सफेद घर में आपका स्वागत है।

Friday, April 12, 2013

"इतिहास-पुलाव" वाया फेसबुक :)

        कभी-कभी कोई फेसबुकिया स्टेटस पोस्ट लायक भी हो जाता है.....कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कोई पौधा इस उम्मीद में गमले में लगाया गया हो कि केवल पत्तेदार हरियाली ही चाहिये लेकिन अचानक उसमें से फूल निकलने लग जांय तो खुद के अज्ञानता पर जहां दुख होता है वहीं पौधा और सुन्दर लगने से खुशी भी मिलती है। ये दो स्टेटस भी ऐसे ही थे जिन्हें बैठे-ठाले फोन से ही ठेल दिया। लिखने के बाद देखा कि लोग उम्मीद से ज्यादा इसे पसंद कर रहे हैं। ढेर सारे फ्रेण्ड रिक्वेस्ट आने लगे तो चौंकना पड़ा।

    दरअसल इस तरह के स्टेटसों की दिक्कत यही होती है कि जब एक पक्ष को लेकर व्यंग्य लिखो तो दूसरा खुश होता है और दूसरे पर लिखो तो पहला खुश होता है। नाराजगी भी समान अनुपात में हिलोर मारती है। अपने को लिखने से मतलब। सो इन तमाम चिलगोजइयों से बेफिक्र, फ्रेण्ड रिक्वेस्ट्स को कुछ देर के लिये मुल्तवी करते हुए पेश है दोनों फेसबुकिया स्टेटस। कहा जा सकता है कि यह पोस्ट फेसबुकिंग-ब्लॉगिंग का एक तरह से "ज्वाइंट वेंचर" है :) 

------------------------------
स्टेटस - 1 ( ईसवी सन् 6013 की इतिहास की उत्तर-पुस्तिका के अंश )
     पुरातत्वविदों को उत्खनन के दौरान हाल ही में एक ऐसी किताब का कवर मिला है जिसका शीर्षक है "क्या करूँगा बनकर"............इस कवर के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि यह किताब दरअसल एक काव्य-पुस्तिका है जिसमें प्रधानमंत्री बनने न बनने को लेकर एक राजनेता के मन की उदात्त भावनाओं को प्रकट किया गया है।

   वहीं इतिहासकार आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं कि कवि ने किताब पर अपना नाम क्यों नहीं छपवाया।

     इसी कवर पेज को लेकर पीएचडी कर रहे छात्रों के विचार से यह काव्य पुस्तिका एक पार्टी के युवराज द्वारा लिखी गई थी और इसे लिखने के दौरान ही चुनावों का मौसम आ गया था। ऐसे में जहां अन्य दलों के प्रत्याक्षी गर्मी सर्दी की परवाह न करते हुए चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब युवराज वैराग्य भाव से कविता रच रहे थे। संभवत: इसका धूमधाम से विमोचन होने की तैयारी भी हो चुकी थी लेकिन चुनावी आचार संहिता लागू होने के कारण मामला खटाई में पड़ गया। अब नाम के साथ किताब का विमोचन नहीं हो सकता था। ऐसे में युवराज ने बिना अपना नाम दिये ही यह काव्य पुस्तिका प्रकाशित कर उसका विमोचन भी करवाने की ठानी।

    इस पर प्रश्न उठाये जाने पर एक प्रेस विज्ञप्ति प्रेषित की गई जिसका तात्पर्य था कि - किताब का शीर्षक - "क्या करूँगा बनकर" से ही लोग जान जायेंगे कि ये किसने लिखी है, फिर आचार संहिता का मान भी तो रखना है।

     वहीं इतिहासकारों के दूसरे धड़े का मानना है कि भले ही किताब के भीतरी पन्ने नष्ट हो चुके हों लेकिन कवर पेज के साथ चिपके शुरूवाती पन्नों से पता चलता है कि इस किताब "क्या करूँगा बनकर" के दसियों संस्करण छपे थे। तिसपर भी भीतरी पन्नों का न पाया जाना दर्शाता है कि वे कविताएं इतनी अच्छी थी कि लोग पन्ने तक चाट गये थे। एक कवर पेज जैसे तैसे अभिलेखागार से मिल पाया वरना वह भी नहीं मिलता।

----------------------------------

स्टेटस - 2 ( ईसवी सन् 6013 की इतिहास की उत्तर-पुस्तिका के अंश )

      इस बात पर इतिहासकारों में घोर मतभेद है कि कोई आडवाणी नाम का शख्स चार हजार वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री बना था या नहीं। इतिहासकारों के एक धड़े का मानना है कि वो प्रधानमंत्री हो चुके थे, तो दूसरे धड़े का मानना था कि वो केवल बनने की इच्छा रखते थे लेकिन बन नहीं पाये थे।

     वहीं पुरातत्वविदों को उत्खनन के दौरान एक निवास स्थान से खंडित अवस्था में एक नेम प्लेट मिली है जिसमें लिखा है कि

. आडवाणी
-प्रधानमंत्री

      इस नेम प्लेट पर भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कुछ का मानना है कि यह नेमप्लेट दर्शाता है कि कोई आडवाणी नाम का शख्स प्रधानमंत्री बना था तो दूसरे धड़े का मानना है कि वो नेम प्लेट खंडित अवस्था में है। पूरा पढ़ने पर "उप-प्रधानमंत्री" पढ़ा जाता..... जिसका तात्पर्य है कि वो पहले कभी "उप-प्रधानमंत्री" बने थे और बाद में सरकार बदल जाने पर "भूतपूर्व उप-प्रधानमंत्री" की नेम प्लेट बनवाई गई थी।

   कालांतर में कुछ अक्षर घिस गये या चोरी हो गये और अंत में नेमप्लेट पर "आडवाणी -प्रधानमंत्री" ही बचा रह गया।

     ऐसे में हो सकता है जान बूझकर फिर से नेमप्लेट में लिखवाया ही नहीं गया हो कि कभी न कभी तो बनेंगे ही.......ऐसे में "उप" या "भूतपूर्व" लिखने का क्या तुक।

     अभिलेखों से कुछ बयान इस बात की पुष्टि भी करते हैं जिनमें कई नेता पंक्तिबद्ध होकर आडवाणी को ही अपना प्रधानमंत्री कहते और मानते सुनाई पड़ते हैं। यहां भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कुछ का कहना है कि वे पंक्तिबद्ध हैं तो कुछ का मानना है कि वे लोग करबद्ध-पंक्तिबद्ध दोनों हैं। लेकिन आडवाणी के सामने नहीं बल्कि किसी मोदी के सामने।

       ऐसे में गुम हुए शब्दों
"भूतपूर्व उप-" की गुत्थी सुलझती दिखती है। इसकी पुष्टि इन्हीं दो शब्दों को लेकर पीएचडी करने वाले असंख्य छात्रों द्वारा भी होती है :)
-----------------


( ईसवी सन् 6013 की इतिहास की उत्तर-पुस्तिका के अंश )

  उम्मीद करता हूं भविष्य में बच्चों को इतिहास जैसे सब्जेक्ट में कुछ दिलचस्प वाकये पढ़ने मिलेंगे :)
 
- सतीश पंचम

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

टन्च विषय हैं दोनों, कम से २० पीएचडी तो कहीं नहीं गयी हैं।

अल्पना वर्मा said...

कवर पेज पर आप ने ही इतना शोध कर डाला तो बाकि विद्यार्थियों के लिए क्या बचा?
वैसे प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए इन दो चाहतों का खुलासा हो चुका था परंतु अभी जो खींचातानी हो रही है उसका अंजाम क्या होगा इस पर 'ज्योतिषियों की ऑनलाइन बहस शुरू हो चुकी होगी.वैसे लालू जी ने अपना फैसला सुना ही दिया है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जोरदार है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सही बात है, स्टेट्स की तीक्षणता तय करती है कितने नए फ़्रेंड रिक्वेस्ट आ धमके :)

तुषार राज रस्तोगी said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के (दिनांक २५ अप्रैल २०१३, बृहस्पतिवार) ब्लॉग बुलेटिन - डर लगता है पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

जय हो :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.