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Friday, July 12, 2013

गंगा आरती......सकोरे वाली लस्सी.... बनारस यात्रा - 3

     सारनाथ से वापस गंगा-घाट की ओर चलने पर रास्ता पूछने पर पता चला कि कोई "गोलगढ्ढा" नाम का इलाका है रास्ते में, वहीं से दहिने बायें कटते पहुँचना है। पहले तो नाम सुनकर ही अजीब लगा कि ये क्या नाम हुआ गोलगढ्ढा। फिर सोचा अपने देश में ऐसे ऐसे स्थानों के नाम हैं कि सुनकर ही हंसी आ जाये। तीसरी कसम का हीरामन, हीराबाई की नाकपुर (नागपुर) - कानपुर... वाली बात सुन ऐसे ही नहीं हंसा था। 

  आगे जिस इलाके से बढ़े उसमें काफी देर तक तो धूल-धक्कड़ ही नजर आ रहा था। मुर्गीयों की कौक कौक, गाय-भैंसों के रेवड़, गाड़ी ठेलों की हिहिर-पिपिर। आगे एक जगह जाम दिखा तो पुलिस वाले ने किसी तरह सीटी वीटी फूंक कर जाम छुड़ाया। एक बोलेरो वाला नहीं मान रहा था तो सीधे पुलिसिया औकात पर आ गया - "का महराज....ढेरे जल्दियान हउअ .....बताईं कइसे जल्दी कइल जाला"। आगे जाने पर एक ठेले पर गन्ना पेरता जूसवाला दिखा। गाड़ी साईड में खड़ी कर ताजा गन्ने का रस ढारा गया। ढलती शाम के दौरान रास्ते में ढेर सारी भैंसे अपने बथान की ओर लौटती दिखीं।

  गोलगढ्ढा होते हुए आगे बढ़े तो कुछ दूरी पर एक गली में ठेले पर पकौड़ियाँ छनने की छन-छन्....कड़र-कड़र वाली आवाजें सुनाई पड़ी। महक भी अच्छी आ रही थी। वहीं साईड में गाड़ी खड़ीकर देखा गया तो ठेले पर कुछ वड़ा टाईप की चीज तली जा रही थी। पूछने पर पता चला भरवां टमाटर की पकौड़ी है। तब टमाटरों के दाम कम थे। पता नहीं अब वो पकौड़ियों वाला भंरवा टमाटर की पकौड़ी बनाता होगा कि नहीं। साथ में धनिये की चटनी थी। दो प्लेट लिया गया। अच्छा लगा तो और लिया। दिक्कत यह थी कि दूसरी खेप गरम-गरम थी। जलते-ठंढवाते फूंकते किसी तरह उदरस्थ किया गया। बगल में ही कुल्हड़ वाली चाय पी गई। एक जन वहीं दुकान पर आकर किसी से अपना काम करवाने का ब्यौरा बता रहा था कि फलाने को हड़काया, धमकाया, चमकाया और न माना तो कल्ले से सामान झलकाया तो ढीला पड़ा। यहाँ सामान से तात्पर्य कट्टा, रिवाल्वर, चक्कू जो चाहे समझा जा सकता है। ये बातें गौण हैं, महत्व सामान की झलकारी का है जिसकी झलक पाते ही सामने वाला ढीला पड़ा।

    खैर, आगे बढ़े। चौक की ओर पहुँचने पर याद आया कि यहीं विश्वविद्यालय प्रकाशन है। समय होता तो यहाँ भी एक चक्कर मार लेता। द्विजेन्द्र नाथ निर्गुण की कहानियों का संकलन यहीं से छपता है। लेने की बड़े दिनों से साध है लेकिन यह साध पूरी न हो सकी। पोस्ट के जरिये मंगाने की सोच आगे बढ़ गया। फिर समय भी कम था ( यह समय कम होने का बहाना बहाना ही है। असल बात चीजों की उपलब्धता की है। जानता हूं कि पोस्ट से मिल सकती है, वरना बनारस के चौक से बीस पच्चीस कदम ही तो चलना था) वहाँ से झुरमुटे अंधेरे में दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़े। दुकानों की लाइटें जल तो रही थीं लेकिन उतनी जगर-मगर लग नहीं रही थी।         

 आगे जाकर पार्किंग में मोटर साईकिल "ठाड़" करने के बाद पाँच रूपये की पर्ची ली गई। दो हेलमेट थे तो वहीं हेंडलों के अगल बगल लटका कर चलते बने। मन अटका था कि कोई हेलमेट न ले जाय। दशाश्वमेध घाट की ओर बढ़ते हुए लगा कि समूचा शहर ही जैसे गंगा आरती देखने उमड़ पड़ा हो। कुछ यही हाल डॉक्टरों, वकीलों, मॉल्स की भी होती है कि जैसे डॉक्टर के यहाँ जाओ तो लगता है सबको बुखार ही पकड़ा है, वकील के यहाँ जाओ तो लगता है जैसे सारे शहर के लोग मुकदमे में फंसे हैं, फोटोकॉपी वाले के यहाँ जाओ तो लगता है जैसे सभी लोगों को आज ही फोटोकापी करवा कर लाने के लिये कहा गया है। वैसा ही हाल यहाँ भी लगा। रास्ते में कुछ दुकानों के साइनबोर्ड बांग्ला में लिखे देखा तो लगा कि यहीं कहीं बंगाली मोहल्ला भी होगा जिसके बारे में कथा-साहित्य में यदा-कदा उल्लेख होता रहा है। 

 आगे जाकर सीढ़ियाँ शुरू हो गईं। कानों में मंत्रध्वनि सुनाई पड़ने लगीं। दो लोग एक माईक के आगे खड़े होकर पूजा अर्चना के शुरूआती मंत्र पढ़ रहे थे। मैंने अपना बैग-पैक वहीं रखा और सीढ़ियों पर बैठ गया। मेरे ठीक बगल में एक बाबाजी बैठे थे। उनकी ओर देखा तो वे मेरी ओर ही देख रहे थे। मैंने जैसे ही ताका वो बोले - पानी है ? मैंने तुरंत बिना बोले बैग से बोतल निकालकर आगे कर दी। आधा पानी बचा था। बाबाजी थोड़ा पीकर वापस लौटाने लगे तो मैंने कहा रखिये अपने पास। दूसरा ले लूंगा। बाबाजी हंसने लगे। मैंने अब आसपास और नजर दौड़ाई तो लगा जैसे समूचे भारत से भिन्न भिन्न प्रांतों के लोग आ जुटे हैं गंगा आरती के लिये। थोड़ी देर बाद बाँसुरी की टेर सुनाई पड़ी और देखते देखते कुछ युवा एक-एक कर हाथों में बड़ी सी आरती की थाल लिये प्रकट हुए। सभी जाकर गंगा घाट के पास बने अस्थायी लकड़ी के मेहराबों के करीब जाकर कुछ दूरी पर खड़े हो गये। माहौल में अगरबत्ती, कपूर, धूप की महक फैलने लगी। सभी लोग उत्सुक हो नजारा देखने लग गये। अचानक संगीत बदल उठा। अब बाँसुरी की टेर के साथ साथ बाकी के वाद्य यंत्र भी सुनाई देने लगे। बिल्कुल ही अलग माहौल बन गया। पूजा अर्चना शुरू हो गई। लकड़ी की मेहराबों से टंगी घंटियों को रस्सी के सहारे नीचे खड़े लोग खींच खींच कर बजाने लगे। उधर नावों में भी गंगा आरती देखने के लिये ढेर सारे लोग जमा थे। अगल बगल से ढेर सारी नौकाएं इसी ओर आ रही थीं। लोग नावों में बैठे बैठे कैमरों में लगे फ्लैश का इस्तेमाल कर तस्वीरें ले रहे थे। ढेर सारे लोग आस-पास मोबाइल से तस्वीरें कैद कर रहे थे। मेरा भी मन हुआ लेकिन इस चक्कर में सामने गंगा आरती के दृश्य को प्रत्यक्ष देखने और रोमांचित होने का सुख कम हो जाता। सो मोबाइल से इक्का दुक्का तस्वीरें लेकर मोबाइल जेब के हवाले किया।

    गंगा आरती के दौरान कई लोग निजी तौर पर हाथ में आरती की थाली ले भीड़ के बीच पहुंचते दिखे। जिसे जैसी श्रद्धा होती वैसा चढ़ावा चढाकर आरती में सहभागी बनता। कॉर्पोरेट की शब्दावली में कहूँ तो इन लोगों को देख लगता था कि ये गंगा आरती के ऑफिशियल पार्टनर संभवत: नहीं हैं। जो कुछ चढ़ावा चढ़ेगा वह इनकी निजी आय मानी जायगी। धीरे-धीरे गंगा आरती का समापन हुआ। लोग चलने लगे तो हम लोग भी वहाँ से निकल पड़े। रात में वहीं एक रिश्तेदार के यहाँ टिकना था। उनके यहाँ छौंकी दाल, घी लगी रोटियाँ, रसेदार आदि का चऊचक इंतजाम किया गया था। जल्द आने का आग्रह भी था। लेकिन यहाँ लौटते हुए रूक रूक कर गये। रास्ते में एक जगह दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर देखा। नाम पढ़कर ही सोच में पड़ गया कि ये क्या बात हुई कि दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर ? अरे भई  देवता हैं। कभी उत्तर का भक्त याद करता होगा, कभी पश्चिम का तो कभी पूरब का। लेकिन यह क्या कि केवल दक्षिण मुखी हनुमान जी ? वैसे भी अपने यहाँ दिशा को लेकर आडम्बर कम होते हैं जो देवताओं को भी दिशा आधारित मान लिया गया है।

  खैर, वह मंदिर इसलिये याद रहा कि वहीं रूककर मिट्टी के सकोरे में मस्त-ठंडी लस्सी पी गई। कुछ आस पास का माहौल देखा समझा गया। बिजली के खंभों से सटा तारों का जंजाल वैसे ही शोभायमान था जैसे अन्य छोटे शहरों में सुशोभित होता है। देखने से लगता है कि इन बिजली के तारों के घनघोर उलझा होने पर भी सही-सही घर में बिजली पहुँचाना और बिजली मीटर की रफ्तार को तदनुसार बनाये रखना भी एक कला है। यह कला और निहारी जाती लेकिन रिश्तेदार के यहाँ की घी लगी रोटी, रसेदार तरकारी और दाल इन्तजार कर रहे थे। सो मोटरसाईकिल चल पड़ी रिश्तेदार के पते पर....।

जारी.......

- सतीश पंचम

12 comments:

kshama said...

Bahut sundar...chitrmay shaili..aankhoke aage tasveern ubharti raheen.....ek binti hai....na mani to koyi baat nahi...alekh kee lambai thodi chhti rakhen....zyada maza aayega....anytha na len...

प्रवीण पाण्डेय said...

लस्सी के रूप में जब पूरा बनारस मन में समाया होगा तो मस्त होकर नींद का तगड़ा झोंका आया होगा।

anshumala said...

जो हम को पता होता की आप बनारस जा रहे है तो और कई चीज आप को बता देते की क्या क्या देखना है :))
बनारस में उत्तर से आने वाली गंगा उत्तर की और ही बहती है , ठण्ड में गए होते तो लस्सी की जगह मलैये खाते , बिसनाथ जी नहीं गए क्या , उम्मीद है रसेदार तरकारी अच्छी लगी होगी :)
छोटी थी तो टीवी पर अनु कपूर वाली अंताक्षरी देखती थी , जब देखती थी की बिदेश में लोग भारतीय गाने देश को याद कर रोने लगते थे , तो बड़ा झूठ और नाटक लगता था बोलो तो एक गाने से क्या देश की याद आ जाना काहे का लगाव बकवास करते है , जब शादी के बाद मुंबई आई तो ऊ बकावासगिरी समझ आने लगी :(

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

विश्वनाथ जी के दर्शन करने का मन तो था लेकिन कुछ कुछ थका मांदा था सो फिर कभी सोचकर दर्शन नहीं किया। फिर कुछ-कुछ उन पंडों से भी चिढ़ होती है जो पहुंचने से पहले ही मुझे-मैं-मेरे यहां वाली जबरी करने लगते हैं। फूल माला वाले भी उसी तरह की खेंच-खांच करने लगते हैं। मलैयो के बारे में काफी सुना है। कभी ठंड के मौसम में जाकर उसका भी लुत्फ लेने की चाह है। देखते हैं यह इच्छा कब पूरी होती है :-)

सतीश पंचम said...

kshama ji,

दरअसल एक इलाका / प्रसंग को एक ही पोस्ट में रखने की कोशिश करने के चलते पोस्ट लंबी हो जा रही है। दो टुकड़ों में यही पोस्ट लिखने पर तारतम्य टूटने की संभावना रहती है :)

सतीश पंचम said...

प्रवीण जी,

लस्सी ने तो जी तर कर दिया था। हाँ, नींद का झोंका थकावट के चलते जरूर आया था :)

Rahul Singh said...

संभवतः उच्‍चारण 'गोलगड्डा' (बस अड्डा/स्‍टैंड) है.

चौक पर ही चौखम्‍बा की भी दुकानें हैं.

संजय अनेजा said...

जारी रहे यात्रा, मजा आ रहा है:)

वाणी गीत said...

तीर्थ स्थलो पर पंडों और ,प्रसाद फूल आदि बेचने वालों की आवभगत(!!) बहुत परेशान करती है . गंगा आरती का दृश्य लुभावना होता है !
रोचक वृतांत!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत खूब..

भागदौड़ कर देखा और लिखा इत्ते दिनो के बाद भी इत्ते करीने से..वाह!

हमलोग गोलगड्डा कहते हैं।

राकेश said...

अब तक के चारो किस्‍तें पढ लीं आपकी बनारस यात्रा की. मैं तो आपके बनारस का मुरीद हो गया हूं. मार्च में 21 दिन बनारस के घाट पर गुजार कर आया हूं. जितना अब तक कि जिन्‍दगी में नहीं सीखा था, तीन हफ्ते का घाट प्रवास सिखा गया. शहर तो जो है, सो है. लोगों की बात ही निराली है. पर घाटों का जीवन एक बिल्‍कुल अलग अनुभव है. कभी लंबी बात होगी इस पर. निराला और अनोखा शहर है. मैं बार-बार बनारस जाना चाहूंगा और हर बार कुछ दिन घाटों पर ही गुजारना भी.


शुक्रिया भाई इस संस्‍मरण को बांटने के लिए.

सतीश पंचम said...

राकेश जी,

अपने 21 दिनी अनुभव को हो सके तो शेयर करें। हम तो डेढ़ दिन के अनुभव में ही मस्त हो लिये :-)

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