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Wednesday, November 28, 2012

गाँवों में साहित्य की ऊभ-चूभ


     बहुत ही दिलचस्प ढंग से गाँवों में साहित्य की स्थिति पर श्री विवेकी राय जी द्वारा लिखा गया यह लेख जब पढ़ने लगो तो लगता है जैसे तीन चार दशक पीछे पहुंच गये हैं। हांलाकि अब भी साहित्यिक रूप से गाँवों में स्थिति कुछ वैसी ही है लेकिन हाल फिलहाल लोग बीएड आदि करके टीचर बनने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं। शिक्षितों की संख्या भी बढ़ी है लेकिन साहित्य की स्थिति अब भी जस की तस है बल्कि और बदतर। तो लिजिए पढ़िये विवेकी राय जी के लिखे उस मजइत लेख का दिलचस्प अंश।

                   'हमारे गाँवों के साहित्यिक नवरत्न'

    बहुत कठिन सवाल है उन लोगों का जो गाँवो में रहते हैं। बौद्धिक स्तर क्या है और साहित्यिक संस्कार कैसा है ? अपने गाँव को देखता हूँ तो चोटी पर दिखाई पड़ते हैं। सत्तर वर्षीय दूखनजी जो अपने परिमित साहित्य पर अपरिमित विश्वास के बल पर नये पढ़े-लिखे लोगों को ललकारते रहते हैं। उनकी सबसे प्रिय पुस्तक प्रेमसागर है जिसे वे मारे आदर के रामायन कहते हैं। उन्हें गर्व है कि उन्होंने पूरा हनुमान चालीसा और बारहखण्डी जवान थे तभी कंठाग्र कर लिए और मनोरंजन भजनमाला, दानलीला, बृहत इन्द्रजाल और राशिमाला आदि को अनेक बार बांचकर छोड़ दिया है।

  इनके मित्र हैं घूरा साहु। ये और दूखनजी दोनों मिलकर रामचरित मानस का खूब अर्थ करते हैं। इन लोगों का विश्वास है कि यदि कविता में राम का वर्णन नहीं है तो वह कांव-कांव है। लेकिन, घुरा साहू दूखन से कुछ आगे हैं। कल्याण पत्रिका मंगाते हैं। गीता और उपनिषद भी रखते हैं। स्नान के बाद देवताओं की तरह रामायण पर जल छिड़ककर धूपदानी घुमा देते हैं। रामायण के बाद इनका अनमोल ग्रंथ है निरमल दास का विचारसागर। दुनिया का सारा ज्ञान इसमें भरा बताते हैं। भक्तमाल, ब्रजविलास और महाभारत भी कभी-कभी बांचकर सुनाते हैं। नित्य पाठ चलता है रामचरितमानस का। वास्तव में साहुजी गंभीर प्रसंगों की भी सुबोध, सटीक और प्रमाणयुक्त व्याख्या कर लेते हैं।
  ऐसा लगता है कि साहित्य के नाम पर यह रामायण ही गाँवों में शेष है। इसका प्रभाव पढ़-अपढ़ सब पर है। साहित्य का स्वाद तो लोगों को मुनाफे में मिलता है, मूल वस्तु है धर्म। इस धर्मप्राण देश के गाँवों में धर्म का संस्कार ऐसा मन-प्राण पर छाया है कि इससे रिक्त साहित्य का वहां कोई मूल्य नहीं। गोदान भागवत के आसन पर नहीं बैठ सका और न साकेत का रामायण की तरह वाचन-गायन ही संभव हुआ। निरक्षर रामटहल राय को रामचरितमानस का एक-एक प्रसंग जबानी याद है। सैकड़ों चौपाइयों का मुहावरों की तरह बात-बात में प्रयोग करते हैं।
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 आगे विवेकी जी लिखते हैं कि,

गाँव स्थित नये पढ़े-लिखे लोगों में अध्यापक, लेखपाल, बाहर से नौकरी छोड़कर आये लोग, फाइनल परीक्षाओं में फेल लोग और साधु-सन्त आदि ही प्रमुख हैं। मानसिक दृष्टि से इनमें सोलहवीं से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक के लोग हैं। चमनलाल लेखपाल उपन्यास की परिभाषा यों करते हैं, उपन्यास उसे कहते हैं जिसमें पहले लिखी जाने वाली बात बाद में लिखी जाय और बाद में लिखी जाने वाली बात पहले लिखी जाये. इनके लिये दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है चन्द्रकान्ता। उसी ने पढ़ने की चाट लगायी और अब तो भोजन से भी जरूरी इनके लिये उपन्यास है। उनके उपन्यास मांगने पर पूछिए कि कैसा उपन्यास चाहिये तो एकमात्र उत्तर है, कुशवाहा-कान्त-का-सा । जिन नये उपन्यासों में विचारों का घात प्रतिघात है अथवा जिसकी भाषा कुछ असाधारण है जैसे दिव्या, बाणभट्ट की आत्मकथा, शेष प्रश्न, नदी के द्वीप और वयं रक्षाम इत्यादि उन्हें वे दूर से सलाम बोलते हैं। एक दिन खेद प्रकट कर रहे थे कि ब्लेक सीरीज के चवन्नी-अठन्नी सीरीज के निकलने वाले जासूसी उपन्यास जाने क्या हो गये ?  मुन्शीजी का प्यार किस्सा चहार दरवेश, आल्हा-खण्ड, हातिमताई, भरथरीचरित्र, तोता-मैना, सदावृक्ष सारंगा, सिंहासनबत्तीसी और बैतालपचीसी से भी अभी पहले जैसा है।
  इनका एक महान कार्य सदा याद किया जायगा। चन्द्रकान्ता पढ़कर सुनाते सुनाते अपने मित्र सीताराम में किताब पढ़ने की इच्छा भड़का दी। नतीजा यह हुआ कि अक्षरांध सीताराम चन्द्रकान्ता और उसी तरह के उपन्यास खेत, खलिहान, बाजार, शहर, कचहरी और यहां तक कि भैंस चराते हुए भी लेकर घूमने लगे। कोई पढ़ा-लिखा आदमी कहीं मिल गया तो बंचवाकर सुनते। मेरे यहां भी बंचवाने के लिये एक दिन गमछे में अकबर-बीरबल विनोद और बड़ा जोगीड़ा संग्रह बांधकर लटकाये आये थे। बाद में उन्होंने स्वंय पढ़ने का अभ्यास कर लिया। अब वे ऐसी किस्सा-कहानी की पुस्तकें खोजते हैं जो सरल भाषा में सरल ढंग से लिखी गई हों।
   वास्तव में यह सरल ढंग ही आज कठिन है।   
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वीर बहादुरजी की माता जिस किताब का पाठ शिवालय पर बैठकर करती हैं वह निरक्षर लोगों के लिए गीता प्रेस से छपी एकमात्र पुस्तक है। मूल्य दस पैसा है। सारे पन्नों में मोटे अक्षरों में सीता-राम सीताराम लिखा है। पाठ करने वाला बस उंगली रखता चला जाये और उच्चारण करता जाये। वीर बहादुरसिंह की पत्नी श्रीमती कलावती देवी गाँव की सबसे अधिक पढ़ी-हुईऔरत हैं और उनकी झांपी में नैहर से मिली पुस्तकों में गोपालगारी, ननद-भौजाई का झगड़ा, हनुमानचालीसा, सोरठी, सुन्दरकाण्ड. मेलाघुमनी, भजनमाला, मकईबहार, स्त्रीसुबोधिनी, रामचरितमानस सटीक और फिल्मी गीत-संग्रह प्रमुख हैं।

 अब सब मिलाकर हिसाब बैठा लीजिए कि गांवों का बौद्धिक स्तर क्या है।

                                                                                -          विवेकी राय

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पुस्तक जुलूस रूका है (रिपोर्ताज संकलन)
प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
मूल्य 20/- (संस्करण 1977)

Monday, November 5, 2012

अमां कायदे से पेश आओ....

       ऐसा माना जाता है कि चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात प्राच्य काल में ढिल्लीका एक राजनैतिक महाक्षेत्र बन चुका था। वहां से प्राप्त तत्कालीन अभिलेख दर्शाते हैं कि तत्कालीन राजनीतिक दल एक दूसरे पर "कहकर" एहसान जताने से भी नहीं चूकते थे। ऐसे ही एक अभिलेख में उल्लिखित है कि एक विदेशी आक्रमण के दौरान जब एक पक्ष सत्तापक्ष में था और दूसरा विपक्ष में तब कुछ ऐसी अंदरूनी चीजें घटित हुई थी कि तब के विपक्षी दल ने सत्ता पक्ष का साथ दिया था। कालांतर में जब वही विपक्ष सत्ता में आ गया तब उसने प्रथम पक्ष को अपने उस एहसान का याद दिलाया कि कैसे उसने विदेशी आक्रमण के समय, मुश्किल वक्त पर उसका साथ दिया था. अत: वह उस एहसान को न भूले और कायदे से पेश आये. इस प्रकरण से स्पष्ट है कि विदेशी आक्रमण के समय एकजुट होना चार हजार वर्ष पूर्व एहसान अथवा उपकार की श्रेणी में आता था।

( ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )

- सतीश यादव

Saturday, November 3, 2012

अपह्त हुएला गुरू एवम् तत्कालीन चिलगोइंया


    पुरातत्वविदों के अनुसार ढिल्लीका नामक स्थान से उत्खनन के दौरान एक ऐसा अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें कि किसी गुरू के अपहृत किये जाने का उल्लेख है। इतिहासकारों का मानना है कि अपह्रत गुरू सम्भवत: किसी ऐसे शिष्य के गुरू थे जो कि  योगाभ्यास के द्वारा अपना और अपने अन्य गुरू-भाईयों का भरण-पोषण किया करता था। कालांतर में उस शिष्य की अभिरूचि योगाभ्यास की ओर कम, तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रमों की ओर ज्यादा हो गई। शिष्य में अचानक पनपी इन अभिरूचियों से संभवत:  गुरू नाराज हो गये और उन दोनों के बीच खटपट शुरू हो गई।

   वहीं दूसरी ओर विदेशी इतिहासकारों का मानना है कि संपूर्ण विश्व में चार हजार वर्ष पूर्व अचानक ही गुरूओं पर ढेर सारी आफतें आई थी। पुराने गुरू धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे थे और नये गुरूओं की आवक घट सी गई थी। ऐसे में किसी नामी-गिरामी शिष्य के गुरू का अपह्रत हो जाना लाजिमी है।
 
   वहीं एक अन्य अभिलेख जिसे कि हरिद्वार नामक स्थान से उत्खनन में मिला है, से पुष्टि होती है कि उल्लिखित शिष्य की राजनीतिक आकांक्षा एंव बड़बोलापन कालांतर में बढ़ जाने से तत्कालीन शासन व्यवस्था ने बल प्रयोग किया था और उस कार्यवाही में शिष्य को एक महिला के रूप में भेष बदलकर, भागकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। अभिलेखों के कुछ स्थानों पर पलस्तर उखड़ जाने से इतिहासकार यह नहीं जान पाये हैं कि तत्कालीन सुरक्षा रक्षकों ने दाढ़ी-मूंछ वाली इस महिला को देख किस रूप में प्रतिक्रिया दी थी किंतु कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उस शिष्य का महिला के वस्त्रों में पाया जाना दर्शाता है कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पुरूष और महिला में भेद नहीं करती थी, सभी से एक समान व्यवहार किया जाता था। इस मत की पुष्टि उत्तर प्रदेश के लखनऊ नामक स्थान पर पाये गये एक भित्तिलेख से होती है जिसके तृतीय सोपान में विवरण दिया गया है कि वहां का कोई पुलिस अधिकारी अपने पुलिसिया कार्यकाल के दौरान ही वर्दी पहने हुए मांग में सिंदूर भर, लिपस्टिक लगा, नाक में नथुनी पहन अपनी कुर्सी पर बैठता था। इस अधिकारी को कालांतर में वृक्ष से अपना ब्याह रचाते और नारीसुलभ गीत गाते भी पाया गया। इन प्रमाणों से स्पष्टत: यह इंगित होता है कि भारत में चार हजार वर्ष पूर्व नर-नारी में विभेद नहीं होता था, उन्हें समान दृष्टि से देखा जाता था।  

 (ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )


- सतीश यादव

Friday, November 2, 2012

स्कॉर्फि़याना फ़रमान

     आजकल खापों के फरमान ढेर सारे सुनने में आते हैं। लड़कियों को जीन्स नहीं पहनने देना चाहिये। यदि कोई लड़की जीन्स पहने मिल जायेगी तो उसके गाँव के मुखिया को जुर्माना भरना पड़ेगा। फिर एक और फरमान आया कि लड़कियों को मोबाइल नहीं रखना चाहिये इससे वे बिगड़ती हैं और अभी हाल ही में फिर यह फरमान सुनने में आया कि लड़कियां स्कॉर्फ से मुँह ढंककर न चलें क्योंकि स्कॉर्फ उनके घर से भागने में सहायक है।  यदि स्कॉर्फ मुंह न ढंकें तो कोई भी लड़की पकड़े जाने के डर से नहीं भागेगी। 
  खैर, ये सारे फरमान ठहरे। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के फरमान सिर्फ हरियाणा ही में सुनाये जाते हैं, देश के बाकी जगहों पर भी इस तरह की चीजें देखने में आती हैं। अभी दो महीने पहले जब मैं अपनी लदाख यात्रा के दौरान करगिल से आगे द्रास की ओर बढ़ रहा था तब एक जगह मन हुआ कि कुछ नाश्ता कर लिया जाय तो आगे बढ़ें। आलू पराठों की दुकान दिखी और गाड़ी साईड में लगाकर हमलोग बैठ गये। इसी बीच मैं अपने बाकी के साथियों को ढाबे पर ही छोड़ वहां चहलकदमी करते हुए एक दूसरी दुकान जा पहुंचा। वहां दुकान के बाहर एक पोस्टर लगा था जिस पर कि हिजाब से संबंधित बातें लिखी थीं। पोस्टरों पर MIAC संगठन का नाम हाथ से लिखा था। थोड़ा बहुत समझने की कोशिश की तो पता चला कि इसमें महिलाओं के लिये इंस्ट्रक्शन थे कि किस तरह उन्हें खुद को ढंकना चाहिये, किस तरह से रहना चाहिये आदि आदि।
 
     तात्पर्य यह कि चाहे हरियाणा हो या कश्मीर, हर जगह इस तरह के फरमान देने वाले संगठन मौजूद रहते हैं। पंजाब में भी आतंकवाद के दौर में कुछ पोस्टर बंटे थे जिनमें महिलाओं लड़कियों के लिये हिदायत रहती थी कि वे बिंदी न लगायें, अपने आप को ज्यादा मॉडर्न न दिखायें।

    खैर, ये सारे फरमान पहले भी सुनाये जाते रहे हैं, तब जबकि नख से शिख तक ढंकी हिरोइनों का दौर था और अब भी जब पूनम पांडे आदि का दौर है। देखते हैं जमाना आगे जाकर किस करवट बैठता है ।  फिलहाल तो फरमान सुनाने वाले, सुनने वाले और उन्हें अमल में लाने वालों के बीच एक अजब सी रस्साकशी चल रही है। जितनी ही जोर से लोग महिलाओं को पर्दे में रहने को कहते हैं उतनी ही जोर से पूनम पांडे, राखी सावंत, शर्लिन चोपड़ाएं अपने अवतरित होने की मुनादी करती हैं। मध्यवर्ग पहले से मध्यम मार्ग पर है। न ज्यादा आगे जाना चाहता है न ज्यादा पीछे। तमाम असंतुष्टियों के बावजूद इतने में संतुष्ट है यही क्या कम है।

 - सतीश यादव 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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