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Thursday, August 22, 2013

बनारस यात्रा 10 - समापन किश्त

     मुंशी प्रेमचंद स्मारक का गेट खुलने के बाद संरक्षक श्री दुबे जी के साथ हम लोग अंदर पहुंचे। सामने ही मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा नजर आई। पास ही बरामदे में ढेर सारे चित्रों की प्रदर्शनी दिखी जिनमें मुंशी जी द्वारा लिखे गये तमाम उपन्यासों, कहानियों आदि के कवर दर्शाये गये थे। किसी किसी चित्र में उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं के बारे में दर्शाया गया था।
 एक जगह दीवार से टंगा कनकौआ दिखा। कनकौआ जिसे हम पतंग कहते हैं, जो कि अब काईट कहलाता है। आज कल के बच्चों को तो पता भी न होगा कि कनकौआ किसे कहा जाता था। जानने की जरूरत भी क्या है। कौन उन्हें शब्दाचार्य बनना हैं। कहाँ उन्हें हिन्दी का शिक्षक बनना है याकि कोई बुझनी बूझना है कि जानें। ऐसे ही कई शब्द लुप्त होते हैं, एक और सही।

   वहीं एक जगह हुक्का दिखा। संरक्षक दुबे जी ने बताया कि प्रेमचंद जी को हुक्का बहुत प्रिय था। इसलिये प्रतीकात्मक रूप में यहाँ हुक्का रखा गया है। मन में आया कि तब तो गुड़ भी रखना चाहिये था। उन्हें तो गुड़ भी बहुत प्रिय था। इतना ज्यादा कि दिन भर में कई कई पीड़िया गुड़ खत्म कर देते थे। अपनी इस लत का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि -

    गुड़ से मुझे बड़ा प्रेम है। जब कभी किसी चीज की दुकान खोलने की सोचता था तो वह हलवाई की दुकान होती थी। बिक्री हो या न हो, मिठाइयां तो खाने को मिलेंगी। हलवाइयों को देखो, मारे मोटापे के हिल नहीं सकते। लेकिन वह बेवकूफ होते हैं, आरामतलबी के मारे तोंद निकाल लेते हैं,  मैं कसरत करता रहूँगा। मगर गुड़ की वह धीरज की परीक्षा लेनेवाली, भूख को तेज करनेवाली खूशबू बराबर आ रही है। मुझे वह घटना याद आती है, जब अम्मां तीन महीने के लिए अपने मैके या मेरी ननिहाल गयी थीं और मैंने तीन महीने के एक मन गुड़ का सफ़ाया कर दिया था।  यही गुड़ के दिन थे। नाना बीमार थे, अम्मां  को बुला भेजा था। मेरा इम्तहान पास था इसलिए मैं उनके साथ न जा सका, मुन्नू को लेती गयीं। जाते वक्त उन्होंने एक मन गुड़ लेकर उस मटके में रखा और उसके मुंह पर सकोरा रखकर मिट्टी से बन्द कर दिया।  मुझे सख्त  ताकीद कर दी कि मटका न खोलना। मेरे लिए थोड़ा-सा गुड़ एक हांडी में रख दिया था। 

वह हांड़ी मैंने एक हफ्ते में सफाचट कर दी सुबह को दूध के साथ गुड़, रात को फिर  दूध के साथ गुड़। यहॉँ तक जायज खर्च था जिस पर अम्मां को भी कोई एतराज न हो सकता।  मगर स्कूल से बार-बार पानी पीने के बहाने घर आता और दो-एक पिण्डियां निकालकर खा लेता- उसकी बजट में कहां गुंजाइश थी। और मुझे गुड़ का कुछ ऐसा चस्का पड़ गया कि हर वक्त वही नशा सवार रहता। मेरा घर में आना गुड़ के सिर शामत आना था। एक हफ्ते में हांडी ने जवाब दे दिया। मगर मटका खोलने की सख्त मनाही थी और अम्मां के घर आने में अभी पौने तीन महीने ब़ाकी थे। एक दिन तो मैंने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे सब्र किया लेकिन दूसरे दिन आह के साथ सब्र जाता रहा और मटके को बन्द कर दिया और संकल्प कर लिया कि इस हांड़ी को तीन महीने चलाऊंगा। चले या न चले, मैं चलाये जाऊंगा। मटके को वह सात मंजिल समझूंगा जिसे रुस्तम भी न खोल सका  था। मैंने मटके की पिण्डियों को कुछ इस तरह कैंची लगाकर रखा कि जैसे बाज दुकानदार दियासलाई  की डिब्बियां भर देते हैं।

 एक हांड़ी गुड़ खाली हो जाने पर भी मटका मुंहों मुंह भरा था।  अम्मां को पता ही चलेगा,  सवाल-जवाब की नौबत कैसे आयेगी। मगर दिल और जान में वह खींच-तान शुरु हुई कि क्या कहूं, और हर बार जीत जबान ही के हाथ रहती। यह दो अंगुल की जीभ दिल जैसे शहज़ोर पहलवान को नचा रही थी, जैसे मदारी बन्दर को नचाये-उसको, जो आकाश में उड़ता है और सातवें आसमान के मंसूबे बांधता है और अपने जोम में फ़रऊन को भी कुछ नहीं समझता। बार-बार इरादा करता, दिन-भर में पांच पिंडियों से ज्यादा न खाऊं लेकिन यह इरादा शराबियों की तौबा की तरह घंटे-दो से ज्यादा न टिकता। अपने को कोसता, धिक्कारता-गुड़ तो खा रहे हो मगर बरसात में सारा शरीर सड़ जाएगा, गंधक का मलहम लगाये घूमोगे, कोई तुम्हारे पास बैठना भी न पसन्द करेगा ! कसमें खाता, विद्या की, मां की, स्वर्गीय पिता की, गऊ की, ईश्वर की, मगर उनका भी वही हाल होता। दूसरा हफ्ता खत्म होते-होते हांड़ी भी खत्म हो गयी।   

      तो ये तो हाल था मुंशी जी का कि गुड़ के बिना बेकल रहते थे। संभवत: हुक्के की तरह मुंशी जी इस इच्छा का भी प्रतीकात्मक मान रखने में व्यवस्था करने में थोड़ी मुश्किल आती। क्या पता बैठे ठाले ही हांड़ी-हांड़ा खत्म हो जाय। 'च्यूंटी-माटा' लगता सो अलग। वैसे भी वहाँ गुड़ खाने के लिये तो गये नहीं थे। अपने प्रिय लेखक से जुड़े स्थान को देखने की प्यास थी, सो वहाँ पहुँचकर आत्मा तृप्त हो ही रही थी। दीवार पर टंगी और चीजों के बारे में जानकारी लेते देते अच्छा लग रहा था। कहीं प्रेमचंद जी अपनी पत्नी शिवरानी देवी जी के साथ नजर आ रहे थे तो कहीं किसी चित्र में अकेले। 

   बात ही बात में दुबे जी ने प्रेमचंद से जुड़ी एक फाइल दिखानी शुरू की जिसमें कि उनसे जुड़े सर्टिफिकेट, मार्कशीट, पत्रों आदि की प्रतिलिपियां रखी गईं थी। मैंने एक एक कर फोल्डर पलटना शुरू किया। कहीं उनके स्कूल का सर्टिफिकेट था तो कहीं यूनिवर्सिटी का। एक जगह सर्टिफिकेट प्रदानकर्ता स्थल का नाम पढ़ा Cawnpore. यह आजकल के Kanpur का ही प्राच्यकालीन नाम है। Cawnpore  लुप्त हो गया अब Kanpur प्रचलन में है। 
  उनके सर्टिफिकेट देखते हुए जूनियर इंग्लिश टीचर वाली सनद पर एक जगह नजर टिक गई। लिखा था - Not qualified to teach Mathematics. मने कि और सब्जेक्ट पढ़ा लेगें लेकिन गणित नहीं। खैर, जिन्होंने जीवन के गणित को समझा और लाखों करोड़ों लोगों को समझाया उनके लिये भी गणित दुरूह ही रहा। अच्छा है। जानकर "कुटिल आत्म-सांत्वना" मिली :-)      

      वहीं दीवार पर एक चलनी में सोजे-वतन की प्रति दिखी। एक जगह हामिद का चिमटा टंगा दिखा। उसी के पास गोदान की प्रति और गिल्ली डंडा भी टंगे दिखे। इन्हीं सारी चीजों को देखते हुए कक्ष के उस हिस्से में गया जहां कुछ बिक्री हेतु किताबें रखी गईं थीं। उलट-पलट कर देखने पर पता चला कि कुछ मेरे पास हैं, कुछ थे लेकिन कहीं किसी को पढ़ने दिया और फिर न मिला। प्रेमचंद जी की कहानियों वाली पतली-पतली किताबें भी दिखीं जिनमें सिर्फ एक या दो कहानियां थीं। उनमें बने चित्रों के साथ बड़े-बड़े अक्षर में कहानी पढ़ते हुए अनायास ही बचपन में पहुंचा जा सकता है। 

  बच्चों के लिये और खुद के लिये भी किताबें चुनना शुरू किया तो कंट्रोल करना पड़ा। मन कहता यह भी लूं, वह भी लूं। फिर  दोपहर भी तो हो चुकी थी। शाम तक घर लौटना जरूरी था ताकि अगले दिन मुम्बई के लिये तैयारी की जा सके। फिर लम्बा रास्ता। बोलते बतियाते अब जल्दी करनी पड़ी। कुछ किताबें खरीद लिया। बाहर निकला। दुबे जी से राम-रहारी हुई। बाईक पर बैठ कर गाँव का थोड़ा सा चक्कर लगाया गया। लौटानी में जब मुंशी प्रेमचंद स्मारक 'डांक' रहा था तब मेरी पीठ पर टंगे थे - हामिद, होरी, धनिया, गोबर, माधव, जुम्मन, निर्मला, आनंदी और ढेर सारा बनारसी नॉस्टॉल्जिया।
    
-------- समाप्त-------

- सतीश पंचम


Friday, July 26, 2013

इन्तजार-ए-लमही.....बनारस यात्रा - 9




      लमही में मुंशी प्रेमचंद स्मृति द्वार से प्रवेश करते ही सबसे पहले नजर पड़ी मुंशी प्रेमचंद उद्यान पर। उद्यान की हालत ठीक-ठाक ही लगी। उद्यान के बोर्ड को देख लगता था जैसे इसे जब तब पोस्टरों से ढंक दिया जाता होगा। कुछ "नुचे-चिथे" पोस्टरों के अंश उस बोर्ड पर भी दिख रहे थे। 




       आगे  बढ़ते  ही  सड़क  के  दोनों  ओर  बाजार  नजर  आया।  कहीं  सब्जी  बिक  रही  थी  तो  कहीं मछली।  कहीं  कसाई  की  दुकान  थी  तो  कहीं  दूध  की।  बाजार  में  ज्यादा  भीड़  तो  नहीं  थी  लेकिन  लोग  आते  जाते  दिख  रहे  थे।

   


  बाजार से होकर आगे बढ़ने पर एक जगह बोर्ड दिखा जिस पर लिखा था कि यह मुंशी प्रेमचंद का पैतृक निवास है। वहीं गाड़ी खड़ी की गई। आगे पैदल चले। सफेद चूने से रंगे घर के दरवाजे बंद थे। दीवार पर किसी विद्या कोचिंग सेन्टर का उखड़ा पोस्टर का अंश नजर आया।

मुंशी प्रेमचंद के घर के सामने बना शिवाला
मुंशी प्रेमचंद जी का पैतृक निवास
 ध्यान से देखने पर कुछ और कोचिंग सेन्टरों के और भी छूटे-बिछड़े अंश नजर आये। इत-उत देखने के बाद नजर पड़ी सामने के शिवाला पर। देखने में लगा कि शायद किसी अति उत्साही 'मनुक्ख' ने पीले रंग के ऑयल पेंट से मंदिर की दीवारें रंगने के बाद उन पर बोल-बम आदि की भरमार कर दी हो। 


    जहां तक मैं समझता हूँ, इस रूप में मंदिर देख भक्ति भाव कम ही उपजता होगा। मंदिर जितने साधारण, सौम्य दिखें, उनकी निर्मलता उतनी ही अधिक प्रतीत होती है। बहुत संभव है यह मंदिर शुरूवात में सौम्य ही लगता हो, लेकिन पीले रंग के ऑयल पेंट ने इसमें कृत्रिमता ला दी।


  आगे बढ़कर देखा गया तो मुंशी प्रेमचंद स्मारक नजर आया। स्मारक का गेट बंद था। गेट के ठीक सामने सड़क उस पार लोहे की जाली से ढंका कुआँ नजर आया। कुएं के जालीदार मुहाने से मदार, पीपल, बेर जैसी बॉटनी बिरादरी सूरज से बतियाने के लिये अंकुआती नजर आई, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब यह कुआँ त्याग दिया गया है। 
    

    वहीं पास ही के मकान की छाँह में कुछ कुत्ते छाँव में बैठे नजर आये। उनके हाव-भाव देखने से लगता था जैसे उन्हें हम जैसे बाहरी लोगों के गाँव में आने पर कोई आपत्ति न थी। हो सकता है बाहरी लोगों को अक्सर देखते रहने की आदत पड़ गई हो। बगल के नल के नीचे कुछ बच्चे भीषण गर्मी में तरी लेते दिखे। छई-छई-छपाक।
ठीक घर के सामने बना उजाड़ दवाखाना

स्मारक के ठीक सामने बना इलैक्ट्रो होम्योपैथ क्लिनिक
   हम लोग वहीं खड़े होकर देख रहे थे कि किससे गेट खुलवाया जाय, तब तक जालीदार कुएँ से सटे, घास-फूस को छतों पर आश्रय देते  मकान पर नजर गई जहां एक बोर्ड लगा था- इलैक्ट्रो होम्यौपैथिक क्लिनिक। उसकी दीवार पर नीले रंग में सूचना दर्ज थी कि "यहाँ पर बच्चों और स्त्रियों के रोग, बाँझपन, पेट के रोग, अलसर, चर्म रोग, सफेद दाग, दमा, सायटिका, कान बहना, मुहाँसा, स्वप्नदोष, नपुंसकता..... सिरदर्द आदि नये पुराने रोगों का इलाज होता है" दरवाजे के बगल में समय भी लिखा था।  सुबह - 10 से 1, सांय - 6 से 9. एक मोबाइल का चित्र बनाकर ठीक उसकी बगल में हाथों से नंबर भी लिखा गया था।

प्रेमचंद जी के पड़ोस का घर
   रूककर इधर-उधर देखा गया कि किससे सम्पर्क किया जाय। कौन है जो गेट खोलेगा। ढूँढते हुए पैतृक निवास के बगल वाली गली में जा पहुँचा। सूनसान गली। कोई नजर नहीं आ रहा था। एक दो घरों की तस्वीर लेने के बाद एक दरवाजा खुला दिखा जिसमें करीब पैंसठ-सत्तर वर्ष के एक बुजुर्ग खटिया पर लेटे नजर आये। प्रणाम करने के बाद उनकी ओर बढ़ा तो वे उठकर बैठ गये। संकोच हुआ कि नाहक इन्हें तकलीफ दिया। पूछने पर कि स्मारक स्थल का गेट कब खुलेगा

प्रेमचंद जी के पैतृक निवास स्थल के करीब का घर
    उन्होंने बैठे गले से बताया कि "होहीं गेटवा के बगिले एक ठौ कागज चफना हौ, ओही पे नम्मर लिखल होई। फोन कै द, मनई आ जइहीं". उन्हें ज्यादा तकलीफ न देकर वापस वहीं मुंशी प्रेमचंद स्मारक के गेट पर पहुँचा गया। वहाँ एक कागज पर "नम्मर" दिखा। फोन करने पर जवाब मिला - "बस, अभी आते हैं"। आसपास के घरों का जायजा लिया तो कुछ अच्छी हालत में मिले तो कुछ खराब हालत में। एक कत्थई रंग का मकान दिखा जिस पर नाम लिखा था - "प्रेमालय"। संभवत: प्रेमचंद जी के परिवार से जुड़े लोगों का ही मकान हो।  

        तभी कुछ बच्चों के खेलने-दौड़ने और शोर की आवाज आई तो उस ओर बढ़ गये। देखा गया तो मुंशी जी के घर के सामने वाले मैदान में कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। ईंटों का स्टैम्प, थोड़ी सी समतल पिच, आस पास आम के पेड़। संभवत: बच्चों के स्कूल जाने का समय अभी न हुआ था। मन में बात आई कि शायद यहीं इसी मैदान में प्रेमचंद जी ने भी गिल्ली डंडा खेला होगा, तभी तो गिल्ली डंडा कहानी में इस खेल के बारे में इतना हुलसकर वर्णन किया है। लेकिन गिल्ली-डंडा ही क्यों ? उन्होंने तो क्रिकेट पर भी कलम चलाई है। और वह भी देशज अंदाज में। भले ही वे आजादी के लड़ाई के दौरान इस खेल को खेलने को लेकर थोड़े नाखुश से थे लेकिन खेल तो खेल है। उससे भला कैसी दुश्मनी। तभी तो "वरदान" उपन्यास में उन्होंने क्रिकेट खेल की यह दिलचस्प कमेंटरी की है। प्रेमचंद जी लिखते हैं
  
   "आज क्रिकेट में अलीगढ़ के निपुण खिलाडियों से उनका सामना था। ये लोग हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध खिलाडियों को परास्त कर विजय का डंका बजाते यहां आये थे। उन्हें अपनी विजय में तनिक भी संदेह न था। पर प्रयाग वाले भी निराश न थे। उनकी आशा प्रतापचंद्र पर निर्भर थी। यदि वह आध घण्टे भी जम गया, तो रनों के ढेर लगा देगा। और यदि इतनी ही देर तक उसका गेंद चल गया, तो फिर उधर का वारा-न्यारा है। प्रताप को कभी इतना बड़ा मैच खेलने का संयोग न मिला था। कलेजा धड़क रहा था कि न जाने क्या हो।     दस बजे खेल प्रारंभ हुआ। पहले अलीगढ़ वालों के खेलने की बारी आयी। दो-ढाई घंटे तक उन्होंने खूब करामात दिखलाई। एक बजते-बजते खेल का पहिला भाग समाप्त हुआ। अलीगढ़ ने चार सौ रन किये। अब प्रयाग वालों की बारी आयी पर खिलाडियों के हाथ-पांव फूले हुए थे। विश्वास हो गया कि हम न जीत सकेंगे। अब खेल का बराबर होना कठिन है। इतने रन कौन करेगा। अकेला प्रताप क्या बना लेगा ? पहिला खिलाड़ी आया और तीसरे गेंद मे विदा हो गया। दूसरा खिलाड़ी आया और कठिनता से पाँच गेंद खेल सका। तीसरा आया और पहिले ही गेंद में उड़ गया । चौथे ने आकर दो-तीन हिट लगाये, पर जम न सका। पॉँचवे साहब कालेज मे एक थे, पर यहाँ उनकी भी एक न चली। थापी रखते-ही-रखते चल दिये।     अब प्रतापचन्द्र दृढ़ता से पैर उठाता, बैट घुमाता मैदान में आयां दोनों पक्ष वालों ने करतल ध्वनि की।  प्रयाग वालों की दशा अकथनीय थी।  प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि प्रतापचन्द्र की ओर लगी हुई थी।   सबके हृदय धड़क रहे थे।  चतुर्दिक सन्नाटा छाया हुआ था।  कुछ लोग दूर बैठकर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि प्रताप की विजय हो।   देवी-देवता स्मरण किये जा रहे थे।   पहिला गेंद आया, प्रताप ने खाली दिया। प्रयाग वालों का साहस घट गया।   दूसरा आया, वह भी खाली गया।   प्रयाग वालों का कलेजा नाभि तक बैठ गया।   बहुत से लोग छतरी संभाल घर की ओर चले।   तीसरा गेंद आया।  एक पड़ाके की ध्वनि हुई ओर गेंद लू  की भॉँति गगन भेदन करता हुआ हिट पर खड़े होने वाले खिलाड़ी से सौ गज आगे गिरा। लोगों ने तालियॉँ बजाईं । सूखे धान में पानी पड़ा । जाने वाले ठिठक गये। निराशों को आशा बँधी। चौथा गेंद आया और पहले गेंद से दस गज आगे गिरा। फील्डर चौंके, हिट पर मदद पहँचायी | पाँचवा गेंद आया और कट पर गया। इतने में ओवर हुआ। बालर बदले, नये बालर पूरे वधिक थे। घातक गेंद फेंकते थे। पर उनके पहिले ही गेंद को प्रताप ने आकाश में भेजकर सूर्य से र्स्पश करा दिया"।
मुंशी प्रेमचंद स्मारक

   हम अभी बच्चों का क्रिकेट देख ही रहे थे कि मुंशी प्रेमचंद जी के स्मारक की देख-रेख करने वाले दुबे जी आते दिखे। राम-रहारी हुई। कहाँ-कैसे, बोलते बतियाते स्मारक का गेट खुला.....
  
जारी.......


Thursday, July 25, 2013

"लिव इन रिलेशन" वाली आधुनिकता और प्रेमचंद की लेखनी...बनारस यात्रा - 8

  बनारस यात्रा के दौरान हमारा अगला और आखिरी पड़ाव रहा मुंशी प्रेमचंद का गाँव लमही। बड़े दिनों से वहाँ जाने की इच्छा थी। देखना चाहता था कि उनका गाँव कैसा लगता है। किस तरह का माहौल रहता है वहाँ। वैसे, उनकी कथा कहानियों से तो अंदाज लग ही जाता है कि जैसे बाकी गाँवों में जीवन है, सामाजिक उहापोह है, तर-त्यौहार हैं, रीति-रीवाज़ हैं, वैसे ही वहाँ भी होगा। लेकिन सोचने और महसूस करने में फर्क है। सो कई वर्षों की अपनी साध पूरी करने के लिये भ्राता श्री के साथ चल पड़ा मोटरसाईकिल पर।

   मन में एक पुलक थी कि मुंशी जी के घर जा रहा हूँ। जेहन में उनकी लिखी कई कहाँनियां एक के बाद एक आये जा रही थीं। पूस की रात, नमक का दरोगा, ईदगाह, कफन...सब एक एक कर कौंध रहे थे। इनमें से कई कहाँनियां स्कूली जीवन में पढ़ी हैं तो कुछ को बाद में। मुझे अब भी याद है कि ईदगाह वाली कहानी पढ़कर मैं रूआँसा हो गया था। मन में बात लग गई थी कि हामिद ने मेले से मिठाई नहीं खरीदी तो न सही, उसने दादी का हाथ जलने से बचाने के लिये चिमटा खरीदा तो चिमटा सही, लेकिन उसके मित्रों ने उसे मिठाई दिखा-दिखाकर ललचाया क्यों ? ऐसा भी कोई करता है क्या ? हांलाकि बाद में हामिद ने अपने लोहे की चिमटे की खूबीयां बताकर अपने मित्रों पर रौब गांठा जरूर था और उनकी ओर से मिठाई भी पा गया था, तिस पर भी मेरा मन वहीं अटका था कि हामिद को उसके दोस्तों ने मिठाई पहले क्यों नहीं दी ? चिमटे की खूबी बताने के बाद ही क्यों दी ?

    इस तरह की ढेरों प्रसंग हैं प्रेमचंद जी के लेखनी में जो आपको हठात् अपने वश में कर लेते हैं। वैसे प्रेमचंद जी के बारे में एक भ्रांति बनी हुई है कि वे गाँव-कस्बों को ही समझते थे और वहीं की कहानियाँ लिखते थे जबकि ऐसा नहीं है। उनकी कहानियों में शहरों का भी, आधुनिक हो चुकने का स्वांग रचते समाज का भी कमोबेश उल्लेख रहता रहा है। उदाहरण के लिये उनकी कहानी 'मिस पद्मा' को ही लें जिसमें कि "लिव-इन रिलेशन" को उन्होंने मुद्दा बनाया है। उसमें उन्होंने विवाह को बंधन मानने वाली आधुनिक महिला पद्मा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि -

    "कानून में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेने के बाद मिस पद्मा को एक नया अनुभव हुआ, वह था जीवन का सूनापन। विवाह को उसने एक अप्राकृतिक बंधन समझा था और निश्चय कर लिया था कि स्वतन्त्र रहकर जीवन का उपभोग करूँगी"।

    करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी मिस पद्मा के बारे में मुंशी जी आगे लिखते हैं  - "उसे अब बहुत अवकाश मिलता था और इसे वह किस्से-कहा,नियाँ पढ़ने, सैर करने, सिनेमा देखने, मिलने-मिलाने में खर्च करती थी। जीवन को सुखी बनाने के लिए किसी व्यसन की जरूरत को वह खूब समझती थी। उसने फूल और पौधे लगाने का व्यसन पाल लिया था। तरह-तरह के बीज और पौधे मँगाती और उन्हें उगते-बढ़ते, फूलते-फलते देखकर खुश होती; मगर फिर भी जीवन में सूनेपन का अनुभव होता रहता था। यह बात न थी कि उसे पुरुषों से विरक्ति हो। नहीं, उसके प्रेमियों की कमी न थी"।

 मुंशी जी आगे लिखते हैं - "पद्मा को विलास से घृणा थी नहीं, उसे घृणा थी पराधीनता से, विवाह को जीवन का व्यवसाय बनाने से"। और इसी सूनेपन को दूर करने के लिये मिस पद्मा एक कालेज के प्रोफेसर प्रसाद से दिल लगा बैठती है। प्रोफेसर की फितरत भी मिस पद्मा सरीखी थी। वह भी विवाह को बंधन मानता था। माने भी क्यों न। आधुनिक जो ठहरा। इसलिये दोनों की बात रह गई और दोनों साथ साथ बिना विवाह के पदमा के घर में रहने के लिये राजी हो गये। हां, ये जरूर है कि दोनों "कसम खाकर" एक दूसरे के साथ रहने को राजी हुए। शर्त यही कि इस साथ रहने की कसम के अलावा बाकी बातों में स्वतंत्रता रहेगी। जिस दिन भी दूसरे से मन खटके एक दूसरे से अलग होने के लिये स्वतंत्र हैं।

    समय बीता और पदमा गर्भवती हुई। उधर रूप-लावण्य भी कुछ कम हुआ और प्रसाद किसी और के साथ लटपटा गया। रात रात भर गायब रहता। मिस पदमा कुढ़ कर रह जातीं। शर्त के मुताबिक साथ रहने के अलावा बाकी बातों में स्वतंत्रता थी। कुछ दिक्कत हो तो अलग होने की सुविधा भी थी लेकिन अब क्या कैसे हो जबकि पदमा बच्चे को जन्म देने के दिनों में चल रही हो। सारा वश तो अवश होकर रह गया। दोनों में झगड़े भी हुए। प्रसाद ने हाथ खड़े करते हुए सीधे कह दिया कि न जम रहा हो तो अलग होने की स्वतंत्रता है। मैं चला जाता हूँ। मुझे कोई हर्ज नहीं।

    फिर वो भी दिन आया कि उसने बच्चे को जन्म दिया। उस वक्त प्रसाद कहीं किसी के साथ विदेश में मस्ती करने चला गया था। खर्च करने के लिये जब रकम टटोली तो पता चला बैंक से पैसे पहले ही निकालकर गया है "लिव इन वाला आधुनिक जेन्टलमैन"। अंतत: पछताती हुई मिस पदमा पड़ोस के विवाहित सुखी दम्पत्ति के बच्चे को देख आँखों से आँसू ढुलका बैठती है और विवाह के बंधन की प्रासंगिकता, उसकी उपयोगिता समझ आती है। 

     ये लिव-ईन रिलेशन आधारित "मिस पदमा" कहानी प्रेमचंद जी ने करीब सत्तर पचहत्तर साल पहले लिखी है लेकिन इस तरह के रिश्तों पर चर्चा हम लोग अब हाल फिलहाल कर रहे हैं। हांलाकि पहले भी लिवइन रिलेशन पर कानून बनने न बनने की चर्चाएं कई साल पहले चली हैं, लेकिन इस मुद्दे का व्यापक प्रचार, उस पर चर्चा आदि अब दिखता है। इसी से पता चलता है कि प्रेमचंद जी को कालजयी रचनाकार क्यों कहा जाता है। 


   उधर बनारस के पांडेपुर तिराहे से होते हुए, दहिने, बांये कट-कुट मारते हमारी मोटरसाईकिल लमही के मुंशी प्रेमचंद स्मृति द्वार पर पहुँच गई जहाँ पुतलों के रूप में होरी बैठे हैं, धनिया भी है और हां, ठीक प्रवेश द्वार के अगल-बगल दो बैलों की जोड़ी भी है........ हमारी तरह   :-) 

जारी......


Monday, July 22, 2013

पप्पू की दुकान.... बनारस यात्रा - 7

  तुलसीदास जी के 'गोदरेजही' पाण्डुलिपी के दूरस्थ दर्शनोपरांत हम लोग वहीं करीब ही स्थित एलिस बोनर संस्थान गये। एलिस बोनर, जिन्होंने कि भारतीय कला से जुड़ी बारीकियों के बारे में अध्ययन किया, यहाँ की मूर्तियों में एक किस्म के ज्यामितीय अनुपात को पाया, उड़ीसा जाकर घूम-घूमकर ताड़पत्रों के अध्ययन से लुप्त होने के कगार पर पहुँचे ज्ञान को किताब के रूप में लिपिबद्ध किया, उन्हीं के संरक्षित निवास स्थान तक हम लोग ढूँढते-ढाँढते पहुँचे। संस्थान खुलने में समय था
सो हमें केवल गैलरी में जाने की अनुमति मिल पाई। शांत, सुंदर जगह। अच्छा लगा वहाँ पहुँचकर। संभवत: बोनर संस्थान के बारे में विस्तृत चर्चा अपने ब्लॉग पर गिरिजेश जी करें।

   वहाँ से हम लोग पप्पू की दुकान की ओर चल दिये। वही दुकान जिसकी चर्चा काशीनाथ सिंह ने अपनी किताब काशी का अस्सी में की है। जिससे भी पूछते कि पप्पू की दुकान किधर है तो जवाब मिलता बस इधर ही है। चलते चले गये।

 करीब पाँच मिनट की ढूँढैती के बाद दुकान मिल गई। बाहर से यह किसी आम दुकान की तरह ही लग रही थी। इसी को काशीनाथ सिंह ने दड़बे की संज्ञा दी थी। पास पहुँचने पर सड़क के किनारे ही थे कि दड़बे के भीतर से ठठाकर हँसते लोगों की आवाज सुनाई पड़ी। पक्का यकीन हो गया कि गपड़गोष्ठी और अड्डेबाजी के लिये फेमस यही है पप्पू की दुकान।

 सन्तो आप में से कई सोच रहे होंगे कि आखिर इसमें ऐसा क्या है तो यही कहना उचित होगा कि इसमें वही सब है जो औरों में भी है, बस एक चीज "एस्ट्रा" है जिसके बारे में कहा जाता है कि बारहो मास यहाँ "बैठकर चहकने और चहक कर बैठने" का सदाबहार मौसम बस यहीं मिलता है। यही वजह है कि पान की दुकान पर हुई गपड़गोष्ठी और उससे जुड़े तमाम गुले-गुलजारियत के दम पर काशी का अस्सी नाम की विख्यात किताब बन गई। और गपड़गोष्ठी भी क्या...एक से एक नगीनेदार बतकही। मिसाल के तौर पर यहीं 'काशी का अस्सी' से अंश देखिये। इस बतकही का संदर्भ तब का है जब मिली-जुली वाजपेयी सरकार के जाने की उम्मीद लिये हुए विरोधी दल तलवार भांज रहे थे लेकिन सरकार गिर नहीं रही थी। उसी बात को लेकर चर्चा चली तो राधेश्याम पांड़े  ने पंचतंत्र की कहानी बयां करते हुए कहा -

 "पंचतन्त्र वाली कहानी तो याद है न आपको ? एक सियार अपनी सियारिन के साथ चूहों की ताक में नदी किनारे बैठा था कि एक तगड़ा कद्दावर साँड़ पानी पीने पहुँचा। सियारिन की नजर उसकी पिछली टाँगों के बीच झूलते मांसपिंड पर गई। बोली - स्वामी, चूहा खाते-खाते मन भर गया है। सामने देखो - साँड़ की टाँगों के बीच में लटका हुआ फल। लगता है, पक गया है बस गिरने ही वाला है ! उसका पीछा करो, आज नहीं तो कल गिर जाएगा। और दसियों साल तक भोंसड़ी के पीछे-पीछे घूमते रह गए और वह नहीं गिरा ! क्यों ? क्योंकि 'शिथिलौ च सुबद्धौ च' था। जब सोलह पार्टियों को साथ लेकर चलना होगा तो शिथिल तो होगा ही, लेकिन सुबद्ध है ! गिरेगा नहीं, करते रहो इन्तजार !"
 
  तो सन्तो ! हम लोग भी उसी दड़बे में जा बैठे जहाँ यह पंचतन्त्र की महान कथा कही गई थी। और सन्जोग देखिये कि दड़बे में उन्हीं राधेश्याम पांड़े का जिक्र हो रहा था। यह जिक्र क्या था और किस सन्दर्भ में था यह थोड़ा बाद में। पहले आपको पप्पू की दुकान के दरो-दिवारों से परिचित करा दूं। 
   जब हम लोग पहुँचे तो वहाँ दो बुजुर्ग दीवार से सटी बेंच पर बैठे बतिया रहे थे। एक दो लोग अखबार पढ़ रहे थे। रह-रहकर हंसी पड़क्का हो ही रहा था। हम लोग दड़बे के अंदर जा बैठे। नजर दौड़ाई तो सामने पटरे पर एक बंद टीवी थी। बंद टीवी के सामने दूध वाला जग रखा था। फिर जब दड़बे में लाईव शो चल रहा हो तो टीवी फीवी की किसको फिकर। दूसरी ओर नजर दौड़ाई तो एक नोटिस बोर्ड दिखा जिस पर किसी ने "प्रणाम पम्फलेट" चिपकाया था वैसे ही जैसे गली मोहल्लों में "प्रणाम होर्डिंग्स" शुभकामना बैनर्स आदि लगते हैं। तो यहाँ भी एक लगा था। कुछ फुटकर आमंत्रण भी नजर आये।

    हम लोगों ने चाय का ऑर्डर दिया और वहीं अंदर की ओर जाकर बैठ गये। यहाँ हम लोगों ने केवल वहाँ मौजूद लोगों की बातें सुन आनंद लेने की ठानी। कुछ कहने का मतलब था कि पप्पू की दुकान का पूरा आनंद न ले पाना। फिर इतनी दूर से सुनने ही तो आये थे।

   वहाँ पहले से मौजूद लोगों की आपसी बातें हो रही थीं। मुलैमा, राजनथवा, मायावतीया.....हर नाम के साथ रेकार...वकार की नजरबंदी। बड़े से बड़े नेता को यहाँ इसी तरह का सम्बोधन मिलता है। हम लोग भी सुन रहे थे। मंद मंद मुसकरा रहे थे। उसी दौरान एक बुजुर्ग ने शुरू किया राधेश्याम पांड़े का किस्सा। वही राधेश्याम पांड़े जिनका कि काशी का अस्सी किताब में जिक्र है और जिन्होंने साँड़ के टाँगों के बीच पके फल वाला लहालोट किस्सा सुनाया था।

  तो सन्तों, यहाँ बात कुछ यूँ उट्ठी कि छड़ी वाले बुजुर्ग का कहनाम था कि "आजु" बड़े दिनों बाद पप्पू की दुकान पर आया हूँ। तबले दूसरे बुजुर्ग ने किस्सा बयां करना शुरू किया। किस्सा कुछ यूँ था कि राधेश्याम पांड़े पादते बहुत थे। एक बार कई लोगों के साथ थे तो तय हुआ कि जब पादना होगा तो मुँह ढंक लेंगे और कहेंगे - "आया"। और जब पाद लेंगे तो मुंह से कपड़ा हटा लेंगे यह कहते हुए कि - "गया"। ऐसे ही एक दिन कपड़ा मुँह पर रखे और बोले - "आया"। बाकी लोगों ने भी कपड़ा मुँह पर रख लिया। पांच मिनट हुआ दस मिनट हुआ लेकिन राधेश्याम पांड़े कुछ कह नहीं रहे थे। जब किसी ने पूछा कि बताइये आया तो आया लेकिन गया कि नहीं ? तब राधेश्याम पाँडे ने बताया - "हमरे त टट्टी होई गई"। वही हाल इनका है, आये तो गये नहीं। 

( पढ़ने से शायद उतना आनंद न आये इस बतकही का, इसलिये विडियो देखल जाय  :-)

 तो सन्तों समझ सकते हैं कि मात्र दस पंदरह मिनट वहां बैठने से ही कितनी चउचक बतकही सुनने मिलती है। और संजोग देखिये कि चर्चा पंचतन्त्र के कथावाचक उन्ही राधेश्याम पांड़े पर थी जो "शिथिलौ च सुबद्धौ च" के "प्रतिपादक" थे। फिलहाल देश की राजनीति में अब भी वही हाल है। धीरे-धीरे दस साल हो गये लेकिन विरोधी अब तक मनमोहनी फल के पक कर गिरने का इंतजार कर रहे हैं। फर्क यह है कि तब सोलह पार्टीयों के चलते शिथिल हो चुकी वाजपेयी सरकार थी तो अब मनमोहन सरकार है। तमाम पार्टियों के सहयोग-असहयोग से शिथिल हो जाने पर भी सुबद्ध है। गिरने वाला फल नहीं लगता। जब तृणमूल से खटकती है तो मुलायम सपोर्ट करने के लिये हाथ लगा देते हैं और जब करूणानिधि से खटकती है तो जयललिता की पार्टी सपोर्टने लग जाती है। इसी से समझ सकते हैं कि सरल भाषा में राजनीति समझने हेतु क्यों 'काशी का अस्सी' पढ़ने की अनुशंसा की जाती है।

  हम अभी और कुछ देर बैठते लेकिन गिरिजेश जी को भी ऑफिस जाना था और हमें भी अपने अगले पड़ाव पर जाना था। सो दड़बे से बाहर निकल आये। गिरिजेश जी चले अपने ऑफिस, हम चले लमही। तो सन्तो, विडियो 'देखल' जाय :-)

video



जारी........


Saturday, July 20, 2013

नौका विहार...घाट पर घाटा... .बनारस यात्रा - 6

       बनारस में सुबह-सुबह गंगा जी में स्नान करने के बाद घाट पर खड़े होकर गिरिजेश जी का इंतजार करने लगा। फोन करने पर पता चला कि आस-पास ही हैं। नजर दौड़ाने पर मॉर्निंग वॉक की धज में जनाब आते दिखे। हाथ मिलऊवल हुआ, अऊर का हाल-चाल, कइसे कहाँ चला जाय पर बात होने लगी।  प्लान किया गया कि अस्सी घाट पर पप्पू की दुकान पर चल कर चाय-शाय पी जाय। गपड़गोष्ठी की जाय। 

  अभी दशाश्वमेध घाट से अस्सी घाट तक नाव से जाने की बातें कर ही रहे थे कि एक नाव वाला आ गया। बताने पर कि अस्सी घाट तक जाना है, उसने किराया दो सौ रूपये बताया। हम लोग आगे बढ़ लिये यह कहकर कि किराया ज्यादा है। नाव में नहीं जाना। आगे जाने पर एक 'ठो' और मिला। पूछने पर उसने बताया कि चार सौ लगेंगे अस्सी घाट तक के। संभवत: वह अपने साथी के बताये दो सौ के रेट से अनभिज्ञ था। हमने ज्ञान बघारा कि वहां दो सौ में ले चल रहा है, आप चार सौ कह रहे हैं ? हम लोग फिर आगे बढ़ने लगे। वही मल्लाह पीछे-पीछे आने लगा और अस्सी घाट तक डेढ़ सौ में ले चलने के लिये राजी हो गया। जाहिर है यहाँ त्वरित 'सूचना का अधिकार' काम आया। पिछले मल्लाह द्वारा दो सौ में ले चलने की सूचना देने से यह बंदा चार सौ की बजाय डेढ़ सौ में ही राजी हो गया। हम संतुष्ट हुए कि ढ़ाई सौ रूपये बचा लिये। यह संतुष्टि तब परम संतुष्टि में बदल जाती यदि कोई दूसरा मल्लाह एक हजार में ले चलने की बात कह डेढ़ सौ में ले चलता। तब हमारी बचत होती साढ़े आठ सौ रूपये। लेकिन इस मल्लाह ने केवल ढ़ाई सौ की बचत कराई। सीधे-सीधे "घाट पर ही घाटा" करा दिया।


     रेट तय होने पर हम लोग नाव की ओर जाने लगे। पता चला यह शख्स केवल रेट तय करता है, नाव खेने वाला दूसरा मल्लाह है वह आ रहा है। हम लोग किनारे खड़े हो नाव का इंतजार करने लगे। एक युवक नाव लेकर हमारी ओर आता दिखा। नाव आने पर हम लोग उसमें बैठ गये। युवा खेवनहार ने नाव आगे बढ़ानी शुरू की। हम लोग बातों में लग गये कि तभी नाव खेवइया अपनी उस नाव को एक दूसरे नाव के करीब ले गया। वहाँ जाकर रस्सी से अपनी नाव बाँधने के बाद तुरत-फुरत एक नाव से दूसरी नाव पर होते हुए एक जगह जाकर वहाँ की रस्सियों को कसने लगा। तब पता चला कि यह नाव जिसमें हम बैठे हैं वह नावों की पार्किंग एरिया से निकालकर लाई गई थी। एक नाव बाहर आने पर शेष खड़ी नावों को रस्सी से व्यवस्थित करना जरूरी था और वही काम किया जा रहा था। सब ठीक-ठाक करने के बाद नाव वाला हमारी नाव पर वापस लौटा और फिर नाव चल पड़ी अस्सी घाट की ओर।

 आस-पास के इलाके को निहारते नाव से आगे बढ़े जा रहे थे तभी सामने की दीवारों पर  एक जगह कोरियाई मोटिफ नजर आया। सुंदर चित्रकारी। चर्चा चली कि आखिर किसने उन विदेशीयों को कहा होगा कि तुम यहाँ अपनी चित्रकारी करो ? और वह भी उस जगह जहाँ लोग दिव्य निपटान कर रहे हों। वहीं मल-मूत्र सब बिखरा पड़ा है, तमाम बदबूदार इलाका लेकिन विदेशी अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति रच गये। अब यह तो स्थानीय लोगों की कमी है जो उन चित्रों के पास हग-मूत रहे हैं। तभी अचानक करीब सात आठ फीट की दूरी पर एक गंगवासी जी दिव्य निपटान के बाद नदी के पानी में छप् छप् करते अपना पिछवाड़ा धोते दिखे। नाव के एकदम सामने आ जाने से उन महाशय के तमाम उरजे पुरजे प्रकट रूप से नजर आ रहे थे और हम लोग मजाक में लग गये कि फोटो लेना चाहिये। वह पिछवाड़ा धोवन पोज् ही ऐसा था कि क्या कहें। महाशय चाहते तो नदी के किनारे सूखी जमीन पर बैठ हाथ आगे बढ़ा 'पानी छू' सकते थे लेकिन वह टखने भर पानी में 'हेल' कर, अंडकोषों को भीगने से बचाते हुए पिछवाड़ा 'उलार' अवस्था में धोवन क्रिया निपटा रहे थे। यह पोज् वाकई स्पेशल था लेकिन फोटो शोटो नहीं लिया गया।

   नाव आगे बढ़ी तो वह स्थान भी आया जहाँ मृतकों का दाह-संस्कार किया जा रहा था। कहीं डोम 'लग्गी' लेकर दाह-संस्कार की लकड़ियों को उलट पलट कर ठीक से मृतकों को जलाने का अपना काम कर रहा था तो ठीक उसी के बगल में एक शख्स अपनी 'लग्गी' में कांटा फंसाये मछलियाँ पकड़ रहा था। लग्गी-लग्गी का फर्क। एक से मृतकों का इंतजाम किया जा रहा था तो एक से जीवित मछलियों का। दोनों प्रक्रियाओं में 'लग्गी' कॉमन थी।

 नाव आगे बढ़ी तो पानी में बहते किसी बच्चे की फूली हुई लाश पर नजर पड़ी। पिछली बार जब आया था तब भी ऐसा ही नजारा देखा था। अबकी फिर वैसा ही देखा। जाहिर है, मन खराब होता है यह सब देखकर। लेकिन क्या करें।  जन्म-मृत्यु, जरा-मरण यही सब तो जीवन चक्र ठहरा।

     नाव आगे बढ़ती ही जा रही थी कि पानी में तैरते लोगों की आवाज आई। उस ओर देखा गया तो एक पिता अपनी पुत्री को तैरना सिखा रहा था। पिता ने टायर ट्यूब पुत्री से छीनकर अपने हाथ में ले लिया था और पुत्री को ललकार रहा था कि "आऊ"...."आऊ"...."आऊ"..। उधर पुत्री थी कि बार-बार चिल्ला रही थी, अपने पिता को बार-बार पकड़ना चाहती थी लेकिन पिता अपनी पुत्री से दूर हट उसे आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित कर रहा था। यह नजारा देख हम लोगों में चर्चा चली कि देखो, उस पिता ने कोई नारीवादी चिंतन न किया होगा, ना तो जानता होगा कि नारीवाद क्या होता है लेकिन वह अपनी पुत्री को जीवन भंवर से बचने की शिक्षा दे रहा है। उसे पानी में बिना टायर-ट्यूब के तैरने के लिये छोड़ प्रोत्साहित कर रहा है कि तैरना सीखो। हमेशा यह टायर-ट्यूब और यह पिता तुम्हारे साथ नहीं रहेगा।

   इन्हीं नजारों को देखते हुए नाव अस्सी घाट पर आ लगी। मल्लाह को पेमेंट करने के बाद हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ ही रहे थे कि गिरिजेश जी ने ध्यान दिलाया कि यहीं कहीं पर तो तुलसीदास की रामचरित मानस की मूल पाण्डुलिपी रखी है। एक-एक कर सीढ़ियाँ चढ़ते उस छोटे से मंदिर की ओर पहुँचे तो पता चला कि सही ठिकाने आये हैं। अंदर कोई पंडित जी थे। एक ओर लाल कपड़े में कुछ गठियाया था। पूछने पर कि मूल प्रति यही है क्या तो जवाब मिला - नहीं। वो उसमें है। देखा गया तो बलिष्ठ-गरिष्ठ गोदरेज का सेफ। रामचरित मानस की मूल प्रति इसी गोदरेज के सेफ में रखी थी। फोटो लेने की मनाही थी। पता चला कि एक बार चोरी हो गई थी। बहुत हंगामा हुआ। पुलिस-फोर्स लग गई थी। डीएम कलेक्टर तक के जिम्मे आया कि मूल प्रति मिलनी चाहिये और कहीं से खोज-खाजकर लाया गया तो इसी गोदरेज के सेफ में रखा गया। समय समय पर सरकारी अमला आकर उसकी खोज खबर लेता रहता है। सेफ वाकई सेफ है कि नहीं यह देख जाता है।

 वहीं मंदिर के आसपास का नजारा लिया गया तो गिरिजेश महराज बोले -  "गंगा यहाँ से देखने पर कितनी विशाल नजर आती हैं। यहीं कहीं बैठकर "तुलसीयवा" रामचरित मानस लिखता होगा"

 मैंने कहा - "अरे तो ललिता घाट पर पीपल के नीचे बैठ बाऊ कथा क्यों नहीं पूरा करते ? हम भी कह सकेंगे - "गिरिजेसवा" यहीं कहीं बैठकर बाऊ कथा लिखता होगा"  :-) 

जारी......

- सतीश पंचम

Sunday, July 14, 2013

Who cares का पर्यायवाची शब्द, अदालती किस्सा.....बनारस यात्रा - 5

    सुबह जब बनारस कैंट से दशाश्वमेध घाट की ओर मोटरसाईकिल से जाने लगे तो रास्ते में पेट्रोल भरवाने की सोचा गया। हल्की शीतल हवा चल ही रही थी। एक पेट्रोल पंप दिखा तो गाड़ी वहीं पंप की ओर मोड़ दी गई। वहाँ पहले से एक कुर्ता पायजामा पहने शख्स अपनी मोटरसाईकिल में पेट्रोल भरवा रहे थे। जब पेमेंट करने की बारी आई तो उन्होंने हजार का नोट निकाला। पेट्रोल पंप पर नकदी इकट्ठा करने वाले शख्स ने पूछा कि "छुट्टा नहीं है क्या ?"

   "अरे अऊर कहाँ छुट्टा मिली आर.....इहीं से न लेंगे कि कतहूँ अन्ते जाय के लेवै के परी" - कहने के बाद वह सज्जन हम लोगों की ओर हंसकर ताकने लगे। हमने भी जवाब में मुस्कराने के बाद उन सज्जन का ही पक्ष लिया कि - "हाँ और क्या, हजार का छुट्टा यहाँ नहीं मिलेगा तो और कहाँ से मिलेगा"

  हमारी बात से प्रोत्साहित हो वे सज्जन हमसे सीधे मुखातिब हुए - "कभ्भौं भी डॉक्टर, पुलिस, ओकील, "टीसी-फीसी" के सामने बड़की नोट लेयके न जायके चाही, भोसड़िया वालेन कुल झार लेथेन.....तोहका नंगा कइके छोड़ देइहंय ई जानि ल्यौ........एही नाते बड़की नोट "पेटरऊल पंपे" खातिर रक्खे हई.....सदा सर्वदा से"  ( कभी भी डॉक्टर, पुलिस, वकील, टीसी-फीसी के सामने बड़ी नोट नहीं निकालनी चाहिये, सब ले लेंगे, झाड़ कर तुम्हें नंगा कर देंगे ये जान लो, इसी वजह से मैं बड़ी नोटें हमेशा से पेट्रोल पंप के लिये रखता हूँ)

  उनकी बातें सुन हम तो हंसे ही पेट्रोल पंप वाला भी मुस्कराये बिना न रह सका। वह सज्जन आगे जारी रहे - "अरे सच कहात हई भाय, अबहांय ओकीले किहां जा और बड़की नोट झलकाय द त सार लेहे बिना छोड़े न। तबहीं न कहा बा कि - "अदालत"….. '' माने आवा, '' माने पईसा द, '' माने मोकदिमा लड़ा, अऊर '' माने तबाह होई जा। अरे इहै कुल न देखे हई। बकि एक बात बा, ई अदालती खिसा (किस्सा) उही खातिर जे समझदार होय। जो न समझे उ जाय लांड़ चाट के काना होय" ( सच कहता हूँ बंधु, अभी वकील के यहाँ जाकर बड़ी नोट दिख जाय तो वह लिये बिना छोड़ेगा नहीं। इसीलिये तो कहा गया है अदालत। अ माने आओ, द माने पैसा दो, ल माने मुकदम लड़ो, और त माने तबाह हो जाओ। लेकिन ये कहानी सिर्फ उसी के लिये जो समझदार हो, न समझे तो जाय लांड़ चाट कर काना हो )   

    सुबह-सुबह प्राप्त इस दिव्य ज्ञान को सुन हम सभी ठठाकर हंसे। पेट्रोल भरा गया। वे अपने रास्ते, हम अपने रास्ते। रास्ते भर हम लोग उन बातों को डिस्कस करते गंगा घाट की ओर बढ़ रहे थे। बाद में जब इन सज्जन की बातों को फेसबुक पर मैंने शेयर किया तो ज्ञानदत्त जी का कमेंट आया - "आप तो बरनार्ड शॉ के यूपोरियन अवतार से मिले! आप अपने को धन्य माने इन सज्जन से मिल कर" !

   उधर गंगा घाट पर बढ़ने के दौरान ही गिरिजेश जी को फोन किया गया कि हम लोग पहुंच रहे हैं, आप भी पहुँचिये। गाड़ी पार्किंग में खड़ी करने के बाद फिर से हेलमेट लटकाने की बात पर सोच विचार हुआ कि दो हेलमेट ऐसे ही हैंडल के अगल बगल टांग कर हम लोग जा रहे हैं। लॉक भी नहीं लिया घर से कि उसी के सहारे निश्चिंत हो सकते। अभी भ्राता श्री से अपनी दुविधा प्रकट ही कर रहा था कि जनाब खीझ कर बोले - "हेलमेट ले जाये तो 'लांड़े से'.... चलो नहाने....बाद में देखा जायगा"।  भ्राता श्री की बात से दिव्य ज्ञान हुआ कि समूचा पूर्वांचल अंग्रेजी के "Who Cares" का पर्यायवाची "लांड़े से" मानता है। ऐसे कई शब्द-युग्म हैं जो सुनने में भले अश्लील लगें लेकिन सफल संवाद कर ले जाने में सहायक और अपने आप में मौलिक हैं :-)

  घाट पर पहुँचने के बाद नहाने के लिये योग्य स्थान की तलाश की जाने लगी। कहीं महिलाएं नहा रही थीं तो कहीं कपड़े बदल रही थीं। एक जगह पुरूषों का जमघट दिखा तो हम लोग उसी ओर बढ़ चले कि यहां नहाने में सुविधा रहेगी। लेकिन वहां भी कई महिलायें दिखीं। सो इधर उधर हम लोग तय नहीं कर पा रहे थे कि किस ओर चला जाय। तब तक पंडों ने घेरना शुरू कर दिया था। आईये, आप को पूजा अर्चना यहीं करवा देंगे। कपड़े यहीं रखिये, बेफिक्र होकर जाइये। अब हम पूजा अर्चना के लिये तो आये नहीं थे। उद्देश्य था केवल नहाना, और लगे हाथ गंगा जी को प्रणाम कर अपने उस सनातन संस्कार को मान देना जिससे अब तक जाने-अनजाने दो-चार होते आये हैं। भ्राता श्री का कहना था, यहीं कपड़े रखो, मैं कपड़े देख रहा हूं, मोबाइल वगैरह छोड़ छाड़कर जाओ नहाओ। बाद में मैं नहाउंगा। वैसे ही किया गया। आसपास महिलायें थी सो मैं सफेद गमछा लपेट आगे गंगा जी की सीढ़ियों की ओर उतरने लगा। तब तक भ्राता श्री की चुटीली आवाज सुनाई पड़ी - "अरे यार गमछा उतार कर अंडरवियर पर ही जाओ। नहीं तुम्हारा निहारने के लिये कोई आतुर है.....और देख ही लेगा कोई तो "घिस" नहीं जायगा"

    उधर अब गमछा उतार कर केवल अंडरवियर पहने बीस पच्चीस सीढ़ियाँ उतरना मुझे असूझ लगने लगा। गमछा हटाने से मैंने मना कर दिया और वैसे ही सीढ़ियाँ उतरता गया। पानी में कई लोग छपा-छप कूद रहे थे। कुछ डुबकी लगा रहे थे। कुछ महिलायें भी स्नान कर रही थीं। थोड़ा सा हटकर बचते बचाते मैं भी पानी में जा कूदा। पानी थोड़ा गंदला था लेकिन वहां यह सब सोचने का वक्त नहीं था। दो चार डुबकी के बाद, अच्छे से नहाने के बाद मैंने ध्यान दिया तो कमर में गमछा था ही नहीं। केवल अंडरवियर ही था। थोड़ी नजर दौड़ाई तो पास ही गमछा सतह पर तैरता दिखा। झपटकर गमछा पकड़ा। फिर से हल्का से कमर में लपेटने के बाद अबकी फाइनल डुबकी लगाई। उधर सूरज उगना शुरू हो गये थे। आंख मूंद कर नमन करने के बाद गंगा जी को प्रणाम कर फिर सीढ़ियों की ओर बढ़ा। उपर सीढ़ियाँ चढ़ते फिर एक बार गमछा व्यवस्थित किया। भ्राता श्री मेरी ओर देख हंस रहे थे। शायद अंडरवियर+गमछे में कुछ ज्यादा ही फन्नी लग रहा था।

   उपर सीढ़ियों के पास पहुँच कर कपेड़ बदला। भ्राता श्री को नहाने भेजा और मैं कपड़े, मोबाइल की रखवाली में लग गया। उसी दौरान फोन किया तो पता चला गिरिजेश महाराज अभी आस-पास ही हैं, बस पहुँचने ही वाले हैं...... 

जारी.....

राँड़, साँड़, सन्यासी.....बनारस यात्रा - 4

    दशाश्वमेध घाट से रिश्तेदार के यहाँ कैंट पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज गये थे। कुछ दुक्खम-सुक्खम बोला बतियाया गया, कुछ जमाने की बतकही चली। इसी बीच चर्चा चली कि बनारस कैसा है ?.....क्या खासियत है ?.....क्या कैफ़ियत है ?....आजकल किस मूड में है बनारस ? इसी चर्चा के दौरान एक परिचित जिनका बनारस में ही जन्म हुआ है, जो पिछले चालीस साल बनारस में ही रहते आये हैं, उनका मानना था कि "बनारस जितना गंदा शहर कोई नहीं। इतना अपवित्र और घृणित शहर होने के बावजूद यह पूजनीय कैसे है यही आश्चर्य है"

  उनकी बात सुनकर हैरानी नहीं हुई। इस तरह का नज़रिया हर किसी का अपने-अपने शहरों के प्रति कभी काल रहता ही है। मैं भी अपने शहर को इसी नजरिये से देखता हूं। मेरी तरह न जाने कितने लोग अपने अपने शहर को गंदा मानते होंगे। लेकिन फिर भी रहते वहीं हैं। यह सिनिक अप्रोच यदा-कदा हर किसी में कभी न कभी मुखर हो उठता है। संभवत: उन परिचित की "सिनिकल पूरनमासी" चल रही हो। इसी तरह की बातें मैं भी महसूस करता हूं जब अपने शहर की किसी भद्दी, किसी वाहियात किस्म की भंड़ैती से तंग हो जाता हूँ। प्रांतवाद, गंदी राजनीति, पोस्टर वार, पुकारने में 'रेकार' की बहुलता, बात-बात में झंडुपना। लेकिन रहना यहीं हैं। कुछ तो मजबूरी, कुछ आदत। यह भी होता है कि किसी से आप ताजिंदगी नफरत करते रहें लेकिन उसके बिना रहना मुश्किल लगने लगता है।      

   खैर, जब बात बनारस के गुणों-अवगुणों की चली है तो यहाँ काशी का अस्सी के उस अंश का जिक्र करना जरूरी समझता हूँ जिसमें एक अंग्रेजन कैथरीन रिसर्च करने बनारस आती है और उसे यहां रांड़, सांड़, सन्यासियों के बारे में कुछ ऐसी बातें पता चलती हैं कि उनका जिक्र पप्पू की दुकान में बैठे बनारसी ब्रम्हानंद, गया सिंह आदि से कर बैठती है। कैथरीन के अनुसार बनारस में ढेर सारे विधवाओं के लिये विधवाश्रम हैं जिनके कि नाम रजिस्टरों में दर्ज हैं। उन विधवाओं के लिये अनुदान जमकर मिलता है। कईयों के घर से साल भर का राशन पानी एक साथ आ जाता है। लेकिन देखने मे आता है कि पचास साठ कमरों वाले विधवाश्रमों में केवल पांच छह कमरे ही खुले हैं बाकी पर ताला जड़ा है। जो विधवायें कैथरीन से मिली भी वे किसी भी नजरिये से विधवा नहीं नजर आ रहीं थीं।

  कैथरीन का दूसरा प्रश्न सन्यासियों के बारे में हुआ कि -  यहाँ सन्यासी कौन है ? वो जो धूनी रमाए बैठा है और पैदल चल सकता है या वह जो मारूति, सुमो, मैटीज जैसी गाड़ियों में घूमता है - तरह तरह के देशी-विदेशी असलहों के साथ, मुस्टंड चेलों के साथ ? पूजे तो वही जा रहे हैं जो गाड़ियों में घूम रहे हैं, आश्रम और मठ भी उन्हीं के हैं, चेले-चाटी और भक्त भी उन्हीं के हैं। जो धूनी रमाए बैठे हैं, भिखमंगे से ज्यादा उनकी औकात नहीं है। कैथरीन ने घूम-घूमकर जो जानकारियाँ प्राप्त की, उनसे इस नतीजे पर पहुँची कि शायद ही कोई ऐसा सन्यासी या साधु हो जिस पर कत्ल के दस-पाँच मुकदमे न हों, जिसके पास ढेरों वैध-अवैध असलहे और हथियार न हों, जो आश्रम और मठों के नाम पर दस-पन्द्रह एकड़ जमीन न कब्जियाए हो ? सन्यासी किसे कहेंगे आप ?

   अगली बात उठी साँड़ों के बारे में। जिसके बारे में वहाँ मौजूद शिव प्रसादजी बोल पड़े - "देखिए तो पहले हर गली, मोहल्ले, सड़क, चौराहे पर साँड़। सही है कि पहचान थे बनारस के। न राहगीरों को उनसे दिक्कत, न उनको राहगीरों से। अत्यंत शिष्ट, शालीन, धीर-गम्भीर, चिन्तनशीलष न ऊधो का देना न माधो का लेना। आपस में लड़ लेंगे लेकिन किसी को तंग न करेंगे। बहुत हुआ तो सब्जी या फल के ठेले में मुँह मार लिया, बस ! वह भी तब जब देखा कि माल है लेकिन लेनदार नहीं। आप अपने रास्ते वे अपने रास्ते। वरना बैठे हैं या चले जा रहे हैं, किसी से कोई मतलब नहींष मन में कोई वासना भी नहीं। गायों के साथ भी राह चलते कोई छेड़खानी नहीं। हाँ भूख से बेहाल आ गईं तो तृप्त कर देंगे। निराश नहीं लौटने देंगे"

 "महोदय यह अपने बारे में बोल रहे हैं या साँड़ों के बारे में ?"  

 ब्रम्हानंद की चुटीली टिप्पणी को अनसुनी करते हुए शिव प्रसाद आगे कहते हैं - "ऐसा है मैडम, वृष्णोत्सर्ग कर्मकांड का एक विधान था। श्राद्ध से पूर्व एकादश को करते थे। त्रिशुल से दागकर छोड़ देते थे पुण्य-लाभ के लिए - कि जाओ, गोवंश की वृद्धि करो। लेकिन आज- जब मृतक के आश्रितों को ही नहीं पोसा रहा है तो साँड़ कहाँ से आएंगे ?"

   कैथरीन, ब्रम्हानंद, शिव प्रसाद और गया सिंह के बीच बनारस को लेकर यह चर्चा आगे चलती है.... निष्कर्ष के तौर पर कैथरीन राँड़ों, सांड़ों और सन्यासियों के आँकड़ों की बात करते हुए कहती है कि - 'वाराणसी इज डाइंग' ! "बनारस, जिसे लोग पढ़ते, सुनते, जानते थे - मर रहा है आज" !
   
     कैथरीन के द्वारा वाराणसी इज् डाईंग कहना वहां मौजूद गया सिंह को अखर गया। शब्द बाण शुरू हो गये। बनारस के मरने की बात सुनकर आहत हुए डॉ. गया सिंह को रोकना मुश्किल। 

    "तो क्या चाहती हैं आप कि मठ और आश्रम राँड़ों से भरे रहें ? साँड़ सड़कों और गलियों में जहाँ तहाँ गोबर करते रहें ? साधू-सन्यासी दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाए लोगों को चूतिया बनाते रहें ?"

 गया सिंह की उत्तेजना को लोगों ने शांत कराना चाहा लेकिन गया सिंह कहां रूकने वाले थे। जारी रहे।

    "घंटे भर से सिर हिला रहे हैं आप और वह कह रही है कि बनारस मर रहा है। इसी बनारस में हम भी हैं, आप भी हैं और यह अस्सी भी है, इसी बनारस के लिए सात समुन्दर पार से दौड़ लगा रहे हैं भोंसड़ी के ये अंग्रेज; लेकिन यह कह रही हैं और आप सिर हिला रहे हैं - सिर्फ इसलिये कि पाँच सौ की दिहाड़ी पर घर बैठ आपको काम चाहिये ; एक ऐसा विदेशी किराएदार चाहिए जिसकी खातिरदारी में आपका पूरा परिवार लगा रहे। यह नहीं देख रहे कि यही साले मार रहे हैं बनारस को और कह रहे हैं कि मर रहा है !"   

"अरे यार ! कुछ तो लिहाज करो महिला है !"

"महिला है तो कपार पर बैठकर मूतेगी ?"

     यह अंश भले काशी का अस्सी में वर्णित हो लेकिन कैथरीन के "वाराणसी इज् डाईंग" संवाद की तरह ही एक और शहर के लिये ऐसी ही बात एक फिल्म में कही गई थी और वह शहर है "बम्बई" ! ठीक यही संवाद ओम पुरी ने एक फिल्म में कहा था - "बॉम्बे इज् डाईंग"। सीन कुछ यूं था कि व्यवस्था और माहौल से हताश ओम पुरी बम्बई की सड़कों पर घूम रहे होते हैं, रास्ते में किसी से झगड़ा करते हैं। बगल में ही एक पेन्टर "Bombay dyeing" की होर्डिंग पेन्ट कर रहा होता है। ओम पुरी तैश में आकर जबरदस्ती उसका रंग लगा ब्रश अपने हाथ में ले लेते हैं और Bombay dyeing के बीच हाथ से "is" लिख देते हैं जिससे विज्ञापन का पूरा अर्थ बदल कर - "Bombay is dyeing" हो जाता है। ओम पुरी चिल्लाकर कहते हैं - "हां, बम्बई मर रही है। बॉम्बे इज् डाईंग"।

   बहरहाल इस चर्चा को यहीं विराम देते हुए इतना कहना समीचीन होगा कि हर शहर को लोग चाहने वाले होते हैं, उससे नफरत करने वाले भी ढेरों होते हैं, उसमें मजबूरी में रहने वाले लोग भी होते हैं। कुछ शहर सामाजिक समरसता में रचे-पगे रहते हैं तो कुछ दंगों की विद्रूपता झेलने को अभिशप्त। कहीं चारों ओर गंदगी ही गंदगी होती है तो ढेर सारी साफ-सुथरी, अट्टालिकाएं भी होती हैं। कोई शहर धार्मिक होता है, कोई नास्तिक तो कोई मिला-जुला गड्डमगड्ड। समय के साथ शहर की कुछ पुरानी चीजें ढह रही होती हैं तो कुछ नई चीजों का आगमन भी होता है। लेकिन वाराणसी की मौलिकता तो उसके पुन्नेपन में है। नया आने पर समायोजन भी हो जायगा जैसे और शहरों में होते हैं। लेकिन पुन्नेपन के नाम पर वाराणसी इज् डाईंग का तमगा मिलना थोड़ा कटु और आहत करने वाली बात लगती है। संभवत: इसके पीछे हमारी पुरातन सोच, संस्कार या सुनी गई बातें हों जो वाराणसी को सबसे पुराना जीवित शहर मानती आई हैं। ऐसे में धीर-गंभीर विदुषी कैथरीन के द्वारा जमा किये गये आंकड़े, उसके अवलोकन लोगों की सोच को झटके तो अवश्य देंगे, कुछ गया सिंह की तरह आहत भी होंगे, कुछ ब्रम्हानंद की तरह गया सिंह जैसों को शांत भी करेंगे।

    उस रात इन्हीं सब बातों को सोचते बिचरते हम सो गये थे। फिर सुबह जल्दी उठकर वापस गंगा घाट लौटकर नहाना भी तो था.....   

जारी.....

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