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Thursday, July 25, 2013

"लिव इन रिलेशन" वाली आधुनिकता और प्रेमचंद की लेखनी...बनारस यात्रा - 8

  बनारस यात्रा के दौरान हमारा अगला और आखिरी पड़ाव रहा मुंशी प्रेमचंद का गाँव लमही। बड़े दिनों से वहाँ जाने की इच्छा थी। देखना चाहता था कि उनका गाँव कैसा लगता है। किस तरह का माहौल रहता है वहाँ। वैसे, उनकी कथा कहानियों से तो अंदाज लग ही जाता है कि जैसे बाकी गाँवों में जीवन है, सामाजिक उहापोह है, तर-त्यौहार हैं, रीति-रीवाज़ हैं, वैसे ही वहाँ भी होगा। लेकिन सोचने और महसूस करने में फर्क है। सो कई वर्षों की अपनी साध पूरी करने के लिये भ्राता श्री के साथ चल पड़ा मोटरसाईकिल पर।

   मन में एक पुलक थी कि मुंशी जी के घर जा रहा हूँ। जेहन में उनकी लिखी कई कहाँनियां एक के बाद एक आये जा रही थीं। पूस की रात, नमक का दरोगा, ईदगाह, कफन...सब एक एक कर कौंध रहे थे। इनमें से कई कहाँनियां स्कूली जीवन में पढ़ी हैं तो कुछ को बाद में। मुझे अब भी याद है कि ईदगाह वाली कहानी पढ़कर मैं रूआँसा हो गया था। मन में बात लग गई थी कि हामिद ने मेले से मिठाई नहीं खरीदी तो न सही, उसने दादी का हाथ जलने से बचाने के लिये चिमटा खरीदा तो चिमटा सही, लेकिन उसके मित्रों ने उसे मिठाई दिखा-दिखाकर ललचाया क्यों ? ऐसा भी कोई करता है क्या ? हांलाकि बाद में हामिद ने अपने लोहे की चिमटे की खूबीयां बताकर अपने मित्रों पर रौब गांठा जरूर था और उनकी ओर से मिठाई भी पा गया था, तिस पर भी मेरा मन वहीं अटका था कि हामिद को उसके दोस्तों ने मिठाई पहले क्यों नहीं दी ? चिमटे की खूबी बताने के बाद ही क्यों दी ?

    इस तरह की ढेरों प्रसंग हैं प्रेमचंद जी के लेखनी में जो आपको हठात् अपने वश में कर लेते हैं। वैसे प्रेमचंद जी के बारे में एक भ्रांति बनी हुई है कि वे गाँव-कस्बों को ही समझते थे और वहीं की कहानियाँ लिखते थे जबकि ऐसा नहीं है। उनकी कहानियों में शहरों का भी, आधुनिक हो चुकने का स्वांग रचते समाज का भी कमोबेश उल्लेख रहता रहा है। उदाहरण के लिये उनकी कहानी 'मिस पद्मा' को ही लें जिसमें कि "लिव-इन रिलेशन" को उन्होंने मुद्दा बनाया है। उसमें उन्होंने विवाह को बंधन मानने वाली आधुनिक महिला पद्मा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि -

    "कानून में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेने के बाद मिस पद्मा को एक नया अनुभव हुआ, वह था जीवन का सूनापन। विवाह को उसने एक अप्राकृतिक बंधन समझा था और निश्चय कर लिया था कि स्वतन्त्र रहकर जीवन का उपभोग करूँगी"।

    करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी मिस पद्मा के बारे में मुंशी जी आगे लिखते हैं  - "उसे अब बहुत अवकाश मिलता था और इसे वह किस्से-कहा,नियाँ पढ़ने, सैर करने, सिनेमा देखने, मिलने-मिलाने में खर्च करती थी। जीवन को सुखी बनाने के लिए किसी व्यसन की जरूरत को वह खूब समझती थी। उसने फूल और पौधे लगाने का व्यसन पाल लिया था। तरह-तरह के बीज और पौधे मँगाती और उन्हें उगते-बढ़ते, फूलते-फलते देखकर खुश होती; मगर फिर भी जीवन में सूनेपन का अनुभव होता रहता था। यह बात न थी कि उसे पुरुषों से विरक्ति हो। नहीं, उसके प्रेमियों की कमी न थी"।

 मुंशी जी आगे लिखते हैं - "पद्मा को विलास से घृणा थी नहीं, उसे घृणा थी पराधीनता से, विवाह को जीवन का व्यवसाय बनाने से"। और इसी सूनेपन को दूर करने के लिये मिस पद्मा एक कालेज के प्रोफेसर प्रसाद से दिल लगा बैठती है। प्रोफेसर की फितरत भी मिस पद्मा सरीखी थी। वह भी विवाह को बंधन मानता था। माने भी क्यों न। आधुनिक जो ठहरा। इसलिये दोनों की बात रह गई और दोनों साथ साथ बिना विवाह के पदमा के घर में रहने के लिये राजी हो गये। हां, ये जरूर है कि दोनों "कसम खाकर" एक दूसरे के साथ रहने को राजी हुए। शर्त यही कि इस साथ रहने की कसम के अलावा बाकी बातों में स्वतंत्रता रहेगी। जिस दिन भी दूसरे से मन खटके एक दूसरे से अलग होने के लिये स्वतंत्र हैं।

    समय बीता और पदमा गर्भवती हुई। उधर रूप-लावण्य भी कुछ कम हुआ और प्रसाद किसी और के साथ लटपटा गया। रात रात भर गायब रहता। मिस पदमा कुढ़ कर रह जातीं। शर्त के मुताबिक साथ रहने के अलावा बाकी बातों में स्वतंत्रता थी। कुछ दिक्कत हो तो अलग होने की सुविधा भी थी लेकिन अब क्या कैसे हो जबकि पदमा बच्चे को जन्म देने के दिनों में चल रही हो। सारा वश तो अवश होकर रह गया। दोनों में झगड़े भी हुए। प्रसाद ने हाथ खड़े करते हुए सीधे कह दिया कि न जम रहा हो तो अलग होने की स्वतंत्रता है। मैं चला जाता हूँ। मुझे कोई हर्ज नहीं।

    फिर वो भी दिन आया कि उसने बच्चे को जन्म दिया। उस वक्त प्रसाद कहीं किसी के साथ विदेश में मस्ती करने चला गया था। खर्च करने के लिये जब रकम टटोली तो पता चला बैंक से पैसे पहले ही निकालकर गया है "लिव इन वाला आधुनिक जेन्टलमैन"। अंतत: पछताती हुई मिस पदमा पड़ोस के विवाहित सुखी दम्पत्ति के बच्चे को देख आँखों से आँसू ढुलका बैठती है और विवाह के बंधन की प्रासंगिकता, उसकी उपयोगिता समझ आती है। 

     ये लिव-ईन रिलेशन आधारित "मिस पदमा" कहानी प्रेमचंद जी ने करीब सत्तर पचहत्तर साल पहले लिखी है लेकिन इस तरह के रिश्तों पर चर्चा हम लोग अब हाल फिलहाल कर रहे हैं। हांलाकि पहले भी लिवइन रिलेशन पर कानून बनने न बनने की चर्चाएं कई साल पहले चली हैं, लेकिन इस मुद्दे का व्यापक प्रचार, उस पर चर्चा आदि अब दिखता है। इसी से पता चलता है कि प्रेमचंद जी को कालजयी रचनाकार क्यों कहा जाता है। 


   उधर बनारस के पांडेपुर तिराहे से होते हुए, दहिने, बांये कट-कुट मारते हमारी मोटरसाईकिल लमही के मुंशी प्रेमचंद स्मृति द्वार पर पहुँच गई जहाँ पुतलों के रूप में होरी बैठे हैं, धनिया भी है और हां, ठीक प्रवेश द्वार के अगल-बगल दो बैलों की जोड़ी भी है........ हमारी तरह   :-) 

जारी......


15 comments:

GYANDUTT PANDEY said...

होरी बैठे हैं, धनिया भी है और हां, ठीक प्रवेश द्वार के अगल-बगल दो बैलों की जोड़ी भी है.....और कोचिंग क्लास के पोस्टर भी जगमगा रहे हैं!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

प्रेमचंद की लेखनी मे डूबोके घुमायेंगे लमही...! अच्छा है।

प्रवीण पाण्डेय said...

सच कहा, इस विषय में कानून बनाने के पहले, मिस पद्मा का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी पढ़ लिया जाये।

anshumala said...

७० -७५ साल पहले आधुनिकता तो थी किसी किसी में किन्तु मन से भारतीयता पूरी तरह से गई नहीं थी , समस्या वही हो जाती है | सोचती हूँ सवाल हमेसा महिलाओ पर ही क्यों उठते है उन्हें ही आधुनिक होने का तंज क्यों मारा जाता है , हमारे समाज में पुरुष हमेसा से प्रेम के नाम पर रखैलो ( मुझे ये शब्द गन्दा लगता है दोष दोनों का और अपमानित शब्द एक के लिए ही क्यों ) को रखता आया है जो लीव इन जैसा ही था , कम से कम आज लिव इन में रहने वाले ज्यादातर अविवाहित होते है |
प्रेम चन्द्र की किताबो के पात्रों को देखने के लिए लमही जाने की क्या जरुरत है मुझे तो बनारस में कितने ही पात्र दिख जाते थे |
डेढ़ दिन में ८ क़िस्त से ज्यादा बन गए डेढ़ दू हफ्ता रहते तो कितने बनते :))

सतीश पंचम said...

@प्रेम चन्द्र की किताबो के पात्रों को देखने के लिए लमही जाने की क्या जरुरत है...

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अंशुमाला जी,

कुछ इच्छाओं को शब्दों से बयां नही किया जा सकता, फिर उन्हें समझाना तो और भी मुश्किल होता है। लमही जाने की इच्छा भी उसी कोटि की थी, सो चला गया।

संभवत: और भी इस तरह की जगहों पर जाउं जो देखने में तो आम जगहों जैसी ही दिखती हैं, लोग, पानी, तर-त्यौहार सब कुछ सामान्य से ही, लेकिन उन स्थानों से जुड़ी बातों को देखने में, उन्हें महसूस करने में जो सुख है, वह बिना वहां गये मिल ही नहीं सकता।

सतीश पंचम said...

डेढ़ दिन में आठ किश्तों वाली बात पर इतना ही कहूंगा कि - पहले मैंने भी सोचा कि दो चार पोस्ट लिखकर निपटा दूंगा लेकिन जब लिखना शुरू किया तो एक एक कर पोस्टों की संख्या बढ़ती गई :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इच्छा हम जैसे बहुतों की होगी। आपकी आँखों से ही देख लेते हैं उस मिट्टी, मकान और खेत खलिहान को जहाँ से वह सब सृजित हुआ जो आज हिंदी साहित्य के लिए सबसे अनमोल धरोहर है।

Anurag Sharma said...
This comment has been removed by the author.
Anurag Sharma said...

एक कालजयी लेखक के बारे में इस काल के एक पसंदीदा लेखक की कलम से पढ़ने का आनंद ही और है। जारी रहे बनारस यात्रा गाथा ...

smt. Ajit Gupta said...

प्रेमचन्‍द जी समाज की नब्‍ज पर हाथ रखते थे।

Majaal said...

ये कहानी कहानी कुछ याद नहीं आ रही है,, क्या ये मान सरोवर में से है या बाहर से ?

हमारे हिसाब से अगर मुंशी जी प्रसाद साहब को भी विवाह की प्रासंगिता समझा देते तो कहानी संपूर्ण हो जाती और बहुत संभव है की अंशुमाला जी भी संतुष्ट हो जाती .

बहरहाल, आप बहुत ही नैसर्गिक लेखक लगते है .. आपका पुराना भी कुछ कुछ याद है ... बकरी/मेमने का (क्या ) श्रीखंड जैसा ... !

लिखते रहिये ...!

सतीश पंचम said...

majaal ji,

श्रीखंड वाली पोस्ट आपको याद रही - शुक्रिया। दरअसल वह एक 'त्रिवेणी' थी जिसे मैंने 2010 में लिखा था।

यह रही वह त्रिवेणी -
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वो करीमन की बकरी आज फिर चर गई
गुलाब की पत्तीयां फिर से कम हो गईं हैं


कांटों ने कहा, बकरी का चुंबन.......श्रीखंड जैसा।
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यह रहा उस त्रिवेणी पोस्ट का लिंक।

http://safedghar.blogspot.com/2010/10/blog-post_08.html

सतीश पंचम said...

"मिस पदमा" कहानी मानसरोवर के किसी अंक में जरूर होगी। नेट पर वह कहानी पूरी की पूरी उपलब्ध है। यह रहा लिंक -

http://premchand.kahaani.org/2010/12/miss-padma.html

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कोई क्‍या कहे. इन पद्माओं को लगता है कि‍ केवल वे ही दि‍माग़ से ठां ठां हैं

अनूप शुक्ल said...

ये भी निपटा दिये। प्रेमचंद आज अगर ये वाली कहानी लिखते तो अंदाज कुछ अलग होता।

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