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Saturday, July 6, 2013

हेलमेट-वेलमेट, इलेक्टरिक पिया और रस्ता पूछैती........ बनारस यात्रा - 1

     गाँव जाने पर इस बार मन हुआ कि बनारस घूमा जाय। चलकर गंगा के घाटों का आनंद लिया जाय, सारनाथ और आस-पास घूमा जाय। बनारसी मस्ती का आनंद लिया जाय और हाँ, काशी का अस्सी में वर्णित उस बनारसी पप्पू की दुकान भी देख ली जाय जिसके बारे में माना जाता है कि वह नागरिक उड्डयन एंव पर्यटन मंत्रालय के लिये एक तरह का चैलेंज है कि आखिर कैसे यहां के लोग बिना कोई खरच पानी किये बैठे-बैठे दुनिया की सैर कर आते हैं ? कैसे लोग कचपच करते लंठई और उद्गम विहारम् हेन तेन धतेन की बातें करते मराते रहते हैं इहाँ-उहाँ। और सबसे बढ़ कर तो यह दुकान अंतरिक्ष अनुसंधान कर्ताओं के लिये भी अब तक पहेली ही है। उन्हें लगता है कि सूरज सुबह नहा-धोकर चलता तो है अपने अड्डे से लेकिन गिरता इस पप्पू की दुकान में ही है। ऐसा क्या है इस दुकान में। न बरमूडा त्रिकोण, न न्यूटन का सेब, न चित्रलेखा की देहरी न पारो का दरवज्जा....फिर किस आकर्षणवश सूरज यहीं आकर पप्पू की दुकान में लद्द से गिरता है ?

  तो सन्तो, तारीख थी पाँच जून दुई हज्जार तेरह। उस दिन सुबह मैं अपने चचेरे भ्राता श्री सत्येन्द्र के साथ मोटरसाईकिल पर निकल पड़ा। लंबा सफर था सो दो हेलमेट ले लिया गया। सुरच्छा के साथ नो कौम्परोमाईज। वरना होता यह है कि आगे बैठा शख्स तो हेलमेट लगा लेता है लेकिन पीछे वाला वैसे ही बिना हेलमेट चलता है यह मानकर कि वह तो अमरता की बूटी खाकर आया है, जो चोट लगेगी आगे वाले को लगेगी कि पीछे वाले को क्यों चोट लगेगी। आखिर वह तो मोटरसाईकिल चला भी नहीं रहा। सिर्फ बैठा ही तो है। या शायद भारतीय जनमानस में यह रच बस चुका है कि आगे वाला यदि हेलमेट लगाता है तो पीछे वाले को बचाने के लिये पॉवर ऑफ अटार्नी खुद-ब-खुद उन अदृश्य शक्तियों को मिल जाती है जिनका काम ही है पीछे बैठे बिना हेलमेट वाले को बचाये रखना।

  खैर, गाँव की सड़क से बाजार की सड़क, फिर उससे बड़ी सड़क। हाईवे पर आने पर लगा कि समूचा हाईवे किसी ने जगह-जगह से चाट कर सफाचट्ट कर दिया है और बची है तो खुरदरी, झुर्रीदार सतह जिसे उपर से नासा वाले वैज्ञानिक देख-देखकर आपस में एक दूसरे को यह कहकर हिम्मत बंधाते होंगे कि जब इस इंडियन सड़क पर लोग इतनी तेज रफ्तार से उस पर से रगड़-घसड़ कर आगे निकले जा रहे हैं तो हमें भी उम्मीद रखनी चाहिये कि कम बजट और सीमित सुविधाओं के बावजूद हमारा भी मिशन कामयाब होगा, हम भी रगड़-फसड़ कर आगे बढ़ेंगे और मंजिल तक पहुँच जायेंगे।

  आगे जाकर रास्ते में प्यास लगी तो आम का पना पिया गया। दस रूपये का एक गिलास। जीरा, पुदीना, नमक औऱ न जाने क्या क्या मायावी चीजें पड़ी थीं कि पना अच्छा लगा और डबल डोज् लिया गया। आगे बढ़े। रास्ते भर में शर्तिया इलाज वाले ढेर सारे विज्ञापन दिखते रहे। किसी किसी में नपुंसकता का इलाज इलेक्ट्रिक से करने की बातें भी दर्ज थी। बड़े बड़े विशालकाय अक्षरों को देख लगता था कि दुनिया में बस यही गुप्त रोग ही एक रोग है जिसे रोग माना जा सकता है बाकि तो बस दिल बहलाने की चीजें हैं। शीघ्रपतन, स्वप्नदोष, टेढ़ा अंग आदि की बमबार्डिंग इतनी भयंकर कि हो सकता है कुछ लोग मात्र शंकावश चले जाते होंगे कि जब इतनी बड़ी महामारी इस क्षेत्र में फैली है तो लगे हाथ दिखा लिया जाय कि महामारी ने असर तो नहीं किया है। हो सकता है इन शर्तिया विज्ञापनों की अधिकता और सदाशयता से शंकित हो कुछ महिलायें अपने पतियों को सज्जेस्ट भी कर देती हों कि जाते क्यों नहीं इलेक्टरिक इलाज करवाने। यहीं से गैंग्स ऑफ वासेपुर के उस गाने का भेद खुलता है जिसमें इलेक्ट्रिक पिया का जिक्र है और जिनके बारे में माना जाता है कि जनाब तार बिजली से पतले हैं।

 खैर, बनारस पहुँचने से पहले जबरदस्त ट्रैफिक का सामना करना पड़ा। चुनचुनाती धूप में मोटरसाईकिल पर बैठे बैठे जब आसपास नजर दौडाई तो फिल्मी पोस्टर बड़े आतुरभाव से ताकते दिखे। कुछ भोजपुरी फिल्मों के थे तो कुछ हिन्दी। कुछ अंग्रेजी फिल्मों के हिन्दी संस्करण। किसी तरह कैंट की ओर पहुँच कर छाँह में खड़े हुए। चप्पल पर नजर पड़ी तो वह एक जगह से उखड़ गई थी। उसका इलाज करना जरूरी लगा वरना आगे जाकर ज्यादा ही उखड़ने का अंदेशा था। आस पास नजर दौड़ाई तो एक मोची की दुकान दिखी। लेकिन वहाँ कौन बैठा है - गेरूआ रामनामी पहने बाबाजी ? बाबाजी किसी शख्स का चप्पल सी रहे थे। जाते हुए हिचकिचाहट हुई कि यार साधु संतों के तो हम पाँव छूते हैं और यहाँ उन्हें अपनी चप्पल सीने दें ? बूट पॉलिश करवायें ?  फिर मन में बात आई कि यहाँ बनारस में तो समूची नगरी ही बाबाजी लोग की है। फिर रैदास और कबीर भी तो उसी श्रमजीवी वर्ग से थे, उन्हीं की नगरी में कैसी झिझक। सो बढ़ लिया आगे। बाबाजी ने मेरी चप्पल में कील ठोंकी और लगे हाथ पालिश भी करने लगे। मेहनत का दाम हुआ कुल दस रूपये। दाम चुकाने के बाद आगे बढ़े।

    भ्राता श्री को रथयात्रा इलाके में किसी काम से जाना था सो वहां मोटरसाईकिल दौड़ा दी गई। आगे बढ़ने पर वहां उन्हें ठीक-ठीक पता नहीं चल रहा था। किसी से पूछा गया तो उसने पता नहीं कौन सी जगह समझा कि उल्टे रास्ते जाने को कहा। वहाँ पहुँचने से पहले ही आभास हुआ कि गलत बता दिया गया है। किसी से फिर पूछा गया तो वह हमारे द्वारा भटक जाने से इतना पीड़ित हो गया कि उसकी बातों से लगता था मानों अभी रो देगा। अरे इहां कहां आ गये आप लोग। ऊ तो उहाँ न है। बतावा...च...च...च। बड़ी आफत भई। बताने वाले की गलती न है। बताओ अब आप लोग उहां से इहां तक भूख पियास से बेहबल हो चले आये....उहौ उलटा.....च च च च। अच्छा अइसा किजिए आप तनिक उहां से दहिने काटिये....आगे जाकर दुरगा मंदिर आयेगा वहां से बाँए कट जाइयेगा, फिर आगे.....। तो समझते बूझते कटते-कुटते हम लोग किसी तरह निर्धारित स्थान पर पहुँचे। दोपहर हो ही गई थी। भ्राता श्री का काम निपटते-निपटाते तीन साढ़े तीन बज गया। वैसे भी गाँव की यह कैफ़ियत है कि जब कभी शहर जाना हो तो केवल घूमने के इरादे से कोई नहीं जाता, कुछ कागजी, कुछ समाचारी उद्देश्य गठियाये चलता है। वही यहाँ भी हुआ। इसी बीच गिरिजेश बाबू को फोन किया कि अपुन भी इसी बनारस में आयेले हैं। दोपहर तक धूप में मराने के बाद अभी क्या-क्या देखा जा सकता है। कुछ साहित्यिक फाहित्यक अड्डा फड्डा हो तो वो भी बताओ। हेन तेन की जानकारी ले पता चला कि फिलहाल सारनाथ जाया जाय। रास्ते में भारत माता मंदिर है वह भी देख लिया जाय। फिर कल सुबह भेंट होगी वहीं गंगा घाट पर। मोटरसाईकिल दौड़ पड़ी भारत माता मंदिर की ओर.......। 

जारी......

- सतीश पंचम

16 comments:

prkant said...

Jhakas yatra vritant . Subah sanatan kalyatri ki lalkar sunkar lagne laga tha ki shaam tak phal-prapti ho sakti hai.:)

prkant said...

Jhakas yatra vritant . Subah sanatan kalyatri ki lalkar sunkar lagne laga tha ki shaam tak phal-prapti ho sakti hai.:)

Satish Chandra Satyarthi said...

वाह! बढ़िया..
जारी रहे बनारस यात्रा..

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इलेक्टरिक इलाज के शर्तिया विज्ञापनों से यह लगता है कि‍ अभी यह इलाका वि‍कासशील देशों की सी श्रेणी में आता है क्‍योंकि‍ शेष भारत में अब लगभग हर काम कंप्‍यूटराइज़्ड होता है (शर्तिया इलाज सहि‍त)
:)

P.N. Subramanian said...

बढियां. पप्पू की दूकान मिली कि नाहीं.

सतीश पंचम said...

पप्पू की दुकान मिली। उसका विवरण अगली कड़ियों में :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन रहे, रहें सब राजा,
मुकुट चढ़ा बैठें सब राजा,
एक दुपहिया, दो हेलमेट में,
आगे राजा, पीछे राजा।

kshama said...

Banaras me rah chuki hun...aapne bahut kuchh yaad dila diya...meri betika janm waheen ka hai.

Anurag Sharma said...

यात्रा वृत्तान्त क्या है, आनंद लहरी है ...

BS Pabla said...

रोचक वृतांत

संजय अनेजा said...

खूब जमेगी पप्पू की दुकान पर,
जब मिल बैठेंगे चार यार .. :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ई चित्रवा कहाँ से पा गये..ढाँसू!

सतीश पंचम said...

हमही बइठे हैं फोटूआ में, सतेन्दर महराज फोटू हींच रहे थे तो हम कहा हिन्चो :-)

बाद में पियर रंग और इस्केचिंग कमपूटरवै से कर दिया :)

Rahul Singh said...

बताइयेगा, रामनगर पीपा पुल के नुक्‍कड़ की लस्‍सी का स्‍वाद अब भी वैसा ही है न. गामा और केशव का पान?

सतीश पंचम said...

राहुल जी,

यात्रा सिर्फ डेढ़ दिन की थी, सो ज्यादा अंतरंग घूमना नहीं हो पाया था। फिर भी रास्ते में जहाँ जैसे बन पड़ा मिट्टी के कसोरे में भरी ठंडी लस्सी से अपना जी जरूर तर किया गया :-)

अनूप शुक्ल said...

अभी दूसरी बांचते हैं।

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