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Sunday, June 23, 2013

इतिहास का दोहराव

   अभी उत्तराखण्ड के जल प्रलय के बाद पूरे इलाके के लुप्त होने, बचे-खुचे घरों में छत तक गाद भर जाने वाले दृश्यों को देख मन में यह बातें आने लगीं कि हो न हो ऐसा ही कुछ पहले भी हुआ होगा तभी तो वो तमाम नदी-घाटी सभ्यतायें समय के साथ अचानक लुप्त हो गईं। मोहनजोदड़ो-हड़प्पा सभ्यता के ध्वंसावशेष देखे जांय तो वहां भी समूचा शहर मिट्टी के ढूहों के तले दबा मिला है। बहुत संभव है वहां भी बाढ़ आई हो, प्रलय आया हो और गाद से समूचा शहर वैसे ही भर गया हो जैसा कि अभी टीवी पर दिखाया जा रहा है।

    अब सवाल उठता है कि तब इतनी बड़ी जनसंख्या भी तो नहीं थी जो पहाड़ों को नुकसान पहुंचाती या किसी प्राकृतिक संसाधनों का इतनी बड़ी मात्रा में दोहन करती कि उत्तराखण्ड जैसे हालिया जल प्रलय की स्थिति निर्माण हो पाये। तब ? ऐसे में संभावना यही लगती है कि भारी बारिश के कारण किसी बड़ी चट्टान के टूटकर गिरने से संभवत: नदियों ने अचानक मार्ग बदला हो या चट्टान के गिरने से नदियों का पानी उफनते हुए पूरी रफ्तार के साथ निचले इलाकों की ओर बढ़ा हो और अपने साथ बहाकर लाये गाद से समूचे शहर को ढंक गया हो। 


     इस बात को खेतों में पानी देने वाली साधारण प्रक्रिया से भी समझा जा सकता है। मसलन उन खेतों में जिनमें पीवीसी की पाइपों से पानी न देकर, कच्ची जमीन पर ही फरसे से नाली या बरहा बनाया जाता है उनमें यह प्रक्रिया आसानी से समझी जा सकती है। जैसे कि किसान फरसे से जमीन में मिट्टी की नाली बनाता है और जो मिट्टी निकलती है उसे नाली के आसपास फेंकता नाली के लिये तटबंध बनाता चलता है। पानी जब आता है तो वह पहले नाली की सूखी जमीन को तर करता चलता है। श्नै-श्नै नाली के किनारे पड़ी ढेलेदार मिट्टी को नम करता है। उसी दौरान कोई बड़ा ढेला नीचे की नम मिट्टी के पानी में घुल जाने पर खुद का संतुलन नहीं बना पाता और छप् से पानी में गिर जाता है। ऐसे में पानी में एक हल्की सी हलचल होती है। यदि किसान ने नाली के तटबंध को तुरंत पानी की छाप देकर मेंड़ का रूप नहीं दिया तो वहां से गीली मिट्टी कटनी शुरू हो जाती है और जहां तहां खेतों में पानी कटकर फसल की दूसरी क्यारियों में फैलने लगता है। ऐसे में मुश्किल तब और होती है जब कोई भैंस या कोई कुत्ता तरी लेने के लिये उस किसान की बनाई मिट्टी की नाली में छपाक से बैठ जाय। जाहिर है तब पानी का बहाव रूक जायगा। आगे की ओर अचानक पानी ठेले जाने से मेंड़ का संभलना मुश्किल हो जायगा। ऐसे में जगह-जगह मेड़ कटने से पानी का यत्र-तत्र फैलना लाजिमी है। इसी तरह संभवत: कोई चट्टान नदियों में गिरी हो। उसने भी आगे की ओर पानी ठेला हो, पीछे नदी के बहाव रोका हो। अनुमान है। ऐसा ही हुआ हो तब।  

  बहुत संभव है उन दिनों बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों, मनुष्यों के हताहत होने से महामारी भी फैली हो। लोग जैसे-तैसे आफत झेलते हुए जिसे जहां ठौर मिला वहां दूर निकल कर टिक गया होगा। नया स्थान ढूंढा गया होगा। जंगलों को काट कर समतल कर फिर से नई किसानी की गई होगी। उदाहरण के रूप में हाल-फिलहाल तक झूम खेती झारखण्ड में होती ही थी जिसमें कि धरती के अनुपजाऊ हो जाने पर आदिवासी वह स्थान छोड़ दूसरे स्थान पर नये से खेती करते हैं। अंग्रेजों के स्थानीय बंदोबस्ती कानून के बाद इस पर रोक लगी सो अलग बात है लेकिन फिर भी इससे इतिहास के अंशों को समझने में सहायता तो मिलती ही है।

  अब सवाल उठता है कि जो हालिया प्रलय उत्तराखण्ड में आया उसे मानवजन्य माना जाय या प्रकृतिजन्य ? क्योंकि कई जगह फेसबुक पर, ब्लॉगों में पढ़ने में आ रहा है कि इसके पीछे मानव ही जिम्मेदार है। प्रकृति का इसमें क्या दोष ? बात कुछ हद तक सच भी है लेकिन मुझे यह पूरी तरह सच नहीं लग रहा। सारा दोष इंसानों का ही नहीं है। हां, उनका दोष यही माना जा सकता है कि वो नदी बेल्ट के बेहद करीब जा बसे। मजबूरी ही सही, लेकिन एक उम्मीद कि हम सुरक्षित रहेंगे। जब जो होगा देखा जायगा। जो सबके साथ होगा वह अपने साथ भी होगा। ऐसी ही मानसिकता और एक दूसरे की देखा-देखी बस्ती बढ़ती चली गई और जिसकी कि संभावना थी वह हो गया।

  फिर नदियाँ तो प्राकृतिक रूप से बह रही थीं। बारिश हुई, जलजमाव कहिये या किसी स्थान विशेष पर ज्यादा वर्षा होने से पैदा हुए हालात से जो आपदा आनी थी सो आई। उसे हम प्रलय कह रहे हैं क्योंकि उसमें मनुष्यों की हानि हुई है। संसाधनों की हानि हुई है। लेकिन प्रकृति के लिये तो यह प्रलय जैसी बात न थी। वह तो सदियों से इसी तरह अपने आप को घटाती, बढ़ाती, चट्टानों को गिराती धरा को समतल करती रही है। यह पहाड़ों के खुद से समतल होते जाने का प्राकृतिक गुण ही है जो लाखों वर्षों से अपरदन के बाद मैदानी इलाकों का निर्माण हो पाया है। फिलहाल जिन इलाकों को हम मैदानी इलाका मान रहे हैं, संभवत: वे पहले पहाड़ ही रहे हों। बाद में पठार और फिर मैदान बनने के लंबे दौर के बाद आज वे इस स्थिति में हैं जिनपर हम बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर रहे हैं। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ इंसानों को इसका दोष देना अनुचित लग रहा है। यह असल में एक तरह का टग ऑफ वार ही है जिसमें लीग मैचों में कभी मनुष्य की जीजिविषा बाजी मार ले जा रही है तो कभी प्रकृति। लेकिन फाईनल मैच जीतती अंतत: प्रकृति ही है। 

 -  सतीश पंचम

6 comments:

संजय अनेजा said...

संभावनाओं से इंकार बिलकुल नहीं किया जा सकता। ये हम लोग ही हैं जो घरों में बैठे हुये मनमाफ़िक निष्कर्ष निकाल लेते हैं और ऐसी त्रासदी के समय भी अपने एजेंडे लागू करने में जुटे रहते हैं। कुछ न कर सके तो चलो आलोचनायें ही कर लें।
आज जहाँ ऊंचे पहाड़ हैं, वहाँ कभी गहरे समुद्र थे और आज जहाँ अथाह सागर हैं वहाँ कभी ऊंची पर्वतमालायें थीं। लीग मैच मनुष्य जीतता दिखता है लेकिन फ़ाईनल मैच प्रकृति ही जीतती है वो भी स्लॉग ओवर्स में ही सक्रिय रहकर।

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकृति रहे दुर्जेय पराजय, हम सब डूबे थे मद में।

प्रवीण पाण्डेय said...

*रही

काजल कुमार Kajal Kumar said...

प्रकृति‍ स्‍वमना तो है पर, इससे खि‍लवाड़ भी तो हम कर ही रहे हैं

अनूप शुक्ल said...

प्रकृति के सामने आदमी बौना है। आदमी को अपनी औकात समझनी चाहिये।

सञ्जय झा said...

aapke sambhavnayen 'samichin' hain....


jai ho.

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