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Thursday, February 28, 2013

घोड़ों की धांधली, जनाना कॉरीडोर बजरिये शाही गल्प

        बादशाह अकबर के दरबार में राजा टोडरमल भूमि बन्दोबस्ती से जुड़ा श्वेतपत्र पढ़ रहे हैं लेकिन दरबार में किसी को उनके श्वेतपत्र में रूचि नहीं है। ज्यादातर लोगों को उस वक्त का इंतजार है जब घोड़ों के घोटालों पर कुछ बहस होगी। ऐसे आड़े वक्त पर बीरबल कहीं दिख नहीं रहे थे। अकबर रह रहकर दरबार में एक नज़र डाल लेते  और फिर अपने सामने रखे शिकायती पत्र को निहार लेते। पत्र में शिकायत आई थी कि दु-अस्पा सैनिक, जिनके पास दो घोड़े होते हैं अक्सर तगड़े घोड़ों की बजाय एक घोड़ा कुछ मरियल, बूढ़ा टाइप रखते हैं और उसी को दिखाकर राजकोष से भत्ता ले लेते हैं जबकि ऐसे घोड़ों की युद्ध में कोई जरूरत नहीं होती। उधर तीन-अस्पा सैनिक भी जिनके पास तीन घोड़े होते हैं वे भी गलत भत्ता लेते दिखे हैं। खुद के इस्तेमाल होने वाले घोड़े को तो तगड़ा रखते हैं लेकिन बाकी के दो घोड़े कहीं से मांग कर लाते हैं और सैन्य कर्मचारी को नज़रपेशी के दौरान गलत ढंग से दिखाकर दो घोड़ों का भत्ता लेने के बाद वही घोड़े दूसरे सैनिकों को दे देते हैं।  कुछ आपसी मिलीभगत का असर, कुछ घोड़ों की कद-काठी। भत्तों में होने वाली शिकायतें आम होती जा रही थीं। ऐसे कई घोड़े पिछले कुछ दिनों से कई-कई बार नजरपेशी के दौरान पकड़ में आये थे। एक दो सैनिक पकड़े भी गये घोड़ों के इस घपलेबाजी में लेकिन यह कहकर छूट गये कि एक ही नस्ल के होने के कारण पहचान में  गड़बड़ी हो रही है। हमें हमारा ही घोड़ा पहचान में नहीं आता तो नज़रपेशी  करने वालों को कैसे पता चलेगा।

    उधर टोडरमल ने शिकमी भूमि के बन्दोबस्ती का जिक्र दरबार में शुरू ही किया था कि बीरबल आते दिखे।  अकबर को "जैबाजी" करने के बाद बीरबल चुपचाप अपनी जगह जाकर बैठ गये। टोडरमल ने बोलना जारी रखा। मसल था "नसब" पत्थरों का जिन्हें जमीनों की पैमाइश के दौरान निशानी के लिये गाड़ा गया था, उनमें से कुछ पत्थर गायब हो गये थे। उन्हीं गायब पत्थरों पर टोडरमल कुछ कह रहे थे लेकिन किसी को उनके कहने में रूचि नहीं थी, अंदर ही अंदर सब को पता था नसब किये गये कुछ पत्थर यमुना किनारे पाये गये हैं जिन पर कि लोग कपड़े पटक-पटक कर धोते हैं। शहर कोतवाल को भी पता है कि नसब के पत्थर कपड़े धोने के पाटे के रूप में इस्तेमाल होते हैं लेकिन वो भी कुछ नहीं बोल रहा था। अंदर ही अंदर सभी जानते थे कि शाही कपड़े वहीं धुलते हैं। फिर कई बार उन्हीं पत्थरों से नदी किनारे एड़ियां रगड़-रगड़ कर मैल छुड़ाती बेगमें भी देखी गई हैं। कौन झंझट मोल ले।

   इधर श्वेतपत्र पढ़ा ही जा रहा था कि तभी दरबार के कोने से कुछ हंगामाख़ेज आवाजें आने लगीं। एक पल को टोडरमल रूके। फिर कुछ सोच कर श्वेतपत्र पढ़ना जारी रखा। लेकिन हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा था। अंतत: राजदरबार के संचालन का दायित्व निभा रहे मुल्ला दो-प्याजा ने शोर-शराबे को देखते हुए दरबार के कोने में अपने कुछ सैनिक भेजे कि देख कर आयें क्या मामला है। सैनिकों ने लौटकर बताया कि कुछ विरोधी हैं जो मांग कर रहे हैं कि राजा टोडरमल, शौचालय-भूमि को लेकर कुछ नहीं कह रहे जबकि हमें शौचालयों की बहुत जरूरत है। भूमि-बन्दोबस्ती में इस बार शौचालयों के लिये अलग से धन आबंटित किया जाय। मुल्ला-दोप्याजा ने हंगामे से जुड़ी खबर को सीधे अकबर के पास ब्रेक किया। अकबर ने एक पल को दरबार के उस कोने की ओर देखा और फिर चुप हो गये। टोडरमल जारी रहे। मुल्ला दो-प्याजा समझ गये क्या करना है। थोड़ी देर बाद कुछ सैनिक हंगामे की दिशा में जाते दिखे। और देखते देखते हंगामे की आवाजें कम से कमतर होती गईं। एकाध आवाजें आई भीं तो कुछ ऐसे जैसे किसी को थप्पड़ पड़ रहे हों। बाकि सब ठीक रहा।

    उधर श्वेतपत्र पढ़ना खत्म हो चुका था। अकबर ने बीरबल को इशारे से पूछा- "कहां थे अब तक" ? बीरबल ने भी इशारे में ही जवाब दिया जिसका मतलब था कि "ठंड रखिये, कहीं नहीं गया था"। तभी मुल्ला दो-प्याजा ने शाही घोड़ों के मामले से जुड़े मंत्री का नाम लिया कि -  "अब शिकायती पत्र पर फलाने अपनी बात रखेंगे"।

       मंत्री ने उठते ही कहा - "जहांपनाह, मुझे इस घपले की जानकारी बहुत पहले से है। गलत घोड़े दिखाकर उनके नाम पर भत्ता लेने से रोकने के लिये मैने घोड़ों को शाही निशान से दागना भी शुरू कर दिया था लेकिन पशु अधिकारों से जुड़े लोग आ पहुंचे और गर्म सील से घोड़ों के पुट्ठों को दागता देख भड़क गये। उन्होंने धमकी भी दी है कि जानवरों के साथ अत्याचार को लेकर हमारी शिकायत करेंगे। तब से हमने घोड़ों को गर्म सील से दागना रोक दिया है औऱ चाह कर भी गलत भत्ता लेने वालों पर अंकुश लगाने में हम कामयाब नहीं हो रहे। ढेर सारे सैनिकों और मनसबदारों को हमने इस धांधली के चलते पकड़ा भी है लेकिन वे भी सीनाजोरी पर उतर आये हैं। ऐसे ही एक मनसबदार को पकड़ कर दरबार में हाजिर कर रहा हूं। एक बार आप उसकी बातें सुनिये और फिर तय किजिए"।

      मनसबदार को पेश किया गया। आदेश पाकर मनसबदार ने कहना शुरू किया - "जहांपनाह, जहां तक बात गलत घोड़े दिखाकर भत्ता लेने की है तो इसमें मैं अपनी कोई गलती नहीं मानता। बल्कि एक तरह से इसे मैं अपने जहांपनाह की बड़ाई ही मानता हूं। उनके लिये ये मैं अपनी तुच्छ भेंट समझता हूं"।

उठंग कर बैठे अकबर अब जरा सीधे होकर बैठ गये। ये क्या कह रहा है। एक तो गलत घोड़े पेश करके भत्ता ले गया और उसे मेरी सेवा बता रहा है। कड़क कर पूछने पर मनसबदार ने कहा - "जहांपनाह, हमारे ढेर सारे सैनिक लड़ाईयों में मारे गये हैं। माली हालत के चलते दो-अस्पा, तीन-अस्पा सैनिकों की संख्या बढ़ा नहीं सकते क्योंकि बजट गड़बड़ा जायगा। लेकिन उनके नाम पर घोड़ों को भत्ता देने से हमारे दस्तावेजों में शाही सेना का आंकड़ा दुगुना तिगुना हो सकता है। इमानदारी से एक सैनिक, एक घोड़ा दिखाने पर हमारे घुड़सवार सैनिकों की संख्या बीस हजार होती है लेकिन जैसे ही दो घोड़े, या तीन घोड़े भत्ते सहित दिखा देते हैं तो अचानक संख्या चालीस हजार साठ हजार तक चली जाती है। सोचिये कि दुश्मनों का मनोबल तोड़ने के लिये ये संख्या कितनी असरदार है"।

अब जहांपनाह ने बीरबल की ओर देखा। हो न हो, बीरबल ने ही इन लोगों को सिखाया पढ़ाया होगा। उस समय तो बादशाह कुछ नहीं बोले। शाम के समय जब शाही बाग में बीरबल और अकबर साथ-साथ घूम रहे थे तभी अकबर ने पूछ लिया - "बीरबल, आज दरबार में तुम कहां से आए थे ? देर कैसे हो गई" ?

बीरबल ने कहा - "शौच के लिये जगह ढूंढ रहा था। न मिलने से देरी हो गई"।

"तुम्हें शौचालय ढूंढने में इतना समय लग गया ? ये तो कोई बात न हुई".

"जहांपनाह, यही तो बात है, आप किसी की बात समझना नहीं चाहते। जो लोग उधर शौचालय की मांग कर रहे थे, उन्हें तो आप के मुंहलगे मुल्ला ने ठोंक-पीट कर चुप करवा दिया। अब जो मनसबदार घोड़ों की धांधली में पकड़े गये हैं उनकी बात भी आप नहीं समझ कर मुझे जिम्मेदार मान रहे हैं"

"बीरबल, ऐसा नहीं कि मैं नहीं समझ रहा हूं। लेकिन दरबार में जब देश विदेश के राजा हों, शासक जुटे हों तो ऐसे में क्या शौचालय जैसी छोटी चीज का बवाल करना जरूरी है"  ?

"जहांपनाह, आप को तो इतने से ही लाज आ गई कि दरबार में बड़े बड़े लोग हैं और उनके सामने शौच की बात करना अच्छा नहीं। जरा सोचिये, कि हमारे राज्य में महिलाओं को जिन्हें खुले में शौच के लिये जाना पड़ता है, उन्हें सबके सामने से जाते हुए कितनी लाज लगती होगी" ?

"लेकिन बीरबल, हमारे यहां लोग शौचालय होने पर भी खेतों में लोटा लेकर जाते हैं। उसका क्या" ?

"जहांपनाह, एक बार आदत डाल दी जाय तो लोग लोटा लेकर बाहर जाना भी छोड़ देंगे"।

"रकम कहां से आयेगी, सुना है दुश्मन हमारे उपर हमले की फिराक में है, आगे बढ़ रहा है। हमें उस ओर भी तो देखना होगा"।

"देखिये, जरूर देखिये, लेकिन इतना जान लिजिए कि जब घोड़ों का फर्जी भुगतान किया जा सकता है तो शौचालयों का भी निर्माण किया जा सकता है, यह भी हो सकता है कि इधर आप शौचालयों के लिये गड्ढे खुदवायें उधर दुश्मन तक खबर पहुंचे कि आप लड़ाई के लिये खंदक खुदवा रहे हैं, इस खबर से ही वो हदस कर खुद-ब-खुद पीछे हट जायगा। एक तरफ शौचालय भी बन जायगा और खंदक खुदने की खबर से दुश्मन ताकतें भी पस्त हो जायेंगी"।

"हम्म....बात तो सही है, ऐसा किया जाय बीरबल कि जब इतना सब कर रहे हैं तो उन शौचालयों में इत्र का भी छिड़काव कर दिया जाय"।

"नहीं जहांपनाह, आप शौचालय बनवा दिजिए, वही बहुत है। इत्र-फुलेल की बजाय लोगों को रूमाल, गमछे आदि बंटवा दिजिए। इससे बुनकरों को रूमाल बनाने का भी काम मिलेगा। बेरोजगारी की समस्या भी हल हो जायगी"।
"बीरबल तुम्हारे सलाह से तो आज दिल खुश हुआ जा रहा है। इतनी सारी समस्याएं एक साथ सुलझा दीं। खंदकों के नाम पर शौचालय बन रहा है, डरकर दुश्मन भी भाग खड़े होंगे। रूमाल बंटवाया जायगा जिससे कुछ हद तक बेरोजगारी की समस्या भी हल होगी। उधर कीमती इत्र शौचालयों में बहने से बच गया सो अलग। बताओ, क्या चाहते हो। क्या इनाम दूं" ?
  "जहांपनाह, यही चाहता हूं कि रूमालों का टेंडर पास करते समय रिश्तेदारी मत निभाने लगना वरना हर बार की तरह आपके सगे वाले को ही टेंडर मिलेगा और वो महीन शाही रूमाल देने के नाम पर शौचालय की कीमत से कई गुना कीमत सिर्फ रूमाल का ही लगायेगा। इसलिये रूमाल दें या न दें, इत्र छिड़कें या न छिड़कें, शौचालय जरूर बनवायें। वो देखिये जहांपनाह, फिर कोई शाही किले से अपने एड़ी का मैल छुड़ाने जमुना की तरफ जा रही है, रोकिये उन्हें। वो जमीन की पैमाइश वाले नशबी पत्थर हैं, एड़ी रगड़ने वाले पत्थर नहीं"।

"जाने दो बीरबल, आज तुमने मेरा दिल खुश कर दिया। इस खुशी के मौके पर मैं कोई टंटा नहीं चाहता"।

"हां, जहांपनाह। सब ऐसे ही चलने दिजिए। किसी को एड़ी रगड़ने में सुख मिलता है किसी को खुद को एड़ी बचाने में। आप बचाकर ही खुश रहिये, अगली बार बजट में जनानखाने  से जमुना तक जाने के लिये शाही कॉरीडोर का भी इंतजाम रखियेगा"।
- सतीश पंचम
( यह झलकी एक गल्प मात्र है। इसे ज्यादा सिरियसली न लें। वैसे भी देश की चिंता करने और  इस तरह के गल्प गढ़ने में सिरियसनेस की जरूरत नहीं पड़ती :-)

Tuesday, February 26, 2013

फिल्म नया दौर के हालात और राजनीतिक चिलगोजईयां

     फिल्म नया दौर का वो सीन याद है जब सडक बनाने को लेकर विवाद हो गया था, विलेन (जीवन) किसी भी हालत में सडक बनने नहीं देना चाहता था क्योंकि इससे उसके बस के मुकाबले तांगे वालों को रोजगार मिल सकता था और उसकी खुद की चल रही बस की सवारी कम हो सकती थी, यदि आप फिर वही सीन याद करें तो हूबहू आज के ताजा हालात से मेल खाते दिखाई देंगे, यहां तक की फिल्म के डॉयलॉग तक अकल्पनीय रूप से ऐसे लगेंगे जैसे आज की परिस्थतियों को देखकर कहे जा रहे हैं।

   नया दौर फ़िल्म में यदि आप लोगों को याद हो तो सडक नहीं बनने देने के लिये विलेन (जीवन) ने अपने साथी पंडित को इस काम पर लगा दिया, उस पंडित का कमाल देखिये, एक देवी मां की मूर्ति ठीक उस जगह जमीन खोद कर गाड़ दी जहां से सडक गुजरने वाली थी, बस फिर क्या था, अगले दिन जब सडक बननी शुरू हुई तो बीच सड़क देवी मां की मूर्ति निकल आने से सभी गांव वालों में हडकंप मच गया, सभी लोग हतप्रभ रह गये, किसी को देवी मां का चमत्कार लग रहा था तो कोई कह रहा था अब यहां मंदिर बनेगा, और इस मंदिर बनाने के लिये जोरदार आवाज उठाने वालों में वह विलेन और उसका साथी पंडित बढचढ कर बोल रहे थे, विलेन तो देवी मां के मंदिर बनाने के लिये बंदूक तक तान बैठा। कई लोगों को लगा यहां मंदिर ही बनाना चाहिये नहीं तो देवी नाराज होंगी, इस हंगामे को बढते देख लोगों ने बीच बचाव किया, जुम्मन चाचा जो कि मुसलमान थे , उन्होंने फिल्म के हीरो शंकर (दिलीप कुमार) को मनाया कि रहने दो बेटा, लडाई झगडा मत करो , मंदिर ही बन जाने दो, हम कोई और रास्ते से सड़क बना लेते हैं।

अब शंकर का कहना था कि, मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये बने हैं, ना कि रास्ता रोकने के लिये. लेकिन अब क्या किया जाये.......वो सामने वाली जमीन गोपाल की है जिसका हमसे बैर चल रहा है, वो भला क्यों दे सड़क बनाने के लिये अपनी जमीन ।

    तब किसी तरह मौके पर मौजूद पत्रकार जॉनी वॉकर पहल करते हैं कि चलो मैं शुरू करता हूं सडक बनाना, पहले कुछ शुरूवात तो करो,........ लेकिन अभी पत्रकार महोदय ने शुरूवात ही की, कि एक लाठी बज गई....... गोपाल ने पत्रकार को रोक दिया, साथ ही ताकीद भी कर दिया ,  अगर किसी ने यहां से एक कदम भी मेरी जमीन पर रखा तो लाशें बिछ जाएंगी , तब शंकर (दिलीप कुमार) आगे बढ कर कहते है.- गोपाल, घर के लोग आपस में भले ही झगडा करें लेकिन जब कोई बाहर वाला आता है तो दोनों उससे मुकाबला करने के लिये एक हो जाते हैं......बस्ती की ईज्जत तुम्हारे हाथ में है गोपाल। और फिर क्या था, गोपाल ने परिस्थितियों को देखते हुए , रोजगार आदि के हालात को समझते हुए न सिर्फ शंकर के गले मिल लिया बल्कि, सडक के लिये ये तक कह दिया -मेरी जमीन से बनाओ सडक, देखता हूं कौन रोकता है...........और सडक को जब गोपाल की जमीन से बनाया जाने लगा तो पहले वाली सड़क के मुकाबले इस सड़क की दूरी और कम हो गई......यानि दिल और जमीन दोनों की ही दूरियां घट गई।

     अब जरा आज के हालात को देखा जाय, सेतू समुद्रम के नाम बवाल करने वाली पार्टियां क्या उस पंडित की तरह व्यवहार नहीं कर रही हैं जिसने रास्ता रोकने के लिये भगवान के नाम का सहारा लिया । इसी मुद्दे पर जब इन पार्टियों द्वारा तोडफोड किया जाता है तो उस विलेन (जीवन) की याद आ जाती हैं जिसनें भगवान के नाम पर रास्ता रोकने के लिये बंदूक तक उठा लिया। शंकर का यह कहना कि "मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये हैं रास्ता रोकने के लिये नहीं" - अपने आप में आज की हकीकत को बयान कर रहे हैं,

   याद रहे - सेतू समुद्रम के बनने से न सिर्फ रोजगार ही बढेगा (तांगे वालों का तरह) , बल्कि उससे , जहाजों के आवागमन में दूरी भी घटेगी (ठीक नया दौर की सडक की तरह), इससे जहाजों में लगने वाले ईंधन की खपत भी कम होगी, और पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा।



    सवाल उठाया जा सकता है कि हमेशा हिंदू ही क्यों झुके। वही क्यों हमेशा अपने प्रतीकों की कुरबानी दे ? मुसलमानों से जुड़े प्रतीकों को कोई नहीं छूता। तो यहां मैं अपनी ओर से इतना ही कहूंगा कि यह झुकना झुकाना राजनीतिक चोंचले हैं। राजनीतिक फैसलों के लिये तुष्टीकरण के लिये इस्तेमाल होते रहे हैं वरना क्या मजाल थी कि दिल्ली शहर में ही रातों-रात मस्जिद खड़ी हो जाती और अदालती आदेश के बावजूद मुख्यमंत्री दलील देकर रह जांय कि पुलिस फोर्स कम है। यह विशुद्ध रूप से राजनीतिक तुष्टिकरण का खेल था। पहले भी खेला गया। आगे भी खेला जायगा। लेकिन उसके चक्कर में हम अपना विवेक क्यों खोयें। जो उचित है, जो सर्वजनहिताय हैऐसे फैसलों से पीछे हम इसीलिये हट जांय कि पहले उसके प्रतीक को नष्ट करो फिर हम अपने को छूने देंगे तो हो गया विकास। फिर तो लौट ए मुसाफिर, चल खोदें गड्ढा। कुछ तू गिर कुछ मैं गिरूं।

      बाद में अपनी पिछली पीढ़ियों को जैसे हम दोष देते हैं कि कम्बख्तों ने देश को बांट कर रख दिया, नासूर छोड़ गये, ये कर गये, वो कर गये, वैसे ही हमारी आगे की पीढ़ी हमें दोषी मानेगी कि तमाम संसाधन इस्तेमाल कर लिये, कोयला, गैस कुछ नहीं छोड़ा और बदले में हम लोगों के लिये छोड़ गये कट्टरता, अहमकपन और फ़जूल की लफ़्फाज़ी। अब हम जूझते रहें पुराने मसलों को लेकर। 

- सतीश पंचम

( 15 August 2008 के दिन इस पोस्ट को पहले भी लिखा था। तब भी सेतु समुद्रम को लेकर बवाल उठा था। तब भी चिलगोजइयां चल रही थीं। इन दिनों फिर मामला उठ रहा है। अत: थोड़े बहुत बदलावों के साथ पुन: पब्लिश्ड )

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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