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Thursday, July 4, 2013

केन्द्रीय तोता v / s प्रादेशिक एमू

    उत्खनन के दौरान मिले अभिलेखों के अध्ययन से पता चलता है कि चार हजार वर्ष पूर्व किसी का फेक एनकाउन्टर किया गया था जिसे लेकर तत्कालीन राज्य एंव केन्द्र सरकार आमने सामने आ गये थे। इसी से जुड़े तथ्यों में किसी सफ़ेद दाढ़ी और काली दाढ़ी वाले दो लोगों की भी चर्चा आई थी लेकिन पता नहीं चल सका कि वो दो लोग कौन थे।

     वहीं इतिहासकारों के दूसरे धड़े का मानना है कि जब यह हंगामा मचा था उसके दस बारह दिन पहले ही लोग गंभीर प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे थे, कई हजार लोग डूबे, कई हजार लोग लापता हुए, कईयों के घर द्वार बह गये लेकिन उन सब बातों की ओर तवज्जो न देते हुए तत्कालीन मीडिया ने उस फेक एनकाउन्टर को मुद्दा बनाया था। इससे तत्कालीन समाज के न्यायप्रियता की पुष्टि होती है। 

     वहीं इस विषय पर पीएचडी करने वाले छात्रों का मानना है कि कि तत्कालीन समाज में न्याप्रियता, करूणा, वीरता आदि केवल मन बहलाने वाली बातें थीं। दरअसल सारा मामला मौका परस्ती का था। जिसे जहाँ मौका मिलता सामने वाले को अपने हिसाब से रगेद देता था और यह मामला भी कुछ-कुछ वैसा ही था।   

    वहीं इन छात्रों के गाईड श्री लल्लन जी 'खड़खड़िया' का मानना है कि उस काल में लोग अपनी जान किसी तोते में या चिड़िया में रखते थे। तत्कालीन केन्द्र सरकार तब तोता पालन उद्योग को इसीलिये बढ़ावा भी देती थी क्योंकि उसकी खुद की जान किसी जांच एजेंसी के तोते में बसती थी। राज्यों के किसी शख्स को घेरना हो तो केन्द्रीय तोते ही काम आते थे । वहीं राज्य सरकारें भी कम नहीं थी। उनके पास भी लंबी-लंबी टांगों वाले एमू पक्षी थे जो उड़ भले न पायें, दौड़ अच्छी लगाते थे। नतीजतन, राज्यों में एमू पालन केन्द्र चलते थे। अपवाद स्वरूप ढिल्लीका जैसे क्षेत्र थे जहां के एमू केन्द्र के अधीन आते थे। यही कारण था कि ढिल्लीका राज्य की शासिका जब तब अपने यहां होने वाले अपराधों से हाथ खड़े कर देती कि हमारे पास एमू पालन का अधिकार नहीं है, हम मजबूर हैं। हमारे अधिकार क्षेत्र में एमूओं को दिजिए।

      वहीं ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि राज्यों के बाड़ों में पलने वाले प्रादेशिक एमू जब अपनी लंबी टांगों से किसी को ठोकर मार कर चित्त करते थे तो मालिक को बताने से नहीं चूकते थे कि  यह आप ही को मारने आया था सो हमने पहले ही उसे मार दिया। नतीजतन मालिक भी खुश हो जाता था।  बाद में एमूओं के मुकाबले केन्द्रीय तोतों का उत्पात बढ़ता गया और एमू मालिकों की शिकायतें होने पर तोते को केन्द्रीय सत्ता के प्रभावों से मुक्त करने की बातें भी हुईं लेकिन प्रथम तो तोता ही मुक्ति नहीं चाहता था और केन्द्र खुद भी अपने हाथों से तोते उड़ाने के लिये तैयार नहीं था।

  कालांतर में एक रूपरेखा जरूर बनी थी कि तोते को मुक्ति दी जाय लेकिन बाद में क्या हुआ इस पर इतिहास अभी मौन है। 

( ईसवी सन् 6020 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )

- सतीश पंचम 

7 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

प्रवीण पाण्डेय said...

इतिहास खनन करेगा और मनन भी, आनन्द भी उठायेगा, जीभर के।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

कुछ दिनों बाद राज्य सत्ता के मालिक को केन्द्र की सत्ता में जगह मिल गयी। उसने अपने राज्य के अनेक एमुओं को केन्द्र के पिजड़े में लाकर तोतों के साथ रख दिया। कुछ ही दिनों में वे सभी एमू तोता बनकर उड़ने लगे।

देश की न्यायपीठ ने सिर पकड़ लिया और केन्द्र के नियन्त्रण में पिजड़ा रखने की व्यवस्था को ही समाप्त करने का आदेश दिया लेकिन इसे मानने को सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनो राजी नहीं हुए।

(उसी उत्तर पुस्तिका से)

indianrj said...

बेहतरीन व्यंग्य।

smt. Ajit Gupta said...

तोते को लोग उड़ाने के फिराक में है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ये भी पता चला तो ज़रूर होगा कि‍ केंद्रीय तोते प्रांतीय तोतों पर हमेशा बीस ही पड़ते थे और एमुओं का क्‍या है वो तो वेचारे जहां तहां यूं ही वि‍चरण करते पाए जाते थे जि‍न्‍हें जब चाहे कोई भी तोता नकेल डाल ले जाता था...

अनूप शुक्ल said...

काली दाढी और सफ़दे दाढी के साथ भूरी दाढी के चर्चे भी होने चाहिये। :)

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