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Friday, October 24, 2014

काला धन उत्खनन वाया पुरातात्विक छन्नी

   पुरातत्विदों को हाल ही उत्खनन के दौरान ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि चार हजार वर्ष पूर्व लोगों में 'शर्मिंदगी' के लक्षण पाये जाते थे। कालांतर में परिस्थितियों के बदलाव के चलते यह लक्षण एकाएक ऊफान पर आ गया और लोग बात-बात पर शर्मिंदा होने लगे थे। इस दौर की पुष्टि हेतु इतिहासकारों ने तत्कालीन किसी मंत्री के वक्तव्यों को उद्धृत किया है जिसके तहत मंत्री को यह कहते पाया गया कि - "यदि हमने काला धन वाले नामों को उजागर कर दिया तो अमुक दल के लोग शर्मिंदा होंगे"। आगे जाकर इसके प्रत्युत्तर में किसी अन्य नेता की ललकार का प्रमाण है जिसके तहत ललकारने वाले नेता का कहना था कि "यदि तुममे 'हिम्मत' है तो सभी काला धन वालों के नाम बताओ".

   इस हिसाब से देखा जाय तो चार हजार वर्ष पूर्व 'हिम्मत' नाम की भी कोई चीज थी अन्यथा ललकारने वाले नेता द्वारा 'यदि' जैसी शब्दावली का प्रयोग न किया जाता। बहुत संभव है कि हिम्मत नामक चीज चार हजार वर्ष पूर्व लुप्त हो गई हो और शर्मिंदगियों की बहुतायत सी हो गई हो।  
  
  वहीं इस विषय पर पीएचडी करने वाले छात्रों का मानना है कि दरअसल चार हजार वर्ष पूर्व हिम्मत जैसी चीज की बहुलता थी और शर्मिंदगी विलुप्ति के कगार पर थी  जिसकी पुष्टि इससे भी होती है कि तत्कालीन किसी मंत्री की संपत्ति पांच महीने में दस करोड़ से ज्यादा बढ़ गई थी और उसे वह खुलेआम स्वीकार भी कर रहा था। संभवत: इसके पीछे तत्कालीन समाज व्यवस्था में सच्चाई का बोलबाला होना भी था। लोग झूठ बोलने से बिल्कुल बचते थे। यदि बहुत जरूरी हुआ तो झूठ की बजाय सीधे गप से काम चलाते थे। ऐसी ही किसी गप की आड़ में पहले कहा गया कि हमारी सरकार आई तो धारा तीन सौ सत्तर हटा देंगे, किंतु जब मामला खुला तो पता चला कि 'धारा तीन सौ सत्तर' की बजाय तीन सौ सत्तर एकड़ 'धरा' की बात हो रही थी जिसे कि किसी उद्योगपति के नाम आबंटित कर दिया गया था। 

  इससे पुष्टि होती है कि चार हजार वर्ष पूर्व यह देश हिम्मत प्रधान देश था। लोग बेहद हिम्मती थे। जब-तब खाते पीते हिम्मत दिखाते थे। यहां तक कि ट्रेन के सफर में 'तत्काल प्रिमियम' जैसी महंगी सेवा का लाभ उठाने से भी नहीं चूकते थे। जहां तक होता महंगे टिकटों को खरीदने की हिम्मत कर ही लेते थे। यदि नहीं थी तो विलुप्त हो चुकी शर्मिंदगी महसूस करने जैसे गुण जिसे किसी भी हाल में बचाये रखना जरूरी था किंतु जिसे बचाया न जा सका। अंतत: उसके साक्ष्य केवल अभिलेखों और उत्खननों में ही उपलब्ध हैं।

( ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )

- सतीश पंचम

3 comments:

classic cinematographer said...

इस व्यंग के लिये आपको बधाई। और आने दीजिये।

BS Pabla said...

हा हा

पटक मारा सबको

Ashutosh Upadhyay said...

अत्यंत सौम्य भाव से प्रस्तुत कटाक्ष

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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