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Friday, July 26, 2013

इन्तजार-ए-लमही.....बनारस यात्रा - 9




      लमही में मुंशी प्रेमचंद स्मृति द्वार से प्रवेश करते ही सबसे पहले नजर पड़ी मुंशी प्रेमचंद उद्यान पर। उद्यान की हालत ठीक-ठाक ही लगी। उद्यान के बोर्ड को देख लगता था जैसे इसे जब तब पोस्टरों से ढंक दिया जाता होगा। कुछ "नुचे-चिथे" पोस्टरों के अंश उस बोर्ड पर भी दिख रहे थे। 




       आगे  बढ़ते  ही  सड़क  के  दोनों  ओर  बाजार  नजर  आया।  कहीं  सब्जी  बिक  रही  थी  तो  कहीं मछली।  कहीं  कसाई  की  दुकान  थी  तो  कहीं  दूध  की।  बाजार  में  ज्यादा  भीड़  तो  नहीं  थी  लेकिन  लोग  आते  जाते  दिख  रहे  थे।

   


  बाजार से होकर आगे बढ़ने पर एक जगह बोर्ड दिखा जिस पर लिखा था कि यह मुंशी प्रेमचंद का पैतृक निवास है। वहीं गाड़ी खड़ी की गई। आगे पैदल चले। सफेद चूने से रंगे घर के दरवाजे बंद थे। दीवार पर किसी विद्या कोचिंग सेन्टर का उखड़ा पोस्टर का अंश नजर आया।

मुंशी प्रेमचंद के घर के सामने बना शिवाला
मुंशी प्रेमचंद जी का पैतृक निवास
 ध्यान से देखने पर कुछ और कोचिंग सेन्टरों के और भी छूटे-बिछड़े अंश नजर आये। इत-उत देखने के बाद नजर पड़ी सामने के शिवाला पर। देखने में लगा कि शायद किसी अति उत्साही 'मनुक्ख' ने पीले रंग के ऑयल पेंट से मंदिर की दीवारें रंगने के बाद उन पर बोल-बम आदि की भरमार कर दी हो। 


    जहां तक मैं समझता हूँ, इस रूप में मंदिर देख भक्ति भाव कम ही उपजता होगा। मंदिर जितने साधारण, सौम्य दिखें, उनकी निर्मलता उतनी ही अधिक प्रतीत होती है। बहुत संभव है यह मंदिर शुरूवात में सौम्य ही लगता हो, लेकिन पीले रंग के ऑयल पेंट ने इसमें कृत्रिमता ला दी।


  आगे बढ़कर देखा गया तो मुंशी प्रेमचंद स्मारक नजर आया। स्मारक का गेट बंद था। गेट के ठीक सामने सड़क उस पार लोहे की जाली से ढंका कुआँ नजर आया। कुएं के जालीदार मुहाने से मदार, पीपल, बेर जैसी बॉटनी बिरादरी सूरज से बतियाने के लिये अंकुआती नजर आई, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब यह कुआँ त्याग दिया गया है। 
    

    वहीं पास ही के मकान की छाँह में कुछ कुत्ते छाँव में बैठे नजर आये। उनके हाव-भाव देखने से लगता था जैसे उन्हें हम जैसे बाहरी लोगों के गाँव में आने पर कोई आपत्ति न थी। हो सकता है बाहरी लोगों को अक्सर देखते रहने की आदत पड़ गई हो। बगल के नल के नीचे कुछ बच्चे भीषण गर्मी में तरी लेते दिखे। छई-छई-छपाक।
ठीक घर के सामने बना उजाड़ दवाखाना

स्मारक के ठीक सामने बना इलैक्ट्रो होम्योपैथ क्लिनिक
   हम लोग वहीं खड़े होकर देख रहे थे कि किससे गेट खुलवाया जाय, तब तक जालीदार कुएँ से सटे, घास-फूस को छतों पर आश्रय देते  मकान पर नजर गई जहां एक बोर्ड लगा था- इलैक्ट्रो होम्यौपैथिक क्लिनिक। उसकी दीवार पर नीले रंग में सूचना दर्ज थी कि "यहाँ पर बच्चों और स्त्रियों के रोग, बाँझपन, पेट के रोग, अलसर, चर्म रोग, सफेद दाग, दमा, सायटिका, कान बहना, मुहाँसा, स्वप्नदोष, नपुंसकता..... सिरदर्द आदि नये पुराने रोगों का इलाज होता है" दरवाजे के बगल में समय भी लिखा था।  सुबह - 10 से 1, सांय - 6 से 9. एक मोबाइल का चित्र बनाकर ठीक उसकी बगल में हाथों से नंबर भी लिखा गया था।

प्रेमचंद जी के पड़ोस का घर
   रूककर इधर-उधर देखा गया कि किससे सम्पर्क किया जाय। कौन है जो गेट खोलेगा। ढूँढते हुए पैतृक निवास के बगल वाली गली में जा पहुँचा। सूनसान गली। कोई नजर नहीं आ रहा था। एक दो घरों की तस्वीर लेने के बाद एक दरवाजा खुला दिखा जिसमें करीब पैंसठ-सत्तर वर्ष के एक बुजुर्ग खटिया पर लेटे नजर आये। प्रणाम करने के बाद उनकी ओर बढ़ा तो वे उठकर बैठ गये। संकोच हुआ कि नाहक इन्हें तकलीफ दिया। पूछने पर कि स्मारक स्थल का गेट कब खुलेगा

प्रेमचंद जी के पैतृक निवास स्थल के करीब का घर
    उन्होंने बैठे गले से बताया कि "होहीं गेटवा के बगिले एक ठौ कागज चफना हौ, ओही पे नम्मर लिखल होई। फोन कै द, मनई आ जइहीं". उन्हें ज्यादा तकलीफ न देकर वापस वहीं मुंशी प्रेमचंद स्मारक के गेट पर पहुँचा गया। वहाँ एक कागज पर "नम्मर" दिखा। फोन करने पर जवाब मिला - "बस, अभी आते हैं"। आसपास के घरों का जायजा लिया तो कुछ अच्छी हालत में मिले तो कुछ खराब हालत में। एक कत्थई रंग का मकान दिखा जिस पर नाम लिखा था - "प्रेमालय"। संभवत: प्रेमचंद जी के परिवार से जुड़े लोगों का ही मकान हो।  

        तभी कुछ बच्चों के खेलने-दौड़ने और शोर की आवाज आई तो उस ओर बढ़ गये। देखा गया तो मुंशी जी के घर के सामने वाले मैदान में कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। ईंटों का स्टैम्प, थोड़ी सी समतल पिच, आस पास आम के पेड़। संभवत: बच्चों के स्कूल जाने का समय अभी न हुआ था। मन में बात आई कि शायद यहीं इसी मैदान में प्रेमचंद जी ने भी गिल्ली डंडा खेला होगा, तभी तो गिल्ली डंडा कहानी में इस खेल के बारे में इतना हुलसकर वर्णन किया है। लेकिन गिल्ली-डंडा ही क्यों ? उन्होंने तो क्रिकेट पर भी कलम चलाई है। और वह भी देशज अंदाज में। भले ही वे आजादी के लड़ाई के दौरान इस खेल को खेलने को लेकर थोड़े नाखुश से थे लेकिन खेल तो खेल है। उससे भला कैसी दुश्मनी। तभी तो "वरदान" उपन्यास में उन्होंने क्रिकेट खेल की यह दिलचस्प कमेंटरी की है। प्रेमचंद जी लिखते हैं
  
   "आज क्रिकेट में अलीगढ़ के निपुण खिलाडियों से उनका सामना था। ये लोग हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध खिलाडियों को परास्त कर विजय का डंका बजाते यहां आये थे। उन्हें अपनी विजय में तनिक भी संदेह न था। पर प्रयाग वाले भी निराश न थे। उनकी आशा प्रतापचंद्र पर निर्भर थी। यदि वह आध घण्टे भी जम गया, तो रनों के ढेर लगा देगा। और यदि इतनी ही देर तक उसका गेंद चल गया, तो फिर उधर का वारा-न्यारा है। प्रताप को कभी इतना बड़ा मैच खेलने का संयोग न मिला था। कलेजा धड़क रहा था कि न जाने क्या हो।     दस बजे खेल प्रारंभ हुआ। पहले अलीगढ़ वालों के खेलने की बारी आयी। दो-ढाई घंटे तक उन्होंने खूब करामात दिखलाई। एक बजते-बजते खेल का पहिला भाग समाप्त हुआ। अलीगढ़ ने चार सौ रन किये। अब प्रयाग वालों की बारी आयी पर खिलाडियों के हाथ-पांव फूले हुए थे। विश्वास हो गया कि हम न जीत सकेंगे। अब खेल का बराबर होना कठिन है। इतने रन कौन करेगा। अकेला प्रताप क्या बना लेगा ? पहिला खिलाड़ी आया और तीसरे गेंद मे विदा हो गया। दूसरा खिलाड़ी आया और कठिनता से पाँच गेंद खेल सका। तीसरा आया और पहिले ही गेंद में उड़ गया । चौथे ने आकर दो-तीन हिट लगाये, पर जम न सका। पॉँचवे साहब कालेज मे एक थे, पर यहाँ उनकी भी एक न चली। थापी रखते-ही-रखते चल दिये।     अब प्रतापचन्द्र दृढ़ता से पैर उठाता, बैट घुमाता मैदान में आयां दोनों पक्ष वालों ने करतल ध्वनि की।  प्रयाग वालों की दशा अकथनीय थी।  प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि प्रतापचन्द्र की ओर लगी हुई थी।   सबके हृदय धड़क रहे थे।  चतुर्दिक सन्नाटा छाया हुआ था।  कुछ लोग दूर बैठकर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि प्रताप की विजय हो।   देवी-देवता स्मरण किये जा रहे थे।   पहिला गेंद आया, प्रताप ने खाली दिया। प्रयाग वालों का साहस घट गया।   दूसरा आया, वह भी खाली गया।   प्रयाग वालों का कलेजा नाभि तक बैठ गया।   बहुत से लोग छतरी संभाल घर की ओर चले।   तीसरा गेंद आया।  एक पड़ाके की ध्वनि हुई ओर गेंद लू  की भॉँति गगन भेदन करता हुआ हिट पर खड़े होने वाले खिलाड़ी से सौ गज आगे गिरा। लोगों ने तालियॉँ बजाईं । सूखे धान में पानी पड़ा । जाने वाले ठिठक गये। निराशों को आशा बँधी। चौथा गेंद आया और पहले गेंद से दस गज आगे गिरा। फील्डर चौंके, हिट पर मदद पहँचायी | पाँचवा गेंद आया और कट पर गया। इतने में ओवर हुआ। बालर बदले, नये बालर पूरे वधिक थे। घातक गेंद फेंकते थे। पर उनके पहिले ही गेंद को प्रताप ने आकाश में भेजकर सूर्य से र्स्पश करा दिया"।
मुंशी प्रेमचंद स्मारक

   हम अभी बच्चों का क्रिकेट देख ही रहे थे कि मुंशी प्रेमचंद जी के स्मारक की देख-रेख करने वाले दुबे जी आते दिखे। राम-रहारी हुई। कहाँ-कैसे, बोलते बतियाते स्मारक का गेट खुला.....
  
जारी.......


7 comments:

अनूप शुक्ल said...

रोचक पोस्ट। मुंशीजी की कमेंट्री चकाचक है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ईंटों के वि‍केट पूरे भारत को एक सूत्र में पि‍रोते हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

कहानी को रचने वाले के गाँव की कहानी भी सुन लें।

वाणी गीत said...

मंदिर को घर ही बना लिया , अपनी गली, अपना मंदिर !
प्रेमचंद्र जी का आवास अच्छी हालत में स्मारक बना हुआ है , अच्छा लगा .
अब तक इन पर प्रोपर्टी डीलर की नजर नहीं पड़ी :)
गिल्ली डंडा शायद आजकल के बच्चे जानते भी नहीं होंगे !
रोचक!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

लेखक प्रेमचंद के भीतर एक बहुत शानदार ब्लॉगर भी छिपा हुआ था। आपने जो लिंक दिया है उसी में उनके दो आलेख पढ़े, दोनो धाँसू पोस्ट की तरह हैं -

तांगे वाले की बड़ http://munshi-premchand.blogspot.com/2006/03/blog-post_114222186203754330.html
शादी की वजह http://premchand.kahaani.org/2006/03/blog-post_114222166063706403.html

गंगेश राव said...

abt u i'd like to say....

"the unique picaro 21st century"

राजीवशंकर मिश्रा बनारस वाले said...

बेहतरीन.... सचित्र दर्शन _/\_

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