानी का रेला आया और बहते हुए सीधे नदी के पानी में। सतह पर तैरते हुए किसी तरह शैवालों में फंसे एक सूखे पत्ते पर जा अटकी। चींटी को काफी देर तक परेशान करने के बाद आखिर पत्ते को शैवालों ने आजाद कर दिया। चींटी पत्ते पर सवार हो आगे बढ़ी चली जा रही थी और उधर शैवाल अपनी इस दरियादिली पर खुश थे।

   रह-रह कर तलहटी में बैठे कंकड़ को देख भी रहे थे कि उसने चींटी और पत्ते को उनकी कैद से आजाद किये जाते देखा कि नहीं ?

- सतीश पंचम

#कल्पना

Saturday, December 26, 2015

आराम वाला स्नेह....!

 अभी दुपहरी में एक चिड़िया खिड़की के पास लोहे की ग्रिल पर बैठी चूं चूं कर रही थी। ऐसा नहीं कि खिड़की के पास पक्षी न आते हों। आते हैं। कबूतर या कौवे तो आते ही रहते हैं लेकिन किसी गौरेया का आना थोड़ी अलग बात है। उनकी चह-चह ज्यादा अच्छी लगती है। नज़र उठा कर उसे एकटक देख रहा था कि किचन से श्रीमती जी की नज़र मुझ पर पड़ी।

क्यों मुस्करा रहे हो ?”

एक चिड़िया आई है

तुम्हारे लिये आई होगी। मैं जाती हूँ तो उड़ जाती है

"उड़ जाती है ? मतलब पहले भी आती रही है। मुझसे ज्यादा तो तुम लक्की हो"।

   मुस्कराते हुए कुछ देर बैठा चिड़िया को देखता रहा। अबकी मादा चिड़िया भी नज़र आई और तुरंत ही फिर कहीं उड़ गई। कुछ क्षणों बाद नर चिड़ा सूखते कपड़ों की ओट में हो गया। फिर भी पतले कपड़े के दूसरी ओर से वह नज़र आ रहा था। चह-चह जारी थी। उठ कर करीब गया तो वह अपराजिता के गमले की ओर सटा चीं-चीं किये था। मुझे देखते ही फुर्र !
   
   वापस आकर आस-पास नज़र दौड़ाया कि कहीं कुछ बॉक्स टाइप मिल जाय तो उसमें छेद करके इसके रहने के लिये ठिकाना बना दूं। क्या पता अंडे देने की तैयारी चल रही हो। ज्ञान जी ने ऐसा ही एक बॉक्स गाँव में रहते गौरैया के लिये बनाया है।  

  इधर बॉक्स नहीं मिला तो श्रीमती जी से उस छोटी सी मिट्टी वाली मटकी के बाबत पूछा जिसे कुछ समय पहले लाया था और अक्सर यूं ही शो-पीस बनी पड़ी रहती थी। पता चला कि वह तो कब की फूट गई।

अब ?

    स्टील के एक पुराने लोटे की याद आई तो मालूम हुआ कि उसमें अभी फ्रिज में कुछ भर-भूर कर रखा है। उधर खिड़की पर चिड़िया का अता-पता नहीं। कबूतर जरूर यहाँ वहाँ गुटर-गूं कर रहे थे। सामने खुले आसमान में चील गोल दायरे में घूम रही थी। साथ-साथ नीचे वाली इमारत की छत पर उसकी परछाईं भी घूम रही थी। थोड़ी देर बाद खिड़की से हट गया। वापस आकर बैठा।

  पहले से बना कर रख दिया होता तो अच्छा था। अब भी बॉक्स बना सकता हूँ लेकिन..... अभी बॉक्स नहीं है। क्या पता स्टील का पुराना लोटा खाली हो जाय। वैसे स्टील वाले में शायद चिड़िया न रहेगी। अंडे देगी तो रात में बच्चों को ठण्ड लगेगी। रूई-तिनका बिछाने के बावजूद स्टील के लोटे में उसे रहना अनकुस लगेगा। वैसे बिजली के खंभों में चिड़ियों को रहते देखा तो है लेकिन फिर भी। लोहे के खंभे और स्टील के लोटे में फ़र्क तो है।

  लेकिन बॉक्स कहाँ मिले ? वो हाल-फिलहाल खरीदा ग्राईंडर वाला कार्डबोर्ड बॉक्स कैसा रहेगा ? नहीं, अभी उसमें थोड़ी कमी-बेसी है। सर्विस वाले को बुलाया है। क्या पता रिटर्न करना पड़ा तो ?

  
     बॉक्स नहीं है, मिट्टी की छोटी वाली मटकी नहीं है, स्टील वाला बर्तन अनुपयुक्त है। अच्छा उसके लिये फिर कभी ठिकाना बनाउंगा। ढूंढने पर ऊपर छत से लगे सामानों में शायद एकाध बॉक्स मिल जाय। लेकिन वहाँ जाने के लिये थोड़ी मेहनत करनी होगी। बाद में आराम से जाउंगा। फिलहाल इसे लिख दूं। लिखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर उपस्थिति जरूरी है। चिड़िया का क्या है। आती-जाती रहेगी। स्टेटस थोड़ी दुबारा ध्यान में आएगा। अंतत: मसला लिख-उख कर टंग गया......

चिड़िया अभी तक नहीं आई है।  

-   सतीश पंचम

Sunday, December 13, 2015

ढूह...महुआ....बांग....बेहया !

     घास में रेंगती चींटी को कहीं से महुआ मिल गया है। अपने संवेदी तंतुओं से बार-बार निरख रही है, परख रही है। उसे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी मीठी और अनोखी महक वाली चीज हाथ लगी है। अंदर ही अंदर डर भी रही है कि कहीं कुछ खतरा न हो। आख़िर उसकी जानकारी में यह मौसम की पहली बदली थी। कभी नहीं देखा था यूँ किसी महुए को टपकते हुए।
    उधर दूसरी चींटी इन सबसे दूरी बना सब कुछ देख रही थी। उसके जीवन में भी यह पहली बयार थी। मह-मह माहौल ! थमते-झिझकते आखिर वह भी भदर-भदर चू रहे महुए के पेड़ के नीचे पहुंची। एक और चींटी को देख पहले वाली में थोड़ी हिम्मत आई। दोनों ही उस अनजानी-अनचीन्ही चीज़ को टटोलने में लग गये। ऊपर बैठा कौआ ताक में था कि कब ढंग का उजाला हो और वह पंख पसारे। यूं तो वह अभी भी कहीं जाकर कुछ खाने-पीने की तलाश कर सकता था लेकिन आज कुछ ठहर कर टहनी छोड़ना ठीक समझा। वैसे भी रात भर महुआ चूने से ठीक से आराम न मिला था। आशंका लगी रही कि कहीं सिर के ऊपर न टपक जाय। कई बार रात में मन किया कि पेड़ बदल दे लेकिन अंधेरे में निकलना ठीक नहीं सोच कर पड़ा रहा। फिर अब तो सुबह हो ही रही है।
    उधर ढूह पर बैठा मुर्गा मन ही मन अपनी बांग पर पसोपेश में है। पहली बांग कुछ कमज़ोर लगी थी। शायद गले का झाल ठीक से उतरा नहीं था। एक और बांग की तैयारी में था कि अचानक दड़बे पर चील का धावा हो गया। करीब ही चीं-चीं कर रहा मुर्गी का बच्चा शिकार बना। अबकी मुर्गे ने बांग देनी चाही लेकिन हिम्मत कुछ छूट सी गई थी। फिर मुर्गी कुनबे में फैली इस ताजा दहशत के दौरान बांग देना ठीक भी न था। ऐसे में उसने पंख फड़फड़ाये, कलगी हिलाई और काँटों से बचते-बचाते करीब स्थित बेर की निचली टहनी पर जा बैठा। वहाँ बैठने का कोई खास कारण तो नहीं लेकिन कभी-कभी उसे अच्छा लगता है वहां बैठना। तब और जब उसके मन में कहीं उठा-पटक चल रही हो।
     तभी एहतियात बरतने के बावज़ूद कलगी किसी नुकीले काँटे से छू भर गई। खदबदाहट में टहनी बदलनी चाही कि पंख उलझ गये। किसी तरह नुच-चिथ कर बाहर निकलने में कामयाब होने के बाद मुर्गे ने बेर और उस पर बने बया के लहराते घोंसले की ओर नज़र उठा कर देखा। कहीं कुछ खदबदाहट नहीं। सब कुछ शांत। धूप निकल आई है। सामने घूरे पर कुछ पाने की उम्मीद से उस ओर जा रहा था कि अचानक कीचड़ से सटी बैंगनी फूलों वाली बेहया की झाड़ियों की ओर चल पड़ा। वहाँ कीचड़-कादो में से छितरा-छितरा कर जो कुछ मिला उसे खाने के बाद फिर एक जोरदार बांग देने की इच्छा हुई कि तभी बेहया की झाड़ियों के भीतर से खरगोश को निकल भागते देख मुर्गा चौंक गया। इंतज़ार में रहा कि अभी कोई और भी उसके पीछे-पीछे झाड़ियों में से निकलेगा उसे पकड़ने लेकिन कोई न निकला। कहीं कुछ हलचल नहीं। धीमे कदमों से थमते-झिझकते आगे बढ़ मुर्गे ने अंतत: एक जोरदार बांग दे ही दी ! कुछ यूं मानो बेहया की झाड़ियों में छुपी उस अनजान चीज को चुनौती दे रहा हो। लेकिन झाड़ियों में कहीं कुछ न निकला। कुछ विशेष हरकत न देख कलगी को झटका दे मुर्गा घूरे की ओर बढ़ चला। झाड़ियाँ मंथर गति से हिलती-डुलती मुस्करा रही थीं।
    आख़िर उन्हें भी बड़े दिनों बाद कोई ढंग का बेहया जो मिला था !

- सतीश पंचम

Tuesday, December 1, 2015

चिड़िया, चट्टान, बरगद, गिरगिट !

  पहाड़ की एक छोटी चट्टान नीचे की ओर सरकते हुए एक बड़े से बरगद की ओट में आकर फंस गई है। वहीं चीटियाँ रेंगती हुई मना रही हैं कि बरगद हटे तो चट्टान आगे सरके, आखिर कब तक इसे अपने दम पर यूं ही बरगद रोके रखेगा। पता चला चीटियाँ उसी के ऊपर से गुजर रही हैं और चट्टान गड़गड़ा कर खिसक गई। जितनी चीटियाँ होंगी सारी मारी जायेंगी।
    उधर बरगद मन ही मन सोच रहा है कि चट्टान कुछ दिन यहीं फंसी रहे तो अच्छा है। नीचे ढलान पर झाड़ियों में चिड़िया का घोंसला है। चट्टान का वहां लुढ़कते हुए जाना चिड़िया परिवार के लिये खतरा है। इन सारी हरकतों से बेखबर चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर घोंसले में पहुंची है। बच्चे चीं चीं करते हुए पहले चुग्गा देने के लिये मुंह खोल शोर मचा रहे हैं। उधर बरगद के किनारे वाली टहनी पर बैठे चिड़े को खतरे का कुछ-कुछ अंदाजा हो गया है। वह मन ही मन मना रहा है कि बरगद इस चट्टान को कुछ और समय तक अपने जटा-जूट में फंसा कर रखे तो अच्छा है।
   इधर चट्टान के मन में भी उहापोह जारी है। वह चाहता है कि जो होना हो वह जल्दी हो। आखिर कब तक यूं ही कगार पर फंसा रहेगा। पास ही रेंगता गिरगिट अपनी लपलपाती जीभ से बार-बार इस नई चट्टान को चाटना चाहता है। वह जानना चाहता है कि बेहद ऊपरी सतह से खिसके इस चट्टान में और यहाँ पहले से मौजूद चट्टान में कुछ बुनियादी फ़र्क है या दोनों ही एक समान हैं। उसकी सतह से चिपटी मिट्टी में कुछ चीटियाँ, कीड़े या कुछ नमक का अंश तो होगा ही। बरगद गिरगिट की इस मंशा को अच्छी तरह भांप रहा है। उसे आशंका है कि गिरगिट के हल्के स्पर्श से चट्टान दूसरी ओर खिसक सकती है। और तभी बरगद का एक लाल पका गोदा टूट कर नीचे गिरा और लुढ़कते हुए घोंसले से दूरी बनाते आगे झाड़ियों में जा कर गुम हो गया। अपना मन मार कर गिरगिट दूसरी ओर हट गया। चींटियाँ सहम कर जहां थी वहीं रूक गईं। चिड़ा सहम गया। बच्चे अभी उड़ने लायक नहीं हुए थे। आज एक गोदा गिरा है, कल दूसरा गिरेगा। फिर ये बरगद के गोदे पकने का मौसम है। कोई न कोई सीधे चट्टान के उस नाजुक हिस्से को छू ही देगा और फिर जो होगा उसके बारे में सोच कर ही जान निकल जाती है।
     उधर चिड़िया चुग्गा देने के बाद फिर उड़ चली थी चुग्गा लाने। मन ही मन भुनभुना रही थी कि न जाने कहाँ चला गया मेरा जोड़ीदार। बच्चे भूख से चिचिया रहे हैं और उसका है कि कहीं कुछ पता ही नहीं।


- सतीश पंचम

बरगद, पीपल, तितली, जटा-जूट

    बरगद की जटाओं पर कहीं से एक तितली आकर बैठ गई। रंग-बिरंगी तितली का स्पर्श होते ही जटाओं में कानाफूसी शुरू हुई। मोटी डाल वाली जटा ने पतली से पूछा कि,‘ये कौन है जो आ बैठी है?’ उसे भी कुछ ज्‍़यादा पता न था। रात-दिन कई तरह के जीव, कीड़े-मकौड़े, मच्छर, भुनगे, गिलहरी वगैरह आते-जाते रहते हैं लेकिन किसी तितली का आना न के बराबर होता है। करीब से उड़ते जरूर देखा है लेकिन कभी उसकी जानकारी में ऐसा नहीं हुआ कि कोई आकर जटाओं पर बैठ जाय।
     उधर पीपल के पेड़ से निकली जटियल दाढ़ी ने कान लगा कर बरगद की जटाओं की बातचीत सुननी चाही पर उनकी बातचीत इतनी सांय-फुस चल रही थी कि कुछ पता न चल रहा था। पीपल के पत्ते शोर मचा रहे थे सो अलग।
   तितली थोड़ी देर जटाओं पर बैठने के बाद दूसरी ओर उड़ चली। दायें-बायें....सामने, ऊपर....तिरछे उड़ते-उड़ते तितली फिर से बरगद की ही किसी दूसरी जटा पर बैठ गई। अबकी बरगद की जटाओं में कुछ ज्‍़यादा ही सिहरन देखी गई। वे इतने चटक और रंगीन स्पर्श के आदी न थे। पीपल की जटियल दाढ़ी ने अबकी बात पकड़ ली। उसे समझ आ गया कि बरगद की जटाओं में क्यूँ बेचैनी फैली है। इसके पहले उसे भी तितली के स्पर्श ने इसी तरह सिहराया था। पीपल के पत्तों ने खड़खड़ाया न होता तो तितली काफी देर तक वहीं बैठी रहती।
      इसी बीच हवा का तेज झोंका आया और बरगद की दूसरी जटा ने तितली के रंगीन पंखों तक पहुँचना चाहा। इससे पहले कि छुए, तितली उड़ चली। बाकी जटाओं ने उस जटा की बदमाशी पर नाराजगी जताई तो उसने हवा का बहाना बताया। तितली फिर से उसी राह आड़े-तिरछे, दायें-तिरछे होकर उड़ चली।
     अबकी पीपल की ओर तिरछे बढ़ रही थी कि फ्लाय कैचर ने झपट्टा मारा और तितली को अपनी चोंच में दबा ये गया वो गया। पीपल के पत्ते हरहराते रह गये, बरगद के पत्तों ने दुख तो जताया लेकिन हमेशा की तरह प्रकट न किया। वैसे भी पीपल के पत्तों के मुकाबले बरगद के पत्ते कुछ ज्‍़यादा स्थिर रहते हैं। सबसे ज्यादा अफ़सोसजनक मंज़र था बरगद की जटाओं में। एक तरह की बेचैनी और कसमसाहट दिख रही थी। उनमें भी उसे ज्‍़यादा जिसने थोड़ी सी हवा चलने पर तितली को छूना चाहा था।
    उधर पीपल की जटियल दाढ़ी अब शांत थी। आज उसे एक किस्म की राहत सी मिल रही थी यह सोच कर कि जब कुछ समय पहले उसके यहाँ भी तितली का आगमन हुआ था तो ऐसी कोई दुर्घटना न हुई थी। तितली जैसे हँसती-खिलखिलाती आई थी वैसे ही वापस उड़ गई थी !
  - सतीश पंचम

Friday, November 27, 2015

बुत बनाउंगा तेरी और पूजा करूंगा....!

"दाल का भाव जानकर क्या करोगे वत्स ? ये जानों कि सरदार पटेल होते तो आज का भारत कुछ और होता। वैसे प्याज सामान्य रेट पर बिक रहा है। हां, वो सुभाष चंद्र बोस थे न वे बहुत महान थे"


"जी वो तो मैं भी जानता हूं लेकिन दाल के दाम कम क्यों नहीं हो रहे ?"


"श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी बहुत महान थे"।


"जी, जानता हूँ। वो आजकल आलू भी कुछ ज्यादा कीमत में......."


"नई आलू की फसल आने दो, दामों में फर्क पड़ जायगा। वैसे भारत की धरती कभी सोना उगलती थी। विदेशी हमारा सोना भर भर कर ले गये"।


"जी वो एक्सपोर्ट कम हो रहा है......रूपया ढल रहा है"।


"अरे यार तुम अपनी दाल की फिक्र छोड़ कर एक्सपोर्ट पर क्यूं जान दे रहे हो ? वैसे बता दूं कि यह समय रहते सरकार की ओर से उठाया गया कदम है ताकि दाल वगैरह की कीमत काबू में रहे। एक्सपोर्ट जारी रखते तो तुम्हारी दाल और ज्यादा दाम में बिकती। एक्सपोर्ट कम होने से कीमतें काबू में हैं। वैसे तुम जानते हो भारत की जमीन इतनी उपजाऊ थी कि सारे संसार को अन्न खिला सकती थी"।


"सुना है रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि निवेश कम होना चिंता का विषय है"।


"अबे तू कब से लाट गवर्नरों की बातों पर ध्यान देने लगा। वैसे बात निकली है तो बता दूं कि विदेशी आये थे तो कह रहे थे कि हम दूध में चीनी की तरह घुल कर रहेंगे और वहीं गलती हो गई। हमारे शासकों ने दरियादिली दिखाई और उन्होंने कब्जा करके हमें लूटा, हमारा देश बरबाद कर दिया। हमें ये नहीं भूलना चाहिये"।


"जी वो गैस सब्सिडी सरेंडर करने की सोच रहा था लोकिन सुना ग्यारह हजार करोड़ की गैस उद्योगपति ने चुरा ली"


"अबे तुम लोग सुनी सुनाई पर बहुत ध्यान देते हो। मैं तुम्हें भारत का स्वर्णिम अतीत बता रहा हूँ और तुम दाल चावल आलू पर पिले पड़े हो। वैसे बता दूं कि गुप्तकाल में लोग बहुत खुशहाल थे। बीच में मुगल आये और सब गड़बड़ा गया। बाकि हमारा देश तो हमारा देश है। जिसे जाना हो जाये अपनी बला से...... बाय द वे .....पहले पुष्पक विमान भी था.....!"

- सतीश पंचम


Sunday, October 4, 2015

जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी किताब - Animal Farm

   
 एनीमल फॉर्म की कहानी ब्रिटिश दौर में बिहार के मोतीहारी में जन्मे जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी गई है जिसे पढ़ते समय जेहन में बार-बार अतीत और वर्तमान की कई राजनीतिक परिस्थितियां तैरने लगती हैं जबकि इसे मूलत: व्यंगात्मक शैली में लिखा गया था रूसी तानाशाह स्टॉलिन के लिये।   

   कहानी के अनुसार पशुबाड़े में एक बार पशु विद्रोह कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे दो पैरों वाले इंसानों द्वारा जबरी इस्तेमाल किये जा रहे हैं। एक पशुगीत लिखा जाता है जिससे सभी प्रेरणा पाते हैं। बाद में आदमियों को भगाने के दौरान युद्ध होता है और स्नोबॉल नाम का जानवर घायल हो जाता है। एक और जानवर इस युद्ध में मारा जाता है जिसके नाम पर स्मारक बना दिया जाता है। सभी जानवर दो पैरों वाले इंसानों से मुक्ति पाने का जश्न मनाते हैं, उनके रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाले सामानों को, गुलामी के प्रतीकों को जला देते हैं और एक सात सूत्री नया विधान लिखा जाता है। 

कुछ दिन पशुबाड़े की शासन-व्यवस्था ठीक-ठाक चलने के बाद दबंग सूअर इन्सानों के कमरों में यह कह कर कब्जा कर लेते हैं कि काम-काज के सुचारू रूप से चलने के लिये अलग व्यवस्था होनी चाहिये। हम आप सब की भलाई के लिये ही कर रहे हैं। सभी लोग इसका अंदर ही अंदर विरोध करते हैं कि ये तो उन सातवें नियम का उल्लंघन है जिसके अनुसार सभी पशु बराबर हैं। लेकिन कोई ज्यादा विरोध नहीं कर पाता। इसी बीच एक नई बात कही जाती है कि सात सूत्री विधान याद करने में मुश्किल है इसलिये इसमें ऐसी बात जोड़ी जाय जो सातों को अभिव्यक्त कर सके। इसलिये एक सूक्त वाक्य दिया जाता है – चार टाँगें अच्छी, दो टाँगें खराबभेड़ों को यही रटने कहा जाता है और वे इसे जब तब इसे रटती रहती। तमाम तरह के बदलाव होते हैं, नई शिक्षा नीति बनाई जाती है, बिल्ली को शिक्षा विभाग सौंपा जाता है। इसी दौरान मोसेस नाम के बड़बोले कौवे का भी प्रसंग आता है जिसमें वह दावा करता है वह एक ऐसे रहस्यमय पहाड़ के बारे में जानता है जिसका नाम मिसरी पर्वत है और मरने के बाद सभी जानवर वहीं पहुँचते हैं। यह पर्वत बादलों से ऊपर आकाश में कहीं स्थित है। मौसेस का कहना था कि मिसरी पर्वत पर सप्ताह के सातों दिन रविवार रहता है और तिपतिया घास तो वहाँ साल के हर मौसम में उगती है। गुड़ की भेली और अलसी की खली तो वहाँ बाड़ों पर उगती है। सभी पशु मौसेस से नफरत करते थे क्योंकि वह बातें तो बहुत बनाता था लेकिन काम कुछ भी नहीं करता था। लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो मिसरी पर्वत पर विश्वास करते थे। 
  
 समय बीतता है और स्नोबॉल नाम का सूअर विकास की अवधारणा रखते हुए एक पवनचक्की लगाने की बात करता है जिससे लोगों को तीन दिन ही काम करना पड़े और लोग बाकी दिन आराम कर सकें। इसका विरोध नेपोलियन नाम का सूअर यह कह कर करता है कि हमें खाद्यान उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है, पवनचक्की की नहीं। बाद में आपसी मन मुटाव के बीच वोटिंग के समय नारा गूंजता है- स्नोबॉल को वोट दो, सप्ताह में तीन दिन काम करोऔर नेपोलियन को वोट दो और भरी हुई नाद पाओ।बैंजामिन नाम का गधा ही ऐसा अकेला पशु रहता है जो किसी की तरफ नहीं झुकता।
   
    इस बीच पवनचक्की के पक्ष में भावपूर्ण अपीलें होने लगीं। आवेशपूर्ण वाक्यों में स्नोबॉल ने सपने दिखाने शुरू किये कि अब पशुओं की पीठ पर से घिनौना बोझ उतार दिया जाएगा। पवनचक्की से बिजली थ्रैशिंग मशीनें, हल, हेंगा, लोढ़े चलेंगे, तेजी से कटाई होगी, फसल के गट्ठे बाँधे जा सकेंगे। थान को अपनी बिजली, रोशनी, ठंडा और गर्म पानी और बिजली का हीटर मिल सकेगा। कुछ लोग तो इस बात पर स्नोबॉल के समर्थक बन गये लेकिन कुछ विरोधी ही रहे। अचानक नेपोलियन अपने कुत्तों के साथ स्नोबॉल पर हमला करके उसे बाडे से बाहर खदेड़ देता है। इस आकस्मिक सत्ता परिवर्तन के औचित्य को सिद्ध करने के लिये मोटे-थुलथुल काया वाले स्क्वीलर को भेजा जाता है जिसमें वह यह बताने में सफल होता है कि स्नोबॉल इन्सानों से मिला हुआ था और उन्हीं की तरह हमें पवनचक्की जैसे भौतिक चीजों के जरिये फिर से गुलाम बनवाना चाहता था। जबकि स्क्वीलर के बारे में दूसरों का कहना था कि वह इतना माहिर है कि काले को सफेद में बदल सकता है।

     समय बीतने के साथ नेपोलियन स्कवीलर के जरिये पशुबाड़े पर अपना कब्जा बढ़ाते चला जाता है। तरह तरह के आंकड़े पेश करता है कि इस बार 200 प्रतिशत खाद्यान में बढ़ोतरी हुई, तीन सौ प्रतिशत हुई लेकिन पशुओं तक उसका लाभ मिले तब तो। उन्हें पता ही नहीं चलता कि जब इतना ज्यादा विकास हुआ है तो वह दिखता क्यों नहीं, हम अब भी भूखे क्यों हैं ? इस बीच अचानक नेपोलियन भी कहने लगता है कि हमें पवनचक्की बनानी होगी। लोग आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि पहले तो विरोधी थे, अब क्यों उसका समर्थन करने लगे ? तो नेपोलियन के करीबी स्कवीलर के जरिये कहलवाया जाता है कि - नेपोलियन दरअसल कभी भी पवनचक्की के विरुद्ध नहीं था। इसके विपरीत, यह नेपोलियन ही था जिसने शुरू-शुरू में पवनचक्की का समर्थन किया था, सच तो यह है कि वे नेपोलियन के कागजों में से चुराए गए थे। वास्तव में पवनचक्की नेपोलियन के दिमाग की ही उपज थी। देखते-देखते पवनचक्की का निर्माण शुरू हो जाता है। इसी दौरान नेपोलियन अपने पुराने मालिक जोंस के बिस्तर पर जाकर सोना शुरू करता है। लोगों में सुगबुगाहट होती है ये उन सात धर्मादेशों में से एक का उल्लंघन हैं। धर्मादेश पढ़े जाते हैं जिके अनुसार  कोई भी पशु चादरों के साथ बिस्तर पर नहीं सोएगा

लोग हैरान होते हैं कि इसमें चादरों का जिक्र कैसे आ गया जबकि मूल धर्मादेश में तो सिर्फ यही लिखा था कि – कोई भी पशु बिस्तर पर नहीं सोऐगाफिर ये सब कैसे ? इसी तरह के कई और बदलाव देखने मिलते हैं। मूल धर्मादेशों के शब्दों में समय समय पर हेरफेर किया जाता है।सूअरों को जब शराब पीते देखा गया तो पाया गया कि धर्मादेश में एक और शब्द जोड़ा गया है – बहुत अधिक शराब नहींजबकि मूल में लिखा था कि – पशु शराब नहीं पियेंगे। अब लिखा है कि पशु बहुत अधिक शराब नहीं पियेंगे। यह चक्कर क्या है? इसी दौरान पुराने पशु गीत को बदलने की कवायद की जाती है कि वह तो पुराने संघर्ष से जुड़ा था, अब उसकी जरूरत नहीं। प्रेरणा गीत फिर से लिखा जाय। तमाम तरह के पुराने दस्तावेज भी खंगाल कर देखे जाते हैं और इस तरह से प्रचारित किये जाते हैं मानों कि स्नोबॉल ने इंसानों से युद्ध के दौरान गद्दारी की साजिशें रची हो। लोग तर्क देते हैं कि तबेले के युद्ध में स्नोबॉल जख्मी हुआ था, उसे वीरता पदक मिला था तो नेपोलियन उस जख्म को ही झूठा बता देता है यह कह कर कि उसके काटने से ही वह घायल हुआ था, तबेले के स्वतंत्रता युद्ध में उसका कोई योगदान नहीं था।

 धीरे-धीरे मोटे-थुलथुल आकार के स्कवीलर और अपने पाले कुत्तों के जरिये नेपोलियन सूअर पूरी तरह कब्जा कर लेता है। अपने विरोधियों को मार देता है। इसी बीच पवनचक्की के निर्माण के लिये पड़ोसी पशु-बाड़े के मालिक से बात चलाई जाती है। लोग हैरान होते हैं कि दो टांगों वाले मनुष्य से क्यों मदद ली जा रही है। तब तर्क दिया जाता कि विकास के लिये यह जरूरी है। कुछ भेड़ों से सूक्त वाक्य बदल कर रटवाया जाता है जिसमें कि पहले से उलट अब कहलवाया जाता है कि – चार टाँगें अच्छी, दो टाँगें ज्यादा अच्छी। पशु हैरान होते हैं कि ये सब क्या चल रहा है, जो चीज पहले खराब कही जा रही थी अब नेपोलियन के आते ही अच्छी कैसे मान ली गई। उधर पुराने दस्तावेजों के साथ हेऱफेर जारी रहता है। फरार सूअर स्नोबॉल को अपराधी घोषित कर दिया जाता है। पशुबाड़े में हुई किसी भी गडबड़ी के लिये उसे ही जिम्मेदार माना जाता। उधर बूढ़े होते पशुओं के लिये रिटायरमेंट की बात होती है लेकिन उन्हें पेंशन के नाम पर टरकाया ही जाता है। उपर से पशुबाड़े के उत्थान के नाम पर नये नये विचार थोपे जाते, मोटे स्कवीलर को विरोधियों को कुचलने का काम सौंपा जाता। देखते ही देखते पशुबाड़े की रौनक गुम होने लगती है। ऐसे में पशुबाड़े के प्राणियों को समझ नहीं आता कि वे पुराने मालिक के समय ज्यादा खुश थे या अपने इस नई आजादी के दौर में ज्यादा खुश हैं।

  बेहतरीन कथानक और बेहतरीन समझ के साथ लिखी गई इस व्यंग्य रचना को हो सके तो हर किसी को पढ़ना चाहिये ताकि वे जान सकें कि दबंगों का कब्जा पूरी शासन व्यवस्था पर कैसे होता है, कैसे एक विशिष्ट वर्ग के लाभ के लिये नियम तोड़े-मरोड़े जाते हैं, कैसे अतीत के पन्नों को लीप-पोतकर बराबर किया जाता है। तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया जाता है। फिर इसमें सिर्फ एक पक्ष ही नहीं होता, वे सभी होते हैं जिन्हें सत्ता का स्वाद मिलता है। स्नोबॉल भी अपने शासन के दौरान धूर्तता से बाज़ नहीं आता था और नेपोलियन भी। हर किसी के पास अपनी धूर्तता को साबित करने के तर्क होते हैं। हर किसी के पास उसे लागू करने के लिये जोर-जबरदस्ती का विकल्प होता है। ऐसे में जॉर्ज ऑर्वेल द्वारा लिखी इस पुस्तक को पढ़ना और जरूरी हो जाता है ताकि भेड़चाल से बचा जाय, अपनी मेधा और अपनी सहज सोच के जरिये भावनाओं में न बहकर निर्णय लिये जा सकें।

     मूल पुस्तक का अनुवाद सूरज प्रकाश जी ने किया है, और प्रकाशित किया है दिल्ली के यश पब्लिकेशन्स ने। सूरज जी को इस पुस्तक के बेहतरीन अनुवाद के लिये बहुत-बहुत बधाई। वैसे मैंने भी यह पुस्तक हाल फिलहाल ही पढ़ी है जबकि इसके अंग्रेजी वर्शन को घर में लाकर रखे हुए पांच-छह साल हो गये थे। आज पढूंगा, अब पढ़ूंगा कहते कहते वक्त गुज़रता गया और जब पढ़ा को दिल बाग-बाग हो गया। कमाल की कल्पना और कमाल का विवरण। पता नहीं स्टॉलिन ने इसे 1945 में पढ़ा था या नहीं ! पढ़ता तो जरूर एक बार अपने तंबाखू वाले पाईप में जलती तीली रखने से पहले इधर-उधर देख लेता कि कहीं जॉर्ज ऑर्वेल तो नहीं देख रहे वरना फिर से एक नया व्यंग्य......!       

- सतीश पंचम

Saturday, October 3, 2015

झालर, पंखुड़ी, पेड़, पानी, बगुला, मंच और तालाब !

   
  कभी-कभी साधारण पेड़-पौधों सा नजर आने वाला कोई पेड़ या पौधा थोड़ा ध्यान से देखने पर कुछ अलग नज़र आता है। उसकी पत्तियां, डंठल, फूल सभी कुछ औरों के मुकाबले नये किस्म के लगते हैं। थोड़ा और ध्यान देने पर उसकी विशेषताएं खुद-ब-खुद आकर्षित करने लगती हैं। तब उसके बारे में पता करने की इच्छा बढ़ती जाती है। नाम क्या है ? किस लिये इसका इस्तेमाल होता है ? कहां पाया जाता है ? कोई औषधिय उपयोग है या यूं ही जंगल झाड़ी का हिस्सा है ? ऐसी तमाम बातें एक-एक कर मन में आने लगती हैं। ऐसे ही किस्म के पेड़ से अबकी सामना हुआ मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में।
   
    पहली नजर में तो यह आम पेड़ ही दिख रहा था। लेकिन ध्यान से देखा तो इसके नीचे की ओर झुकी पत्तियों में झालर सी दिखी। फिर जिस ओर खड़ा होकर देख रहा था वहां सूरज की रोशनी पत्तियों से होकर मुझ तक पहुंच रही थी। ऐसे में उस झालर के कुछ नये पत्ते ऑप्टिकल ब्राइटनेस की वजह से और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहे थे। मोबाइल कैमरे से तस्वीरें लेने के बाद इसकी छांव से बाहर निकला और थोड़ा दूर हट कर पेड़ को देखने लगा। इस बार और भी हैरानी हुई। पत्तियाँ ऊपर से नीचे की ओर एक विशेष अंदाज में झुकी हुई थीं। ऐसा लगता था पेड़ खुद ही अपने पत्तों की ढेरी निकाल-निकाल कर उन्हें धूप दिखा रहा हो। इसका नाम पता करना चाहा तो कहीं कुछ था ही नहीं। तने से सिर्फ अधटूटा पतला तार लटक रहा था। जाहिर है पहले वहां नाम वाली पट्टिका थी लेकिन कौवों ने घोंसला बनाने के लिये तार को आड़ा-टेढ़ा करके तोड़ लिया था और वहां सिर्फ झूलता हुआ तार ही बचा था। आस-पास नजर दौड़ाया तो उस तरह का पेड़ दिखा ही नहीं। तभी इसकी फुनगी पर नजर पड़ी जहां इक्का दुक्का फूल खिले थे। वहां तक कैमरा क्या पहुंचता। सो जैसे तैसे मोबाइस से जूम करके तस्वीर खेंचा। इस पेड़ के बारे में जानने की उत्सुकता बनी हुई थी। सो थोड़ा-आसपास और ढूंढा। कहीं कुछ नहीं। मायूस होकर थोड़ा आगे बढ़ा। इक्का दुक्का तस्वीरें लेने के बाद देखा तो सामने वैटरनरी स्टूडेंट्स का ग्रुप चला आ रहा था। पशु-चिकित्सालयों के बच्चे हाथ में घास लेकर एमू के पिंजरे के पास जमा हो गये। कुछ देख-ताक कर रहे थे। इच्छा तो हुई कि उनके कार्यकलाप देखे जांय लेकिन जेहन में वह पेड़ घूम रहा था सो वहां से हट कर दूसरी ओर चल पड़ा।   

        थोड़ा आगे जाने पर वैसा ही पेड़ दिखा। सुखद आश्चर्य ! अबकी उस पर नाम वाली पट्टिका भी थी जिस पर लिखा था – Burmese Pink Cassia. नीचे गिरे डंठल, पत्तों को टटोला तो उनके बीच से कुछ गिरे हुए फूल भी मिल गये। कुछ अधखिले थे कुछ पूर्ण विकसित। पंखुड़ियों का आकार-प्रकार काफी आकर्षित कर रहा था। सूंघने पर उनमें जरा भी महक नहीं मिली। एक अधखिले फूल को थोड़ा सा खोला तो भीतर गुलमोहर के तंतुओं सी रचना दिखी जिनके सिर पर गेहूं के दानों सा पुंकेसर जुड़ा हुआ था। अक्सर बचपने में गुलमोहर के तंतुओं से बहुत खेला है। एक दूसरे तंतुओं के सिर फंसा कर विपरीत दिशा में खेंचने पर जिस खिलाड़ी के तंतुओं के सिर पर जुड़े गेहूं के आकार वाले दाने टिके रहते वह जीत जाता। अमूमन दो-तीन तंतुओं की भिड़न्त के बाद पहला कमजोर हो जाता और टूटने पर गुलमोहर की पंखुड़ी में से दूसरा निकालना पड़ता। लेकिन कभी ऐसा भी होता कि अकेला एक तंतु सामने वाले खिलाड़ी के दस बारह से जीत जाता। उस लक्की तंतु को तब बचाकर रख लिया जाता कि इसने बहुत मेहनत की। अब आराम करे।
   
      किंतु यहां इस Burmese pink cassia के तुंतु इतने छोटे थे उनसे खेलना मुश्किल था। हां, दिखने में जरूर खूबसूरत थे। तस्वीरें लेने के बाद कुछ देर वहां ठहर कर आगे बढ़ गया। कई और तस्वीरें लिया। एक जगह गमलों में कुछ करौंदे के आकार के फल देख ठहर गया। उन्हें टटोल ही रहा था कि एक ललछहूँ पका फल नजर आया। उसे तोड़ कर मुंह में रखा तो पिच्च से फूट गया। फूटते साथ मुंह का स्वाद कड़वा-कसैला हो गया। तुरत-फुरत आक-थू करके उगला। थोड़ा सा राहत मिलने के बाद ज्ञान हुआ कि अकेले होने पर बोटॉनिकल गार्डन में इस तरह का एडवेंचर ठीक नहीं। कहीं कुछ उल्टा-सीधा फल हुआ तो मुश्किल हो जायगी। भुगतना पड़ सकता है। लेकिन जानने की जिज्ञासा जो न कराये। एक बार ऐसे ही किसी पेड़ की छाल मुंह में रख लिया था। पत्तियों के मसलने  से पता नहीं चल रहा था कि कौन सा पेड़ है, स्वाद कैसा है तो उसकी छाल थोड़ा सा तोड़ कर मुंह में रख कर देखना चाहा कि कैसा है। पहले पहल तो यूं लगा जैसे दालचीनी लकड़ी हो लेकिन बाद में कुछ जलन सी हुई तो उगलना पड़ गया। नाम आज तक नहीं पता चला। कभी गाँव जाना हुआ तो किसी से पूछ कर ही पता चलेगा। वैसे भी वहां कौन से बोटॉनिस्ट बैठे हैं। उनके लिये तो जैसे सब पेड़, वैसे ये भी एक पेड़।

  वहां से आगे बढ़ते हुए कुछ और देख-ताक के बाद सामने एक हरसिंगार को छोटा से पेड़ नजर आया। कुछ फूल झड़े थे। उसी के बगल में ठूंठ हुआ एक अलग पेड़ खड़ा था जिसके तने से सफ़ेद फंगस / कुकुरमुत्ते सी आकृति निकली हुई थी। जाहिर है वह पेड़ अब सड़ रहा था। एक ओर हरसिंगार, एक ओर सड़ा पेड़। प्रकृति भी अद्भुत है। सड़े पेड़ से याद आया वहीं गार्डन में एक कुमकुम का भी पेड़ था जो अब एकदम ठूंठ हो चुका है। देखने से लग रहा है कि अब शायद ही हरा हो लेकिन कुछ कहा नहीं जा सकता। कई बार ऐसे-ऐसे पेड़-पौधों को फिर से हरियराते देखा है जिन्हें देखने पर लगता था कि अब ये एकदम मर चुका है। लेकिन मौसम बदला नहीं कि उन्हीं में नये पत्ते निकलते देखा है। इसलिये कुमकुम के उस पेड़ के लिये अपनी ओर से उम्मीद तो बनाये रखा है बाकी प्रकृति और वहां के कर्मचारी जानें।

       वहीं एक विदेश जोड़ा अपने बच्ची के साथ हंसता खेलता नजर आया। पिता आंखें बंद करता और बच्ची छुप जाती। मां फोटो क्लिक करती। उन्हें देख अच्छा लग रहा था। वहां से होते हुए बोटॉनिकल गार्डन के उस हिस्से की ओर बढ़ गया जहां तालाब है। शांत पानी के पास खड़ा होना अच्छा लगा। वैसे भी पानी कहीं भी हो, यदि वह शांत हो या धीरे-धीरे बह रहा हो तो उसके पास खड़े होने में एक तरह का सुकून सा मिलता है। संभवत: जीवों की  प्रकृतिगत मेनुफैक्चरिंग ही इस तरह की गई है कि जहां कहीं साफ़ पानी दिखे या उसके आस-पास का स्वास्थ्यकर माहौल मिले पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, मनुष्य सभी एक किस्म की ठहर देते ही हैं। 
     
      उसी तालाब में देखा एक चौरस चबूतरे पर एक बगुला यूं बैठा है मानों वह मच पर हो और तालाब को संबोधित कर रहा हो। रह-रहकर अपने पंखों को सुलझाता, साफ करता फिर अपनी उसी संबोधन मुद्रा में आ जाता। उसे देख ख्याल आया कि संभवत: यह खा-पीकर उस चबूतरे पर बैठा है जो जलीय जीवों मसलन मछलियों, मेंढ़कों के लिये संदेश है कि अब उससे खतरा नहीं है वरना खाया-अघाया बगुला यूं खुले में मंच पर नहीं बैठता। तब वह भी और बगुलों की तरह मंच मछलियों की टोह में मगजमारी कर रहा होता, पानी में ठहर-ठहर कर अपने लिये भोजन तलाशता।
  
       इसी बीच कई और ख्याल आये मानों वह बगुला तालाब के बीच कविता पाठ कर रहा हो और जलचरों से उम्मीद कर रहा हो कि वे उसकी सराहना करेंगे लेकिन मछलियां बाहर ही नहीं आ रही थीं। वे सभी कवि जी को देखकर जाने कहां दुबक गईं थीं। फिर ख्याल आया कि हो सकता है वह मंच पर बैठा कांग्रेसी युवराज है जिसे सुनने के लिये लोग नहीं मिल रहे। कहीं आस-पास शीला दीक्षित भी हो सकती हैं जो अपील करें कि अरे आप लोग सुन तो लिजिये। हांलाकि मैं प्रकृति के आनंद के बीच राजनैतिक एंगल लाने से बचता रहा हूं लेकिन आजकल दिनों-दिन राजनीतिक स्टेटस सोशल मीडिया की ओर से इतने ज्यादा ठेले जाते हैं कि जाने-अनजाने जेहन में वह बात आ ही जाती है। यही वजह है कि खुद को दिमागी रूप से ठीक-ठाक रखने के लिये कईयों के स्टेटस म्यूट कर चुका हूं या अनफ्रेण्ड कर चुका हूं। नहीं चाहिये ऐसी सड़ांध जहां दिमाग का भुरता बन जाय और सहज सोच भी प्रभावित होने लगे।  
       
      आगे और कभी कई नजारे लिये, पानी में बहते पत्तों को धीरे-धीरे सरकते देखा, कुछ बुलबुलों का बनना बिगड़ना देखा। एकाध बड़ा बुडुक्का फूटता तो हल्की सी जल-तरंग बनती। सतह पर बहते पत्ते लहराते जरूर लेकिन अंतत: वहीं जमे रहते। हौले-हौले किनारे की ओर सरकते पत्तों के बीच एकाध सूखे तैरते डंठल भी नजर आये जिनपर बड़ी-बड़ी चींटियां रेंग रही थीं। उन्हें देख कर लग रहा था मानों वे pirates of the Caribbean sea की तर्ज पर pirates of the Botanical pond हों ! जहां कहीं सीमेंटी दिवार का किनारा मिला कि फट से उन दीवारों पर चढ़ना शुरू। फिर तो लूट लो जितना लूट सकते हो। कहीं चिड़ियों के फूटे अंडे, कहीं किसी कौवे द्वारा छोड़े गये मांस के कण तो कहीं मरी गिलहरी के अवशेष! हर ओर कुछ न कुछ उपलब्ध ! हां, उनमें भी श्रेष्ठतम् की चाह बनी रहती है। जो ज्यादा अच्छा है वही लेना है, न मिला तो उससे कम वाले पर धावा बोलो। मिल गया तो ठीक वरना उससे कम वाले तक पहुंचो लेकिन कोशिश यही कि अच्छा वाला चाहिये। ताजा मांस मिला तो ठीक, वरना बासी ही सही, वह भी न मिला तो अंडों के छिलके ही सही.....न मिले तो सूखी कड़ी हो चुकी गिलहरी ही सही !
         
      देखा जाय तो हम सभी में वह Pirates वाले गुण(?) ही हैं। अच्छे की चाह ब्राण्डेड की ओर ले जाती है, वह न मिल पाये या आमदनी के बाहर की चीज हो तो सस्ता वाला ही सही, वह न मिल पाये तो उससे खराब वाला सेकंड हैंड ही सही। वह भी नहीं तो एक उम्मीद कि आज नहीं है तो क्या हुआ.....कल हो सकता है किस्मत खुल जाय, कुछ मेहनत से कुछ तिकड़म से कुछ हिसाब बन जाय और हम भी ढंग के आदमी बन जांय। यह चाह, यह उम्मीद, यह मेहनत बनी रहे तो अच्छा है। वैसे भी इसकी कोई गारंटी नहीं कि मेहनत से कमाये पैसों से आप अपनी पहुंच की चीजें खा पायें। हाल-फिलहाल की घटनायें देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। दादरी में गाय का मांस खाने के शक में एक व्यक्ति को मार दिया गया। और भी जगह दंगा-फ़साद होता ही रहा है लेकिन हम चेत नहीं पाते। 


     चार साल पहले मुंबई के काला घोड़ा आर्ट फ़ेस्टिवल के दौरान एक तस्वीर खेंचा था जिसमें दर्शाया गया था कि लोग खाने के टेबल के इर्द-गिर्द बैठे हैं। बीच में खाना रखा है। खाने से सट कर रोजमर्रा के काम आने वाले औजार रखे हैं जिनके दम पर मनुष्य मेहनत करता है, रोजी-रोटी कमाता है, अपना पेट भरता है। उन औजारों के बाद तरह-तरह के धार्मिक चिन्ह रखे गये थे। यानि लोगों को खाना है तो पहले धार्मिक चिन्हों से होते हुए आगे हाथ बढ़ायें, औजारों को पार करें और तब अपने लिये निवाला तोड़ें। यही आज कल की सच्चाई है। वही हो रहा है। ऐसे में साहिर लुधियानवी का लिखा चित्रलेखा फिल्म का वह गीत बरबस ही याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि – 

     "ये पाप है क्या....ये पुण्य है क्या….. रीतों पर धर्म की मुहरें हैं....हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे.....संसार से भागे फिरते हो.....!"

         देखा जाय तो हम सभी इस संसार से भागे फिर रहे हैं। कभी धर्म की शरण जाते हैं, कभी जादू की, कभी ढोंगी बाबाओं की शरण तो कभी संत का चोला पहने धूर्तों की शरण। बेहतर हो सहज ढंग से हम अपने आप को परखें, सहज ढंग से सोचें, सहजता की ओर बढ़ें तो थोड़ी तकलीफ़े कम हो जाएंगी। वैसे भी संसार में सैकड़ों मसले हैं जिन्हें देख-ताक कर मुंह चुराने को जी चाहता है, अपने आप से भी और दुनिया से भी। नजरें मिलाते झिझक होती है। ऐसे में प्रकृति का ठौर मिल जाय तो नजरें चुराना आसान हो जाता है। वैसे भी पायरेटपना तो अपने अंदर है ही। थोड़ी प्रकृतिगत चोरी यह भी सही !

  -    सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कुमकुम, हरसिंगार, पलाश, पीपल, बांस के साथ-साथ बर्मा का भी एक पेड़ लहलहा रहा है।

समय - वही, जब स्नान-ध्यान के बाद लोग पेड़ की जड़ में जल चढ़ा रहे हों और वह मन ही मन हंसते हुए कहे - "अरे अभी तो मेरी टहनी पर कौवा मांस लेकर बैठा था, तुम आये और वह उड़ा"
  

Saturday, June 27, 2015

ललित मोदी आफ्टर चार हजार साल बाद !

 
 
उत्खनन के दौरान मिट्टी में दबे ललित मोदी नाम के शिलापट्ट को देखते ही उत्खनन कार्य में जुटे मजदूरों ने जल्दी जल्दी ब्रश द्वारा मिट्टी हटाना चाहा लेकिन ऊपर की ओर खड़े सुपरवाईजर की सख्त हिदायत थी कि उत्खनन के दौरान जल्दबाजी न करें। चीजें साबुत निकलें तो विश्लेषण में आसानी होती है।

  वहीं मजदूरों का कहना था कि वे आज तक केवल  भुने हुए चावल, भुने हुए चने, भुनी हुई दाल आदि के अवशेष ही उत्खननों के दौरान प्राप्त कर सके हैं, वह भी किसी मृदभांड में या किसी परित्यक्त चूल्हे में राख और मिट्टी के बीच दबे हुए मिले हैं, लेकिन यह पहली चीज है जिस पर चार हजार साल पहले बड़े बड़े लोगों के साथ संबंध रखने और उस संबंध को भुनाने वाले का नाम लिखा है। ऐसे में उत्खनन के मान्य सिद्धांतों के अनूरूप चलनी से चाल कर, ब्रश से मिट्टी हटाकर धीरे धीरे उत्खनन करना बहुत अखर रहा है। उत्कंठा बढ़ती ही जा रही है।

 वहीं बगल वाले गढ्ढे में खड़े वरिष्ठ पुरातत्वविद का कहना है कि उत्खनन में लगे मजदूर ऐसे शिलापट देख कर ज्यादा उत्कंठित न हों क्योंकि ऐसे संबंध भुनाऊ लोगों के शिलापट्ट पहले भी बहुतायत में मिलते रहे हैं। यह शिलापट्ट इस मामले में थोड़ा सा अलग इसलिये है क्योंकि जिसका नाम लिखा है वह खुद बोल बोल कर अपने संबंधों को उजागर कर रहा था। केवल इतने से कारण की वजह से उत्खनन में जल्दीबाजी करना अनुचित है।

   वहीं इस शिलापट्ट के बारे में सुनते ही हांफते डाफते उत्खनन स्थल पर पहुंचे इतिहासकारों का मानना है कि इस गड़े हुए शिलापट्ट को निकालने के लिये ब्रश और चलनी का इस्तेमाल करना ठीक नहीं होगा। बहुत ज्यादा समय लग सकता है क्योंकि यह शिलापट्ट इस पर उल्लिखित व्यक्ति की तरह ही जितना जमीन से ऊपर नजर आ रहा है उससे कहीं ज्यादा जमीन के नीचे दबा होगा। इसलिये हो सके तो पहली बार पुरातात्विक उत्खनन के स्टैंडर्ड प्रोसिजर को दरकिनार करते हुए जेसीबी मशीन द्वारा उत्खनन कराया जाय।

    वहीं इस विषय पर पीएचडी करने वाले शोधार्थियों का मानना है कि जेसीबी मशीनों के मुंहाने पर बड़े बड़े विशालकाय ब्रश बांधकर उत्खनन किया जाय तो पुरातत्विक स्टैंडर्ड प्रोसिजर फॉलो किया जा सकता है। इससे उत्खनन में तेजी भी आएगी और इस उल्लिखित व्यक्ति ललित मोदी को यह कहने की नौबत भी नहीं आएगी कि वह किसी जेसीबी से मिल चुका है अन्यथा जैसी कि किवदंती है, यह वो शख्स था जो चार हजार वर्ष पूर्व हर किसी से मिल चुका था और लोग मानवता के नाते इससे मिल भी लेते थे। यह अलग बात है कि बाद में वही लोग खुद को ठगा हुआ और ललित मोदी को पीड़ित बताते थे। ऐसे विलक्षण महापुरूष के नाम वाला शिलापट् मिलना एक दुर्लभ पुरातात्विक संयोग है।

(ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)

- सतीश पंचम

Sunday, June 21, 2015

रे मना तू तनिक ध्यान बंटा !

     हर बात में रोना कि योगा मत करो कि देश भूखा है...नंगा है.....अंतड़ियां भीतर हैं....बाहर हैं....हर वक्त का रोना अजीब लगता है। ध्यान बंटाने के लिये योग दिवस, स्वच्छता दिवस, बीमाबाजी सब हो रहा है तो होण दो, कुछ पॉजिटीव ही हो रहा है। सब जानते हैं कि और कामों के साथ-साथ सरकार द्वारा ध्यान बंटाने की यह भी एक कवायद है, लोगों में अपनी इमेज बनाने की एक तरह की कोशिशें हैं। इसी बहाने कुछ अच्छा हो रहा है तो किया जाय। बाकी तो विकास, शिक्षा, भ्रष्टाचार, अचार सब दुनियावी बातें तो दिल बहलाने के लिये हैं, हुआ तो ठीक न हुआ तो क्या फर्क पड़ता है। सरकार तो चल रही है न। पत्रकार बिना कहे बिछे जा रहे हैं, स्तुतिगान और लारा लप्पा बिना कहे गा रहे हैं।

       दूरदर्शन पर आज ही मोदी द्वारा योग किये जाने के दौरान कमेंटरी पढ़ी जा रही थी कि - मोदी जी योग से बहुत प्रभावित हैं, वो कहते हैं कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" ........अब जहां इतना सब चल रहा है तो थोड़ा बहुत घालमेल तो हो ही जाता है, भले यह गाँधी जी द्वारा कहा गया हो कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है"....अब उसे मोदी के लिये दूरदर्शन द्वारा कहा जा रहा है ....इतना घालमेल तो मानवता के नाते चलता है। बाकी नीयत तो ठीक है - ऐसा भी कहा जा सकता है। मानवता ठहरी।

     उधर बिहार में चुनाव हैं तो बड़े शाह दल बल के साथ पटना पहुंचे हैं। भारी भरकम शरीर के साथ कोई तड़ीपार हो और योग करते हुए उसके लिये कहा जाय कि "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" तो अच्छा लगेगा क्या ?

     उधर वसुंधरा जी भी योग करती दिखीं। ताड़ासन करते हुए पैरों को रह रहकर जमीन पर ला रही थीं। उनसे ठीक से खड़े भी नहीं हुआ जा रहा था। वो शायद जताना चाहती थीं कि वो जमीन से जुड़ी नेत्री हैं। ऐसे ही बाकी के नेता-नेती लोग भी होंगे। ऐसे में हर एक के साथ "मेरा जीवन ही मेरा संदेश" वाली तख्ती चस्पां कर दी जाय तो भावपूर्ण और स्मितहास्य का लहरदार मिश्रण ही बन जाय।

 सोचिये कि किस किस की तस्वीर के साथ "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है" जैसा आदर्श वाक्य क्या क्या गुल खिला सकता है। हर एक की तस्वीर के साथ यह घोषवाक्य अलग अलग ध्वनित होगा। उसकी काट, उसकी मार, उसकी चोट हर एक के लिये 'सेल्फी कोटेशन' टाईप होगी।


     कहीं बाबा रामदेव कह रहे हैं - मेरा जीवन ही मेरा संदेश है, पीछे पतंजली का बैनर लहरा रहा है......कहीं माँझी की तस्वीर के साथ चस्पां है कि - मेरा जीवन ही मेरा संदेश है.....पीछे आम और लीची झूल रहे हैं।........नजीब जंग की तस्वीर के साथ अलग ही प्रभाव उत्पन्न होगा। तब और जब केजरीवाल की तस्वीर के बगल में नजीब जंग की तस्वीर लगी हो और दोनों ही अपने अपने जीवन को संदेशमय बनाने के लिये प्रतिबद्ध दिखें। केजरीवाल लिखें तो जंग मिटायें और जंग लिखें तो उसे केजरीवाल मिटायें। इस सब में बैनर और होर्डिंग की ऐसी तैसी होती रहे तो होण दो। जहां इतना खर्चा चल रहा है तो थोड़ा और सही।

    फिर एक दिल्ली वाले जीतेन्द्र तोमर तो हैं ही। इन दिनों शैक्षिक पर्यटन पर हैं। जहां जाते हैं दरों-दिवारों से, क्लास की बेंच, कुर्सी, डस्टर, कलम सब से खूब हिल मिल रहे हैं। स्कूलों के बच्चे जैसे पहले स्याही फेंक कर खेलते थे, अब भी उनके साथ वैसा ही खेल रहे हैं। कहीं कोई फर्क नहीं। इसलिये और किसी की तस्वीर के साथ यह वाक्य संरचना जमे या न जमे लेकिन जीतेन्द्र तोमर की तस्वीर के साथ यह पंक्ति खूब फबेंगी। ऐसे ही कई और होंगे। मसलन ललित मोदी, राघव, मदेरणा, तिवारी, रेड्डी, करूणा, राजा, कनिमोई, सोमनाथ  सब की अपनी कहानी....सबके जीवन का अपना अलग संदेश। अब यह डिपेंड करता है कि कौन कितना किसके जीवन से प्रभावित होता है, हो पाता है। वैसे एक मनीष सिसोदिया भी हैं। पता ही नहीं चल रहा कि उनके तस्वीर के साथ मेरा जीवन ही....वाली पंक्तियां लिखी जांय तो क्या संदेश निकलेगा। उन से बेहतर तो देश की HRD मंत्री हैं, कम से कम ज्योतिषी को हाथ दिखाती उनकी तस्वीर से देश में कुछ संदेश तो जाता है। कुछ पोथी-पत्राधारकों के बीच वेकेंसियों वाले अच्छे दिनों की आशा का संचार तो होता है।


- सतीश पंचम

Sunday, May 17, 2015

भूगोल सोरठा...विज्ञान गारी सागर....इतिहास काव्य सागर !

   "एक खूबसूरत काला चश्मा उत्खनन के दौरान मिलते ही पुरातत्विदों में हर्ष की लहर दौड़ गई। टीला क्रमांक दस वाले उत्खननकर्ता ने टीला क्रमांक आठ वाले को आवाज दी तो सात और छह वाले भी दौड़े चले आये। बाकी लोग पहले से ही पहुंच चुके थे। इस काले चश्मे के बारे में जब पुरातत्विदों ने खोजबीन की तो पता चला कि चार हजार वर्ष पूर्व इसे पहन कर तत्कालीन प्रधान सेवक ने किसी विदेशी म्यूजियम में भ्रमण किया था। उस पल की तस्वीरें तत्कालीन अखबारों में प्रमुखता से छपी थीं।   वहीं इतिहासकारों के दूसरे धड़े का मानना है कि यह वो चश्मा होकर वो वाला चश्मा है जिसे पहनकर प्रधानसेवक के सामने जाने पर तत्कालीन कलेक्टर को फटकार सुननी पड़ी थी क्योंकि कलेक्टर उस चश्मे में उनसे ज्यादा जंच रहा था।
    वहीं इस चश्मे पर शोध करने वाले पीएचडी शोधार्थियों का मानना है कि धूप का चश्मा लगाने से सामने खड़े व्यक्ति की शक्ल चश्मे में दिखने लगती है.....कोई झेल लेता है तो किसी से वह भी नहीं झेला जाता। संभवत: फटकारे जाने का यही कारण रहा हो। इसके अलावा यदि वस्तुस्थिति को समझते हुए कलेक्टर अपनी मुश्किल बताता कि कैसे प्रधानसेवक के प्रखर तेज से, उनके दैदिप्यमान मुखमंडल से उसकी आँखें चौंधिया रही हैं तो बहुत संभव है अगली बार वह कलेक्टर से 'महाकलेक्टर' के रूप में प्रमोशन पा जाता" !

( ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)
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  इतिहास पढ़ना हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है। बचपन में इतिहास की किताब में छपी किसी तस्वीर को देख घंटों उसके बारे में कल्पनायें किया करता। कोई किला देख लिया तो वहां कल्पना शुरू होती, राजा यहीं से गुजरता होगा, सिपाही, द्वारपाल, घोड़े, हाथी सब यहीं से जाते होंगे, पानी का हौदा रखा जाता होगा, ऊपर गेट से फूल बरसाया जाता होगा, फूल भी ढलान पर उगी झाड़ियों में से मिलते होंगे, राजा को खुद कुछ न करना पड़ता होगा। सब उसके सहचर करते होंगे। फिर लकड़ी के घोड़े वाली तस्वीर देख कल्पना करता कि कैसे उसके भीतर बैठे तीस लोग सांस लेते होंगे, रात भर के लिये यूनानियों ने कैसे उस लकड़ी के घोड़े को किले के बाहर छोड़ा होगा और कैसे उसे खींच खांच कर किले के भीतर लाया गया होगा। रात में सिपाही घोड़े के पेट से निकले होंगे, एक एक पेंच खोला गया होगा, धीरे से बिना आवाज किये सिपाही अंधेरे में उतरे होंगे, बाहर निकल कर किले का दरवाजा भीतर से खोल अपने साथियों को आमंत्रित करते उनके चेहरे पर कैसे कैसे भाव आये होंगे। ऐसी बहुत सी कल्पनाएं थीं जिन्होंने इतिहास पढ़ने में रूचि जगाई।    

   आज भी जब किसी एतिहासिक स्थल पर पहुंचता हूं तो उसे लेकर कल्पनाएं जीवंत हो जाती हैं। मन तरह तरह के कयास लगाने लगता है। भीमबेटका की पाषाणकालिन गुफा संख्या ग्यारह के ठंडे चबूतरे पर लेटे-लेटे यूं लगा जैसे आदिकाल में पहुंच गया हूं। आग जल रही है, धुआँ इन कगारों में औंस कर रह जा रहा है, उसे ऊपर निकलने का रास्ता एक ही ओर से मिल रहा है लेकिन वहां भी जंगली झाड़ी होने से ठीक से निकास नहीं है। धुआँ आँखों में लग रहा है। इस असूझ में सामने से कोई शिकार कंधों पर लादे लिये चला आ रहा है। खाल जल्दी से अलग करना होगा वरना चींटियां लग जायेंगी। राख लेकर खाल के भीतर रगड़ना भी है ताकि खून सूख जाय। धूप में सुखाना होगा, बारिश भी आने वाली है। कितनी सारी मुश्किलें।

    इस तरह की कल्पनिक उड़ान अच्छी लगती है। सहजता से किसी स्थान को अपने साथ नत्थी कर लेता हूं। दिक्कत तब होती है जब इतिहास को तोड़ मरोड़ कर लिखा जाता है और वही पढ़ाया जाता है। धार्मिक और राजनीतिक लाभ हानि के हिसाब से इतिहास को पाल पोस कर बड़ा किया जाता है। किसी राजा को बहुत बड़ा धार्मिक और किसी को उन्माद से प्रेरित घोषित किया जाता है। किसी को धर्म का रक्षक तो किसी को विधर्मी बताकर पाठ्य पुस्तक से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है जबकि ध्यान से पढने पर वही राजा किसी और समय में विपरीत कार्य में लिप्त दिखता है, किसी को हिन्दूओं का संरक्षक कहा जाता है तो अगले ही अध्याय में उसके परिवार के संबंध मुस्लिम बादशाह के साथ नजर आते हैं। बेटी ब्याही जाती है, जागीर ली जाती है। सारा कुछ गड्डम-गड्ड। ऐसे में इतिहास को अपने हिसाब से एडजस्ट करने की कोशिश देख कोफ्त भी होती है। इस कोशिश में क्या मार्क्सवादी, क्या हिन्दूवादी और क्या मुस्लिम। सभी एक दूसरे से बढ़कर हैं। इसका कच्चा चिट्ठा अरूण शौरी ने अपनी किताब में बयां किया है कि कैसे जानेमाने इतिहासकारों ने अपनी मन मर्जी से इतिहास को तोड़ा मरोड़ा, जहां मन आया वहां घपला किया। किताब का नाम है - "Eminent Historians: Their Techniques, Their Line, Their Fraud".

   देखा जाय तो किसी इतिहास की किताब को लिखते समय बहुत ज्यादा सतर्कता, व्यापक दृष्टिकोण और उस काल के हिसाब से मान्यताओं, रूढ़ियों और भौगोलिक स्थितियों पर पैनी नजर रखना चाहिये। लेकिन ऐसा होता कहां है। जिस इतिहासकार की ग्रंथि जिस ओर लिपट जाय वह उसी ओर बढ़ता चला जाता है। पूर्वाग्रह भी कारण हो जाते हैं इस तरह के रायता फैलाने में। कोई बंदा ज्यादा धार्मिक है तो वह इतिहास लिखते वक्त राजा के धर्म को महिमामंडित करना शुरू कर देगा, आदि से लेकर अंत तक वह इसी में मुग्ध रहेगा कि राजा बड़ा धार्मिक था, उसने इतना दान-पुन्न किया, इतने मंदिर बनवाये, इतने कंगूरे, इतने अटारियां, इतने दीपस्तंभ। वह बाकी चीजों पर ध्यान ही नहीं देगा। वहीं जो इतिहासकार कुछ इस्लामिक दुनिया से प्रभावित रहेगा वह लिखते वक्त भी जेहन में शाही टेर के साथ ही लिखेगा। बादशाह को बहुत नफ़ासत और इंसाफपसंद, बाकियों को ऐरू-गैरू समझेगा। इस तरह का लेखन पढ़ने की रौ में तुरंत पकड़ में नहीं आता लेकिन अंदर ही अंदर लगने लगता है कि बंदा किसी खास मानसिकता से लिख रहा है, उसकी बातें संदिग्ध लग रही हैं। यह आभास होते ही आगे कुछ पढ़ना मुश्किल होता चला जाता है और फिर उस इतिहासकार द्वारा चाहे कितना भी विश्वास करने लायक मजबूत तथ्य पेश किया जाय, वह संदिग्ध ही लगता है। एक बार विश्वास उठा नहीं कि फिर हर जानकारी संदेह के दायरे में लगती है।

  फिर हाल फिलहाल के दशकों में राजनीतिक इतिहास लिखवाने-बनवाने की होड़ सी लगी है। जरा सा कोई इधर उधर बताये तो धरना प्रदर्शन और तोड़ फोड़ होने लगती है। इस मामले में हर कोई अपने हिसाब से इतिहास को देखना चाहता है। वह नये तथ्यों को, नई जानकारियों को मानना ही नहीं चाहता क्योंकि ऐसा करने पर उसके राजनीतिक करियर पर असर पड़ सकता है। यही वजह थी कि जब झूठ मूठ का इतिहास गढ़वाने की बयार बहने लगी तो चिढ़कर मैंने अपने हिसाब से तात्कालिक मुद्दों को इतिहास की उत्तर पुस्तिका के रूप में लिखना शुरू किया। उन मुद्दों पर चुटकी लेनी शुरू की जिन मुद्दों को लोग बिना समझे बूझे बस आंख बंद कर मान लेते हैं। वे यह नहीं समझते कि जो कुछ राजनेताओं द्वारा कहा जा रहा है वह वाकई सही है या ऐसे ही शिगूफा छोड़ा गया है। यदि यही चीजें आज से दस साल बीस साल बाद या हजार साल बाद देखी समझी जायेंगी तो क्या निष्कर्ष निकाला जायगा, उन्हें लोग किस रूप में देखेंगे ? दस बीस साल बाद की बात तो छोड़िये, एक ही बात को तुरंत के तुरंत किस रूप में लोग देखते हैं यही अगर समझ लिया जाय तो इतिहास और पुराण, इतने साल, हजार साल का जो बवंडर बो कर रखे हैं वही शांत हो जाय। कम्बख्तों को संसद में बोलते वक्त जुबान भी न लड़खड़ाई कि ज्योतिष के सामने विज्ञान बौना है। तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई उस बंदे को बोलते समय। तिस पर विज्ञान कांग्रेस में लेकर आ गये चालीस इंजनों वाले जहाज की तुकबंदी। पूरी दुनिया में थू थू करवा कर रख  दिये। मिथक और विज्ञान की मनोरम चटनी बनाकर दुनिया के सामने परोस दिये कि यही है हमारी थाती। चख कर देखो। उपर से जिस विभाग से अपेक्षा की जा रही थी कि वह आगे बढ़कर ऐसे लोगों पर लगाम कसेगा, बेसिर-पैर की हांकने पर बंदिश लगायेगा उसी की एक तथाकथित नेत्री जी ज्योतिषी के आगे हाथ पसार अपना भविष्य पढ़वाते नजर आईं। जय हो। इससे आगे क्या सोचना-समझना।

   इन्हीं सब बातों पर, ऐसे चिलगोजों पर कटाक्ष करते हुए यदा-कदा ईसवी सन् 6020 की उत्तर पुस्तिकाएं लिख देता हूं। मनमौजी व्याख्या, चुटकी लेते हुए मुद्दों को परोसने में ऊपर ऊपर से आनंद भले आये लेकिन अंदर ही अंदर एक किस्म की  पीड़ा महसूस होती है। दरअसल कोई भी इतिहास अनुरागी व्यक्ति कभी भी इतिहास को तोड़ना मरोड़ना पसंद नहीं करेगा। वह चाहेगा कि चीजों को उसी अंदाज में, उसी परिप्रेक्ष्य में देखे समझे जिस परिप्रेक्ष्य में वे चीजें इस्तेमाल होती थीं। जिस दौर में वे मान्यताएं प्रचलित थीं। ऐसी हर चीज को ज्यादा से ज्यादा सटीक ढंग से  देखने की चाहत हर इतिहास प्रेमी में होती है। संभवत: यही कारण है कि हर स्टेटस जो ईसवी सन् 6020 की उत्तर पुस्तका के रूप में लिखता हूं, उसे लिखने के बाद अंदर ही अंदर कचोट महसूस होती है। एक तरह का रीतापन, एक बेचैनी सी रहती है। यह बेचैनी वर्तमान को भविष्य के इतिहास के रूप में इंगित करते हुए और ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे में कोशिश रहती है कि इस मौजू इतिहास को लोग पढ़ भर लें, सोचें कि तथाकथित इतिहासकार, धार्मिक उन्माद से ग्रस्त लिखावटों और बनावटी इतिहास लेखन से किस तरह सचेत रहें। इस तरह की सावधानी तब और ज्यादा जरूरी हो जाती है जब चारों ओर मार-काट, हत् तेरे की धत् तेरे की, हमारा धर्म, हमारा न्याय वाली खुशफ़हमियाँ फैली हों।

 - सतीश पंचम 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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