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Saturday, June 22, 2013

त्रासदी के बाद वाली त्रासदी........

    टीवी पर उत्तराखण्ड त्रासदी के भयावह दृश्य देख मन एकदम कसैला हो जाता है। कोई भूखा है, कोई प्यासा, किसी का पूरा परिवार बह गया है तो किसी के बच्चे का पता नहीं। बहुत ही भयावह स्थिति है। हालत ये कि ज्यादा देर तक वहां के हालात टीवी पर देखते नहीं बनते। यहां तक कि घर पर भी भोजन करते समय टीवी का चैनल बदल दिया जाता है। हजारों किलोमीटर दूर ही सही, लेकिन सामने जब इतने सारे लोग भूखे प्यासे, तकलीफ में हों, जीवन मरण के बीच फंसे हों तो आखिर कैसे हलक से निवाला उतरे।

       इस तरह टीवी पर कोई दुखी करने वाला दृश्य देख भोजन करने की अनिच्छा वाली स्थिति तब भी हुई थी जब अन्ना हजारे उपवास कर रहे थे। जब सामने कोई बुजुर्ग इतने दिनों से भूखा-प्यासा हो और वह भी अपने लिये नहीं, बल्कि औरों के लिये तो उन्हें देखकर भोजन किय़ा जाय, यह तो अनुचित है। लेकिन तब भी अनिच्छा से ही सही, सभी लोग भोजन करते थे। अब भी इस त्रासदी को देख हमारी ही तरह अन्य लोग-बाग भी पल भर को दुखी हो जाते होंगे, वे भी अनिच्छा से भोजन करते ही होंगे, चैनल उनके यहां भी बदल दिये जाते होंगे, लेकिन अंतस् तो जानता है। वही अंतस् यह भी जानता है कि यह सब आठ दस दिन का रोना धोना है। बाद में सब पहले जैसा ही शांत हो जायगा। सभी लोग फिर पहले जैसे हंसी ठिठोली करेंगे, कोई दुख संताप नहीं। कोई कुछ नहीं। जीवन चलता रहेगा यह सोचकर, दिल को समझा बुझाकर कि कि जाने वाले चले गये, जिसको जाना था गये,  अब क्या रोना धोना,  किस्मत में जिसके जो बदा था हुआ। अब राहत के नाम पर लूट खसोट होगी, कईयों के वारे-न्यारे होंगे। कुछ का बिगड़ा है तो कुछ लोग बन भी जायेंगे। प्रकृति ठहरी। 

           इधर पिछले दो-तीन दिन से रोज सुबह पूजा के समय मन ही मन कामना करता हूं कि अंधेरी रात में फंसे भूखे-प्यासे लोगों को अब दिन के उजाले में कुछ खाने मिले। कुछ राहत मिले। लेकिन किससे प्रार्थना करूं, वह जो अपनी रक्षा खुद करने में असमर्थ हैं ?  अंतस् जानता है कि जिस मूर्ति के सामने प्रार्थना कर रहा हूं वह केवल मिट्टी, रंगों और फूलों का साज श्रृंगार भर है। अगरबत्ती की महक भी तो उसके नथुनों तक नहीं पहुंच पाती, भला मिट्टी, संगमरमर, या लकड़ी क्या जाने महक किसे कहते हैं, दीये की लौ किस ओर क्या कहना चाहती है। लेकिन नहीं, यह मौन प्रार्थना किसी मूर्ति के सामने भले हो, किसी बाजार से लाये दिये, तेल और रूई के जलने से उठी लौ के जरिये भले होती हो, दरअसल यह सब अपने मन को समझाने की एक तरकीब भर हैं। एक किस्म की मानसिक खुमारी। देखा जाय तो असल ईश्वर उन पहाड़ों, दरख्तों, नदियों, बादलों के रूप में हैं जिन्होंने यह विनाशलीला रची है। जो अब तक शांत थे, अचानक कुपित हो उठे। इंसान के बढ़ते लालच, जंगलों की कटाई, पहाड़ों को काटने, उन्हें दबोचने के इंसानी हथकण्डों से प्रकृतिस्थ नहीं रह सके और दिख गई विनाश लीला।

   कहा जा सकता है कि तब ईश्वर ने उन लोगों को क्यों मारा जिनका कोई दोष नहीं था। जो वहां केवल ईश्वर की आराधना के लिये गये थे। तो यही कहा जा सकता है कि प्रकृति के रौद्र रूप के सामने जो पड़ा सो गया, जिसे बचना था बचा, जिसे नहीं बचना था नहीं बचा। लेकिन बहुत सारे लोग बचाये जा सकते थे किन्तु नहीं बचाये जा सके। आपदा प्रबंधन की कमी ने कईयों को मौत के मुंह में झोंक दिया। कई जिंदगी भर की टीस लेकर लौटे हैं, या अब भी फंसे हैं।

      हां इस आपदा से कईयों के मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा जरूर खत्म हो गई होगी। भला ऐसा कैसे हो सकता है कि जो लोग ईश्वर की आराधना के लिये गये हों, उन्हें ही ईश्वर इस तरह लील ले ? मार दे। तिस पर भी कईयों के मन में ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ी भी होगी, वे जिन्हें अचानक किसी अनचीन्हे चेहरे ने हाथ बढ़ाकर बहती धारा से खेंच लिया होगा, वे जिन्हें किसी सैनिक ने मौत के मुंह से बचाया होगा, वे जिनके लिये गाँव वालों ने मदद का हाथ बढ़ाया होगा। ऐसे में बचने वाले के हाथ स्वत: प्रार्थना की मुद्रा में जुड़ जाते हैं। हाँ, उन कूढ़मगजों का कुछ नहीं किया जा सकता जो इस विपदा में शिवलिंग के बच जाने को किसी दैवी चमत्कार से जोड़कर देख रहे होंगे। उनके लिये हजारों इंसानों की जान जाने से अधिक विस्मयकारी चीज यही है कि शिवलिंग बच गया। जरूर कोई चमत्कार होगा।

      खैर, तीर्थ स्थलों की बदहाली, उनके जरिये होने वाली तकलीफें हमने खुद अर्जित की हैं। उनसे होने वाले हानि-लाभ सभी का मार्जिन ऐसे ही रूप में आता है। धर्म कोई भी हो। फितरत एक सी रहती है। थोड़ी लूट-खसोट, थोड़ी बदइंतजामी, थोड़ा प्रचार, थोड़ा अपराध, थोड़ा सूकून, थोड़ी सांत्वना। सब मिलकर सामाजिक कोलाज, जिसमें हर वो रंग दिखता है जिससे समाज बनता है। जिससे इंसानों की बस्ती बनती बिगड़ती है, आस्था जुड़ती-टूटती है, मनों का समुच्चय डूबता-उतरता है। ऐसे में बस यही कहूंगा कि जो भी हों, जैसे भी हों, अपना विवेक लोग बनाये रखें, ईश्वर से प्रार्थना जरूर करें लेकिन देखादेखी अंधी दौड़ में नहीं, किसी मंदिर में गणेश जी को दूध पिलाने में होने वाली भगदड़ के लिये नहीं , बल्कि अपने आत्मबल के लिये, अपने मानसिक संबल के लिये, अपने से अलग और बाकियों के कुशल क्षेम की कामन लिये। बाकी तो दुनियादारी चलती रहेगी। वही लोग फिर मिलेंगे, फिर वही आपाधापी होगी, फिर वही हंसी ठिठोली होगी। हां, जिनके परिजन बिछड़े होंगे, उनके लिये कुछ लंबे समय तक गमगीन माहौल रहेगा ही। ऐसे में हाथ जोड़ कर उनके लिये कामना ही की जा सकती है कि वे जल्द इस टीस से उबर सकें। लोगों की सैलरी से एक दो दिन का तनख्वाह जायेगी ही, कुछ और आगे बढ़कर स्वंय दे देंगे, कुछ अलग से गुप्त दान करेंगे, कुछ दान देते हुए फोटो खिंचवायेंगे, कुछ फेसबुक पर अपनी दानशीलता का वर्णन करेंगे, कुछ ट्वीटर पर अपडेट करेंगे, कुछ दान देकर टैक्स सेविंग्स की रसीद लेंगे, कुछ नोचेंगे, कुछ खसोटेंगे, कुछ के वारे न्यारे होंगे, कुछ पूरे सपने होंगे।
      संक्षेप में कहूँ तो इस त्रासदी से पानी, पहाड़, जंगल, पौधे, पेड़, आस्थाएं, सपने, चाहते, दुख, दर्द सब एक साथ अपडेट होना चाह रहे हैं, अपडेट हो भी जायेंगे, रूकेंगे नहीं। भला अब तक किसी त्रासदी से संसार रूका है जो अब रूक जायगा ? उसे तो इसी तरह चलते रहना है। चरैवेति.....चरैवेति !!! 

- सतीश पंचम          

15 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मानव की लापरवाही का दोष ईश्वर पर क्यों मढ़ें हम, प्रशासन और निर्माण मानव की ही देन है। प्रकृति का रोष है, उसका सम्मान हो।

प्रवीण said...

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इस त्रासदी से पानी, पहाड़, जंगल, पौधे, पेड़, आस्थाएं, सपने, चाहते, दुख, दर्द सब एक साथ अपडेट होना चाह रहे हैं, अपडेट हो भी जायेंगे, रूकेंगे नहीं। भला अब तक किसी त्रासदी से संसार रूका है जो अब रूक जायगा ? उसे तो इसी तरह चलते रहना है। चरैवेति.....चरैवेति !!!

यही अंतिम सत्य है...चरैवेति.....चरैवेति...


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तुषार राज रस्तोगी said...

आपकी यह पोस्ट आज के (२२ जून, २०१३, शनिवार ) ब्लॉग बुलेटिन - मस्तिष्क के लिए हानि पहुचाने वाली आदतें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हंयं !
ब्‍लॉग की शक्‍ल को ये क्‍या हुआ :(

anshumala said...

26 जुलाई की बाढ़ के बाद पता चला की मुंबई में मीठी नाम की कोई नदी भी है जिसको पाट कर बने निर्माण का नतीजा भी ये बाढ़ थी नतीजा तब से हर साल मीठी नदी की सफाई के नाम पर करोडो रुपये का आवंटन होता है और नदी जस की तस गंदी है उस पर बने अवैध निर्माण उसी तरह है, पर्यावरण को जो नुकशान है वो वैसा ही है , हा उसके नाम पर अब कुछ लोगो के जेब जरुर भर रही है , वही हाल वहा भी होना है आप को त्रासदी दिख रही है और कुछ लोगो को तो कड़क हरे नोट दिख रहे है , प्रधानमत्री ने भी रहात के लिए ज्यादा से ज्यादा हेलीकाफ्टर और लोग भेजने की घोसना से पहले ये घोषणा की की कितने हजार करोड़ की मदद वहा दी जा रही है । पहले होटलों का निर्माण किया गया , तीर्थयात्रा के नाम पर पर्यटन को बढ़ावा दिया गया बुजुर्ग से ज्यादा युवा बच्चो की संख्या दिख रही है वहा , ऐसी जगह जो एक साथ हजारो लोगो को नहीं संभाल सकती थी वहा लाखो को जाने की छुट दी गई , सब कुछ भगवान भरोषे ही हो रहा था , अंत में भगवान ने भी हाथ खड़े कर दिए प्रकृति के सामने । दुःख तो ये सोच कर की कितनो को अब कभी भी अपनो की लाश तक न मिलेगी , और इस वजह से सरकार के मुआवजे के साथ ही बीमे की रकम तक न मिले और उन्हें मृत भी न घोषित किया जा सकेगा ७ साल , बेचारे शायद आगे का जीवन अपनो के आने के इंतज़ार में गुजार दे ।

सतीश पंचम said...

काजल जी,

कोई तकनीकी गड़बड़ी लग रही है। क्रोम में देखने पर ब्लॉग की हैडिंग थोड़ा गड़बड़ नजर आ रही है जबकि IE पर ठीक दिख रही है।

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

उत्तराखण्ड की त्रासदी पर भी वही मुंबई जैसी नोंच खसोट होगी, बल्कि हो रही है। अभी तो छोटे छोटे चोर हैं जो केवल सामानों पर हाथ साफ कर रहे हैं, बड़े चोर राहत सामग्री, शिविर आदि के नाम पर वारे-न्यारे करने की ताक में होंगे ही और ऐसा हर आपदा के समय पर देखा गया है। सुनामी आने पर जो कपड़े यहां से भेजे गये थे वे यहीं मुंबई के फुटपाथों पर बिकते पाये गये। तमाम अन्य चीजें भी उसी तरह बेकदर हुई होंगी, उनकी नोंच खसोंट हुई होगी।

राजेंद्र कुमार said...

उतराखंड पर आई विपदा को भुलाया नही जा सकता,हम चाहे कुछ भी कर लें प्रकृति के आगे लाचार हैं। बहुत ही भावपूर्ण मार्मिक प्रस्तुतिकरण,ईश्वर की कृपा बनी रहे

अनूप शुक्ल said...

मार्मिक !

संजय अनेजा said...

विवेक पर ही विश्वास किया जा सकता है, रुकेगा कुछ नहीं।

शोभना चौरे said...

सच अन्दर से बहुत कुछ टूट गया है टी .वि देखकर जो विचार मन में घुमड़ थे आपने अभिव्यक्ति दे दी
भुज के भूकम्प का समय यद् आ गया जिसमे नव निर्माण में अनेक लोग करोडपति हो गये और पीड़ित लोआज तक भी उबार
नहीं पाए ।

शोभना चौरे said...

सच अन्दर से बहुत कुछ टूट गया है टी .वि देखकर जो विचार मन में घुमड़ रहे थे आपने अभिव्यक्ति दे दी ।
भुज के भूकम्प का समय याद आ गया जिसमे नव निर्माण में अनेक लोग करोडपति हो गये और पीड़ित लो ग आज तक भी उबर
नहीं पाए । अंतर्मन को द्रवित करती सच्ची पोस्ट ।

Anurag Sharma said...

@ आपदा प्रबंधन की कमी ...
- पूरी पोस्ट ही विचारणीय है लेकिन जिस देश मे सामान्य प्रशासन-व्यवस्था ही अनुपस्थित हो वहाँ आपदा प्रबंधन तो बहुत दूर की बात है

सुज्ञ said...

इन दुर्भाग्यपूर्ण प्राकृतिक आपदाओँ से सम्वेदनाएँ भी अपडेट हो तो बात बने!! सच्ची प्रार्थना तो यह होगी कि प्रत्येक जीवन के प्रति आदर, हमारे मनस् मेँ स्थापित हो. परस्पर जीवन सहयोग-मूल्य आदरणीय बने,यही जाने वालों को सच्ची श्रद्धाँजलि होगी. विपदा से बचे लोगों के लिए, मानवीय निष्ठा स्थापन ही सच्ची आस्था होगी.

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

:(

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