सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, December 21, 2014

बांसपत्र, नागकेसर, चील दम्पत्ति.....प्रकृति यात्रा

 
 बोटानिकल गार्डन में घूमते हुए बांस के झुरमुटों पर नजर पड़ी तो मन लहक गया। बचपन से ही हरे-हरे बांस मुझे बहुत लुभाते हैं। उनके झुरमुटों के बीच कभी सांप-बिच्छुओं से बचते-बचाते घुस जाओ तो मन हरियर हो जाता है। कहीं कोई नन्हीं सी चिड़या उन बांस के झुरमुटों के बीच फुदकती नजर आती है तो कभी कोई अनचिन्हे किस्म का पक्षी छहांता नजर आता है। पक्षी न दिखें तब भी उन झुरमुटों में किसी न किसी तरह की आवाजें आती ही रहती है। न भी हों तो बांस के सरसराते पत्ते तो हैं ही। दुपहरी में जब तेज हवा चलती है तो ये बांस ही हैं जो उनके आने की सबसे पहले सूचना देते हैं। फिर ये बांस भी सीधे नहीं उगते। टेढ़े-मेड़े, झुके-लदे, आपस में फंसे-कसे जैसे उनमें रगड़-धगड़ सी चलती रहती है। कभी दो बांस आपस में टकराना शुरू करते हैं तो जो आवाजें निकलती हैं, वे कभी-कभी उनके आपसी मनमुटाव का आभास देते हैं। रह रहकर चिर्रर-चूं...कर्र-चूं की ध्वनि। फिर बांसों की इन लगातार रगड़ से लकड़ी का तापमान बढ़ता जाता है, हरे बांस धीरे-धीरे एक ही जगह रगड़ खाकर सुलगना शुरू करते हैं। गर्मी के मौसम में तेज लू वाले थपेड़ों के बीच कई बार इन बांसों के कारण ही आग लगते देखा गया है। नीचे गिरी सूखी पत्तियां तो हैं ही इस दावानल में घी का काम करने के लिये। सो देखते ही देखते समूचा जंगल चट् चट् की ध्वनि करता धधक उठता है।

    इधर गाँवो में अब बाँस सिर्फ शादी-ब्याह, मरनी-करनी या किसी फूस की मड़ैया आदि के लिये ही काटे जाते हैं वरना एक समय था कि दरवाजे पर लगी चचरी से लेकर छत तक में बांस ही बांस नजर आता था। कच्चे घर के भीतर पहुंचते ही नये कटे बांसों की टटकी महक से मन सुरभित हो जाता था। मकानों के निर्माण में आज भी बांस का इस्तेमाल होता है लेकिन कम। पहले की तरह नरिया-थपुआ वाला जमाना नहीं रहा। अब तो गर्डर पटिये का जमाना है, एक तरह से अच्छा है। इसी बहाने हरियरी बची रहेगी। लेकिन उतने से ही बांसों का कहां छुटकारा होगा। अब तो बांस ही नहीं बचते। जहां थोड़ी सी जगह मिली नहीं कि वहां कुछ निर्माण कर दिया गया। ऐसे में बांसों की हरियरी दिख जाय तो मन खुद ब खुद उनमें अटक जाता है। फिर यहां बंबई में तो इस नजारे को देखना और दिलचस्प बना देता है। ऊपर से उन बांसों में लटकते ढेर सारे चमगादड़। उनके खुलते, बंद होते पंखों को देख ऐसा लगा जैसे बांस की सरसराती पत्तियों के साथ वे भी ताल दे रहे हों। 

    उन बांसों को निहारते हुए क्षण भर बीता कि नजर बाँस के इर्द-गिर्द अटके सूखे चौड़े पत्तों पर पड़ी। ऐसा लगा जैसे बाँस किसी साँप की तरह केंचुल उतार रहे हों। नीचे गिरे एक सूखे चौड़े पत्ते को उठाकर छुआ तो बहुत मोटा और कड़ा लगा। उसका आकार और रंग देखकर एकबारगी सूखे भोजपत्रों का एहसास हुआ। चूंकि इसे सामने ही बाँस में अटके देखा था सो पता था कि बाँस का छिलका है वरना अचक्के में देखने पर भोजपत्र तो कह ही सकता था। नाखूनों से दबाया तो सूखा पत्ता चटक गया। जाहिर है अंदर की नमी सूख गई थी वरना बाँस इसे अपने से अलग क्यों करता ? कुछ ऐसा ही स्वभाव इंसानों में भी होता है। जब तक रिश्ते में आपसी नमी बनी है, तब तक स्नेह से जुड़े हैं, जहाँ शुष्कता आई कि विलग हो लिये इस बाँसपत्र की तरह।

  उधर बाँस के झुरमुटों के करीब ही नागकेसर के ढेर सारे पेड़ नजर आये तो उनकी ओर बढ़ लिया। नागकेसर, जिसे Ceylon Iron Wood भी कहा जाता है में सफ़ेद फूल खिले थे। भीनी-भीनी खुशबू वाले वे फूल बहुत तो नहीं लेकिन इक्का-दुक्का कहीं नजर आ रहे थे। उनके पास ही ढेर सारे नागकेसर के फल भी दिखे। कुछ ऊंचाई पर होने से जब हाथ न लगे तो नीचे जमीन पर ढूंढा। घास में एक जगह उसके बीज दिख गये। हरा फल भी दिखा। उस हरे फल तो दांतों से चीर दिया तो स्वाद कुछ कसैला लगा। भीतर तीन बीज आपस में चुक्की-मुक्की मारे बैठे थे। जमीन पर गिरे बीज कत्थई रंग के थे। ये वाले सफ़ेद हरियरी लिये थे। शायद पक जाने के कारण बीज कत्थई हुए हों। एक बार P N Subramanian जी ने बताया था कि इस नागकेसर की लकड़ी बहुत कड़ी और मजबूत होती है। इसे काटने-छीलने के लिये भी विशेष धार और मजबूती वाले औजार लगते हैं। छोटा सा नागकेसर लकड़ी का बना हाथी भी दस बारह हजार का मिलता है। इस लिहाज से देखा जाय तो एक भरा-पूरा नागकेसर वृक्ष लाखों की कीमत  रखता होगा। नेट पर चेक किया तो एक छोटे से हाथी की कीमत 599 डॉलर दिखी। कुछ और नन्हे आकार के दिखे जिनके कीमत 60 डॉलर के आसपास दिखी।

  पास ही एक पेड़ पर तोतों की टांय-टांय सुनाई दी। ढेर सारे तोते किसी पेड़ पर जमा थे। न वहां कोई फल था न फूल, कुछ नहीं। सिर्फ जमा होकर टांय-टांय करे जा रहे थे। पास ही एक बरगद के ऊंची फुनगी पर चील बैठती दिखी। उसे देखने से लग रहा था जैसे वह ठीक से जगह न मिलने के कारण बैठ नहीं पा रही हो। हवा में कुछ देर पंखों को फैलाये रखने के बाद फड़फड़ाते हुए चील उड़ी तो पता चला वहां चीलिन बैठी है। अनजाने में चील दम्पत्ति की रतिक्रिया देख बैठा। उधर से नजरें हटाया तो सामने सप्तपर्णी के पेड़ पर किसी अनजानी चिड़िया की आवाज सुनाई दी। कुछ देर देखने के बाद भी कहीं कुछ पता न चला कि कौन सी चिड़िया है, किस ओर से बोल रही है। मन ही मन हंसा कि चिड़िया मेरा ध्यान खेंच रही है ताकि चील दम्पत्ति पर दृष्टिपात न कर सकूं। उधर चील महाराज आसमान में एक गोल दायरा बनाकर धीरे-धीरे उड़ रहे थे, चीलिन अब भी बरगद की फुनगी पर बैठी थी।

जारी....

- सतीश पंचम

    

Sunday, December 14, 2014

कुमकुम, गम्बोज, बिब्बा, महुआ संग प्रकृति विहार

       इस बार मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में जाने का मेरा एक खास उद्देश्य था। मन
कुमकुम का खोखला पेड़
में था कि कुमकुम के पेड़ पर लदे सिंदुरी फूलों को देखा जाय। इसके पीछे राहुल सिंह जी का वह फेसबुक स्टेटस था जिसमें उन्होंने अपने यहां सिंदुरी फूलों के खिलने का चित्र दर्शाया था। उसे देखते ही लगा कि ये कुमकुम के पेड़ की बात हो रही है। पूछ-पछोर के बाद मन बना लिया कि अगले दिन जाकर मुंबई के बोटॉनिकल गार्डन में देखा जाय कि यहां वाले पेड़ में भी फूल खिले हैं या नहीं ? जाने पर निराशा हाथ लगी। उसमें एक भी फल-फूल नहीं था। हां, कुछ पत्तियां थीं वो भी पेड़ के बिचले हिस्से में। ऊपर फुनगी के सभी पत्ते झड़ चुके थे। वैसे भी वह कुमकुम का पेड़ खोखला था। उम्मीद कम ही थी, सो ज्यादा निराश नहीं होना पड़ा। फिर इस प्रकृति को निहारते समय जब-जब उद्देश्य लेकर पहुंचा हूं, प्रकृति ने चौंकाया ही है। जिस पेड़ को बिल्कुल बेजान समझ कर ध्यान नहीं देता था, अगली बार जाने पर वही पेड़ फलों-फूलों से लदा नजर आता था। जिसे बहुत फलदार, फूलों वाला मानता था वह अगली बार बेजान नजर आता था। ऐसा कई बार हो चुका है, इसलिये किसी भी पेड़ को बेकार, बहुत फलदार या जंगली मानने को अब जल्दी दिल नहीं चाहता। जानता हूं कि समय आने पर उसमें भी फल लगेंगे। फूलों की बहार होगी। अभी सिर्फ पत्ते नजर आ रहे हैं, तो आ रहे हैं। फिर ऐसे भी पेड़ों से पाला पड़ा जिसमें कई-कई महीनों तक एक पत्ता तक नजर नहीं आया था। मणिमोहर ऐसा ही पेड़ है। उसे जब देखा बिना पत्तों के देखा। न उसमें फूल खिलता न कुछ...सिर्फ ठूंठ सा खड़ा रहता तब भी जंगली लतायें, उसे घेरे रहतीं। कई महीनों तक उसे यूं ही नजरअंदाज कर निकलता रहा। एक दिन देखा उसमें छोटी छोटी पत्तियां निकल रही हैं। तब बहुत हैरानी हुई थी। लेकिन अब नहीं होती।
ऑप्टिकल ब्राईटनेस से लबरेज़ पत्तियां
       
  आगे बढ़ा तो मैसूर गंबोज के पेड़ से पाला पड़ा। उसका कच्चा फल नीचे जमीन पर गिरा था। सुबह का समय होने से अभी तक झाड़ू मारने वाले कर्मचारी वहां तक नहीं पहुंचे थे। वैसे भी बोटॉनिकल गार्डन में सुबह के एक घंटे के समय को मैं गोल्डन हॉवर मानता हूं। उस एक घंटे में जमीन पर गिरे पत्ते, फलियां, फूल, टहनी बहुत सी जानकारी देते हैं। जिन फलों तक हाथ नहीं पहुंचता या फूलों को सूंघने के लिये मशक्कत करनी पड़ती है वे जमीन पर गिरे मिलते हैं। जिन पत्तों को मसल कर उनकी महक, उनके स्पर्श का अनुभव लेना होता है वह आसानी से मिल जाते हैं। गिरे हुए डंठल को हाथ में लेकर उसकी नमी, उसका भार या खुरदरेपन का अंदाजा बखूबी मिल जाता है वरना किसी पेड़ के पत्ते को छूने भर से वहां मौजूद कर्मचारी नाराजगी जताते हैं। फिर सुबह के समय माहौल भी खुशनुमा रहता है। सूरज की तिरछी रोशनी में पक्षियों की चह-चह जमकर होती है। ताजी हवा में फूल-पत्तों की महक खूब मिलती है। तब तिरछी धूप में पेड़ों के पत्ते विशेष अंदाज में चमकते नजर आते हैं। ऑप्टीकल ब्राइटनेस उफान पर होता है। फिर ऐसे समय में पत्तों के झड़ने में भी एक खास किस्म की विशेषता नज़र आती है। दिन भर तो पत्ते एक-एक कर झड़ते ही रहते हैं लेकिन सुबह के समय यह रफ्तार तेज होती है और उसी समय उनके गिरने, घूमकर जमीन को स्पर्श करने, झरझराकर एक साथ ढेर सारे पत्तों द्वारा टहनी छोड़ने का अंदाज देखने लायक होता है। ऐसे ही समय में पहुंचा था, सो जमीन पर गिरे मैसूर गम्बोज के कच्चे फल मिल गये।

मैसूर गम्बोज का पीला-चिपचिपा दूध
    उन्हें उठाकर हाथ में लिया, दबाया, सूंघा...कुछ खास पता नहीं चल रहा था। तभी नाखूनों से थोड़ा सा हिस्सा कुचला तो भीतर से गाढ़े, पीले रंग का चिपचिपा दूध निकल आया। उस दूध को सूंघा तो उसमें भी कोई महक नहीं। हिम्मत करके दांत से फल को चीर दिया। कसैला स्वाद। पके फल का स्वाद कुछ और होता होगा। फिलहाल तो कच्चा था, सो उसी तरह का स्वाद भी होना लाजिमी है। एकाध फोटो शोटो खेंचकर फल को वहीं फेंक आगे बढ़ा। हाथ में चिपचिपाहट बनी रही। उधर लोगों का आना जाना शुरू हो गया था। किसी स्कूल के बच्चों की पूरी कतार आ गई। उन्हें आगे का रास्ता देकर इत्मिनान से आसपास का नजारा लेता रहा। येलो वुड ट्री की लकड़ियां काली-पीली रंगत लिये नजर आईं। देवरस के  पेड़ से लटकते झालरों से छोटे-छोटे लाल फूल झड़ते दिखे। नोनी के फल छोटे-कच्चे नजर 
आ रहे थे।
Marking Nut (बिब्बा / भिलांवा / भल्लातक) के बीज


    आगे जाने पर  नजर मार्किंग नट / बिब्बा जिसे हिंदी में भल्लातक (भिलावा) भी कहा जाता है, के पेड़ पर गई। उसके पत्तों के बीच कुछ फल सा नजर आया तो तुरत-फुरत करीब पहुंचा। इससे पहले उसमें फलियां लगे नहीं देखा था। एक तो उसकी बनावट ऐसी कि बगल में खड़े सागौन के वृक्ष और उसमें ज्यादा फर्क नजर नहीं आ रहा था, दूसरे उसे जब देखा तब ठिगना, अलसाया सा ही देखा है। न ज्यादा हरकत न कुछ। उसमें लगी फलियां थोड़ी उंची थीं, सो जमीन पर नजर दौड़ाई। घास में एक सूखी फली दिख गई। उसे उठाया, खोला, पंखुड़ी अलग की, रेशे साफ करते-करते उसके महीन कण मैसूर गम्बोज से निकले पीले चिपचिपे दूध वाले हाथ में लग गये और फिर रगड़ते ही हाथ साफ। अब चिपचिपाहट का नामो निशान नहीं। आनंद आ गया इस तकनीक पर। फिर ध्यान दिया मार्किंग नट के बीजों पर। उसके रेशों को कुरेदते-कुरेदते भीतर से आँवले के बीज सरीखा एक सख़्त हिस्सा निकला। संभवत: उसी सख़्त बीज को किसी प्रक्रिया द्वारा काम में लाया जाता है। पहले धोबी उसी बीज से कपड़ों पर निशान बनाते थे इसलिये भी उसे मार्किंग नट कहा जाता है। 

महुआ
  वहां से आगे बढ़ा तो अपने उस कैंडल ट्री को देखता गया। सफ़ेद, गंधहीन फूल उसमें से अब भी निकल-निकल कर चू रहे थे। दो कौवे उसकी टहनी पर नजर आये। मेरे करीब पहुंचते ही उड़ गये। वहां से तेजी से चलते हुए महुए के पेड़ के पास पहुंचा। पता चला कि अभी-अभी उसके नीचे सफाई हो चुकी है। थोड़ा आस-पास नजर दौड़ाने पर सूखे महुए का हिस्सा मिला। मसल कर उसकी महक लिया तो दिल खुश ! एकदम टटकी महुआ महक। कई साल हो गये महुए की महक लिये। आज फिर उस खुशबू से रूबरू हुआ। वहीं खड़े होकर आसपास देख ही रहा था कि सेमल की रूई जमीन पर अटकी दिखी। तुरंत उठा लिया। 
   
सेमल का फरफराता बीज
फरफराते, महीन रेशे देखकर लग रहा था जैसे उस सेमल के बीज में जान हो। छोड़ा तो उड़ जायगा। उस बीज को वहीं उंगलियों से मसला तो सारे रेशे सिकुड़ कर बत्ती बन गये। अब रेशों में वह हरकत न रही। शांत हथेली पर पड़े रहे। नीचे जमीन से उठाकर दूसरे सेमल बीज को हथेली पर रखा, उसे भी मसला तो वह भी बत्ती। कुल मिलाकर उनका आकार कुछ यूं हो गया कि दिये में बाती के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।
सेमल बाती

जारी....


- सतीश पंचम

Friday, October 24, 2014

काला धन उत्खनन वाया पुरातात्विक छन्नी

   पुरातत्विदों को हाल ही उत्खनन के दौरान ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि चार हजार वर्ष पूर्व लोगों में 'शर्मिंदगी' के लक्षण पाये जाते थे। कालांतर में परिस्थितियों के बदलाव के चलते यह लक्षण एकाएक ऊफान पर आ गया और लोग बात-बात पर शर्मिंदा होने लगे थे। इस दौर की पुष्टि हेतु इतिहासकारों ने तत्कालीन किसी मंत्री के वक्तव्यों को उद्धृत किया है जिसके तहत मंत्री को यह कहते पाया गया कि - "यदि हमने काला धन वाले नामों को उजागर कर दिया तो अमुक दल के लोग शर्मिंदा होंगे"। आगे जाकर इसके प्रत्युत्तर में किसी अन्य नेता की ललकार का प्रमाण है जिसके तहत ललकारने वाले नेता का कहना था कि "यदि तुममे 'हिम्मत' है तो सभी काला धन वालों के नाम बताओ".

   इस हिसाब से देखा जाय तो चार हजार वर्ष पूर्व 'हिम्मत' नाम की भी कोई चीज थी अन्यथा ललकारने वाले नेता द्वारा 'यदि' जैसी शब्दावली का प्रयोग न किया जाता। बहुत संभव है कि हिम्मत नामक चीज चार हजार वर्ष पूर्व लुप्त हो गई हो और शर्मिंदगियों की बहुतायत सी हो गई हो।  
  
  वहीं इस विषय पर पीएचडी करने वाले छात्रों का मानना है कि दरअसल चार हजार वर्ष पूर्व हिम्मत जैसी चीज की बहुलता थी और शर्मिंदगी विलुप्ति के कगार पर थी  जिसकी पुष्टि इससे भी होती है कि तत्कालीन किसी मंत्री की संपत्ति पांच महीने में दस करोड़ से ज्यादा बढ़ गई थी और उसे वह खुलेआम स्वीकार भी कर रहा था। संभवत: इसके पीछे तत्कालीन समाज व्यवस्था में सच्चाई का बोलबाला होना भी था। लोग झूठ बोलने से बिल्कुल बचते थे। यदि बहुत जरूरी हुआ तो झूठ की बजाय सीधे गप से काम चलाते थे। ऐसी ही किसी गप की आड़ में पहले कहा गया कि हमारी सरकार आई तो धारा तीन सौ सत्तर हटा देंगे, किंतु जब मामला खुला तो पता चला कि 'धारा तीन सौ सत्तर' की बजाय तीन सौ सत्तर एकड़ 'धरा' की बात हो रही थी जिसे कि किसी उद्योगपति के नाम आबंटित कर दिया गया था। 

  इससे पुष्टि होती है कि चार हजार वर्ष पूर्व यह देश हिम्मत प्रधान देश था। लोग बेहद हिम्मती थे। जब-तब खाते पीते हिम्मत दिखाते थे। यहां तक कि ट्रेन के सफर में 'तत्काल प्रिमियम' जैसी महंगी सेवा का लाभ उठाने से भी नहीं चूकते थे। जहां तक होता महंगे टिकटों को खरीदने की हिम्मत कर ही लेते थे। यदि नहीं थी तो विलुप्त हो चुकी शर्मिंदगी महसूस करने जैसे गुण जिसे किसी भी हाल में बचाये रखना जरूरी था किंतु जिसे बचाया न जा सका। अंतत: उसके साक्ष्य केवल अभिलेखों और उत्खननों में ही उपलब्ध हैं।

( ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )

- सतीश पंचम

Sunday, October 5, 2014

OP stop smelling your socks - फिल्म शॉर्ट है लेकिन शानदार है !


      बाजारवाद के दौर में कुछ अच्छी फिल्में दब कर रह जाती हैं, वे लोगों के बीच आ ही नहीं पातीं जबकि एक अच्छी फिल्म के सारे गुण, सारी तकनीक उनमें शामिल रहती है। ऐसी ही फिल्म है श्रीराम डाल्टन की बनाई शॉर्ट फिल्म ''OP stop smelling your socks' . मुख्य भूमिका में हैं नवाजुद्दीन सिद्दिकी। जब यह फिल्म बनी थी तब वे उतने फेमस नहीं हुए थे। साल था 2010.

  कहानी कुछ यूं है कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी एक प्रॉडक्शन ब्वॉय हैं। एक शूटिंग के सिलसिले में अपनी प्रॉडक्शन यूनिट के साथ यह प्रॉडक्शन ब्वॉय OP कहीं एक ही गाड़ी में जा रहा है। उसकी इच्छा है कि अबकी बार वह विंडो सीट पर बैठे। हमेशा उसे बीच में बैठा दिया जाता है। आगे की सीट पर डायरेक्टर और ड्राईवर बैठते हैं। पीछे की सीट जहां तीन लोग बैठ सकते हैं वहां कुल चार लोग ठूंसे हुए किसी तरह बैठते हैं। ओपी को बीच में बैठना अच्छा नहीं लगता। विंडो सीट पाने के चक्कर में वह गाड़ी से उतर कर नीचे झूठ-मूठ का पेशाब भी करता है ताकि बैठते समय खिड़की वाली सीट मिले लेकिन उसे तब भी वह सीट नहीं मिलती। कैमरामैन बाहर निकल कर खड़ा रहता है, उसके आने पर अंदर की ओर वापस बैठा कैमरामैन फिर अपनी विंडो सीट पकड़ लेता है। उधर दूसरी ओर फिल्म की हिरोइन और एक शख्स है। हिरोइन कैमरामैन से रास्ते भर बतियाने में ही मगन है। बीच में फंसता है बेचारा प्रो़डक्शन ब्वॉय ओपी।

  इसी बीच लंबी यात्रा के दौरान सभी को नींद आ जाती है और बोर हो रहे ओपी को याद आता है कि उसके मोजों में से बदबू आ रही है। वह चुप्पे से अपने मोजे निकालता है, और वही रखे बोतल के पानी से हाथ बाहर निकाल मोजों को धोकर चुपचाप पानी की बोतल रख देता है। हिरोइन ने अपने बालों की क्लिप वहीं फ्रंट सीट के पीछे अटका कर रखी होती है। ओपी उस हेयर क्लिप को लेकर कैमरामैन वाली साइड की विंडो सीट पर अपने मोजे सूखने के लिये बाहर की ओर क्लिप से अटका देता है। हेयर क्लिप से अटके दोनों मोजे बाहर की ओर हवा में लहराते रहते हैं। इसी बीच ओपी को भी नींद आ जाती है। सपने में वह देखता है कि अब वह कैमरामैन पर हावी हो चुका है। कैमरामैन को वह दबोचे हुए है और बेचारा कैमरामैन घिघिया रहा है। अब विंडो सीट पर शान से ओपी बैठा है और हंस हंस कर हिरोइन से बातें कर रहा है। कुछ देर बाद ओपी की आंख खुलती है तो देखता है कि सिर्फ एक ही मोजा बाहर लहरा रहा है। एक मोजा गायब। इधर उधर देखता है तो सभी अपनी जगह सो रहे हैं। ड्राईवर वैसे ही गाड़ी चला रहा है। कैमरामैन वैसे ही विंडो सीट पर बैठा है, खुद वह वैसे ही बीच में ठुंसा हुआ है। तिसपर एक मोजा हवा में कहीं उड़ भी गया है। ओपी धीरे से वह मोजा क्लिप में से निकालता है और उसे भी बाहर फेंक देता है। तभी उसे अपने पास कुछ दबा हुआ सा लगता है और निकालने पर पता चलता है कि यह तो पहले वाला ही मोजा है जिसे वह उड़ गया समझ रहा था। परेशान हाल में वह कल्पना करता है कि अभी सबको बतायेगा तो लोग तरह-तरह से उसका मजाक बनायेंगे। वह फिर झपकी लेना शुरू करता है और आंख खुलती है तो बाहर फिर दोनों मोजे लहराते नजर आते हैं। ऐसा एक दो बार और होता है। कभी उसे लगता है कि एक मोजा गिर गया है तो कभी लगता है कि नहीं दोनों सही-सलामत हैं। इसी बीच झपट कर ओपी उन मोजों को पकड़ लेता है। उसकी इस कामयाबी पर गाड़ी के अंदर बैठे लोग ताली बजाते हैं। 

 लेकिन नहीं, बाहर एक ही मोजा लटक रहा है। ओपी के मन में कशमकश जारी है। 

     पूरी फिल्म देखते हुए लगातार एक तरह का सस्पेंस बना रहता है कि अब क्या होगा। अब ?  अब ? वहीं इस फिल्म में इस्तेमाल किया गया सत्तर अस्सी के दशक का सस्पेंस थ्रिलर वाला बैकग्राउण्ड म्यूजिक भी जोरदार है। श्रीराम डॉल्टन की इस शॉर्ट फिल्म को इसलिये भी देखना जरूरी है ताकि पता चल सके कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे कलाकार एक दिन में तैयार नहीं होते। वे इन्हीं तरह की हार्ड कोर फिल्मों से रच-बसकर, तप कर निकलते हैं तो जाकर आगे कहीं झिलमिलाते हैं, सबकी नजरों में छा से जाते हैं। देखा जाय तो इस तरह की फिल्में किसी कलाकार के अंदर की कला को उभारने में, उसे मांजने-निखारने का एक ज़रिया भी हैं। फिर बतौर डायरेक्टर श्रीराम डाल्टन ने जिस तरह से सारी चीजों को एक पैकेज में उतारा है वह काबिले-तारीफ है। फिल्म 2008 में सिर्फ चार घंटे में बनी थी और लागत थी मात्र 2000 /-.  शॉर्ट फिल्मों के शौकीन, फिल्म विधा की जानकारी चाहने वाले जिज्ञासु प्रृवत्ति के लोग, छात्र इसे जरूर देखें। यह रही फिल्म - 'OP stop smelling your socks' .


- सतीश पंचम  



Sunday, September 28, 2014

प्रकृति विहार

     कभी-कभी जिन पेड़ों को हम बेजान, नीरस, बिना फल-फूल वाला चलता किस्म का मान लेते हैं, समय आने पर वही पेड़-पौधे अपने सुन्दर फूलों, महक और फलों से लदकर हमें चौंका देते हैं। उन्हें देख विश्वास ही नहीं होता कि ये वही पेड़ है जो सिर्फ पत्तों और टहनियों के लिये जाना जाता था। ऐसा ही कुछ अबकी मुंबई के भायखला स्थित बोटॉनिकल गार्डन में देखने को मिला जब कुछ पेड़ों को फल और फूलों से लदा देखा। उन्हीं में से एक पेड़ था कैंडल ट्री। पहले जब कभी उसे देखा एक मझोले आकार का, हरे भरे पत्तों वाला झुटपुटिया पेड़ ही दिखा था। आज भी वह उसी तरह दिख रहा था। ये तो जब उसके नजदीक पहुंचा तो पता चला कि अरे इसमें तो फूल खिले हैं और वो भी डालियों पर, पत्तों के बीच से नहीं बल्कि पेड़ के तनों पर फूल खिले हैं। आसपास देखा, जमीन पर ढेर सारे सफेद फूल झड़ कर गिरे थे। उठाकर एक को सूंघा तो उसमें महक बिल्कुल न थी। यदि थी भी तो एक हल्की सी जंगली फूलों जैसी।

     मेरे सामने जब एक फूल तुरंत ही झड़ कर नीचे गिरा तो ध्यान गया कि इसके तने पर अधखिली कलियां निकल रही हैं। कुछ चींटियां, कुछ कीड़े इन फूलों में बैठे थे। वे भी फूल के साथ नीचे आ गिरे। इसकी जड़ों से लेकर ऊपर की देखा तो तने से कई फूल निकले थे। इतने में फिर एक फूल गिरा। फिर और एक। फूलों के झड़ने की रफ्तार देख लगा कि इस तरह तो ये शाम तक झड़ कर फारिग हो लेगा लेकिन अभी कई कलियां तने से निकल रही थीं तो लगा कि शायद अभी और इसके फूलों का समय बाकी है। इसकी दो चार तस्वीरें खींच आगे बढ़ गया।









      दूसरी ओर एक और पेड़ चौंकाने के लिये तैयार था। यह था Lignum Vitae जिसका अर्थ है The Tree of Life. भारत में इसे क्या कहते हैं पता नहीं।

इन पेड़ों की महीन पत्तियां बहुत आकर्षित करती हैं। पहले इसके हल्के बैंगनी रंग के फूलों को झड़ते देखा था। उनमें भीनी-भीनी खुशबू थी। बाद में जब झड़-झूड़ कर फूल खत्म हो गये तो काफी समय तक ये छोटे, हरे पत्तों से अटा पड़ा रहा। धीरे-धीरे चलती हवा में इसका हिलना-डुलना देखते ही बनता है। उन्हीं पत्तों को करीब से देखने उनकी छांव से गुजर रहा था कि एक जगह निगाह अटक गई। छोटा सा केसरी रंग का कुछ फल जैसा दिखा। फल भी ज्यादा बड़ा नहीं, बस ईमली के बीज की तरह का। ऊपर हाथ नहीं पहुंच रहा था सो नजरें जमीन पर उसके गिरे फलों को ढूंढने लगीं। घास में एक जगह उसके फल दिखे तो उठा लिया। महक कुछ खास नहीं थी। एक फटे फल में लाल रंग का बीज दिखा।

    एक साबुत फल वहीं नीचे गिरा था। उसे उंगली से दबाव देकर फोड़ा तो पूरा हाथ लिसलिसा गया। उंगलियां चिपकने लगीं। गोंद बहुत जबरदस्त किस्म का था। वहीं पत्तियों में उंगलियों को पोंछ-पांछकर हाथ साफ किया तो राहत मिली। गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि इसकी लकड़ी सबसे ज्यादा भारी किस्म की होती है जिसे पानी में डुबोने पर अन्य लकड़ियों के मुकाबले तुरंत ही डूब जाती है। इसमें कीड़े भी जल्दी नहीं लगते।

 
वहां से आगे बढ़ा तो एक बरगद का पेड़ पीले फलों से
लदा-फदा नजर आया। उसका नाम देखा तो वह था - Mysore Fig. ढेर सारे पतंगे जिन्हें हम हेलिकॉप्टर कीड़ा कहते हैं उसके फलों के आसपास मंडरा रहे थे। वहीं करीब ही तालाब का पानी सूरज की रोशनी में चमचमा रहा था।

     ठहर कर उसकी टहनियों, पत्तों को देखा तो पानी की झिलमिल रोशनी उसकी घनी छांव में होते हुए टहनियों पर पड़ रही थी। देखने में ऐसे लगता था जैसे टहनियों में एक किस्म का प्रवाह हो रहा हो। जड़ों से होते हुए ऊपर फुनगी की ओर। पानी की यह झिलमिल चमक बहुत अच्छी लग रही थी। थोड़ी देर और ठहर कर उसका आनंद लिया। जमीन पर गिरे Mysore Fig के फल को फोड़ कर देखा तो वह गूलर की तरह दिखा। हां, इसमें कीड़े नहीं थे वरना गूलर में अक्सर कीड़े देखे हैं जिन्हें गांव-गिरांव में लोग ये समझ कर खाते थे कि इसके खाने से आंखों की रोशनी तेज होती है।


 



          इन्हीं सब पेड़-पौधों के बीच से होता हुआ आगे बढ़ते रहा। प्रकृति को अचंभित हो देखता रहा। वैसे इन पेड़ पौधों को कई बार आ-आकर देखा है लेकिन मन नहीं भरता। इन्हें जितनी बार देखता हूं कहीं न कहीं चौंका देते हैं। पिछली बार देखा था तो एक पेड़ था - Elephant ear pod Tree. तब खूब बारिश हो रही थी। ऐसे में एक विशेष बात दिखी थी कि इसके तने से ढेर सारा पानी तेजी से नीचे बह रहा था जबकि वहीं आस-पास के बाकी पेड़ों से पानी बहुत धीरे-धीरे रिस रहा था। बगल का महुए का पेड़ उतनी तेज बारिश में भी सुस्त नजर आ रहा था। उसका इस तरह तेज पानी गिराना हैरान कर देने वाला नजारा था। आज जब ध्यान से देखा तो उस पेड़ के तने पर ऊपर से नीचे की ओर महीन नालियों जैसी धारी बनी हुई थी। संभवत: इन्हीं धारियों को पकड़े-पकड़े समूचा पानी सीधे तने की ओर बढ़ता था और इकट्ठे होकर तेजी से पानी बहाता था। मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी वरना इसकी धारियों का चित्र लेता। अगली बार जाने पर फिर इससे दुई-चार होकर तस्वीर खेंचूंगा।


- सतीश पंचम


Update :-  अभी अपने द्वारा खेंचे गये Images चेक किया तो वहां 26 अप्रैल 2014 की खेंची इसी पेड़ की (Elephant ear pod ) धारियों वाली छवि मिल गई। जब फोटो खेंचा था तब सिर्फ नेम प्लेट के लिये खेंचा था लेकिन अब ध्यान दिया तो नेम प्लेट के आस-पास वे वर्टिकल धारियां भी नजर आ गईं । यह रहा वह चित्र।


Saturday, September 13, 2014

मछली, मकड़ी और पीपल

   कहीं सुदूर वन-प्रांतर में नदी किनारे पीपल के पेड़ की झुकी टहनी से पत्तियां पानी से ऊपर हिल-डुल रही हैं। चांदनी रात की झिलमिल में मछलियां, घोंघे उस हिलती-डुलती परछाईं को संशय की नजर से देख रहे हैं। पहले भी कई बार शुभ्र, उज्जवल रातों को इस तरह की परछाईयां सतह के करीब दिखाई दी हैं लेकिन ये वाली परछाईं तो कुछ ज्यादा ही गहरी लग रही है।

उधर नई-नकोर मछलियों के एक झुण्ड ने मन बना लिया है कि सतह के करीब पहुंच कर उस चीज को पकड़ा जाय। काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी सिवाय परछाईं पीने के वे कुछ कर नहीं पा रही थीं। उधर पीपल की टहनी उन मछलियों की इस नादानी पर हंस रही है। उसके पत्ते हवा में यूं लहरा रहे थे मानों ताली बजा रहे हों

उधर दूसरी टहनी से लटकती मकड़ी हवा में हिल डुल रही है। वह भी परेशान थी। जाला तो बरगद के पेड़ पर बना रही थी लेकिन पीपल और बरगद इतने सटे थे कि पता ही न चला कब बरगद खत्म हुआ और कब पीपल शुरू ? ऐसे में उलझे पेड़ों की परवाह न कर मकड़ी ने जाला बुनना शुरू किया और अब हाल यह है कि तेज हवा में बरगद तो वैसे ही रहा लेकिन पीपल ने साथ छोड़ दिया। जरा सी हवा चली नहीं कि हिलने-डुलने खड़खड़ाने लगता।

इसी हालात की मारी मकड़ी एक तांत पकड़े-पकड़े सतह से कुछ ऊपर लटक रही है और नीचे मछलियां ऊभ-चूभ हो रही हैं। मकड़ी ऊपर को जाना चाहती है लेकिन तेज हवा से ठहरना पड़ रहा है। पीपल की झुकी टहनी लहरा कर मकड़ी की ओर जाते हुए उसे ऊपर लेने का मन बना रही है लेकिन मकड़ी बार-बार हवा में लहरा रही है। तांत अब टूटा कि तब टूटा।

और तभी अचानक पानी में बहती किसी बड़ी झाड़ी से मकड़ी टकराई। सहारा पाते ही मकड़ी ने तांत छोड़ दिया और बहती झाड़ी पर धीरे से उतर गई।

भीतर पानी में तैरती मछलियां बहती झाड़ी को कोस रही थीं। कहां तो टकटकी बांध कर परछाईं पी रही थीं, मकड़ी को लटकते उसका करतब देख रही थीं और एक बहती झाड़ी ने अचानक सारा कुछ बिगाड़ दिया।

- सतीश पंचम

( मेरे फेसबुक पेज की  #कल्पना सीरीज़ पोस्ट) 


Saturday, September 6, 2014

कल्पना....

   
     महुए के नीचे गीली जमीन पर सरकता घोंघा किसी नुकीली दूब के छू जाने पर ठहर गया है। करीब ही गिरा सूखा पत्ता  घोंघे के यूं ठिठकने पर मन ही मन हंस रहा है।

और दूब ? अपने नुकीलेपन पर बेचारी दुखी है। उसने जान बूझकर घोंघे की लिजलिजी त्वचा को नहीं छुआ था, वह जहां थी वहीं रही, बल्कि यह घोंघा ही था जो सरकते-सरकते उसकी ओर बढ़ आया। इतने पर भी गनीमत होती यदि घोंघे का ऊपरी खोल दूब को स्पर्श करता। न जाने किस धुनकी में चल रहा था कि अपने नर्म पेट को ही नुकीले हिस्से से छुआ बैठा।

उधर घोंघा मन ही मन कुढ़ रहा था। उसे अंदर से लग रहा था कि दूब ने जान बूझकर अपना नुकीला हिस्सा स्पर्श कराया है।

इन सब मामलों से अनजान एक बच्चा तितली के पीछे पड़ा है। वह उसे पकड़ना चाहता है लेकिन तितली है कि उड़े जा रही है। बैठती है, फिर उड़ती है। अबकी जो उड़ी तो दूब की ओर ही बढ़ी चली आ रही थी। इस दौड़ भाग को देख सूखे पत्ते के मन में आशंका हुई कि कहीं बच्चा इस ओर आ गया तो घोंघे को कुचल देगा, दूब परेशान कि कहीं तितली उस पर बैठे हुए पकड़ी गई तो नाहक लोग उसे ही दोषी मानेंगे। इन सबसे अनजान घोंघा रास्ता बदल कर जाने लगा तो अचानक बही तेज हवा के चलते सूखा पत्ता उड़कर उसके और करीब आ गया। सूखे पत्ते को यूं पलटते देख अचानक तितली ने उड़ान बदली और तिरछे होकर झरबेरियों की ओर उड़ चली।

सूखे पत्ते ने फुसफुसाते हुए घोंघे से कहा - "लगता है तितली ने तुम्हें देख लिया था इसलिये तुम्हें रौंदने से बचाने के लिये ही उसने रास्ता बदल दिया"।

लेकिन घोंघे को इन सब से क्या ? वह भारी कदमों से दूब की चुभन और उसकी दुष्टता को कोसे चला जा रहा था। "संभलकर चलने" की दूब की ताकीद भी उसे सुनाई नहीं दी।

उधर तितली पकड़े बच्चा इसी ओर बढ़ा चला आ रहा था। अबकी न तो हवा बही, न तो सूखे पत्ते में हरकत हुई, बस एक अंदेशा बना रहा। घोंघा अब कुचला, तब कुचला....।

 - सतीश पंचम

( मेरी फेसबुकिया #कल्पना पोस्ट)



Sunday, March 9, 2014

IRCTC की मनोहर जहमतें !


इन दिनों IRCTC की वेबसाईट से टिकट बुक कर ले जाना यानि वर्ल्ड कप पा लेना है। न जाने कितनी आँखें सुबह आठ बजे से पहले ही ब्राऊजर पर टिकी रहती हैं। साईट के फूलने, पचकने से लेकर उसके कांखने तक सारा कुछ क्षण प्रतिक्षण टकटकी बांध कर निहारा जाता है। फिर एक दो मिनट जाते न जाते तमाम आँखें आशा छोड़ने लगती है। उन्हें एहसास हो जाता है कि आज भी टिकट मिलने से रहा। अब मिला भी तो वेटिंग मिलेगा या आरएसी। और जब तक परिणाम नजर आये पता चलता है Service not available या Session timeout. यदि सौभाग्य से यह चीज स्क्रिन पर न दिखी तो PQWL / WL 24, 25 जैसी शब्दावली तो दिख ही जायेगी, जिसका तात्पर्य है कि अगले दिन लोग फिर हुमाच बांध कर बैठेंगे कम्प्यूटर स्क्रिन के सामने। अगले दिन फिर वही धमाचौकड़ी मचेगी।

  लेकिन एक वह भी समय था कि 'बम्बई' से गाँव जाने के लिये लोग तीन-तीन चार-चार दिन तक कतार में लगकर रेल्वे आरक्षण लेते थे। फिर तीन महीने पहले से टिकट निकालना होता था। जिस दिन का टिकट बुक करना होता था दिन से दो-चार दिन पहले से लोग लाईन में लग जाते थे। दोपहर, शाम, रात वहीं उठते, बैठते, सोते, टहलते बिताते और सुबह शंटिंग-चंटिंग और धक्का-धुक्की के बीच बासी मुंह टिकट लेने के लिये तैयार दिखते। ऐसे में परिचितों के जरिये कुछ लोग शिफ्ट वाइज कतार में लगते थे।  जिसकी सुबह की शिफ्ट होती वह शाम के समय छुड़ाने आ जाता, जिसकी शाम की शिफ्ट होती वह सुबह को पहुंचता। ऐसे में किसी-किसी का खाना घर से आता तो कोई वहीं आस-पास का वड़ा-पाव वगैरह खाकर किसी तरह समय बिताता। जिस किसी को जरूरी काम के चलते लाईन में से हटना पड़ जाता वह कह कर जाता कि भाई मैं आता हूं लौट कर। मेरा नम्मर याद रखना। यदि लाईन जस की तस रही तो ठीक वरना धक्का-मुक्की होने पर वापस उसका वह नम्बर मिलना मुश्किल। जिसे बोलकर बंदा गया होता यदि वो शरीफ किस्म का हुआ तो ठीक वरना फिर से कतार में लगो। फिर वही धक्का-मुक्की, फिर वही शंटिंग चंटिंग।

 तब 'बम्बई वीटी' में रेल्वे आरक्षण केन्द्र के पिछवाड़े से लाईन लगते-लगते हरी मस्जिद तक कतार चली जाती। वहीं पास ही काठ के ढेर सारे बक्से पड़े होते। टाट में लिपटे किसी बक्से में मछली गंधा रही होती तो किसी में से पानी रिस रहा होता। कहीं मक्खियां भिनभिनाती दिखतीं तो कहीं कुत्ता सोया नजर आता। उसी माहौल में लोग इमारत की छांव में पेपर बिछा बैठते, बोलते-बतियाते कभी वीपी सिंह को चंहेटते, कभी मुलायम को, कभी कल्याण को तो कभी लालू को। मुद्दा ज्यादातर राजनीतिक ही रहता।  सुबह ग्यारह बजते-बजते जब तेज धूप हो जाती तो लोग छांह ढूंढने लगते। कहीं खिड़कियों के ग्रिल में अखबार फंसा छांव किये हैं तो कहीं गमछा फैलाकर हाथ से ताने हैं। तिस पर आरक्षण केन्द्र की किसी फूटी पाइप से बाथरूम का पानी गिरता रहता। ऐसे ही हौलनाक माहौल में लोग लाईन में लगे रहते। उसी दौरान कभी-कभार कोई हंसी-पड़क्का वाला डॉयलॉग बोल देता। ऐसे ही एक शख्स की कुछ बातें याद आती हैं जिसके कहने का तात्पर्य था कि - "घर से तो महाराज अच्छे से कपड़ा ओपड़ा पहनकर निकले होंगे कि जा रहे हैं 'टिकस' लेने, यहां आकर धूप में छांह करके पड़े हैं, मछरी गन्हा रही है, माछी भिनभिना रही है, कुकुर औ बिलार चाट-सूंघ रहे हैं, धक्का-मुक्की में पुलिस की लाठी खा रहे हैं, शर्ट फटी जा रही है और घर पर मलकिन कहती होंगी कि आज मोरे बालम खीरा लेकर आने वाले हैं"।  

   वहीं एक अजीब बात यह भी होती कि रात के एक बजे या दो बजे के आसपास एक नम्बरों वाला आरक्षण फार्म मिलता था जिसपर उस वक्त ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी का सिग्नेचर होता। उस नम्बरों वाले फॉर्म को पाने का मतलब था कि लोग अब कतार छोड़ कर जा सकते थे, सुबह आठ बजने से पहले इस फॉर्म पर पड़े नम्बर के हिसाब से कतार में लग जाना होता। उस फॉर्म को लेने के लिये ही खूब जोर की धक्का मुक्की चलती। दरअसल जितना पहले नम्बर वाला फॉर्म मिलता, टिकट की संभावनाएं उतनी ही ज्यादा होतीं वरना फिर अगले दिन कतार में लगो चौबीस घंटों के लिये। ठीक उसी समय दलालों का भी जुगाड़ होता। एक ओर से पुलिस वाले लोगों को कतार में लगने का दिखावा करते, लोहे की रेलिंग पर डंडा फटकारते और दूसरी ओर से धक्का मुक्की में दलाल घुसते चले जाते। ऐसे में  जिस शख्स को लगता कि उसका नम्बर को पचहत्तरवां है और कुल चार सौ फॉर्म बंटने के हिसाब से उसे टिकट मिलना तय है तो पता चलता कि धक्का -मुक्की में न जाने कैसे वह पीछे हो गया और नम्बर मिला दो सौ पन्द्रह। ऐसे में आश्चर्य होता कि बाकी के दो सौ से ज्यादा लोग कहां से आ गये, कहां से नम्बर इतना पीछे हो गया। फिर अगले दिन वही होता। लाइन फिर लगती। अबकी बार वह शख्स बीसवें या बाईसवें स्थान पर होता लेकिन उसके मन में अब भी डर समाया रहता कि रात में धक्का मुक्की होने पर वह फिर से पीछे हो जायगा। और धक्का मुक्की भी मामूली न होती। एक पुलिसिया लोहे की रेलिंग पर डंडा फटकारता तो सभी लोगों में शंटिंग शुरू। क्या पता अब क्या हुआ। न जाने नम्बरों वाला फॉर्म कहीं अभी तो नहीं बंट रहा। क्या पता बंट ही रहा हो। दरअसल इस आशंका के पीछे उस पुलिस वाले का हाथ होता जो धक्का मुक्की से बचाने के नाम पर रात की बजाय दोपहर में ही फॉर्म बांट देता कि इसे लेकर चुपचाप बैठो, ज्यादा शोर मत करो। रात में ऐसे ही नम्बर मिलेगा।

  लोग उस फॉर्म के दम पर चाय पीने निकल जाते, खा पीकर लौटते। कुछ वहीं बैठे रहते, कुछ घर जाकर नहा धोकर आते। शाम के सात आठ बजते बजते फिर वही रस्साकशी। कतार में दलाल घुसा दिये जाते। जिस किसी को एक फॉर्म मिल चुका होता पता चला उसी नम्बर के और भी फॉर्म है। कौन कहां कैसे वाले मामले में पुलिस वाले की ड्यूटी बदलती और रात वाला पुलिसिया आ डटता। दोपहर में बंटे फॉर्म को खारिज कर रात में एक बजे बंटने वाले फॉर्म को मान्य करता हुआ कुर्सी लगाकर बैठा नजर आता। लोग कुढ़कर रह जाते। कहां तो इतनी मेहनत से कतार में लगे थे अब सब फिर आगे-पीछे हो गये। रात में फिर वही शंटिंग। जो अखबार बिछाकर सोया रहता वह जागता तो पता चलता कतार तो कहां की कहां चली गई है, अब उसे कोई कतार में घुसने भी नहीं दे रहा। पुलिस अलग फटकारती, कतार वाले अलग फटकारते। उस समय कोई कड़ा होकर कहे कि ये मेरा नम्बर है जिसे जो करना हो करे तो उसकी बात मान भी ली जाती थी लेकिन जो नरम पड़ा वह गया आखिर में।   

  उसी में कभी-कभार शिक्षक विशेष ट्रेन की भी लाईन लगती। पता चलता कि जिस शिक्षक को हम इतनी इज्जत देते हैं, उनके सामने कतारबद्ध हो स्कूलों में चलते हैं, वे भी कतार तोड़ कर धक्का मुक्की में व्यस्त हैं। वे भी हत्त तेरे की धत्त तेरे की करते हुए नजर आ रहे हैं। कभी-कभी जब दोपहर में या रात में जोर की धक्का मुक्की चलती तो देखता था कि कोई कोई गुरूजी पसीने से तर बतर हैं, सीना दबा हुआ है, गर्दन चंपी हुई है, लेकिन मजाल है जो वे आरक्षण केन्द्र के पीछे वाली खिड़कियों में लगी  ग्रिल छोड़ें। पुलिस वाले के आने पर कभी कभी शिक्षक लोग मजाक भी करते कि - कम से कम शिक्षकों  पर तो लाठी मत चलाओ। गुरूजी लोग हैं। ऐसे में पुलिसिया भी पलटकर जवाब देता कि बचपन में आप  ही लोग तो पीटे थे, अब थोड़ा सा आप लोग भी पिट जाओगे तो क्या 'बगद' जायेगा। ऐसे में समझा जा सकता है कि वहां का माहौल कैसा होता होगा। कभी राजनीति, कभी कुकुरहांव, कभी हत्त तेरे की, धत्त तेरे की तो कभी क्या।  

    वह समय अब भी हर साल गर्मियों की छुट्टियों में रेल आरक्षण के दौरान आता है लेकिन एक दो दिन के लिये ही, तब जब कि शिक्षक विशेष मुंबई से छूटने वाली हो। उस रात मुंबई के तमाम उत्तर भारत की ओर जाने वाले शिक्षक गण जमा होते हैं। लेडिज टीचर हुईं तो उनके लिये अलग कतार लगती है। पता चला जिन-जिन की श्रीमती जी टीचर हैं उनके 'वे' पान खाकर मुस्की मारते टहल रहे हैं, पुरूष शिक्षकों को आपस में धक्का-मुक्की करते देख रहे हैं, पुलिसियों को रेलिंग पर डंडा फटकारते देख रहे हैं और उनकी श्रीमती जी साथी शिक्षिकाओं संग - बतकूचन में व्यस्त हैं। अगले दिन पहचान पत्र के साथ पहले महिला टीचरों को छोड़ा जाता है और फिर पुरूष टीचरों को।

   आज हालात यह है कि घर में बैठे-बैठे या सायबर कैफे से लोग आरक्षण करने में लगे हैं लेकिन टिकट नहीं मिल रहा। कभी IRCTC के नखरे तो कभी नेट स्पीड का लोचा। फिर भी गनीमत है। कम से कम आरक्षण केन्द्र की फूटी पाइप से गिरता पानी तो नहीं झेलना पड़ता। फिर वो मछलियों की गंध, कुत्ते बिल्लियों के बीच पेपर बिछा कर सोना, आरक्षण केन्द्र की काली ग्रिल जिसे शायद साफ करने की कभी जरूरत न पड़ती हो। लोगों के द्वारा हाथों-हाथ पकड़े रहने के चलते ही वो साफ हो जाती थी। आखिर सामुदायिक कार्य जो ठहरा। लोग आज भी सामाजिकता निभाते हैं। एक साथ तीन चार लोग मिलकर बुकिंग करते हैं, टिकट निकलवाते हैं, डबल कोटा, सिंगल कोटा, RAC, W/L जैसी शब्दावलियों से दो चार होते हैं। कुछ लोग पहुंच के आधार पर टिकटों का जुगाड़ करते हैं तो कुछ आखिर दम तक ग्रीष्मकालीन विशेष गाड़ियों का चातक पक्षी की तरह इंतजार करते हैं। कभी तो टिकट बुक होगा। 

  आखिर लोगों को 'मुलुक' जो जाना है ! नाते-रिश्तेदारों संग बैठना-उठना है। किसी को बिटिया के लिये रिश्ता ढूंढने जाना होगा किसी के यहां परिवार में कोई शादी ब्याह का मौका आ पड़ा होगा। कहीं किसी को कुछ काम तो किसी को कुछ। IRCTC के सर्वरो, तनिक परदेसी मनुष्यों पर दया करो वरना फिर वहीं आरक्षण केन्द्र की जुटान होगी - फिर वही धक्का मुक्की, धूप, छांह, सीवर की फटी पाईपें, गन्धाती मछलियां, अखबारी बिस्तर और फिर वही अहमक बतियां :-)    

 - सतीश पंचम 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.