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Sunday, July 14, 2013

राँड़, साँड़, सन्यासी.....बनारस यात्रा - 4

    दशाश्वमेध घाट से रिश्तेदार के यहाँ कैंट पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज गये थे। कुछ दुक्खम-सुक्खम बोला बतियाया गया, कुछ जमाने की बतकही चली। इसी बीच चर्चा चली कि बनारस कैसा है ?.....क्या खासियत है ?.....क्या कैफ़ियत है ?....आजकल किस मूड में है बनारस ? इसी चर्चा के दौरान एक परिचित जिनका बनारस में ही जन्म हुआ है, जो पिछले चालीस साल बनारस में ही रहते आये हैं, उनका मानना था कि "बनारस जितना गंदा शहर कोई नहीं। इतना अपवित्र और घृणित शहर होने के बावजूद यह पूजनीय कैसे है यही आश्चर्य है"

  उनकी बात सुनकर हैरानी नहीं हुई। इस तरह का नज़रिया हर किसी का अपने-अपने शहरों के प्रति कभी काल रहता ही है। मैं भी अपने शहर को इसी नजरिये से देखता हूं। मेरी तरह न जाने कितने लोग अपने अपने शहर को गंदा मानते होंगे। लेकिन फिर भी रहते वहीं हैं। यह सिनिक अप्रोच यदा-कदा हर किसी में कभी न कभी मुखर हो उठता है। संभवत: उन परिचित की "सिनिकल पूरनमासी" चल रही हो। इसी तरह की बातें मैं भी महसूस करता हूं जब अपने शहर की किसी भद्दी, किसी वाहियात किस्म की भंड़ैती से तंग हो जाता हूँ। प्रांतवाद, गंदी राजनीति, पोस्टर वार, पुकारने में 'रेकार' की बहुलता, बात-बात में झंडुपना। लेकिन रहना यहीं हैं। कुछ तो मजबूरी, कुछ आदत। यह भी होता है कि किसी से आप ताजिंदगी नफरत करते रहें लेकिन उसके बिना रहना मुश्किल लगने लगता है।      

   खैर, जब बात बनारस के गुणों-अवगुणों की चली है तो यहाँ काशी का अस्सी के उस अंश का जिक्र करना जरूरी समझता हूँ जिसमें एक अंग्रेजन कैथरीन रिसर्च करने बनारस आती है और उसे यहां रांड़, सांड़, सन्यासियों के बारे में कुछ ऐसी बातें पता चलती हैं कि उनका जिक्र पप्पू की दुकान में बैठे बनारसी ब्रम्हानंद, गया सिंह आदि से कर बैठती है। कैथरीन के अनुसार बनारस में ढेर सारे विधवाओं के लिये विधवाश्रम हैं जिनके कि नाम रजिस्टरों में दर्ज हैं। उन विधवाओं के लिये अनुदान जमकर मिलता है। कईयों के घर से साल भर का राशन पानी एक साथ आ जाता है। लेकिन देखने मे आता है कि पचास साठ कमरों वाले विधवाश्रमों में केवल पांच छह कमरे ही खुले हैं बाकी पर ताला जड़ा है। जो विधवायें कैथरीन से मिली भी वे किसी भी नजरिये से विधवा नहीं नजर आ रहीं थीं।

  कैथरीन का दूसरा प्रश्न सन्यासियों के बारे में हुआ कि -  यहाँ सन्यासी कौन है ? वो जो धूनी रमाए बैठा है और पैदल चल सकता है या वह जो मारूति, सुमो, मैटीज जैसी गाड़ियों में घूमता है - तरह तरह के देशी-विदेशी असलहों के साथ, मुस्टंड चेलों के साथ ? पूजे तो वही जा रहे हैं जो गाड़ियों में घूम रहे हैं, आश्रम और मठ भी उन्हीं के हैं, चेले-चाटी और भक्त भी उन्हीं के हैं। जो धूनी रमाए बैठे हैं, भिखमंगे से ज्यादा उनकी औकात नहीं है। कैथरीन ने घूम-घूमकर जो जानकारियाँ प्राप्त की, उनसे इस नतीजे पर पहुँची कि शायद ही कोई ऐसा सन्यासी या साधु हो जिस पर कत्ल के दस-पाँच मुकदमे न हों, जिसके पास ढेरों वैध-अवैध असलहे और हथियार न हों, जो आश्रम और मठों के नाम पर दस-पन्द्रह एकड़ जमीन न कब्जियाए हो ? सन्यासी किसे कहेंगे आप ?

   अगली बात उठी साँड़ों के बारे में। जिसके बारे में वहाँ मौजूद शिव प्रसादजी बोल पड़े - "देखिए तो पहले हर गली, मोहल्ले, सड़क, चौराहे पर साँड़। सही है कि पहचान थे बनारस के। न राहगीरों को उनसे दिक्कत, न उनको राहगीरों से। अत्यंत शिष्ट, शालीन, धीर-गम्भीर, चिन्तनशीलष न ऊधो का देना न माधो का लेना। आपस में लड़ लेंगे लेकिन किसी को तंग न करेंगे। बहुत हुआ तो सब्जी या फल के ठेले में मुँह मार लिया, बस ! वह भी तब जब देखा कि माल है लेकिन लेनदार नहीं। आप अपने रास्ते वे अपने रास्ते। वरना बैठे हैं या चले जा रहे हैं, किसी से कोई मतलब नहींष मन में कोई वासना भी नहीं। गायों के साथ भी राह चलते कोई छेड़खानी नहीं। हाँ भूख से बेहाल आ गईं तो तृप्त कर देंगे। निराश नहीं लौटने देंगे"

 "महोदय यह अपने बारे में बोल रहे हैं या साँड़ों के बारे में ?"  

 ब्रम्हानंद की चुटीली टिप्पणी को अनसुनी करते हुए शिव प्रसाद आगे कहते हैं - "ऐसा है मैडम, वृष्णोत्सर्ग कर्मकांड का एक विधान था। श्राद्ध से पूर्व एकादश को करते थे। त्रिशुल से दागकर छोड़ देते थे पुण्य-लाभ के लिए - कि जाओ, गोवंश की वृद्धि करो। लेकिन आज- जब मृतक के आश्रितों को ही नहीं पोसा रहा है तो साँड़ कहाँ से आएंगे ?"

   कैथरीन, ब्रम्हानंद, शिव प्रसाद और गया सिंह के बीच बनारस को लेकर यह चर्चा आगे चलती है.... निष्कर्ष के तौर पर कैथरीन राँड़ों, सांड़ों और सन्यासियों के आँकड़ों की बात करते हुए कहती है कि - 'वाराणसी इज डाइंग' ! "बनारस, जिसे लोग पढ़ते, सुनते, जानते थे - मर रहा है आज" !
   
     कैथरीन के द्वारा वाराणसी इज् डाईंग कहना वहां मौजूद गया सिंह को अखर गया। शब्द बाण शुरू हो गये। बनारस के मरने की बात सुनकर आहत हुए डॉ. गया सिंह को रोकना मुश्किल। 

    "तो क्या चाहती हैं आप कि मठ और आश्रम राँड़ों से भरे रहें ? साँड़ सड़कों और गलियों में जहाँ तहाँ गोबर करते रहें ? साधू-सन्यासी दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाए लोगों को चूतिया बनाते रहें ?"

 गया सिंह की उत्तेजना को लोगों ने शांत कराना चाहा लेकिन गया सिंह कहां रूकने वाले थे। जारी रहे।

    "घंटे भर से सिर हिला रहे हैं आप और वह कह रही है कि बनारस मर रहा है। इसी बनारस में हम भी हैं, आप भी हैं और यह अस्सी भी है, इसी बनारस के लिए सात समुन्दर पार से दौड़ लगा रहे हैं भोंसड़ी के ये अंग्रेज; लेकिन यह कह रही हैं और आप सिर हिला रहे हैं - सिर्फ इसलिये कि पाँच सौ की दिहाड़ी पर घर बैठ आपको काम चाहिये ; एक ऐसा विदेशी किराएदार चाहिए जिसकी खातिरदारी में आपका पूरा परिवार लगा रहे। यह नहीं देख रहे कि यही साले मार रहे हैं बनारस को और कह रहे हैं कि मर रहा है !"   

"अरे यार ! कुछ तो लिहाज करो महिला है !"

"महिला है तो कपार पर बैठकर मूतेगी ?"

     यह अंश भले काशी का अस्सी में वर्णित हो लेकिन कैथरीन के "वाराणसी इज् डाईंग" संवाद की तरह ही एक और शहर के लिये ऐसी ही बात एक फिल्म में कही गई थी और वह शहर है "बम्बई" ! ठीक यही संवाद ओम पुरी ने एक फिल्म में कहा था - "बॉम्बे इज् डाईंग"। सीन कुछ यूं था कि व्यवस्था और माहौल से हताश ओम पुरी बम्बई की सड़कों पर घूम रहे होते हैं, रास्ते में किसी से झगड़ा करते हैं। बगल में ही एक पेन्टर "Bombay dyeing" की होर्डिंग पेन्ट कर रहा होता है। ओम पुरी तैश में आकर जबरदस्ती उसका रंग लगा ब्रश अपने हाथ में ले लेते हैं और Bombay dyeing के बीच हाथ से "is" लिख देते हैं जिससे विज्ञापन का पूरा अर्थ बदल कर - "Bombay is dyeing" हो जाता है। ओम पुरी चिल्लाकर कहते हैं - "हां, बम्बई मर रही है। बॉम्बे इज् डाईंग"।

   बहरहाल इस चर्चा को यहीं विराम देते हुए इतना कहना समीचीन होगा कि हर शहर को लोग चाहने वाले होते हैं, उससे नफरत करने वाले भी ढेरों होते हैं, उसमें मजबूरी में रहने वाले लोग भी होते हैं। कुछ शहर सामाजिक समरसता में रचे-पगे रहते हैं तो कुछ दंगों की विद्रूपता झेलने को अभिशप्त। कहीं चारों ओर गंदगी ही गंदगी होती है तो ढेर सारी साफ-सुथरी, अट्टालिकाएं भी होती हैं। कोई शहर धार्मिक होता है, कोई नास्तिक तो कोई मिला-जुला गड्डमगड्ड। समय के साथ शहर की कुछ पुरानी चीजें ढह रही होती हैं तो कुछ नई चीजों का आगमन भी होता है। लेकिन वाराणसी की मौलिकता तो उसके पुन्नेपन में है। नया आने पर समायोजन भी हो जायगा जैसे और शहरों में होते हैं। लेकिन पुन्नेपन के नाम पर वाराणसी इज् डाईंग का तमगा मिलना थोड़ा कटु और आहत करने वाली बात लगती है। संभवत: इसके पीछे हमारी पुरातन सोच, संस्कार या सुनी गई बातें हों जो वाराणसी को सबसे पुराना जीवित शहर मानती आई हैं। ऐसे में धीर-गंभीर विदुषी कैथरीन के द्वारा जमा किये गये आंकड़े, उसके अवलोकन लोगों की सोच को झटके तो अवश्य देंगे, कुछ गया सिंह की तरह आहत भी होंगे, कुछ ब्रम्हानंद की तरह गया सिंह जैसों को शांत भी करेंगे।

    उस रात इन्हीं सब बातों को सोचते बिचरते हम सो गये थे। फिर सुबह जल्दी उठकर वापस गंगा घाट लौटकर नहाना भी तो था.....   

जारी.....

8 comments:

अनूप शुक्ल said...

:) क्या बात है!

ताऊ रामपुरिया said...

बनारस की पृष्ठभुमि लेये "काशी का अस्सी" पढी है, पर आपकी दृष्टि से इसे जानना भी अच्छा लगेगा. इंतजार करते है अगले भाग का.

रामराम.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

काशी का अस्सी का संदर्भ लिये यह पोस्ट जानदार बन पड़ी है।

जो कहता है बनारस मर रहा है या जो कहता है बोम्बे मर रहा है दरअसल उस शहर से बहुत प्यार करता है। वह शहर के जिस रूप पर वर्षों से फिदा है, वही अगर मिटने लगे तो उसे पीड़ा होती है। आपने सही लिखा कि अपने शहर के बारे में खीझ कर हम ऐसा कहते हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कि‍सी भी शहर में जैसे जैसे भीड़ बढ़ती जाती है बहुत सी वि‍कृति‍यां स्‍थान लेती ही हैं

P.N. Subramanian said...

सुन्दर, लेकिन यह सही है कि बहुत
सारे शहर अपनी पहचान खो रहे हैं

सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी said...

जय हो...

प्रवीण पाण्डेय said...

सच कहा, कपार पर बैठाल के सब करवा रहे हैं, सदियों से।

अनूप शुक्ल said...

क्या बात है फिर से!

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