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Sunday, July 14, 2013

Who cares का पर्यायवाची शब्द, अदालती किस्सा.....बनारस यात्रा - 5

    सुबह जब बनारस कैंट से दशाश्वमेध घाट की ओर मोटरसाईकिल से जाने लगे तो रास्ते में पेट्रोल भरवाने की सोचा गया। हल्की शीतल हवा चल ही रही थी। एक पेट्रोल पंप दिखा तो गाड़ी वहीं पंप की ओर मोड़ दी गई। वहाँ पहले से एक कुर्ता पायजामा पहने शख्स अपनी मोटरसाईकिल में पेट्रोल भरवा रहे थे। जब पेमेंट करने की बारी आई तो उन्होंने हजार का नोट निकाला। पेट्रोल पंप पर नकदी इकट्ठा करने वाले शख्स ने पूछा कि "छुट्टा नहीं है क्या ?"

   "अरे अऊर कहाँ छुट्टा मिली आर.....इहीं से न लेंगे कि कतहूँ अन्ते जाय के लेवै के परी" - कहने के बाद वह सज्जन हम लोगों की ओर हंसकर ताकने लगे। हमने भी जवाब में मुस्कराने के बाद उन सज्जन का ही पक्ष लिया कि - "हाँ और क्या, हजार का छुट्टा यहाँ नहीं मिलेगा तो और कहाँ से मिलेगा"

  हमारी बात से प्रोत्साहित हो वे सज्जन हमसे सीधे मुखातिब हुए - "कभ्भौं भी डॉक्टर, पुलिस, ओकील, "टीसी-फीसी" के सामने बड़की नोट लेयके न जायके चाही, भोसड़िया वालेन कुल झार लेथेन.....तोहका नंगा कइके छोड़ देइहंय ई जानि ल्यौ........एही नाते बड़की नोट "पेटरऊल पंपे" खातिर रक्खे हई.....सदा सर्वदा से"  ( कभी भी डॉक्टर, पुलिस, वकील, टीसी-फीसी के सामने बड़ी नोट नहीं निकालनी चाहिये, सब ले लेंगे, झाड़ कर तुम्हें नंगा कर देंगे ये जान लो, इसी वजह से मैं बड़ी नोटें हमेशा से पेट्रोल पंप के लिये रखता हूँ)

  उनकी बातें सुन हम तो हंसे ही पेट्रोल पंप वाला भी मुस्कराये बिना न रह सका। वह सज्जन आगे जारी रहे - "अरे सच कहात हई भाय, अबहांय ओकीले किहां जा और बड़की नोट झलकाय द त सार लेहे बिना छोड़े न। तबहीं न कहा बा कि - "अदालत"….. '' माने आवा, '' माने पईसा द, '' माने मोकदिमा लड़ा, अऊर '' माने तबाह होई जा। अरे इहै कुल न देखे हई। बकि एक बात बा, ई अदालती खिसा (किस्सा) उही खातिर जे समझदार होय। जो न समझे उ जाय लांड़ चाट के काना होय" ( सच कहता हूँ बंधु, अभी वकील के यहाँ जाकर बड़ी नोट दिख जाय तो वह लिये बिना छोड़ेगा नहीं। इसीलिये तो कहा गया है अदालत। अ माने आओ, द माने पैसा दो, ल माने मुकदम लड़ो, और त माने तबाह हो जाओ। लेकिन ये कहानी सिर्फ उसी के लिये जो समझदार हो, न समझे तो जाय लांड़ चाट कर काना हो )   

    सुबह-सुबह प्राप्त इस दिव्य ज्ञान को सुन हम सभी ठठाकर हंसे। पेट्रोल भरा गया। वे अपने रास्ते, हम अपने रास्ते। रास्ते भर हम लोग उन बातों को डिस्कस करते गंगा घाट की ओर बढ़ रहे थे। बाद में जब इन सज्जन की बातों को फेसबुक पर मैंने शेयर किया तो ज्ञानदत्त जी का कमेंट आया - "आप तो बरनार्ड शॉ के यूपोरियन अवतार से मिले! आप अपने को धन्य माने इन सज्जन से मिल कर" !

   उधर गंगा घाट पर बढ़ने के दौरान ही गिरिजेश जी को फोन किया गया कि हम लोग पहुंच रहे हैं, आप भी पहुँचिये। गाड़ी पार्किंग में खड़ी करने के बाद फिर से हेलमेट लटकाने की बात पर सोच विचार हुआ कि दो हेलमेट ऐसे ही हैंडल के अगल बगल टांग कर हम लोग जा रहे हैं। लॉक भी नहीं लिया घर से कि उसी के सहारे निश्चिंत हो सकते। अभी भ्राता श्री से अपनी दुविधा प्रकट ही कर रहा था कि जनाब खीझ कर बोले - "हेलमेट ले जाये तो 'लांड़े से'.... चलो नहाने....बाद में देखा जायगा"।  भ्राता श्री की बात से दिव्य ज्ञान हुआ कि समूचा पूर्वांचल अंग्रेजी के "Who Cares" का पर्यायवाची "लांड़े से" मानता है। ऐसे कई शब्द-युग्म हैं जो सुनने में भले अश्लील लगें लेकिन सफल संवाद कर ले जाने में सहायक और अपने आप में मौलिक हैं :-)

  घाट पर पहुँचने के बाद नहाने के लिये योग्य स्थान की तलाश की जाने लगी। कहीं महिलाएं नहा रही थीं तो कहीं कपड़े बदल रही थीं। एक जगह पुरूषों का जमघट दिखा तो हम लोग उसी ओर बढ़ चले कि यहां नहाने में सुविधा रहेगी। लेकिन वहां भी कई महिलायें दिखीं। सो इधर उधर हम लोग तय नहीं कर पा रहे थे कि किस ओर चला जाय। तब तक पंडों ने घेरना शुरू कर दिया था। आईये, आप को पूजा अर्चना यहीं करवा देंगे। कपड़े यहीं रखिये, बेफिक्र होकर जाइये। अब हम पूजा अर्चना के लिये तो आये नहीं थे। उद्देश्य था केवल नहाना, और लगे हाथ गंगा जी को प्रणाम कर अपने उस सनातन संस्कार को मान देना जिससे अब तक जाने-अनजाने दो-चार होते आये हैं। भ्राता श्री का कहना था, यहीं कपड़े रखो, मैं कपड़े देख रहा हूं, मोबाइल वगैरह छोड़ छाड़कर जाओ नहाओ। बाद में मैं नहाउंगा। वैसे ही किया गया। आसपास महिलायें थी सो मैं सफेद गमछा लपेट आगे गंगा जी की सीढ़ियों की ओर उतरने लगा। तब तक भ्राता श्री की चुटीली आवाज सुनाई पड़ी - "अरे यार गमछा उतार कर अंडरवियर पर ही जाओ। नहीं तुम्हारा निहारने के लिये कोई आतुर है.....और देख ही लेगा कोई तो "घिस" नहीं जायगा"

    उधर अब गमछा उतार कर केवल अंडरवियर पहने बीस पच्चीस सीढ़ियाँ उतरना मुझे असूझ लगने लगा। गमछा हटाने से मैंने मना कर दिया और वैसे ही सीढ़ियाँ उतरता गया। पानी में कई लोग छपा-छप कूद रहे थे। कुछ डुबकी लगा रहे थे। कुछ महिलायें भी स्नान कर रही थीं। थोड़ा सा हटकर बचते बचाते मैं भी पानी में जा कूदा। पानी थोड़ा गंदला था लेकिन वहां यह सब सोचने का वक्त नहीं था। दो चार डुबकी के बाद, अच्छे से नहाने के बाद मैंने ध्यान दिया तो कमर में गमछा था ही नहीं। केवल अंडरवियर ही था। थोड़ी नजर दौड़ाई तो पास ही गमछा सतह पर तैरता दिखा। झपटकर गमछा पकड़ा। फिर से हल्का से कमर में लपेटने के बाद अबकी फाइनल डुबकी लगाई। उधर सूरज उगना शुरू हो गये थे। आंख मूंद कर नमन करने के बाद गंगा जी को प्रणाम कर फिर सीढ़ियों की ओर बढ़ा। उपर सीढ़ियाँ चढ़ते फिर एक बार गमछा व्यवस्थित किया। भ्राता श्री मेरी ओर देख हंस रहे थे। शायद अंडरवियर+गमछे में कुछ ज्यादा ही फन्नी लग रहा था।

   उपर सीढ़ियों के पास पहुँच कर कपेड़ बदला। भ्राता श्री को नहाने भेजा और मैं कपड़े, मोबाइल की रखवाली में लग गया। उसी दौरान फोन किया तो पता चला गिरिजेश महाराज अभी आस-पास ही हैं, बस पहुँचने ही वाले हैं...... 

जारी.....

11 comments:

संजय अनेजा said...

'I care' का पर्यायवाची क्या होगा, उत्सुकता बढ़ गई है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त

सतीश पंचम said...

संजय जी,

बड़ा कठिन प्रश्न पूछे हैं। I Care का पर्यायवाची संभवत: उसी अंदाज में पता चलेगा जिस अंदाज में झटके से Who care का पता चला था :-)

prkant said...

पूर्वांचल who cares के बदले में .......कह कर दक्खिन झटक देता है;-)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बढिया चल रहा है बनारसी अंदाज में

P.N. Subramanian said...

रोचक प्रसंग के बाद गंगा स्नान हो गया. शुद्धिकरण की आवश्यकता जो थी.

ताऊ रामपुरिया said...

दिव्य ज्ञान हुआ कि समूचा पूर्वांचल अंग्रेजी के "Who Cares" का पर्यायवाची "लांड़े से" मानता है। ऐसे कई शब्द-युग्म हैं जो सुनने में भले अश्लील लगें लेकिन सफल संवाद कर ले जाने में सहायक और अपने आप में मौलिक हैं :-)

देशज भाषा किसी विदेशी भाषा से कहीं भी कमतर नही है, आपकी बनारस यात्रा तो लगता है काशी का अस्सी को भी पीछे छोड देगी.:)

लाजवाब, पढने में आनंद आरहा है.

रामराम.

Abhishek Ojha said...

सारे भाग आज ही पढ़ा ... बिलकुल मस्त ... जारी रहे :)

रीडर ख़त्म होने के बाद… पोस्ट तक आने में असुविधा होने लगी है.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अंडवि‍यर के ऊपर गमछा भी !!!

आप बनारस के लि‍ए मि‍सफ़ि‍ट हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा नोट अपने लिये सुरक्षित स्थान ढूढ़ लेता है, गरीब के हाथ रहेगा तो सदा टूटने का डर बना रहेगा। बड़ी तिजोरी में जाकर गरीब को देखकर बोलता होगा, Who cares.

रोचक..

अनूप शुक्ल said...

गमछा कथा चकाचक है। उसकी फ़ोटू कहां है? :)

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