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Sunday, July 7, 2013

अतिक्रमण मतिक्रमण.... भारत माता मंदिर..... सारनाथ.... बनारस यात्रा - 2

     बनारस के रथयात्रा इलाके से सारनाथ की ओर जाने वाली सड़क पर आये तो सामना हुआ अतिक्रमण हटाने वाले दस्ते से। अतिक्रमण हटाने के दौरान रास्ता रोक दिया गया था लेकिन फिर भी पैदल लोग आ जा रहे थे। साईकिल वाले कंधे तक साईकिल उठा कर आगे निकल रहे थे तो चिलचिलाती धूप में हम जैसे मोटरसाईकिल वालों का मूड़ उखड़ा था, चौपहिया वाहन वाले लोग भी उखड़-पखड़ रहे थे कि जब अतिक्रमण हो रहा था तब ये लोग कहां मरवा रहे थे। एक बाबाजी अतिक्रमण करने वालों को  सुनाते गये कि - "भोसड़िया वालेन के ई नांय सुझात रहा कि मनई कईसे अईहीं जईहीं, जगह छेंक लिहे रहेने एनकरे बाप दादा के सड़क हौ। हां, देक्खा तनि" 

     थोड़ी देर बाद रास्ता खोला गया। आगे जाकर तीर के निशान से बताया गया था कि इसी ओर भारत माता मंदिर है। देखते जाने के बावजूद आगे बढ़ जाने पर किसी से पूछा गया तो बताया गया कि ऊ जो सामने हनुमान जी का मंदिर है उसी के "ओरियाँ" है। सीधे चले जाइये। हम लोग उसी "ओरियाँ" चल पड़े। सामने गेट दिखा। अंदर मोटरसाईकिल लेकर पहुँचे तो पेड़ की छाँव में दो चार कॉलेज वाले लौन्डे-लफाड़ी अपने सहपाठिनों संग कचर-पचर बतियाते दिखे। आगे नजर पड़ी तो 
बड़ा सा बोर्ड दिखा। भारत माता मंदिर। 



        साथ ही दिखा वह निर्देश जिस पर स्पष्ट लिखा था कि कृपया जूते उतार कर अंदर जायें। हम लोगों ने निर्देश का पालन करते हुए चप्पल-जूते उतारे और सीढ़ियों पर पैर रखा तो लगा जैसे एकदम से गर्म तवे पर पैर पड़ गया हो। कड़क धूप का असर। पटियेदार सीढ़ियों को गर्म होना ही था। मन में आया कि ठंडा पानी होता तो इस तप्त चट्टानी पटिया पर पानी गिरा कर उससे उठती महक का आनंद लूँ। गर्मी के मौसम में अक्सर गाँव घर की छत जिसकी सीढ़ियाँ मिर्जापुरी पटिये की हैं, तप्तावस्था में पानी पड़ने पर खास किस्म की महक देती हैं। लेकिन वहाँ यह सब प्रयोग करने थोड़ी गये थे। जल्दी जल्दी तपती चट्टानी सीढ़ियाँ पार कर आगे बढ़े, देहरी छूकर प्रणाम किया और अंदर दाखिल हुए। 



भारत का उभारदार मानचित्र
    अंदर जाने पर एक तरह की शांति सी मिली। कुछ तो गर्म पटिये से पाँव जलने से बचने की वजह से और कुछ भीतर की छाँह से। अंदर देखा तो जमीन पर भारत का एक विशाल नक्शा सा बना हुआ था। सफेद संगमरमर से पहाड़, नदियाँ, सागर दर्शाते उस नक्शे को देखकर मन में एक अलग से भाव आये कि यही है भारत भूमि। यही है वो धरा जिसका इतिहास, जिसका धर्म, जिसकी संस्कृति का अतीत इतना विहंगम, इतना विशाल है बृहद है कि कई-कई जन्म कम पड़ जायेंगे इसे समझने में। संगमरमरी नक्शे के चारों ओर की बनी रेलिंग से सटकर हम लोग इस अद्भुत कृति को देखते रहे।


       नजर पड़ी आस-पास की दिवारों पर तो कुछ धुंधला सा दिखा। ओह....ये तो इस दिवार पर नक्शा ही पूरा का पूरा हाथों से बनाया गया है। आस पास के और तमाम दीवारों को देखा गया। सभी में एक अलग एहसास। छूने का मन करता था लेकिन नहीं छूआ गया। संभवत: इस ललक के कारण ही यह नक्शा छू छूकर धुंधला पड़ गया है। कहीं कुछ स्पष्ट नहीं दिख रहा लेकिन पता चलता है कि यह हिमालय है, यह पश्चिमी भारत यह बंगाल की खाड़ी। कुछ तस्वीरें ली गईं। आसपास नजर दौड़ाया गया तो एक पुलिस वाले दिखे। लुंगी जमीन पर फैलाकर बैठे हुए अखबार से पंखा झल रहे थे। दूसरी ओर देखा तो एक छोटी सी दुकान दिखी जिसपर कुछ किताबें, कुछ चित्र नजर आ रहे थे। आगे बढ़कर उन्हें देखा गया। सराहा गया। लेकिन लिया कुछ नहीं गया। पहले से अब संयत खरीददारी करने लगा हूँ। पहले इस तरह की एतिहासिक चीजों के विवरण आदि अदबदाकर खरीदता था लेकिन धीरे-धीरे उनमें लिखे कुछ मिथ्या, कुछ अनर्गल, फालतू के प्रलाप से जी भरता गया और अब टटोल टटोलकर ही खरीददारी करता हूँ। बेमतलब सेंटी होना या किसी के बौद्धिक प्रलाप से प्रभावित होना वैसे भी अब नहीं सुहाता। सो, आगे बढ़ लिये। एक जगह बोर्ड दिखा जिस पर इस मंदिर को बनाने के पीछे का इतिहास लिखा था। उसे पढ़ा गया। समझा गया। सराहा गया। उधर समय बीता जा रहा था। वैसे भी सारनाथ पुरातत्व विभाग के अंतर्गत आता है जिसे देखने का निश्चित समय होता है। ज्यादा देर रूकने का मतलब है कि सारनाथ न देख पाना।

  सो मोटर साईकिल अब सारनाथ की ओर दौड़ चली। वहाँ पहुँचने से पहले ही दिख जाता है कि आप किसी खास इतिहास को छूने जा रहे हैं। जगह जगह पत्थरों की मूर्तियाँ, कुछ पुरानी, कुछ हाल ही में बनी, कुछ स्तूप। सब जैसे आभास दे देते हैं कि आगे क्या है।

   सारनाथ के धमेख स्तूप के पास पहुँचकर पूछताछ की गई तो पता चला कि संग्रहालय पहले देख लिया जाय क्योंकि उसका निश्चित समय है। धमेख स्तूप सूर्यास्त तक देखा जा सकता है। इसलिये टिकट लेकर सारनाथ संग्रहालय की ओर बढ़ गये। पहले भी सारनाथ के इस संग्रहालय में हो आया हूँ लेकिन तब इतनी सुरक्षा नहीं थी। अब भी नहीं है लेकिन पहले से कुछ ज्यादा सतर्कता दिखती है। मोबाइल अंदर ले जाने नहीं दिया गया। कैमरा भी बैन। सिक्यूरिटी गार्ड से कहा गया कि भईया बैटरी रख लो, मोबाइल अंदर ले जाने दो। लेकिन वह तैयार न हुआ। बाहर रखवा कर ही माना। अच्छा लगा जानकर कि सिक्यूरिटी गार्ड मुस्तैद था।

    सुंदर बाग-बगीचों के बीच से होते हुए अंदर मुख्य हॉल में पहुँचे जहाँ पीठ से पीठ जोड़े चार शेर खड़े हैं। रूपये पर या यूं ही छोटे-मोटे कलाकृति के रूप में चार शेरों को तो कई बार हमने देखा है लेकिन अपने बृहदाकार में प्रत्यक्ष देखने पर अद्भुत लगती है प्रतिमा। अब तक चमक बरकरार है। खुर इतने सधे अंदाज में नुकीले बने हैं कि लगता है उंगली रखकर नीचे से हल्का दबाव दिया जाय तो अभी हमारी उंगली से खून निकल आयेगा। गठी देंह वाले शेर। पुलकित करती है प्रतिमा। अद्भुत। तभी वहाँ एक गाईड पंदरह बीस दक्षिण भारतीय पर्यटकों को अशोक के चार सिंहों वाली लाट के बारे में समझाते दिखे। चुनार के बलुआ पत्थरों से निर्मित उस विशालकाय प्रतिमा के साथ मैंने बहुत पहले अपनी फोटो खिंचवाई थी। पता नहीं कहां है अब वह फोटो। अब तो अंदर कैमरा भी अलाउड नहीं है।  
  

     वहीं हॉल में और तमाम पुरातत्व से जुड़ी चीजों को देखा गया। एक जगह ताम्र-पाषाणकाल का बरछा दिखा जिसे देखकर कुछ देर वहीं रूक गया। उसकी बनावट देखते हुए कल्पना में खो सा गया कि जो इसे गढ़ रहा होगा उसने कैसे कैसे इसे बनाया होगा, क्या-क्या चीजें किस टीले से लाकर इसमें मर-मसाला समेटकर बनाया होगा। तभी किसी की बातों से मेरा ध्यान बंट गया। एक महिला प्रदर्शन हॉल के बीच रखी लंबी सीटों पर लेट गई थी। उसका पति वहीं अपने बच्चों के साथ प्रदर्शित वस्तुएं देख रहा था। शायद महिला की रूचि न थी इन तमाम पुरातात्विक चीजों में या तबियत खराब थी पता नहीं लेकिन उसका इस तरह से बीच हॉल में पसर जाना अटपटा सा लगा। हो सकता है कुछ शारीरिक परेशानी हो। वहाँ से आगे बढ़ते हुए ईंटों के टुकड़े पर ध्यान गया जिसमें बताया गया था कि इमारतों में कोने वाली बाहरी ईंटें हमेशा से खूबसूरत बनाने का चलन रहा है। प्लास्टर हो या न हो, कोना खूबसूरत लगना चाहिये। सौंदर्य की यह अनूभूति अपने आप में रोमांचित करती है।

   संग्रहालय के दायें गैलरी को पार कर जब बांये गैलरी में गया तो वहां फिर वही महिला पसरी दिखी।  मन में आया कि इसे जब सोना ही था तो घर जाकर सोती यहां क्यों बीच गैलरी पुरातात्विक महत्व की  सामग्री बनी है। उधर उसका पति बराबर अपने बच्चों को प्रदर्शनी की वस्तुएं दिखा रहा था। समझा रहा था। खैर, तमाम चीजों को देखते हुए संग्रहालय के बंद होने का समय आ गया। हम लोग बाहर निकलकर धमेख स्तूप की ओर बढ़े। वहाँ जाने तक शाम ढलने लगी थी। एक ओर नजर दौड़ाई तो कुछ लोग पेड़ों के नीचे किसी का बर्थडे सेलिब्रेट कर रहे थे। एक बंदा केक काट रहा था। बाकी लोग हैपी बड्डे करते हुए गीत गा रहे थे। सामने विशालकाय धमेख स्तूप खड़ा था। दूसरी ओर निगाह दौड़ाई तो कोई प्रेमी-प्रेमिका सटकर एक दूसरे के गले का नाप ले रहे थे। रह रहकर इधर उधर ताक भी रहे थे। आखिर वो भी क्या करें, उन्हें भी तो ठिकाना नहीं मिलता, सो यहीं धमेख स्तूप के पास भाव-विह्वल हो लेते हैं।  जिसने बनवाया होगा तब उसे थोड़ी मालूम होगा कि यह इलाका कभी प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिये शरण-स्थली का भी काम करेगा।

  थोडी देर वहां चहलकदमी के बाद अचानक निगाह एक गिरगिट जैसे जंतु पर पड़ी जो सरसर करता वहां पड़ी चट्टानों के पास से गुजर रहा था। साथ चल रहे भ्राता श्री से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिसखोपड़ा है। कुछ क्षण बाहर रहने के बाद बिसखोपड़ा वहीं कहीं जमीनी पाईप में जा धंसा। शाम गहराती जा रही थी तब प्लान बनाया गया कि अब सीधे गंगा आरती के लिये चला जाय। पहुँचते पहुँचते समय हो ही जायगा।

जारी.....

11 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सही बात, अतिक्रमण पहले बहुत पहले से सम्हाला गया होता तो मुँह बाये न खड़ा होता। सुन्दर विवरण।

prkant said...

jeevant vivaran

अनूप शुक्ल said...

आगे का किस्सा कब ?


विवरण चकाचक! बाबाजी अतिक्रमण वालों को सही गरियाये। :)

anshumala said...

सारनाथ गए और एक सबसे ख़ास चीज देखना भूल गए लगता है , उसका जिक्र पोस्ट में नहीं है , देख लेते तो अच्छा था क्या पता खुराफाती दिमाग फिर दूसरो को उन्हें देखने के लिए छोड़े ही नहीं । सारनाथ में मंदिर के बगल में जो बड़ा पेड़ है जिसके निचे ५ बौद्धिष्टो को बैठा दिखाया गया है असल में वो उस मूल पेड़ के क्लोन का क्लोन है जिसके निचे बैठ कर बुद्ध ने ज्ञान पाया था । जो असली पेड़ था उसे अशोक की पुत्रवधू ने नष्ट करा दिया था उसके बाद , अशोक ने उसकी जो कलम श्री लंका भेजा था उस पेड़ से दो कलम ला कर एक बोद्ध गया में लगाया गया जहा कमबख्तो ने फिर उसे नष्ट करने का प्रयास किया और दूसरा सारनाथ में लगाया गया , पागलो की जमात का क्या भरोसा एक है जिनसे सुरक्षा करने नहीं आती सूचना के बाद भी दुसरे नालायको को सब नष्ट करने के आलावा आता ही क्या है ।

भारतमाता मंदिर में दीवारों पर जो नक्शा बना है जहा तक मुझे याद है वो हर काल में भारत के नक़्शे का क्या रूप था उसका है हर पुरातन राजा महाराजा के काल में भारत कैसे कितना बढ़ा घटा उसका सबुत है । शायद गाइड ने आप की बताया हो की जो मानचित्र जमीन पर बनी है वो बस ऐसे ही नहीं बनी है पुरे नाप जोख के साथ है हिमालय से ले कर विन्ध्याचल पहाडियों की जीतनी उंचाई है उतनी ही उचाई और गहराई को रखा गया है , नदियों की गहराई में कभी पानी भी बहता था । दोनों पोस्टे पढ़ी अच्छी लगी जमाने बाद बनारसी अयली गयली पढ़ कर लगा की बनारस में ही हूँ :)

anshumala said...

tani hamaara comment aajad kar de :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत रोचक विवरण है भाई। मुझे अभी तक संयोग नहीं बना सारनाथ जाने का। अब मन ललचा रहा है।

सतीश पंचम said...

अनूप जी,

अभी समय नहीं मिल पा रहा। कोशिश करूंगा कि जल्दी अगली कड़ी पोस्ट करूँ।

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

आपने इतना विवरण दे दिया कि लग रहा है बनारस यात्रा से पहले आप से पता करके जाना चाहिये था। बोधिवृक्ष और उन मूर्तियों के बारे में तो कुछ भी नहीं पता था। और यह भी नहीं पता था कि मानचित्र पर नदियों की तरह पानी की लकीर बनी रहती थी। वैसे भी डेढ़ दिन की यात्रा थी। सो अगली बार बनारस ध्यान से देखल जाई :)

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

बनारस यात्रा करियेगा तो गंगा आरती विशेष रूप से देखियेगा। भव्य, अद्भुत।

पूरण खण्डेलवाल said...

रोचक यात्रा विवरण !!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छा वर्णन किया है आपने..चकाचक। अंशुमाला जी के कमेंट ने चार चाँद लगा दिया।

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