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Sunday, September 28, 2014

प्रकृति विहार

     कभी-कभी जिन पेड़ों को हम बेजान, नीरस, बिना फल-फूल वाला चलता किस्म का मान लेते हैं, समय आने पर वही पेड़-पौधे अपने सुन्दर फूलों, महक और फलों से लदकर हमें चौंका देते हैं। उन्हें देख विश्वास ही नहीं होता कि ये वही पेड़ है जो सिर्फ पत्तों और टहनियों के लिये जाना जाता था। ऐसा ही कुछ अबकी मुंबई के भायखला स्थित बोटॉनिकल गार्डन में देखने को मिला जब कुछ पेड़ों को फल और फूलों से लदा देखा। उन्हीं में से एक पेड़ था कैंडल ट्री। पहले जब कभी उसे देखा एक मझोले आकार का, हरे भरे पत्तों वाला झुटपुटिया पेड़ ही दिखा था। आज भी वह उसी तरह दिख रहा था। ये तो जब उसके नजदीक पहुंचा तो पता चला कि अरे इसमें तो फूल खिले हैं और वो भी डालियों पर, पत्तों के बीच से नहीं बल्कि पेड़ के तनों पर फूल खिले हैं। आसपास देखा, जमीन पर ढेर सारे सफेद फूल झड़ कर गिरे थे। उठाकर एक को सूंघा तो उसमें महक बिल्कुल न थी। यदि थी भी तो एक हल्की सी जंगली फूलों जैसी।

     मेरे सामने जब एक फूल तुरंत ही झड़ कर नीचे गिरा तो ध्यान गया कि इसके तने पर अधखिली कलियां निकल रही हैं। कुछ चींटियां, कुछ कीड़े इन फूलों में बैठे थे। वे भी फूल के साथ नीचे आ गिरे। इसकी जड़ों से लेकर ऊपर की देखा तो तने से कई फूल निकले थे। इतने में फिर एक फूल गिरा। फिर और एक। फूलों के झड़ने की रफ्तार देख लगा कि इस तरह तो ये शाम तक झड़ कर फारिग हो लेगा लेकिन अभी कई कलियां तने से निकल रही थीं तो लगा कि शायद अभी और इसके फूलों का समय बाकी है। इसकी दो चार तस्वीरें खींच आगे बढ़ गया।









      दूसरी ओर एक और पेड़ चौंकाने के लिये तैयार था। यह था Lignum Vitae जिसका अर्थ है The Tree of Life. भारत में इसे क्या कहते हैं पता नहीं।

इन पेड़ों की महीन पत्तियां बहुत आकर्षित करती हैं। पहले इसके हल्के बैंगनी रंग के फूलों को झड़ते देखा था। उनमें भीनी-भीनी खुशबू थी। बाद में जब झड़-झूड़ कर फूल खत्म हो गये तो काफी समय तक ये छोटे, हरे पत्तों से अटा पड़ा रहा। धीरे-धीरे चलती हवा में इसका हिलना-डुलना देखते ही बनता है। उन्हीं पत्तों को करीब से देखने उनकी छांव से गुजर रहा था कि एक जगह निगाह अटक गई। छोटा सा केसरी रंग का कुछ फल जैसा दिखा। फल भी ज्यादा बड़ा नहीं, बस ईमली के बीज की तरह का। ऊपर हाथ नहीं पहुंच रहा था सो नजरें जमीन पर उसके गिरे फलों को ढूंढने लगीं। घास में एक जगह उसके फल दिखे तो उठा लिया। महक कुछ खास नहीं थी। एक फटे फल में लाल रंग का बीज दिखा।

    एक साबुत फल वहीं नीचे गिरा था। उसे उंगली से दबाव देकर फोड़ा तो पूरा हाथ लिसलिसा गया। उंगलियां चिपकने लगीं। गोंद बहुत जबरदस्त किस्म का था। वहीं पत्तियों में उंगलियों को पोंछ-पांछकर हाथ साफ किया तो राहत मिली। गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि इसकी लकड़ी सबसे ज्यादा भारी किस्म की होती है जिसे पानी में डुबोने पर अन्य लकड़ियों के मुकाबले तुरंत ही डूब जाती है। इसमें कीड़े भी जल्दी नहीं लगते।

 
वहां से आगे बढ़ा तो एक बरगद का पेड़ पीले फलों से
लदा-फदा नजर आया। उसका नाम देखा तो वह था - Mysore Fig. ढेर सारे पतंगे जिन्हें हम हेलिकॉप्टर कीड़ा कहते हैं उसके फलों के आसपास मंडरा रहे थे। वहीं करीब ही तालाब का पानी सूरज की रोशनी में चमचमा रहा था।

     ठहर कर उसकी टहनियों, पत्तों को देखा तो पानी की झिलमिल रोशनी उसकी घनी छांव में होते हुए टहनियों पर पड़ रही थी। देखने में ऐसे लगता था जैसे टहनियों में एक किस्म का प्रवाह हो रहा हो। जड़ों से होते हुए ऊपर फुनगी की ओर। पानी की यह झिलमिल चमक बहुत अच्छी लग रही थी। थोड़ी देर और ठहर कर उसका आनंद लिया। जमीन पर गिरे Mysore Fig के फल को फोड़ कर देखा तो वह गूलर की तरह दिखा। हां, इसमें कीड़े नहीं थे वरना गूलर में अक्सर कीड़े देखे हैं जिन्हें गांव-गिरांव में लोग ये समझ कर खाते थे कि इसके खाने से आंखों की रोशनी तेज होती है।


 



          इन्हीं सब पेड़-पौधों के बीच से होता हुआ आगे बढ़ते रहा। प्रकृति को अचंभित हो देखता रहा। वैसे इन पेड़ पौधों को कई बार आ-आकर देखा है लेकिन मन नहीं भरता। इन्हें जितनी बार देखता हूं कहीं न कहीं चौंका देते हैं। पिछली बार देखा था तो एक पेड़ था - Elephant ear pod Tree. तब खूब बारिश हो रही थी। ऐसे में एक विशेष बात दिखी थी कि इसके तने से ढेर सारा पानी तेजी से नीचे बह रहा था जबकि वहीं आस-पास के बाकी पेड़ों से पानी बहुत धीरे-धीरे रिस रहा था। बगल का महुए का पेड़ उतनी तेज बारिश में भी सुस्त नजर आ रहा था। उसका इस तरह तेज पानी गिराना हैरान कर देने वाला नजारा था। आज जब ध्यान से देखा तो उस पेड़ के तने पर ऊपर से नीचे की ओर महीन नालियों जैसी धारी बनी हुई थी। संभवत: इन्हीं धारियों को पकड़े-पकड़े समूचा पानी सीधे तने की ओर बढ़ता था और इकट्ठे होकर तेजी से पानी बहाता था। मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी वरना इसकी धारियों का चित्र लेता। अगली बार जाने पर फिर इससे दुई-चार होकर तस्वीर खेंचूंगा।


- सतीश पंचम


Update :-  अभी अपने द्वारा खेंचे गये Images चेक किया तो वहां 26 अप्रैल 2014 की खेंची इसी पेड़ की (Elephant ear pod ) धारियों वाली छवि मिल गई। जब फोटो खेंचा था तब सिर्फ नेम प्लेट के लिये खेंचा था लेकिन अब ध्यान दिया तो नेम प्लेट के आस-पास वे वर्टिकल धारियां भी नजर आ गईं । यह रहा वह चित्र।


Saturday, September 13, 2014

मछली, मकड़ी और पीपल

   कहीं सुदूर वन-प्रांतर में नदी किनारे पीपल के पेड़ की झुकी टहनी से पत्तियां पानी से ऊपर हिल-डुल रही हैं। चांदनी रात की झिलमिल में मछलियां, घोंघे उस हिलती-डुलती परछाईं को संशय की नजर से देख रहे हैं। पहले भी कई बार शुभ्र, उज्जवल रातों को इस तरह की परछाईयां सतह के करीब दिखाई दी हैं लेकिन ये वाली परछाईं तो कुछ ज्यादा ही गहरी लग रही है।

उधर नई-नकोर मछलियों के एक झुण्ड ने मन बना लिया है कि सतह के करीब पहुंच कर उस चीज को पकड़ा जाय। काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी सिवाय परछाईं पीने के वे कुछ कर नहीं पा रही थीं। उधर पीपल की टहनी उन मछलियों की इस नादानी पर हंस रही है। उसके पत्ते हवा में यूं लहरा रहे थे मानों ताली बजा रहे हों

उधर दूसरी टहनी से लटकती मकड़ी हवा में हिल डुल रही है। वह भी परेशान थी। जाला तो बरगद के पेड़ पर बना रही थी लेकिन पीपल और बरगद इतने सटे थे कि पता ही न चला कब बरगद खत्म हुआ और कब पीपल शुरू ? ऐसे में उलझे पेड़ों की परवाह न कर मकड़ी ने जाला बुनना शुरू किया और अब हाल यह है कि तेज हवा में बरगद तो वैसे ही रहा लेकिन पीपल ने साथ छोड़ दिया। जरा सी हवा चली नहीं कि हिलने-डुलने खड़खड़ाने लगता।

इसी हालात की मारी मकड़ी एक तांत पकड़े-पकड़े सतह से कुछ ऊपर लटक रही है और नीचे मछलियां ऊभ-चूभ हो रही हैं। मकड़ी ऊपर को जाना चाहती है लेकिन तेज हवा से ठहरना पड़ रहा है। पीपल की झुकी टहनी लहरा कर मकड़ी की ओर जाते हुए उसे ऊपर लेने का मन बना रही है लेकिन मकड़ी बार-बार हवा में लहरा रही है। तांत अब टूटा कि तब टूटा।

और तभी अचानक पानी में बहती किसी बड़ी झाड़ी से मकड़ी टकराई। सहारा पाते ही मकड़ी ने तांत छोड़ दिया और बहती झाड़ी पर धीरे से उतर गई।

भीतर पानी में तैरती मछलियां बहती झाड़ी को कोस रही थीं। कहां तो टकटकी बांध कर परछाईं पी रही थीं, मकड़ी को लटकते उसका करतब देख रही थीं और एक बहती झाड़ी ने अचानक सारा कुछ बिगाड़ दिया।

- सतीश पंचम

( मेरे फेसबुक पेज की  #कल्पना सीरीज़ पोस्ट) 


Saturday, September 6, 2014

कल्पना....

   
     महुए के नीचे गीली जमीन पर सरकता घोंघा किसी नुकीली दूब के छू जाने पर ठहर गया है। करीब ही गिरा सूखा पत्ता  घोंघे के यूं ठिठकने पर मन ही मन हंस रहा है।

और दूब ? अपने नुकीलेपन पर बेचारी दुखी है। उसने जान बूझकर घोंघे की लिजलिजी त्वचा को नहीं छुआ था, वह जहां थी वहीं रही, बल्कि यह घोंघा ही था जो सरकते-सरकते उसकी ओर बढ़ आया। इतने पर भी गनीमत होती यदि घोंघे का ऊपरी खोल दूब को स्पर्श करता। न जाने किस धुनकी में चल रहा था कि अपने नर्म पेट को ही नुकीले हिस्से से छुआ बैठा।

उधर घोंघा मन ही मन कुढ़ रहा था। उसे अंदर से लग रहा था कि दूब ने जान बूझकर अपना नुकीला हिस्सा स्पर्श कराया है।

इन सब मामलों से अनजान एक बच्चा तितली के पीछे पड़ा है। वह उसे पकड़ना चाहता है लेकिन तितली है कि उड़े जा रही है। बैठती है, फिर उड़ती है। अबकी जो उड़ी तो दूब की ओर ही बढ़ी चली आ रही थी। इस दौड़ भाग को देख सूखे पत्ते के मन में आशंका हुई कि कहीं बच्चा इस ओर आ गया तो घोंघे को कुचल देगा, दूब परेशान कि कहीं तितली उस पर बैठे हुए पकड़ी गई तो नाहक लोग उसे ही दोषी मानेंगे। इन सबसे अनजान घोंघा रास्ता बदल कर जाने लगा तो अचानक बही तेज हवा के चलते सूखा पत्ता उड़कर उसके और करीब आ गया। सूखे पत्ते को यूं पलटते देख अचानक तितली ने उड़ान बदली और तिरछे होकर झरबेरियों की ओर उड़ चली।

सूखे पत्ते ने फुसफुसाते हुए घोंघे से कहा - "लगता है तितली ने तुम्हें देख लिया था इसलिये तुम्हें रौंदने से बचाने के लिये ही उसने रास्ता बदल दिया"।

लेकिन घोंघे को इन सब से क्या ? वह भारी कदमों से दूब की चुभन और उसकी दुष्टता को कोसे चला जा रहा था। "संभलकर चलने" की दूब की ताकीद भी उसे सुनाई नहीं दी।

उधर तितली पकड़े बच्चा इसी ओर बढ़ा चला आ रहा था। अबकी न तो हवा बही, न तो सूखे पत्ते में हरकत हुई, बस एक अंदेशा बना रहा। घोंघा अब कुचला, तब कुचला....।

 - सतीश पंचम

( मेरी फेसबुकिया #कल्पना पोस्ट)



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