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Monday, July 22, 2013

पप्पू की दुकान.... बनारस यात्रा - 7

  तुलसीदास जी के 'गोदरेजही' पाण्डुलिपी के दूरस्थ दर्शनोपरांत हम लोग वहीं करीब ही स्थित एलिस बोनर संस्थान गये। एलिस बोनर, जिन्होंने कि भारतीय कला से जुड़ी बारीकियों के बारे में अध्ययन किया, यहाँ की मूर्तियों में एक किस्म के ज्यामितीय अनुपात को पाया, उड़ीसा जाकर घूम-घूमकर ताड़पत्रों के अध्ययन से लुप्त होने के कगार पर पहुँचे ज्ञान को किताब के रूप में लिपिबद्ध किया, उन्हीं के संरक्षित निवास स्थान तक हम लोग ढूँढते-ढाँढते पहुँचे। संस्थान खुलने में समय था
सो हमें केवल गैलरी में जाने की अनुमति मिल पाई। शांत, सुंदर जगह। अच्छा लगा वहाँ पहुँचकर। संभवत: बोनर संस्थान के बारे में विस्तृत चर्चा अपने ब्लॉग पर गिरिजेश जी करें।

   वहाँ से हम लोग पप्पू की दुकान की ओर चल दिये। वही दुकान जिसकी चर्चा काशीनाथ सिंह ने अपनी किताब काशी का अस्सी में की है। जिससे भी पूछते कि पप्पू की दुकान किधर है तो जवाब मिलता बस इधर ही है। चलते चले गये।

 करीब पाँच मिनट की ढूँढैती के बाद दुकान मिल गई। बाहर से यह किसी आम दुकान की तरह ही लग रही थी। इसी को काशीनाथ सिंह ने दड़बे की संज्ञा दी थी। पास पहुँचने पर सड़क के किनारे ही थे कि दड़बे के भीतर से ठठाकर हँसते लोगों की आवाज सुनाई पड़ी। पक्का यकीन हो गया कि गपड़गोष्ठी और अड्डेबाजी के लिये फेमस यही है पप्पू की दुकान।

 सन्तो आप में से कई सोच रहे होंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या है तो यही कहना उचित होगा कि इसमें वही सब है जो औरों में भी है, बस एक चीज "एस्ट्रा" है जिसके बारे में कहा जाता है कि बारहो मास यहाँ "बैठकर चहकने और चहक कर बैठने" का सदाबहार मौसम बस यहीं मिलता है। यही वजह है कि पान की दुकान पर हुई गपड़गोष्ठी और उससे जुड़े तमाम गुले-गुलजारियत के दम पर काशी का अस्सी नाम की विख्यात किताब बन गई। और गपड़गोष्ठी भी क्या...एक से एक नगीनेदार बतकही। मिसाल के तौर पर यहीं 'काशी का अस्सी' से अंश देखिये। इस बतकही का संदर्भ तब का है जब मिली-जुली वाजपेयी सरकार के जाने की उम्मीद लिये हुए विरोधी दल तलवार भांज रहे थे लेकिन सरकार गिर नहीं रही थी। उसी बात को लेकर चर्चा चली तो राधेश्याम पांड़े  ने पंचतंत्र की कहानी बयां करते हुए कहा -

 "पंचतन्त्र वाली कहानी तो याद है न आपको ? एक सियार अपनी सियारिन के साथ चूहों की ताक में नदी किनारे बैठा था कि एक तगड़ा कद्दावर साँड़ पानी पीने पहुँचा। सियारिन की नजर उसकी पिछली टाँगों के बीच झूलते मांसपिंड पर गई। बोली - स्वामी, चूहा खाते-खाते मन भर गया है। सामने देखो - साँड़ की टाँगों के बीच में लटका हुआ फल। लगता है, पक गया है बस गिरने ही वाला है ! उसका पीछा करो, आज नहीं तो कल गिर जाएगा। और दसियों साल तक भोंसड़ी के पीछे-पीछे घूमते रह गए और वह नहीं गिरा ! क्यों ? क्योंकि 'शिथिलौ च सुबद्धौ च' था। जब सोलह पार्टियों को साथ लेकर चलना होगा तो शिथिल तो होगा ही, लेकिन सुबद्ध है ! गिरेगा नहीं, करते रहो इन्तजार !"
 
  तो सन्तो ! हम लोग भी उसी दड़बे में जा बैठे जहाँ यह पंचतन्त्र की महान कथा कही गई थी। और सन्जोग देखिये कि दड़बे में उन्हीं राधेश्याम पांड़े का जिक्र हो रहा था। यह जिक्र क्या था और किस सन्दर्भ में था यह थोड़ा बाद में। पहले आपको पप्पू की दुकान के दरो-दिवारों से परिचित करा दूं। 
   जब हम लोग पहुँचे तो वहाँ दो बुजुर्ग दीवार से सटी बेंच पर बैठे बतिया रहे थे। एक दो लोग अखबार पढ़ रहे थे। रह-रहकर हंसी पड़क्का हो ही रहा था। हम लोग दड़बे के अंदर जा बैठे। नजर दौड़ाई तो सामने पटरे पर एक बंद टीवी थी। बंद टीवी के सामने दूध वाला जग रखा था। फिर जब दड़बे में लाईव शो चल रहा हो तो टीवी फीवी की किसको फिकर। दूसरी ओर नजर दौड़ाई तो एक नोटिस बोर्ड दिखा जिस पर किसी ने "प्रणाम पम्फलेट" चिपकाया था वैसे ही जैसे गली मोहल्लों में "प्रणाम होर्डिंग्स" शुभकामना बैनर्स आदि लगते हैं। तो यहाँ भी एक लगा था। कुछ फुटकर आमंत्रण भी नजर आये।

    हम लोगों ने चाय का ऑर्डर दिया और वहीं अंदर की ओर जाकर बैठ गये। यहाँ हम लोगों ने केवल वहाँ मौजूद लोगों की बातें सुन आनंद लेने की ठानी। कुछ कहने का मतलब था कि पप्पू की दुकान का पूरा आनंद न ले पाना। फिर इतनी दूर से सुनने ही तो आये थे।

   वहाँ पहले से मौजूद लोगों की आपसी बातें हो रही थीं। मुलैमा, राजनथवा, मायावतीया.....हर नाम के साथ रेकार...वकार की नजरबंदी। बड़े से बड़े नेता को यहाँ इसी तरह का सम्बोधन मिलता है। हम लोग भी सुन रहे थे। मंद मंद मुसकरा रहे थे। उसी दौरान एक बुजुर्ग ने शुरू किया राधेश्याम पांड़े का किस्सा। वही राधेश्याम पांड़े जिनका कि काशी का अस्सी किताब में जिक्र है और जिन्होंने साँड़ के टाँगों के बीच पके फल वाला लहालोट किस्सा सुनाया था।

  तो सन्तों, यहाँ बात कुछ यूँ उट्ठी कि छड़ी वाले बुजुर्ग का कहनाम था कि "आजु" बड़े दिनों बाद पप्पू की दुकान पर आया हूँ। तबले दूसरे बुजुर्ग ने किस्सा बयां करना शुरू किया। किस्सा कुछ यूँ था कि राधेश्याम पांड़े पादते बहुत थे। एक बार कई लोगों के साथ थे तो तय हुआ कि जब पादना होगा तो मुँह ढंक लेंगे और कहेंगे - "आया"। और जब पाद लेंगे तो मुंह से कपड़ा हटा लेंगे यह कहते हुए कि - "गया"। ऐसे ही एक दिन कपड़ा मुँह पर रखे और बोले - "आया"। बाकी लोगों ने भी कपड़ा मुँह पर रख लिया। पांच मिनट हुआ दस मिनट हुआ लेकिन राधेश्याम पांड़े कुछ कह नहीं रहे थे। जब किसी ने पूछा कि बताइये आया तो आया लेकिन गया कि नहीं ? तब राधेश्याम पाँडे ने बताया - "हमरे त टट्टी होई गई"। वही हाल इनका है, आये तो गये नहीं। 

( पढ़ने से शायद उतना आनंद न आये इस बतकही का, इसलिये विडियो देखल जाय  :-)

 तो सन्तों समझ सकते हैं कि मात्र दस पंदरह मिनट वहां बैठने से ही कितनी चउचक बतकही सुनने मिलती है। और संजोग देखिये कि चर्चा पंचतन्त्र के कथावाचक उन्ही राधेश्याम पांड़े पर थी जो "शिथिलौ च सुबद्धौ च" के "प्रतिपादक" थे। फिलहाल देश की राजनीति में अब भी वही हाल है। धीरे-धीरे दस साल हो गये लेकिन विरोधी अब तक मनमोहनी फल के पक कर गिरने का इंतजार कर रहे हैं। फर्क यह है कि तब सोलह पार्टीयों के चलते शिथिल हो चुकी वाजपेयी सरकार थी तो अब मनमोहन सरकार है। तमाम पार्टियों के सहयोग-असहयोग से शिथिल हो जाने पर भी सुबद्ध है। गिरने वाला फल नहीं लगता। जब तृणमूल से खटकती है तो मुलायम सपोर्ट करने के लिये हाथ लगा देते हैं और जब करूणानिधि से खटकती है तो जयललिता की पार्टी सपोर्टने लग जाती है। इसी से समझ सकते हैं कि सरल भाषा में राजनीति समझने हेतु क्यों 'काशी का अस्सी' पढ़ने की अनुशंसा की जाती है।

  हम अभी और कुछ देर बैठते लेकिन गिरिजेश जी को भी ऑफिस जाना था और हमें भी अपने अगले पड़ाव पर जाना था। सो दड़बे से बाहर निकल आये। गिरिजेश जी चले अपने ऑफिस, हम चले लमही। तो सन्तो, विडियो 'देखल' जाय :-)




जारी........


13 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बस... दो मिनट में आया!

kshama said...

Ek baar phir Banaras ho aaneka man karta hai!

GYANDUTT PANDEY said...

चलिये, पढ़ा था, आपने दिखा दिया पप्पू का दुकान!

दीपक बाबा said...

दुकेले चाय हजम कर लोगे ... :)

Rahul Singh said...

एलिस बोनर की स्‍मृति सुरक्षित है भारत कला भवन में.

वाणी गीत said...

हे भगवान्!

प्रवीण पाण्डेय said...

टाइटौ च टपको च,
शिथिलौ च सुबद्धौ च।
प्रथमो सूजयेत,
द्वितीयो पूजयेत।

इति वार्ता।

सतीश पंचम said...

:)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

:)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अरे, यह तो गजब का आख्यान है। मुझसे छूटता ही जा रहा था। आज सब काम छोड़कर सारी किश्तों की रसधार में गोते लगाऊंगा

Abhishek Ojha said...

:) mast.

अनूप शुक्ल said...

मजेदार। पप्पूआ की दुकानौ देख लिये। सुन लिये।

P.N. Subramanian said...

आपकी यात्रा के कुछ पोस्ट तो पहले पढ़े थे परन्तु पापु की दूकान देखना आज ही हुआ

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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