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Thursday, August 22, 2013

बनारस यात्रा 10 - समापन किश्त

     मुंशी प्रेमचंद स्मारक का गेट खुलने के बाद संरक्षक श्री दुबे जी के साथ हम लोग अंदर पहुंचे। सामने ही मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा नजर आई। पास ही बरामदे में ढेर सारे चित्रों की प्रदर्शनी दिखी जिनमें मुंशी जी द्वारा लिखे गये तमाम उपन्यासों, कहानियों आदि के कवर दर्शाये गये थे। किसी किसी चित्र में उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं के बारे में दर्शाया गया था।
 एक जगह दीवार से टंगा कनकौआ दिखा। कनकौआ जिसे हम पतंग कहते हैं, जो कि अब काईट कहलाता है। आज कल के बच्चों को तो पता भी न होगा कि कनकौआ किसे कहा जाता था। जानने की जरूरत भी क्या है। कौन उन्हें शब्दाचार्य बनना हैं। कहाँ उन्हें हिन्दी का शिक्षक बनना है याकि कोई बुझनी बूझना है कि जानें। ऐसे ही कई शब्द लुप्त होते हैं, एक और सही।

   वहीं एक जगह हुक्का दिखा। संरक्षक दुबे जी ने बताया कि प्रेमचंद जी को हुक्का बहुत प्रिय था। इसलिये प्रतीकात्मक रूप में यहाँ हुक्का रखा गया है। मन में आया कि तब तो गुड़ भी रखना चाहिये था। उन्हें तो गुड़ भी बहुत प्रिय था। इतना ज्यादा कि दिन भर में कई कई पीड़िया गुड़ खत्म कर देते थे। अपनी इस लत का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि -

    गुड़ से मुझे बड़ा प्रेम है। जब कभी किसी चीज की दुकान खोलने की सोचता था तो वह हलवाई की दुकान होती थी। बिक्री हो या न हो, मिठाइयां तो खाने को मिलेंगी। हलवाइयों को देखो, मारे मोटापे के हिल नहीं सकते। लेकिन वह बेवकूफ होते हैं, आरामतलबी के मारे तोंद निकाल लेते हैं,  मैं कसरत करता रहूँगा। मगर गुड़ की वह धीरज की परीक्षा लेनेवाली, भूख को तेज करनेवाली खूशबू बराबर आ रही है। मुझे वह घटना याद आती है, जब अम्मां तीन महीने के लिए अपने मैके या मेरी ननिहाल गयी थीं और मैंने तीन महीने के एक मन गुड़ का सफ़ाया कर दिया था।  यही गुड़ के दिन थे। नाना बीमार थे, अम्मां  को बुला भेजा था। मेरा इम्तहान पास था इसलिए मैं उनके साथ न जा सका, मुन्नू को लेती गयीं। जाते वक्त उन्होंने एक मन गुड़ लेकर उस मटके में रखा और उसके मुंह पर सकोरा रखकर मिट्टी से बन्द कर दिया।  मुझे सख्त  ताकीद कर दी कि मटका न खोलना। मेरे लिए थोड़ा-सा गुड़ एक हांडी में रख दिया था। 

वह हांड़ी मैंने एक हफ्ते में सफाचट कर दी सुबह को दूध के साथ गुड़, रात को फिर  दूध के साथ गुड़। यहॉँ तक जायज खर्च था जिस पर अम्मां को भी कोई एतराज न हो सकता।  मगर स्कूल से बार-बार पानी पीने के बहाने घर आता और दो-एक पिण्डियां निकालकर खा लेता- उसकी बजट में कहां गुंजाइश थी। और मुझे गुड़ का कुछ ऐसा चस्का पड़ गया कि हर वक्त वही नशा सवार रहता। मेरा घर में आना गुड़ के सिर शामत आना था। एक हफ्ते में हांडी ने जवाब दे दिया। मगर मटका खोलने की सख्त मनाही थी और अम्मां के घर आने में अभी पौने तीन महीने ब़ाकी थे। एक दिन तो मैंने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे सब्र किया लेकिन दूसरे दिन आह के साथ सब्र जाता रहा और मटके को बन्द कर दिया और संकल्प कर लिया कि इस हांड़ी को तीन महीने चलाऊंगा। चले या न चले, मैं चलाये जाऊंगा। मटके को वह सात मंजिल समझूंगा जिसे रुस्तम भी न खोल सका  था। मैंने मटके की पिण्डियों को कुछ इस तरह कैंची लगाकर रखा कि जैसे बाज दुकानदार दियासलाई  की डिब्बियां भर देते हैं।

 एक हांड़ी गुड़ खाली हो जाने पर भी मटका मुंहों मुंह भरा था।  अम्मां को पता ही चलेगा,  सवाल-जवाब की नौबत कैसे आयेगी। मगर दिल और जान में वह खींच-तान शुरु हुई कि क्या कहूं, और हर बार जीत जबान ही के हाथ रहती। यह दो अंगुल की जीभ दिल जैसे शहज़ोर पहलवान को नचा रही थी, जैसे मदारी बन्दर को नचाये-उसको, जो आकाश में उड़ता है और सातवें आसमान के मंसूबे बांधता है और अपने जोम में फ़रऊन को भी कुछ नहीं समझता। बार-बार इरादा करता, दिन-भर में पांच पिंडियों से ज्यादा न खाऊं लेकिन यह इरादा शराबियों की तौबा की तरह घंटे-दो से ज्यादा न टिकता। अपने को कोसता, धिक्कारता-गुड़ तो खा रहे हो मगर बरसात में सारा शरीर सड़ जाएगा, गंधक का मलहम लगाये घूमोगे, कोई तुम्हारे पास बैठना भी न पसन्द करेगा ! कसमें खाता, विद्या की, मां की, स्वर्गीय पिता की, गऊ की, ईश्वर की, मगर उनका भी वही हाल होता। दूसरा हफ्ता खत्म होते-होते हांड़ी भी खत्म हो गयी।   

      तो ये तो हाल था मुंशी जी का कि गुड़ के बिना बेकल रहते थे। संभवत: हुक्के की तरह मुंशी जी इस इच्छा का भी प्रतीकात्मक मान रखने में व्यवस्था करने में थोड़ी मुश्किल आती। क्या पता बैठे ठाले ही हांड़ी-हांड़ा खत्म हो जाय। 'च्यूंटी-माटा' लगता सो अलग। वैसे भी वहाँ गुड़ खाने के लिये तो गये नहीं थे। अपने प्रिय लेखक से जुड़े स्थान को देखने की प्यास थी, सो वहाँ पहुँचकर आत्मा तृप्त हो ही रही थी। दीवार पर टंगी और चीजों के बारे में जानकारी लेते देते अच्छा लग रहा था। कहीं प्रेमचंद जी अपनी पत्नी शिवरानी देवी जी के साथ नजर आ रहे थे तो कहीं किसी चित्र में अकेले। 

   बात ही बात में दुबे जी ने प्रेमचंद से जुड़ी एक फाइल दिखानी शुरू की जिसमें कि उनसे जुड़े सर्टिफिकेट, मार्कशीट, पत्रों आदि की प्रतिलिपियां रखी गईं थी। मैंने एक एक कर फोल्डर पलटना शुरू किया। कहीं उनके स्कूल का सर्टिफिकेट था तो कहीं यूनिवर्सिटी का। एक जगह सर्टिफिकेट प्रदानकर्ता स्थल का नाम पढ़ा Cawnpore. यह आजकल के Kanpur का ही प्राच्यकालीन नाम है। Cawnpore  लुप्त हो गया अब Kanpur प्रचलन में है। 
  उनके सर्टिफिकेट देखते हुए जूनियर इंग्लिश टीचर वाली सनद पर एक जगह नजर टिक गई। लिखा था - Not qualified to teach Mathematics. मने कि और सब्जेक्ट पढ़ा लेगें लेकिन गणित नहीं। खैर, जिन्होंने जीवन के गणित को समझा और लाखों करोड़ों लोगों को समझाया उनके लिये भी गणित दुरूह ही रहा। अच्छा है। जानकर "कुटिल आत्म-सांत्वना" मिली :-)      

      वहीं दीवार पर एक चलनी में सोजे-वतन की प्रति दिखी। एक जगह हामिद का चिमटा टंगा दिखा। उसी के पास गोदान की प्रति और गिल्ली डंडा भी टंगे दिखे। इन्हीं सारी चीजों को देखते हुए कक्ष के उस हिस्से में गया जहां कुछ बिक्री हेतु किताबें रखी गईं थीं। उलट-पलट कर देखने पर पता चला कि कुछ मेरे पास हैं, कुछ थे लेकिन कहीं किसी को पढ़ने दिया और फिर न मिला। प्रेमचंद जी की कहानियों वाली पतली-पतली किताबें भी दिखीं जिनमें सिर्फ एक या दो कहानियां थीं। उनमें बने चित्रों के साथ बड़े-बड़े अक्षर में कहानी पढ़ते हुए अनायास ही बचपन में पहुंचा जा सकता है। 

  बच्चों के लिये और खुद के लिये भी किताबें चुनना शुरू किया तो कंट्रोल करना पड़ा। मन कहता यह भी लूं, वह भी लूं। फिर  दोपहर भी तो हो चुकी थी। शाम तक घर लौटना जरूरी था ताकि अगले दिन मुम्बई के लिये तैयारी की जा सके। फिर लम्बा रास्ता। बोलते बतियाते अब जल्दी करनी पड़ी। कुछ किताबें खरीद लिया। बाहर निकला। दुबे जी से राम-रहारी हुई। बाईक पर बैठ कर गाँव का थोड़ा सा चक्कर लगाया गया। लौटानी में जब मुंशी प्रेमचंद स्मारक 'डांक' रहा था तब मेरी पीठ पर टंगे थे - हामिद, होरी, धनिया, गोबर, माधव, जुम्मन, निर्मला, आनंदी और ढेर सारा बनारसी नॉस्टॉल्जिया।
    
-------- समाप्त-------

- सतीश पंचम


फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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