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Wednesday, March 6, 2013

देशसेवा.....उत्खनन चालू आहे :)


     इतिहासकारों को कुछ ऐसे अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं जिससे पता चलता है कि प्राच्यकाल में कुछ लोग देश सेवा के लिये अविवाहित रहने में अगाध विश्वास रखते थे। उन्हें अपना अविवाहित रहना देशसेवा में सहायक तत्व लगता था। अति प्राच्यकाल में जहां भीष्म को इस तरह की प्रतिज्ञा करने के लिये जाना जाता है वहीं, बाद में एक राजनीतिक दल के युवराज द्वारा ऐसी ही मंशा प्रकट करने का प्रमाण मिलता है तदनुसार यदि वो विवाहित हो जाते हैं तो देश को कौन संभालेगा। कोई तो होना चाहिये देश संभालने के लिये।

       वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कुछ लोग ऐसे भी हुए थे जिन्होंने अविवाहित होते हुए भी विवाहितों सा बर्ताव किया और नौबत पिता-पुत्र के डीएनए टेस्ट तक आ पहुंची। फिर ढेर सारे ऐसे विवाहितों के भी प्रमाण मिलते हैं जिन्होंने विवाहित होते हुए भी देश सेवा की। जमकर की। यह अलग बात है कि कइयों ने पुत्र-पुत्री मोह के चक्कर में देश का भट्ठा ही बैठा दिया था। कुछ अविवाहित राजनेत्रीयों के भी प्रमाण मिलते हैं जिन्होंने अविवाहित रहकर भारत भूमि पर शासन किया। उसके बावजूद कहीं किसी के घर से चप्पलों का गोदाम मिला तो किसी के भाई के पास करोड़ों की अकूत संपत्ति।

     उत्खनन में ऐसी भी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं जिनमें अविवाहित शासिका के हाथ में पर्स है। इतिहासकारों के बीच इस मूर्ति को लेकर भ्रम है। पुरातत्वविदों के एक धड़े का मानना है कि शासिका अपने पर्स में से रूपये निकाल कर जनता में बांट रही है तो दूसरा धड़ा मानता है कि वह धन बांट नहीं रही बल्कि धन बटोर रही है। इसी बांटने-बटोरने के प्रश्न पर इतिहासकारों के बीच लाठी-बल्लम चलने की खबरें भी मिली हैं। इसी दौरान कुछ इतिहासकार सिर में लगी चोट से जब आसमान की ओर ताकने लगे तो उन्हें मूर्ति के उपर छतरी भी लगी दिखी। जिससे  फिर उनमें नई बहस चल पड़ी कि छतरी लगाकर धन केवल बटोरा ही जा सकता है, बांटने वाले को धूप-गर्मी की फिक्र नहीं होती। इतनी ही चिंता होती धूप-बरसात की तो वह घर से निकलता ही क्यों ? स्पष्ट है कि उत्खनन से प्राप्त मूर्ति "बटोर शैली" की है।

      उधर कुछ अभिलेख दर्शाते हैं कि कई नेताओं के कई-कई पत्नियां थीं। पॉलीगेमी प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी। ऐसे में इतिहासकार विभ्रम की स्थिति में हैं कि ऐसे लोगों को कुंवारों द्वारा किये गये त्याग की तुलना में देशद्रोही की श्रेणी में रखा जाय या अपराधी श्रेणी में। विवाद का निर्धारण अभी नहीं हो पाया है क्योंकि आशंका है कि फिर इतिहासकारों के बीच लाठी बल्लम चल सकता है। लिहाजा नई खोज होने तक कुंआरों के द्वारा देशसेवा वाले अध्याय को पाठ्यक्रम से निकाले जाने की मांग  की  जाने लगी हैं। एक मांगकर्ता ने जब रिविव्यू कमेंटी में मसला उठाया था तो पता चला उनके नाकाबिल पुत्र का विवाह नहीं हो रहा इसलिये अपनी खीझ अभिव्यक्त कर रहे हैं।

( ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)


7 comments:

वीरेन्द्र कुमार भटनागर said...

यदि युवराज आजीवन अविवाहित रहे तो उनके पश्चात देश को कौन संभालेगा :)

दीपक बाबा said...

बारिस नहीं हो रही.....

एक् कुंआरे को राज में बिठा राखा सै, कि कोनों धर्म करम उसके हाथ से लगता ही नहीं, अकाल ही पड़ेगो


अटल काल में बारिश न आने पर एक ग्रामीण का पक्ष

smt. Ajit Gupta said...

विमल मित्र का एक उपन्‍यास था शायद अन्तिम था - मुजरिम हाजिर। उसके नायक ने कसम खायी कि मैं तुम्‍हारे ठाकुर वंश को समाप्‍त कर दूंगा। उसका कहना था कि मैं और तो कुछ नहीं कर सकता लेकिन तुम्‍हारा वंश तो मिटा ही सकता हूँ। कहीं ऐसा ही तो प्रण नहीं है।

वाणी गीत said...

इतिहास पढना बड़ा रोचक होगा तब तो !

प्रवीण पाण्डेय said...

आगामी पीढ़ियों को कुछ और दे पायें, न दे पायें, पर मजेदार और रोचक इतिहास का विषय अवश्य दिये जा रहे हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ये तो बखियों को उत्खनन चल रहा है

देवांशु निगम said...

अइसे हुईहै , तौ हुई भवा !!!! :) :) :)

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