सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, July 2, 2013

मार-कुटाई वाले अंडरवियर.....इति विज्ञापन गाथा :-)


      अभी  कल  फेसबुक  पर  एक  स्टेटस अपडेट किया था जिसमें एक अंडरवियर वाले होर्डिंग का जिक्र था। उस होर्डिंग में दिखाया गया था कि एक बंदा किसी कंपनी का अंडरवियर पहन कर अपनी बलिष्ठ भुजाओं से सलाखें टेढ़ी कर रहा था। उस विज्ञापन को देखकर लग रहा था कि मानों कहना चाहता हो कि हमारी कंपनी का अंडरवियर पहनोगे तो जेल में हुई कुटम्मस के बाद भी तुम्हारी पौरूष ग्रंथि बची रहेगी और जेल की सलाखें टेढ़ी कर सकने वाली वह ताकत सिर्फ हमारी कंपनी का अंडरवियर पहनने से मिलेगी।  

   यह तो रहा विज्ञापन का एक पक्ष। इसका दूसरा पक्ष भी हो सकता है कि हमारी कंपनी का अंडरवियर पहनोगे तो अपनी प्रेमिका के कमरे की सींखचे तोड़कर भी पहुंच सकते हो। और यदि कोई उसके अभिभावक आ जांय तो सींखचे तोड़ कर भाग भी सकते हो। लेकिन हमारी कंपनी का अंडरवियर पहने रहोगे तब अन्यथा पकड़ाये जाओगे। कुटम्मस होगी। आस पड़ौस में चार बात फैलेगी। इससे अच्छा है कि हमारी कंपनी का अंडरवियर पहन लो।

  इस तरह से देखा जाय तो वह कंपनी तो भारते के मजनूओं के लिये अच्छा ही सोच रही थी। लेकिन यह विज्ञापन दस साल पहले आता तो चलता। अब तो लिव इन का जमाना है। कहां कोई किसी से सींखचे तोड़ कर मिलने जाता है। हाँ, चोर-चाईयों के लिये जरूर यह विज्ञापन हो सकता है कि चोरी करने जाओ, सेंध लगाने जाओ तो हमारा अंडरवियर पहनकर जाना।

     अब सवाल उठता है कि तब वो टीवी पर मजबूत टीएमटी सरियावाले विज्ञापनों का क्या होगा। उन्हें तो प्रतिविज्ञापन कैंपेन करवाना पड़ जायगा कि भईया हमारी कंपनी का सरिया तो किसी फलाने कंपनी वाले अंडरवियरी पहलवान के द्वारा भी टेढ़ा नहीं किया जा सकता भले वो पहलवान चार-पांच अंडरवियर एक साथ ही क्यों न पहने हो। हमारा सरिया आलरेडी एन्टी अंडरवियर वाले तत्वों से मिश्रित है। वह सरियों को किसी अंडरवियर पहने पहलवानों द्वारा टेढ़ा किये जाने से बचाये रखता है।

   इसी बीच जेहन में बात आती है कि आखिर ये बनियान-अंडरवियरों वाले विज्ञापन इतने उत्पातिया क्यूं होते हैं ? अंडरवियर पहना नहीं कि मार-कुटाई शुरू। कोई अपना लक पहन कर चलने कहता है तो कोई कहता है ये अंदर की बात है। एकाध तो ऐसे भी हैं कि जिन्हें देखकर लगता है कि सृष्टि में बस यही अंडरवियर ही है जिसे महत्व देना चाहिये वरना इस दुनिया में बाकी कुछ अब रहा नहीं है। जीयो तो अंडरवियर के लिये, मरो तो अंडरवियर के लिये।  अंडरवियरवै सर्वस्व.... 

 खैर, स्टेटस तो स्टेटस ठहरा। उसमें मजेदार कमेंट भी आये। पद्म सिंह जी का कहना था कि इसका तो ये मतलब हुआ कि अंडरवियर उतारा तो सारी ताकत ठुस्स। अवनीश सिंह जी का कहना था कि - अंडरवियर का लोहा या लोहे का अंडरवियर। इस पर याद आया कि कभी बाँस के बने अंडरवियरों पर भी पोस्ट लिखा था। तब बाँस के रेशों से बने अंडरवियर पर देहात हैरान था। अब लोग लौहधर्मिता वाले अंडरवियरों से हैरान हैं कि ऐसा क्या है जिसे पहनने से लोहे का सरिया तक टेढ़ा कर देने की ताकत आ जाती है। फिर तो स्कूलों में बच्चों को विटामिन डी, बी, सी वगैरह फालतू में पढ़ाया जाता है। पता नहीं पाठ्यक्रम निर्धारित करने वालों की दृष्टि से यह विज्ञापन कैसे छूट गया।

    बहरहाल वह विज्ञापन और वो उसका टुटहा पुटहा दिमाग वही लोग जानें। अभी तो इसी तरह के अंत:वस्त्रीय मसले को लेकर भिखारी ठाकुर पर रचित किताब "सूत्रधार" के पृष्ठ 149 में दिलचस्प संवाद  देखिये। मजाक-मजाक में ही पति-पत्नी के बीच बनी शक की दीवार को लेकर "जेंडर इक्वलिटी" वाला न्याय खुलिहार कर रख दिये हैं भिखारी ठाकुर जी। आनंद लिजिए.......।     
  
साभार : सूत्रधार , पृष्ठ - 149, मूल्य - 250/-  राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

"आखिर परदेश वाले पति तो अपनी पत्नियों को ताला लगाकर जाते नहीं।

"लगाते हैं"

"कहाँ ?"

"गुजरात कि का तो राजस्थान में ! लोहे का कमर-कच्छा जिसमें ताला बन्द कर चाभी अपनी जेब में रखकर देशावर गए। का जाने कब लौटें। तब तक खजाना में कोई चोर न घुसे। लौटकर आए तो ताला खोला। अपना काम किए, फिर जाने लगे तो फिर ताला-कुंजी"

"ए भाई, ई तो बढ़िया उपाय है। और पैखाना पेशाब ?"

"ओकर जगह बनावल रहेला" (उसकी जगह बनी होती है)

"तब तो एक ताला औरत के पास भी होना चाहिए, ताला बन्द कर बिदा किया। इसकी चाभी उनकी जेब में, उसकी चाभी इनकी करधनी में, लौटने पर दूनो ताला साथे में खुले। तब ना हो सकेगा न्याय…."


  - सतीश पंचम

5 comments:

अनूप शुक्ल said...

जबर व्यंग्य। :)

smt. Ajit Gupta said...

गजब व्‍यंग्‍य है।

सञ्जय झा said...

khoob 'nyay' kiye hain.......


jai ho.

प्रवीण पाण्डेय said...

अण्डरवियर का प्रचार था कि उसके अन्दर के खुजली पाउडर का।

soni garg goyal said...

भरपूर हास्य

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.