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Saturday, September 6, 2014

कल्पना....

   
     महुए के नीचे गीली जमीन पर सरकता घोंघा किसी नुकीली दूब के छू जाने पर ठहर गया है। करीब ही गिरा सूखा पत्ता  घोंघे के यूं ठिठकने पर मन ही मन हंस रहा है।

और दूब ? अपने नुकीलेपन पर बेचारी दुखी है। उसने जान बूझकर घोंघे की लिजलिजी त्वचा को नहीं छुआ था, वह जहां थी वहीं रही, बल्कि यह घोंघा ही था जो सरकते-सरकते उसकी ओर बढ़ आया। इतने पर भी गनीमत होती यदि घोंघे का ऊपरी खोल दूब को स्पर्श करता। न जाने किस धुनकी में चल रहा था कि अपने नर्म पेट को ही नुकीले हिस्से से छुआ बैठा।

उधर घोंघा मन ही मन कुढ़ रहा था। उसे अंदर से लग रहा था कि दूब ने जान बूझकर अपना नुकीला हिस्सा स्पर्श कराया है।

इन सब मामलों से अनजान एक बच्चा तितली के पीछे पड़ा है। वह उसे पकड़ना चाहता है लेकिन तितली है कि उड़े जा रही है। बैठती है, फिर उड़ती है। अबकी जो उड़ी तो दूब की ओर ही बढ़ी चली आ रही थी। इस दौड़ भाग को देख सूखे पत्ते के मन में आशंका हुई कि कहीं बच्चा इस ओर आ गया तो घोंघे को कुचल देगा, दूब परेशान कि कहीं तितली उस पर बैठे हुए पकड़ी गई तो नाहक लोग उसे ही दोषी मानेंगे। इन सबसे अनजान घोंघा रास्ता बदल कर जाने लगा तो अचानक बही तेज हवा के चलते सूखा पत्ता उड़कर उसके और करीब आ गया। सूखे पत्ते को यूं पलटते देख अचानक तितली ने उड़ान बदली और तिरछे होकर झरबेरियों की ओर उड़ चली।

सूखे पत्ते ने फुसफुसाते हुए घोंघे से कहा - "लगता है तितली ने तुम्हें देख लिया था इसलिये तुम्हें रौंदने से बचाने के लिये ही उसने रास्ता बदल दिया"।

लेकिन घोंघे को इन सब से क्या ? वह भारी कदमों से दूब की चुभन और उसकी दुष्टता को कोसे चला जा रहा था। "संभलकर चलने" की दूब की ताकीद भी उसे सुनाई नहीं दी।

उधर तितली पकड़े बच्चा इसी ओर बढ़ा चला आ रहा था। अबकी न तो हवा बही, न तो सूखे पत्ते में हरकत हुई, बस एक अंदेशा बना रहा। घोंघा अब कुचला, तब कुचला....।

 - सतीश पंचम

( मेरी फेसबुकिया #कल्पना पोस्ट)



1 comment:

प्रतिभा सक्सेना said...

हर समय कुछ न कुछ चलता रहता है यहाँ - दर्शक बन जाने का भी अपना आनन्द !

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