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Saturday, July 20, 2013

नौका विहार...घाट पर घाटा... .बनारस यात्रा - 6

       बनारस में सुबह-सुबह गंगा जी में स्नान करने के बाद घाट पर खड़े होकर गिरिजेश जी का इंतजार करने लगा। फोन करने पर पता चला कि आस-पास ही हैं। नजर दौड़ाने पर मॉर्निंग वॉक की धज में जनाब आते दिखे। हाथ मिलऊवल हुआ, अऊर का हाल-चाल, कइसे कहाँ चला जाय पर बात होने लगी।  प्लान किया गया कि अस्सी घाट पर पप्पू की दुकान पर चल कर चाय-शाय पी जाय। गपड़गोष्ठी की जाय। 

  अभी दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक नाव से जाने की बातें कर ही रहे थे कि एक नाव वाला आ गया। बताने पर कि अस्सी घाट तक जाना है, उसने किराया दो सौ रूपये बताया। हम लोग आगे बढ़ लिये यह कहकर कि किराया ज्यादा है। नाव में नहीं जाना। आगे जाने पर एक 'ठो' और मिला। पूछने पर उसने बताया कि चार सौ लगेंगे अस्सी घाट तक के। संभवत: वह अपने साथी के बताये दो सौ के रेट से अनभिज्ञ था। हमने ज्ञान बघारा कि वहां दो सौ में ले चल रहा है, आप चार सौ कह रहे हैं ? हम लोग फिर आगे बढ़ने लगे। वही मल्लाह पीछे-पीछे आने लगा और अस्सी घाट तक डेढ़ सौ में ले चलने के लिये राजी हो गया। जाहिर है यहाँ त्वरित 'सूचना का अधिकार' काम आया। पिछले मल्लाह द्वारा दो सौ में ले चलने की सूचना देने से यह बंदा चार सौ की बजाय डेढ़ सौ में ही राजी हो गया। हम संतुष्ट हुए कि ढ़ाई सौ रूपये बचा लिये। यह संतुष्टि तब परम संतुष्टि में बदल जाती यदि कोई दूसरा मल्लाह एक हजार में ले चलने की बात कह डेढ़ सौ में ले चलता। तब हमारी बचत होती साढ़े आठ सौ रूपये। लेकिन इस मल्लाह ने केवल ढ़ाई सौ की बचत कराई। सीधे-सीधे "घाट पर ही घाटा" करा दिया।


     रेट तय होने पर हम लोग नाव की ओर जाने लगे। पता चला यह शख्स केवल रेट तय करता है, नाव खेने वाला दूसरा मल्लाह है वह आ रहा है। हम लोग किनारे खड़े हो नाव का इंतजार करने लगे। एक युवक नाव लेकर हमारी ओर आता दिखा। नाव आने पर हम लोग उसमें बैठ गये। युवा खेवनहार ने नाव आगे बढ़ानी शुरू की। हम लोग बातों में लग गये कि तभी नाव खेवइया अपनी उस नाव को एक दूसरे नाव के करीब ले गया। वहाँ जाकर रस्सी से अपनी नाव बाँधने के बाद तुरत-फुरत एक नाव से दूसरी नाव पर होते हुए एक जगह जाकर वहाँ की रस्सियों को कसने लगा। तब पता चला कि यह नाव जिसमें हम बैठे हैं वह नावों की पार्किंग एरिया से निकालकर लाई गई थी। एक नाव बाहर आने पर शेष खड़ी नावों को रस्सी से व्यवस्थित करना जरूरी था और वही काम किया जा रहा था। सब ठीक-ठाक करने के बाद नाव वाला हमारी नाव पर वापस लौटा और फिर नाव चल पड़ी अस्सी घाट की ओर।

 आस-पास के इलाके को निहारते नाव से आगे बढ़े जा रहे थे तभी सामने की दीवारों पर  एक जगह कोरियाई मोटिफ नजर आया। सुंदर चित्रकारी। चर्चा चली कि आखिर किसने उन विदेशीयों को कहा होगा कि तुम यहाँ अपनी चित्रकारी करो ? और वह भी उस जगह जहाँ लोग दिव्य निपटान कर रहे हों। वहीं मल-मूत्र सब बिखरा पड़ा है, तमाम बदबूदार इलाका लेकिन विदेशी अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति रच गये। अब यह तो स्थानीय लोगों की कमी है जो उन चित्रों के पास हग-मूत रहे हैं। तभी अचानक करीब सात आठ फीट की दूरी पर एक गंगवासी जी दिव्य निपटान के बाद नदी के पानी में छप् छप् करते अपना पिछवाड़ा धोते दिखे। नाव के एकदम सामने आ जाने से उन महाशय के तमाम उरजे पुरजे प्रकट रूप से नजर आ रहे थे और हम लोग मजाक में लग गये कि फोटो लेना चाहिये। वह पिछवाड़ा धोवन पोज् ही ऐसा था कि क्या कहें। महाशय चाहते तो नदी के किनारे सूखी जमीन पर बैठ हाथ आगे बढ़ा 'पानी छू' सकते थे लेकिन वह टखने भर पानी में 'हेल' कर, अंडकोषों को भीगने से बचाते हुए पिछवाड़ा 'उलार' अवस्था में धोवन क्रिया निपटा रहे थे। यह पोज् वाकई स्पेशल था लेकिन फोटो शोटो नहीं लिया गया।

   नाव आगे बढ़ी तो वह स्थान भी आया जहाँ मृतकों का दाह-संस्कार किया जा रहा था। कहीं डोम 'लग्गी' लेकर दाह-संस्कार की लकड़ियों को उलट पलट कर ठीक से मृतकों को जलाने का अपना काम कर रहा था तो ठीक उसी के बगल में एक शख्स अपनी 'लग्गी' में कांटा फंसाये मछलियाँ पकड़ रहा था। लग्गी-लग्गी का फर्क। एक से मृतकों का इंतजाम किया जा रहा था तो एक से जीवित मछलियों का। दोनों प्रक्रियाओं में 'लग्गी' कॉमन थी।

 नाव आगे बढ़ी तो पानी में बहते किसी बच्चे की फूली हुई लाश पर नजर पड़ी। पिछली बार जब आया था तब भी ऐसा ही नजारा देखा था। अबकी फिर वैसा ही देखा। जाहिर है, मन खराब होता है यह सब देखकर। लेकिन क्या करें।  जन्म-मृत्यु, जरा-मरण यही सब तो जीवन चक्र ठहरा।

     नाव आगे बढ़ती ही जा रही थी कि पानी में तैरते लोगों की आवाज आई। उस ओर देखा गया तो एक पिता अपनी पुत्री को तैरना सिखा रहा था। पिता ने टायर ट्यूब पुत्री से छीनकर अपने हाथ में ले लिया था और पुत्री को ललकार रहा था कि "आऊ"...."आऊ"...."आऊ"..। उधर पुत्री थी कि बार-बार चिल्ला रही थी, अपने पिता को बार-बार पकड़ना चाहती थी लेकिन पिता अपनी पुत्री से दूर हट उसे आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित कर रहा था। यह नजारा देख हम लोगों में चर्चा चली कि देखो, उस पिता ने कोई नारीवादी चिंतन न किया होगा, ना तो जानता होगा कि नारीवाद क्या होता है लेकिन वह अपनी पुत्री को जीवन भंवर से बचने की शिक्षा दे रहा है। उसे पानी में बिना टायर-ट्यूब के तैरने के लिये छोड़ प्रोत्साहित कर रहा है कि तैरना सीखो। हमेशा यह टायर-ट्यूब और यह पिता तुम्हारे साथ नहीं रहेगा।

   इन्हीं नजारों को देखते हुए नाव अस्सी घाट पर आ लगी। मल्लाह को पेमेंट करने के बाद हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ ही रहे थे कि गिरिजेश जी ने ध्यान दिलाया कि यहीं कहीं पर तो तुलसीदास की रामचरित मानस की मूल पाण्डुलिपी रखी है। एक-एक कर सीढ़ियाँ चढ़ते उस छोटे से मंदिर की ओर पहुँचे तो पता चला कि सही ठिकाने आये हैं। अंदर कोई पंडित जी थे। एक ओर लाल कपड़े में कुछ गठियाया था। पूछने पर कि मूल प्रति यही है क्या तो जवाब मिला - नहीं। वो उसमें है। देखा गया तो बलिष्ठ-गरिष्ठ गोदरेज का सेफ। रामचरित मानस की मूल प्रति इसी गोदरेज के सेफ में रखी थी। फोटो लेने की मनाही थी। पता चला कि एक बार चोरी हो गई थी। बहुत हंगामा हुआ। पुलिस-फोर्स लग गई थी। डीएम कलेक्टर तक के जिम्मे आया कि मूल प्रति मिलनी चाहिये और कहीं से खोज-खाजकर लाया गया तो इसी गोदरेज के सेफ में रखा गया। समय समय पर सरकारी अमला आकर उसकी खोज खबर लेता रहता है। सेफ वाकई सेफ है कि नहीं यह देख जाता है।

 वहीं मंदिर के आसपास का नजारा लिया गया तो गिरिजेश महराज बोले -  "गंगा यहाँ से देखने पर कितनी विशाल नजर आती हैं। यहीं कहीं बैठकर "तुलसीयवा" रामचरित मानस लिखता होगा"

 मैंने कहा - "अरे तो ललिता घाट पर पीपल के नीचे बैठ बाऊ कथा क्यों नहीं पूरा करते ? हम भी कह सकेंगे - "गिरिजेसवा" यहीं कहीं बैठकर बाऊ कथा लिखता होगा"  :-) 

जारी......

- सतीश पंचम

15 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जहाँ प्रकृति चौड़ी हो जाती है, वहीं मन भी फैल कर विस्तार पा लेता है।

संजय अनेजा said...

फ़ेसबुक पर बाऊकथा लिखने का ठिया दिखाकर गिरिजेश जी बयाना झटक चुके हैं, अब भाव खा\दिखा रहे हैं। धोखाधड़ी का मामला बनता है :)

kaushal mishra said...


मैंने कहा - "अरे तो ललिता घाट पर पीपल के नीचे बैठ बाऊ कथा क्यों नहीं पूरा करते ? हम भी कह सकेंगे - "गिरिजेसवा" यहीं कहीं बैठकर बाऊ कथा लिखता होगा" :-)

jai baba banaras....

अनूप शुक्ल said...

चकाचक पोस्ट।
त का बोले गिरिजेश बाबू?

सतीश पंचम said...

ज्ज्जही.... बोले तो कछु नाहीं बस हंस दिये.....तभी न अंतवा में गिरिजेस जी की हंसायमान फोटू लगाये हैं :-)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कभी-कभी देखने वाले ढेर देख लेते हैं रोज देखने वालों से..जय हो।

सोमेश सक्सेना said...

अभी एक एक करके पढ़े सारे भाग.ऐसा यात्रा वृत्तांत अब तक तो शायद नहीं ही पढ़ा मैंने. मजा आ गया :)

Abhishek Ojha said...

:)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह यह कड़ीमाला तो पूरी एक कि‍ताब का मसाला है

prkant said...

चउचक पोस्ट है भैया । गिरिजेश जी को खोभियाए रहिए तभी बाऊ कथा पूरी होगी ।

वाणी गीत said...

गंगा मैया की शरण में क्या नहीं धुल जाता है !
सारे ही रस नजर आते हैं गंगा किनारे , कहीं नव नाट्य रस ग्रन्थ भी तो यहीं नहीं लिखा गया था :)

anshumala said...

नहाना धोना में धोना उसे ही कहते है जिसका इतना विस्तार से वर्णन किया है , कभी कभी सब लिखने की जरुरत नहीं होती है कुछ बाते पाठको को कल्पना पर ही छोड़ देना चाहिए जो जिस दिमाग का होगा खुद ही कल्पना कर लेगा :)
वैसे आप बनारस घूम किसके साथ रहे है , तारीफ करने होगी उनकी जो आप को बनारस दिखा रहे है , जो दिखाना है वो दिखा नहीं रहे है और न जाने क्या क्या आप देखे जा रहे है , पहले बौद्ध वृक्ष नहीं देखा बिसनाथ जी ( बनारस में यही कहते है ) नहीं गए , और अब घाट पर वो नहीं देखा जो विनोद दुआ भी जाते है तो उन्हें दिखाया जाता है की वो देखिये घाट के किनार शुद्ध भारतीय लिफ्ट जिसे हाथ से खीचा जाता है , देखिये की भारत के कोने कोने से राजा महाराजो ने यहाँ घाट और अपने रहने के लिए गंगा किनारे महल नुमा बनाया , भारत में गिने चुने जगहों पर तारो सूरज चाँद की गणना करने के लिए वेधशालाए बनी है उनमे से एक छोटा सा बनारस में भी है घाट किनारे , देखने लायक चीज तो देखा नहीं रहे है और न जाने का का बेकार का सब देख रहे है , जो हर शहर में होता है ट्रैफिक अतिक्रमण , गाली गुत्ता, हगना मूतना ,पंडा संड सब देख लिए , दुनिया के बसे पहले शहरों में एक को देखने का नजरिया आप का गलत है बुरी नजर से देखेंगे तो सब बुरा बुरा ही दिखेगा , और बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला ऐसे ट्रको के पीछे लिखा होता है :))))

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

कहा जाता है बनारस जानने के लिये महीने दो महीने भी कम पड़ जाय। कोई कोई तो जनम तक का टाईम गैप देते हैं कि बनारस जानने के लिये एक जनम कम है। फिर हम लोग तो मात्र डेढ़ दिन की यात्रा पर थे। क्या-क्या देखते। कितना बटोरते। सो, अगली बार जब बनारस यात्रा होगी तो आप से पता करके ही होगी :)

रही बात गंदगी, धूल-धक्कड़ और तमाम अल्लम गल्ल्म देखने की तो यह सब सामने आ गया सो लिख दिया। फिर ट्रकों के पीछे तो बहुत कुछ लिखा होता है। हर लिखे को ध्यान रखने लगे तो हो चुकी यात्रा :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आज आपकी बनारस यात्रा की सभी सात कड़ियाँ क्रम से पढ़ी मैंने। आप वातावरण का ऐसा चाक्षुष वर्णन करते हैं कि लगता है हम भी आपकी मोटरसाइकिल के पीछे बैठे हुए यह सब देख रहे हैं। ऐसा बोल्ड चित्रण देखकर अंशुमाला जी थोड़ी विचलित हो गयीं तो आश्चर्य नहीं। हाँ, उनकी बात भी अपनी जगह ठीक है। इस पुरातन नगर की विशिष्ट पहचान वाले स्थल तो देखना ही चाहिए।

यह सब पढ़कर मुझे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा है कि अपनी अगली पोस्टिंग बनारस में करा लूँ। दो-चार साल वहाँ रहकर ही छककर बनारस का रसपान किया जा सकता है।

सतीश पंचम said...

धन्यवाद सिद्धार्थ जी !

दरअसल बिना बोल्ड हुए बनारस का असली रस मिल ही नहीं सकता था। फिर वहां कोई बच्चों की पिकनिक के लिये तो गये नहीं थे। जाना इसलिये हुआ कि कुछ मनसायन हो जाय, कुछ देख-ताक लिया जाय। घाट-घटोली, कुछ बतरस लिया जाय।

यहाँ ज्यादा इच्छा तो मुंशी प्रेमचंद के गाँव लमही जाने की थी। सो इन सारे लोकेशनों को बतौर बनारसी बोनस देखा गया :-)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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