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Tuesday, February 26, 2013

फिल्म नया दौर के हालात और राजनीतिक चिलगोजईयां

     फिल्म नया दौर का वो सीन याद है जब सडक बनाने को लेकर विवाद हो गया था, विलेन (जीवन) किसी भी हालत में सडक बनने नहीं देना चाहता था क्योंकि इससे उसके बस के मुकाबले तांगे वालों को रोजगार मिल सकता था और उसकी खुद की चल रही बस की सवारी कम हो सकती थी, यदि आप फिर वही सीन याद करें तो हूबहू आज के ताजा हालात से मेल खाते दिखाई देंगे, यहां तक की फिल्म के डॉयलॉग तक अकल्पनीय रूप से ऐसे लगेंगे जैसे आज की परिस्थतियों को देखकर कहे जा रहे हैं।

   नया दौर फ़िल्म में यदि आप लोगों को याद हो तो सडक नहीं बनने देने के लिये विलेन (जीवन) ने अपने साथी पंडित को इस काम पर लगा दिया, उस पंडित का कमाल देखिये, एक देवी मां की मूर्ति ठीक उस जगह जमीन खोद कर गाड़ दी जहां से सडक गुजरने वाली थी, बस फिर क्या था, अगले दिन जब सडक बननी शुरू हुई तो बीच सड़क देवी मां की मूर्ति निकल आने से सभी गांव वालों में हडकंप मच गया, सभी लोग हतप्रभ रह गये, किसी को देवी मां का चमत्कार लग रहा था तो कोई कह रहा था अब यहां मंदिर बनेगा, और इस मंदिर बनाने के लिये जोरदार आवाज उठाने वालों में वह विलेन और उसका साथी पंडित बढचढ कर बोल रहे थे, विलेन तो देवी मां के मंदिर बनाने के लिये बंदूक तक तान बैठा। कई लोगों को लगा यहां मंदिर ही बनाना चाहिये नहीं तो देवी नाराज होंगी, इस हंगामे को बढते देख लोगों ने बीच बचाव किया, जुम्मन चाचा जो कि मुसलमान थे , उन्होंने फिल्म के हीरो शंकर (दिलीप कुमार) को मनाया कि रहने दो बेटा, लडाई झगडा मत करो , मंदिर ही बन जाने दो, हम कोई और रास्ते से सड़क बना लेते हैं।

अब शंकर का कहना था कि, मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये बने हैं, ना कि रास्ता रोकने के लिये. लेकिन अब क्या किया जाये.......वो सामने वाली जमीन गोपाल की है जिसका हमसे बैर चल रहा है, वो भला क्यों दे सड़क बनाने के लिये अपनी जमीन ।

    तब किसी तरह मौके पर मौजूद पत्रकार जॉनी वॉकर पहल करते हैं कि चलो मैं शुरू करता हूं सडक बनाना, पहले कुछ शुरूवात तो करो,........ लेकिन अभी पत्रकार महोदय ने शुरूवात ही की, कि एक लाठी बज गई....... गोपाल ने पत्रकार को रोक दिया, साथ ही ताकीद भी कर दिया ,  अगर किसी ने यहां से एक कदम भी मेरी जमीन पर रखा तो लाशें बिछ जाएंगी , तब शंकर (दिलीप कुमार) आगे बढ कर कहते है.- गोपाल, घर के लोग आपस में भले ही झगडा करें लेकिन जब कोई बाहर वाला आता है तो दोनों उससे मुकाबला करने के लिये एक हो जाते हैं......बस्ती की ईज्जत तुम्हारे हाथ में है गोपाल। और फिर क्या था, गोपाल ने परिस्थितियों को देखते हुए , रोजगार आदि के हालात को समझते हुए न सिर्फ शंकर के गले मिल लिया बल्कि, सडक के लिये ये तक कह दिया -मेरी जमीन से बनाओ सडक, देखता हूं कौन रोकता है...........और सडक को जब गोपाल की जमीन से बनाया जाने लगा तो पहले वाली सड़क के मुकाबले इस सड़क की दूरी और कम हो गई......यानि दिल और जमीन दोनों की ही दूरियां घट गई।

     अब जरा आज के हालात को देखा जाय, सेतू समुद्रम के नाम बवाल करने वाली पार्टियां क्या उस पंडित की तरह व्यवहार नहीं कर रही हैं जिसने रास्ता रोकने के लिये भगवान के नाम का सहारा लिया । इसी मुद्दे पर जब इन पार्टियों द्वारा तोडफोड किया जाता है तो उस विलेन (जीवन) की याद आ जाती हैं जिसनें भगवान के नाम पर रास्ता रोकने के लिये बंदूक तक उठा लिया। शंकर का यह कहना कि "मंदिर और शिवाला लोगों को रास्ता दिखाने के लिये हैं रास्ता रोकने के लिये नहीं" - अपने आप में आज की हकीकत को बयान कर रहे हैं,

   याद रहे - सेतू समुद्रम के बनने से न सिर्फ रोजगार ही बढेगा (तांगे वालों का तरह) , बल्कि उससे , जहाजों के आवागमन में दूरी भी घटेगी (ठीक नया दौर की सडक की तरह), इससे जहाजों में लगने वाले ईंधन की खपत भी कम होगी, और पर्यावरण को भी नुकसान कम होगा।



    सवाल उठाया जा सकता है कि हमेशा हिंदू ही क्यों झुके। वही क्यों हमेशा अपने प्रतीकों की कुरबानी दे ? मुसलमानों से जुड़े प्रतीकों को कोई नहीं छूता। तो यहां मैं अपनी ओर से इतना ही कहूंगा कि यह झुकना झुकाना राजनीतिक चोंचले हैं। राजनीतिक फैसलों के लिये तुष्टीकरण के लिये इस्तेमाल होते रहे हैं वरना क्या मजाल थी कि दिल्ली शहर में ही रातों-रात मस्जिद खड़ी हो जाती और अदालती आदेश के बावजूद मुख्यमंत्री दलील देकर रह जांय कि पुलिस फोर्स कम है। यह विशुद्ध रूप से राजनीतिक तुष्टिकरण का खेल था। पहले भी खेला गया। आगे भी खेला जायगा। लेकिन उसके चक्कर में हम अपना विवेक क्यों खोयें। जो उचित है, जो सर्वजनहिताय हैऐसे फैसलों से पीछे हम इसीलिये हट जांय कि पहले उसके प्रतीक को नष्ट करो फिर हम अपने को छूने देंगे तो हो गया विकास। फिर तो लौट ए मुसाफिर, चल खोदें गड्ढा। कुछ तू गिर कुछ मैं गिरूं।

      बाद में अपनी पिछली पीढ़ियों को जैसे हम दोष देते हैं कि कम्बख्तों ने देश को बांट कर रख दिया, नासूर छोड़ गये, ये कर गये, वो कर गये, वैसे ही हमारी आगे की पीढ़ी हमें दोषी मानेगी कि तमाम संसाधन इस्तेमाल कर लिये, कोयला, गैस कुछ नहीं छोड़ा और बदले में हम लोगों के लिये छोड़ गये कट्टरता, अहमकपन और फ़जूल की लफ़्फाज़ी। अब हम जूझते रहें पुराने मसलों को लेकर। 

- सतीश पंचम

( 15 August 2008 के दिन इस पोस्ट को पहले भी लिखा था। तब भी सेतु समुद्रम को लेकर बवाल उठा था। तब भी चिलगोजइयां चल रही थीं। इन दिनों फिर मामला उठ रहा है। अत: थोड़े बहुत बदलावों के साथ पुन: पब्लिश्ड )

5 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

प्रवीण पाण्डेय said...

अंग्रेज़ों ने इतनी चरस बोई है कि नशा उतारने में दो तीन दशक और लगेंगे।

smt. Ajit Gupta said...

शायद यह धर्म से जुड़ा मुद्दा भर नहीं है। इसका विस्‍तृत अध्‍ययन करें तो मामला कुछ और भी है।

anshumala said...

अजित जी सही कह रही है ये मामला बस धर्म आस्था से नहीं जुडा है , कुछ लोग आस्था के नाम पर एक मुद्दे को उछाल रहे है और उसी को पकड़ कर उसे और बड़ा बनाने का काम सरकार कर रही है , कारण है कि पर्यावरण को नुकसान, जिसे राम सेतु कहा जा रहा है असलमे वो मुंगे की चट्टानें है जिसे बनने में लाखो साल लगते है पानी के निचे का जीवन पूरी तरह से उसी पर निर्भर होता है वो न केवल छोटे जीवो का घर होता है बल्कि उस पर उगे घास पात उनका खाना भी होता है और उन छोटे जीवो पर बड़े जीव निर्भर है एक पूरा चक्र है आप उन मुंगो की चट्टानों को तोड़ देंगे तो छोटे जीवो का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा और उनके बिना बड़े जीव क्या करंगे ये बिलकुल वैसा है है जैसा जंगल से सारे पेड़ पौधे घास को काट देना , पूरा जिवन चक्र ही समुंदरी जीवन ही बर्बाद हो जायेगा । सराकर इसलिए राम सेतु का मुद्दा इतना उछाल रही है की आप और हम जैसे को असली मामला पता ही न चले और विकाश के नाम पर वो पर्यावरण को इतना भारी नुकशान पहुंचा सके । अब सोचिये की बिन मछली के समुन्द्र कैसा होगा और उस पर निर्भर मछुआरो का क्या होगा , क्या वह से बड़े बड़े जहाज गुजरेंगे तो वो जगह मछली पकड़ने के लायक रहेगा । क्या आप पसंद करेंगे की आचानक से सरकार आये और कहे की आप का घर दुकान तोड़ कर यहाँ रास्ता बनायेंगे ताकि लोगो को जाने में सहूलियत हो । आप तो कंप्यूटर नेट पर रहते है जरा सर्च कीजिये मिल जायेगा ।

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

पर्यावरण से जुड़े मसले पर मेरी भी सहमति है कि इससे यदि पर्यावरण को क्षति पहुंचे तो रामसेतु को न छेड़ना ही ठीक रहेगा। लेकिन जब राजनीतिक दल धर्म के नाम पर आंय बांय कांय बकने लगें तो इस तरह की मंशा की ओर इंगित करना जरूरी हो जाता है। अभी के हालात में पर्यावरण कम और धर्म की आड़ ज्यादा ली जा रही है। यही बात अखर रही है।

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