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Monday, January 7, 2013

वे धरती से कटकर गमलों में खिलने के दिन थे.......

     कमलेश्वर के संस्मरण "जो मैंने जिया"  पढते हुए एक प्रसंग ने ध्यान खेंचा। कमलेश्वर, मोहन राकेश, परदुमन तब एक ही साथ रहते थे। फाकाकशी के दिन थे। अंडेवाले का उधार ज्यादा हो गया था और उससे बचते हुए रहना पड़ता था। उधर राकेश के किसी महिला से चल रहे चक्कर के चलते उसके भाईयों से बचते रहने के दिन थे। ऐसे में ही एक दिन उन्हें मोहन राकेश की माँ के आने की खबर लगी। उन्हें स्टेशन से रिसीव करना था लेकिन इन लोगों के पास जेब में पैसे नहीं थे। राकेश का पता नहीं था। बचे कमलेश्वर और परदुमन। उसी अनुभव को कमलेश्वर अपनी आपबीती के तौर पर एक अध्याय में लिखते हैं कि  –

                                      वे धरती से कटकर गमलों में खिलने के दिन थे।


     मां को स्टेशन से लाने के पैसे नहीं थे। ऐसे आड़े वक्त में परदुमन काम आया। उसकी हालत भी खस्ता थी। स्टेशन तक तो पैदल भी जाया जा सकता था लेकिन अम्मा को तो स्कूटर में लाना ही था। समस्या संगीन थी, क्योंकि अंडेवाले से बचने के लिये हम दोनों ही सुबह-सुबह आधे घंटे के लिए घर से गैरहाजिर हो गये थे।

    परदुमन की हालत मुझसे भी बदतर थी। वह कम्युनिस्ट तो था ही, साथ ही कम्युनिस्टों के औसत आदर्शवाद से ज्यादा आदर्शवादी भी था। वह उतना संघर्षवादी नहीं था। बहुत शांत और संयत व्यक्ति था और बहसों आदि में अहिंसावादियों की तरह शिरकत करता था। लेकिन वह बहुत दृढ़ विचारों वाला व्यक्ति था। वह शायद इस नतीजे पर पहुँच चुका था कि मार्कस्वादी-समाजवादी बनने में उसे शायद जन-संघर्षों में शामिल होना पड़ेगा, परन्तु उसकी व्यक्तिगत मुश्किलों में कोई कामरेड या उसकी पार्टी शिरकत नहीं करेगी। वह अपने परिवार के भयानक विरोध के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बना था और उसके माँ-बाप ने उसे घर-निकाला दे दिया था। उसने भी घर से सारे नाते तोड़ लिये थे। उसकी एक बहन दिल्ली में ही ब्याही थी। उसे वह बहुत प्यार करता था लेकिन राखी वाले दिन वह घर से नदारद हो जाता था क्योंकि बहन को देने के लिए उसके पास दस रूपये भी न होते थे। उसकी बहन राखी और मिठाई का डब्बा छोड़कर चली जाती थी। दूसरे दिन परदुमन राखी बाँध लेता था और मिठाई बाँटते-बाँटते उदास हो जाता था।

    उसके माता-पिता को उसकी हालत का पता चल चुका था। वे नहीं चाहते थे कि परदुमन विपन्नता की ऐसी कठिन जिंदगी गुजारे। वे काफी अमीर थे। दो साल पहले वे मुझसे मिले थे। वे परदुमन से मिलने ही आये थे और उसे समझा-बुझाकर पंजाब वापस ले जाना चाहते थे पर परदुमन उस वक्त घर पर नहीं था। दोनों ने दोपहर तक उसका इंतजार किया। परदुमन शायद उस बीच वापस आया था, पर जंगले की खिड़कियों से अपने मां-बाप को बैठा देखकर लौट गया था। मुझे भी कुछ आभास हुआ था। जब परदुमन के भीतर आने के कुछ आसार नजर न आये उसकी मां की आँखें आंसुओं से भर आईं थीं। बड़े दुख से वो बोली थीं –

“ उसने हमें देख लिया है....अब वो वापस नहीं आएगा....थका-हारा घर में आराम करने के लिए लौटा होगा.....हमें देखकर अंदर भी नहीं आ पाया.....अब चलें, नहीं तो वह लौटेगा ही नहीं.....मैं उसे खूब जानती हूँ”

  तब उसके पिता सरदारजी ने एक और रास्ता निकाला था। वे मुझसे बोले थे –

“कमलेश्वर बेटे, तुम दस हजार रूपये रख लो.....अपने बैंक में डाल देना। परदुमन हमसे तो कुछ लेता नहीं, तुम उसे दोस्त की तरह इन रूपयों में से पैसे देते रहना। वह तुमसे ले लेगा”।

    “वह मुझसे भी नहीं लेगा। पहली बात तो यह कि वह कभी किसी से कुछ मांगता नहीं और दूसरी बात यह कि वह मेरी हालत भी अच्छी तरह जानता है। उसे जरूर शक होगा कि मेरे पास यह पैसे कहाँ से आये हैं।

“कमलेश्वर ठीक कह रहा है। तुमने देखा – वह बिजली का पंखा भी वैसा ही बंधा रखा है जैसा हमने गर्मियों में भेजा था। उसने खोला तक नहीं” – परदुमन की मां ने बड़ी उदासी से कहा था।

      और तब मुझे उस पंखे का रहस्य पता चला था जो परदुमन के कमरे के कोने में पिछले दो-ढाई साल से रखा था। नया पंखा...पूछने पर जिसके बारे में परदुमन ने बताया था कि वह उसके किसी दोस्त का था, जो उसे उसके पास रख गया था। जलती गर्मियों में आंगन में लेटकर दफ्तियों से वह हवा करता रहा था, पर परदुमन ने वह पंखा इस्तेमाल नहीं किया था, क्योंकि उसके मुताबिक वह पंखा एक अमानत था। उस दिन परदुमन के इस अमानत वाले रहस्य का पता चला था।

  मुझे तो नहीं मालूम था पर एक रोज परदुमन ने अपनी अलमारी में अखबार के नीचे सौ-सौ के पांच नोट रखे पाए थे। उन्हें मरे हुए चूहे की तरह पकड़े हुए वह मेरे कमरे में आया था और बोला था – “देख रहे हो दोस्त! यह रूपये मेरी मां रख गई है कि मैं न जान सकूं। अब रहम करते हैं ये लोग....”

और परदुमन ने वह रूपये उसी तरह और वहीं अखबार के नीचे रख दिए थे। भूखा मरता रहा था लेकिन वो रूपए उसने छुए तक नहीं थे। लेकिन राकेश की मां के आने के दिन तो हालत बहुत विकट थी और मैंने परदुमन को सौ-सौ के वे पांच नोट याद दिलाये थे। तो भभकते हुए उसने कहा था – नहीं उन नोटों को हाथ नहीं लगाना है।

तब मैंने उसे समझाया था – नोटों के नंबर तो तुम्हारी मां नोट करके नहीं ले गई होगी, एक नोट निकाल लो...फिर हम सौ का दूसरा नोट रख देंगे.....तुम जब चाहो तो यह पांच सौ रूपये लौटा देना”

“नहीं” परदुमन चीखा था – ये नोट नहीं...ये कांच के टुकड़े हैं जो मुझे लहुलुहान करते हैं......मुझे बेईज्जत करते हैं.....आज पन्द्रह साल हो गए.....मेरे पंद्रह सालों की मजाक उड़ाते लगते हैं ये नोट। क्या मैं पिछले पंद्रह सालों से कभी भूखा नहीं रहा ? अगर रहा हूं तो आज भी भूखा सो सकता हूं”।

बहुत हुज्जत के बाद आखिर यह तय हुआ था कि उन पांच नोटों में से एक नोट दस रूपये पर गिरवी रखा जाएगा....और कर्जा चुकाने के बाद वही नोट वापस लाया जाएगा और रख दिया जाएगा।

रोहतक रोड वाले सरदार जी के यहां मेरी रोमर घड़ी पहले से गिरवी रखी हुई थी – जब हम सौ रूपये का एक नोट दस रूपये पर गिरवी रखने पहुँचे तो सरदार बहुत हंसा था। उसने हमारा मजाक उड़ाया था। हमें चाय पिलाई थी और सौ रूपये का वो एक नोट एक लिफाफे में रखकर हमें नौ रूपये दे दिए थे। ब्याज था एक रूपया.....

जब हम उसकी दुकान से निकले थे तो वह बाहर तक हमें छोड़ने आया था और हमें ऐसे ताज्जुब से देख रहा था जैसे हम किसी दूसरी दुनिया के बाशिंदे हों।

परदुमन तब जेब में नौ रूपये डालकर पैदल स्टेशन गया था और राकेश की मां – हम सबकी मां को स्कूटर में बैठाकर ले आया था।

.....हिमालय जैसी नैतिकता की एक और शिला मेरे जीवन में स्थापित हो गई थी।

- कमलेश्वर

पुस्तक- आधारशिलाएं – I (जो मैने जिया )
प्रकाशक – राजपाल एण्ड सन्स
मूल्य – 90/- (1992 संस्करण)

10 comments:

SHOBHA GUPTA said...

वाह! ऐसे भी लोग होते है दुनिया में !

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवट लोग, अपने ही अन्दाज में जीते..

BS Pabla said...

ऎसी ही होती है मानव की फितरत

अनूप शुक्ल said...

रोचक संस्मरण है।

संजय @ मो सम कौन ? said...

मजा आ गया पढ़कर, कैसे कैसे ज़िद्दी लोग..

मैं और मेरा परिवेश said...

इस पोस्ट ने बहुत दुखी किया, इतना आदर्शवादी होना भी अच्छा नहीं, सबको कितना दुख मिला लेकिन जिन्होंने इसे जिया वे समझौता नहीं कर सकते थे अन्यथा आज वे वैसे ही गुमनाम हो जाते जैसे हममें से कितने लोग रह जाते हैं आदर्शों से समझौता करने के बाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अव्वल दर्ज़े के निर्मम - जिन्होने ज़िंदगी ऐसे जी हो, उनकी टक्कर की कहानियाँ कोई कैसे लाये!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सोच रही हूँ ...कितनी भूख लगी होगी परदुमन जी , कमलेश्वर जी और माँ के बेटे को ..
परन्तु माँ घर पर आ तो गईं ...

--
- लावण्या

डॉ. मोनिका शर्मा said...

मनुष्यता का मान ! ......

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब । यादगार । प्रेरणास्पद । धन्यवाद ।

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