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Thursday, January 24, 2013

अज्ञातवास.......


"इस कमरे की खिड़की खुली है और अगहन की हवा बहकर अन्दर आ रही है। पछुआ हवा। अलसी और मटर के नीले-बैंगनी फूलों को छेड़ती हुई। बांसों के झुरमुट में सीटी-सी बजाती। मुरझाते कमल-वनों पर उसांस-सी छोड़ती। डाक्टर कहते हैं, इस हवा से बचो। मैं खिड़की बन्द करना चाहता हूं। पर उठना नहीं चाहता, किसी को पुकार भी नहीं सकता।

मैं यूं ही रहा हूं। बहुत कुछ करना चाहता हूं। करने में कोई बाधा नहीं है, पर नहीं करता। वैसे जब कुछ कर लेता हूं तब सोचता हूं कि यही करना चाहता था। जो किया नहीं, उसके लिए सोचना चाहता हूं कि उसे कभी चाहा नहीं"। 

        श्रीलाल शुक्ल के लिखे उपन्यास "अज्ञातवास" की इन पंक्तियों से ही पता चलता है कि पूरा उपन्यास कितना दिलचस्प होगा। उपन्यास का मुख्य पात्र एक विधुर रजनीकान्त है, जिसने कि अपनी पत्नी को इसलिये छोड़ रखा था कि वह गाँव की थी, रहने-बोलने का सलीका नहीं जानती थी। एक दिन जबरी अपने पति रजनीकान्त के घर आ डटी कि मुझे रहना है आपके साथ लेकिन रजनीकान्त ने डांट दिया। उसे साथ नहीं रखने की ठानी लेकिन एक दो दिन करके रहने दिया। रजनीकान्त बाहर जाता तो घर के दरवाजे, खिड़कियां बंद कर जाता कि कहीं बाहर निकली तो लोग इस गंवारन को देखेंगे तो क्या सोचेंगे। दो चार दिन तक ताला बंद करके जाने के बाद कहीं से कोई शिकायत नहीं सुनाई पड़ी तो मिस्टर रजनीकान्त बिना ताला लगाये ऑफिस जाने लगे। उधर क्लब मे इन्हें चिंता लगी रहती कि लोग उनकी पत्नी के बारे में सुनेंगे, उनके शादी-शुदा होने के बारे में सोचेंगे तो क्या सोचेंगे।

  धीरे धीरे रजनीकान्त महाशय कुछ अंदर ही अंदर खिंचे खिंचे से रहने लगे। उधर लोगों को धीरे धीरे पता लगा कि इनकी श्रीमती जी आई हुई हैं। एक दिन उनका मित्र गंगाधर अपनी पत्नी को लेकर इनके यहां आ पहुंचा। मजबूरी में भीतर से पत्नी को बुलवाना पड़ा। ड्राईंग रूम में चारो जन बातें करने लगे। मित्र की पत्नी श्रीमती रजनीकान्त से गांव देहात की बातें पूछतीं, मकई, आम के बारे में चर्चा करतीं। सभी के बीच अच्छे सौहार्द्रपूर्ण माहौल में आपसी बातचीत चलती रही। श्रीमती रजनीकान्त भी सहज भाव से बातें करती रहीं लेकिन मिस्टर रजनीकान्त को लग रहा था जैसे उनके मित्र की पत्नी जान बूझकर उनकी पत्नी से गांव देहात की बातें पूछकर मजाक उड़ा रही है, खुद को श्रेष्ठ साबित कर रही है। उनकी नजर मित्र की पत्नी के कपड़ों पर पड़ी जो काफी शालीन और महंगे लग रहे थे जबकि अपनी पत्नी की साड़ी कुछ कमतर जान पड़ रही थी। जिस दौरान बातचीत चलती रही महाशय अंदर ही अंदर धंसते जा रहे थे कि उनकी पत्नी उतनी शहरी सलीकेदार नहीं है, गांव की है और ऐसी तमाम बातें जिनसे उन्हें शर्मिंदगी महसूस हो खुद ब खुद उनके दिमाग में आती जा रही थीं।

   उसके कुछ दिनों बाद एक रात शराब के नशे में अपनी पत्नी से जबरदस्ती कर बैठे। पत्नी लाख मना करती रही कि आपको उल्टी हो रही है, आप मुझसे दूर दूर रहते हैं फिर क्यों छूना चाहते हैं और तमाम कोशिशों के बावजूद पत्नी को शराब के नशे में धुत्त होकर प्रताड़ित किया। अगले दिन रजनीकान्त महाशय की पत्नी ने घर छोड़ दिया और जाकर मायके रहने लगी।

  उधर रजनीकान्त एक अन्य शहरी महिला की ओर आकर्षित हुए जोकि अपने पति को छोड़ चुकी थी। दोस्तों के बीच शराबखोरी चलती रही। इनके दोस्तों में एक फिलासफर, एक डॉक्टर, एक अभियंता। सबकी गोलबंदी। इसी बीच खबर आई कि उस रोज छीना-झपटी और नशे की हालत में हुए सम्बन्ध से पत्नी गर्भवती हो गई है। बाद में पता चला कि एक लड़की हुई है। दिन बीतते गये और एक रोज खबर आई कि पत्नी की तबियत बहुत खराब है। श्रीमान रजनीकान्त किसी तरह अपने उस पत्नी को देखने पहुंचे लेकिन पत्नी बच नहीं पाई। उसका निधन हो गया। अब रजनीकान्त को भीतर ही भीतर यह बात डंसने लगी कि उन्होंने उसकी कदर नहीं की। दूसरा विवाह नहीं किया।

  लड़की बड़ी हुई, पिता के मित्रों की आपसी शराबखोरी के दौर में एक रोज एक फिलासफर मित्र ने पत्नी की अनुपस्थिति में वैश्याओं की उपयोगिता पर फिलासफी बघारनी शुरू की तो रजनीकान्त को लगा कि वह मित्र उन्हें टारगेट करके बोली बोल रहा है, ताना मार रहा है। उसी सोच में डूबे थे कि बेटी ने पिता से चिंतित होने का कारण पूछ लिया और ग्लानि और पश्चाताप में डूबे रजनीकान्त अपने द्वारा अपनी पत्नी को समझ न पाने, उसे बेकदर करने की बात बताते चले गये। इन्हीं सारी बातों की बुनावट है श्रीलाल शुक्ल का लिखा यह दिलचस्प उपन्यास अज्ञातवास।

    उपन्यास की कुछ पंक्तियां शराब के नशे में फिलासफर द्वारा कहे जाने पर अलग ही अंदाज रखती हैं। मसलन

  वैसे मैं संस्कृत का विद्वान हूं। शब्द की नस-नस में घुसकर जैसा चाहूं वैसा अर्थ खींच सकता हूं। मैं कह सकता हूं कि श्रीमान गंगाधर जी आप गंगा को धारण करने वाले नहीं है। बल्कि दीर्घ सन्धि के हिसाब से गंगा के अधर यानी किनारे हैं, जिनका चुम्बन शहरों के गन्दे पानी के नाले करते हैं। मैं कह सकता हूं कि गंगाधरजी, आप खानदानी सूअर हैं। नहीं, आप सुष्ठु भी हैं, वर भी हैं। सब प्रकार से श्रेष्ठ हैं। अपनी याददाश्त के खजाने से वे-वे गालीयां निकाल सकता हूं कि आप दंग रह जायेंगे। आपको गदहा बना सकता हूं, बकवादी और कसाई या कशाई बना सकता हूं और साबित कर सकता हूं कि ये सब भगवान विष्णु के और फिर यथा हरिस्तथा हर:” के हिसाब से श्रीमान गंगाधरजी के पुराणसम्मत विशेषण हैं।

  रजनीकान्त को माइल्ड हार्ट अटैक आने पर वही शराबी मित्र कुछ यों कहता है

   इन बातों से घबराना नहीं चाहिये। तुम्हारी उम्र अड़तालीस साल से ऊपर हो चुकी है। दुनिया तुमको जितना दे सकती थी दे चुकी। अब आगे जीने का सुख तो सरप्लस मुनाफे की बात है। जितना ले सकते हो लो और इस बात का शोक न करो कि तुम और ज्यादा क्यों नहीं ले पाते। .....मुझे देखो, मैं बयालीस का हूं पर मुझे पचीस साल के बाद से ही लगने लगा था कि मैं अब बेमतलब जी रहा हूं। जानते हो क्यों ?   

   ………

 मैं क्यों अपनी जिन्दगी में थकान का अनुभव करता हूं ? इसीलिये कि पचीस साल तक पहुंचते पहुंचते मैं जानने लायक सभी कुछ जान गया था, उसके बाद न कोई चीज प्रेरित करती है न उत्तेजित। पहले पांचवे दर्जे से छठे दर्जे में पहुंचना, नई किताबें खरीदना, ये बातें भी जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना बन जाती हैं। नई जगहें देखना, त्यौहार मनाना, नई किस्म का खाना खाना इन सबमें लगता है कि जीवन को नया अर्थ मिल रहा है। जब यूनिवर्सिटी की डिग्री लेकर मैंने फोटो खिंचाई, जब मुझे नौकरी मिली, जब मुझे पहली तनख्वाह मिली,  अपना कमाया रूपया अपने हाथ में रखा....और....जब पहली बार एनॉटमी ऑफ अपोजिट सेक्स से परिचित हुआ जीवन की ये छोटी छोटी घटनाएं तब कितनी उत्प्रेरक जान पड़ती थीं।

       उपन्यास में इसी तरह के प्रसंग, शराब के नशे में धुत होकर बके गये बोल यदा-कदा आते ही रहते हैं। रजनीकान्त द्वारा अपनी गंवई पत्नी के प्रति किये गये अनादर और उससे उपजी वर्तमान टीस के बीच उपन्यास कई बार अतीत के पन्नों में जाकर लौट आता है। गांव के लोगों द्वारा ग्राम्य गीत की प्रस्तुति और उससे जुड़े विवाद भी उपन्यास के रूचिकर हिस्से हैं।


-          सतीश पंचम
 

पुस्तक अज्ञातवास
लेखक श्रीलाल शुक्ल
प्रकाशक राजपाल एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली
मूल्य 110/- (संस्करण - 2011)

ISBN – 978-81-7028-124-5  

13 comments:

संजय अनेजा said...

पढेंगे भाईजी।
वैसे पोस्ट का शीर्षक देखकर मुझे लगा था ब्लॉग से अपने अज्ञातवास के बारे में कुछ अपडेट कर रहे होंगे:)

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा उपन्यास है यह। आपकी पोस्ट पढ़कर इसे एक बार फ़िर से पढ़ने का मन होने लगा। जय हो।

smt. Ajit Gupta said...

आभार, अच्‍छे उपन्‍यास की जानकारी देने के लिए।

वीरेन्द्र कुमार भटनागर said...

आप द्वारा प्रस्तुत उपन्यास की झलक अत्यन्त रोचक है और पूरा उपन्यास पढ़ने की प्यास जगाती है।

सञ्जय झा said...

ruchikar prastuti pancham da'.....maja aaya.......


jai ho.....

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

मैं और मेरा परिवेश said...

किताब पढ़ने की इच्छा हो रही है बहुत अच्छी समीक्षा

प्रवीण पाण्डेय said...

करने और न करने के बारे में कुछ कुछ ऐसे ही ख्याल हमारे अन्दर भी आते हैं, बहुत रोचक..

दीपक बाबा said...

संजय बाऊ को टीप को मेरी टीप माना जाए.

बाकि आपने अज्ञातवास के लिए जिज्ञासा उत्पन्न कर दी है. साधुवाद.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छा उपन्यास है...अच्छी समीक्षा...बहुत बहुत बधाई...

VICHAAR SHOONYA said...

सतीश पंचम ने सतीश पंचम यादव को अज्ञात वास से बाहर कैसे निकला ? बहुत दिनों के बाद इस ब्लॉग पर आया इस लिए अनजान हूँ। मेरे ख्याल से यादव जी पहले यहाँ नहीं हुआ करते थे।

सतीश पंचम यादव said...

Vichaar Shunya ji,

मेरा पूरा नाम सतीश पंचम यादव है और शुरूवाती पोस्टें और कमेंट सतीश यादव के नाम से ही करता था। अभी भी मेल या चैट से जो मित्रगण सम्पर्क में हैं या रहे हैं उनके चैटलिस्ट में मेरा नाम सतीश यादव ही है।

सोचा कुछ दिन अपने इसी नाम का आनंद लूं :)

rashmi ravija said...

उपन्यास में जिस तरह की समस्या का जिक्र है, वह आज भी युवाओं के मन में पल रही है।

इसी विषय पर एक दुसरे ब्लॉग पर लम्बा विमर्श चल रहा है।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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